शुक्रवार, 30 मार्च 2018

बे-फिक्र हूं 31 मार्च के आतंक से

जिन तमाम बातों की फिक्र मैं नहीं करता उनमें से एक 31 मार्च भी है। 31 मार्च को भी मैं वैसे ही बरतता हूं जैसे अन्य तारीखों को। मार्च एंड है तो क्या! कोई हव्वा थोड़े है। मैं तो बस इतना जनता हूं कि मार्च एंड में मुझे अपना कुछ भी क्लोज नहीं करना है। जो जैसा चल रहा है, चलते रहने देना है।

31 मार्च की फिक्र तो वे करें जिनके लंबे-चौड़े बैंक बैलेंस हैं। या फिर वे जिन्हें काले को सफेद में बदलकर खुद को सरकार और इनकम-टैक्स की निगाह में पवित्र दिखाना है।

लेकिन अपने साथ ऐसा कोई रगड़ा नहीं। जो हैसियत बाहर है वही भीतर। महीने का एंड तो छोड़िए, यहां तो जेब का हाजमा दस तारीख तक आते-आते ही गड़बड़ाने लगता है। ख़र्च और महीना कैसे निपट पाता है, मुझसे बेहतर भला कौन जानता होगा। फिर भी, कोई गम और फिक्र नहीं।

लेखक होने का चाहे कोई फायदा मिला हो या नहीं लेकिन इतना फायदा तो मिला ही है कि पूंजी के भंडार नहीं भरे हैं। ज्यादा पूंजी जोड़कर करना भी क्या है! पूंजी को तो यों भी आवारा कहा-माना गया है। वैसे, आवारगी एक धांसू विधा है पर पूंजीगत आवारगी में अपना रत्तीभर विश्वास नहीं।

पैसा हाथ का मैल है। इस मैल का यश पूंजीपतियों को ही मुबारक।
मार्च के महीने में मैंने बहुतों को हड़बड़ाते देखा है। एक अजीब किस्म का डर उन्हें चेहरों पर पढ़ा है। अपने सीए की बटरिंग करते सुना है। टैक्स के झंझटों में इतना उलझे रहते हैं कि अपनी सेहत के समीकरण तक बिगाड़ देते हैं। माना कि मार्च सबसे खर्चीला और टिपिकल महीना है पर हव्वा थोड़े है।

इतना कमाते ही क्यों हो कि हर तरफ की जमा-पूंजी का हिसाब-किताब रखना पड़े। रात को तिजोरी में ताला डालके सोना पड़े। बैंक से नोट निकालने पर्सनल गनर के साथ जाना पड़े। किताबों में हेरा-फेरी करनी पड़े। अफसरों की जेबें गर्म करनी पड़ें। दिल पर हर वक़्त यह बोझ लदा रहे कि हाय! इतना पैसा कैसे संभाल पाऊंगा?

अमां, कमाई उतनी ही क्यों नहीं करते जितनी जेब गवाही दे। जेब की औकात से बाहर कमाओगे टेंशन तो रहेगी ही महाराज। लेकिन हम कहां मानते हैं। लोग तो लाश का भी सौदा कर जाते हैं यहां।

सुख से हूं कि लेखक हूं। न ऊंची-मोटी कमाई है। न घर में तिजोरी की जगह है न जेब पर अतिरिक्त बोझ। जितना कमा पा रहा हूं, जीवन की गाड़ी टनाटन चल रही है। फकीरी का भी अपना ही आनंद है शिरिमानजी।

सबको मालूम है, साथ कुछ लेकर नहीं जाना। सब जोड़ा-जाड़ा यहीं छोड़ जाना है। फिर भी, आदमी टेंशनग्रस्त है। 31 मार्च की फिक्र में यों दुबला हुआ जा रहा है मानो सबकुछ क्लियर कर वो कोई बहुत बड़ा तीर मार लेगा! सरकार से ईनाम पाएगा! समस्त पाप धो लेगा!

जिन्हें 31 मार्च के लिए फिक्रमंद रहना है, रहें। मैं उनकी फिक्रमंदी के लिए दुआरत हूं।

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