शनिवार, 31 मार्च 2018

सोशल मीडिया के मूर्ख

पत्नी मुझे सोशल मीडिया का मूर्ख कहती है। पत्नी है। सच ही कहती होगी! यों भी, पत्नियां अपने पतियों के बारे में 'झूठ' कहती कब हैं! खुद के बारे में पत्नी के कहे का पहले कभी बुरा नहीं माना तो अब क्या मानूंगा! यह क्या कम बड़ी बात है कि पत्नी मेरे बारे में 'कुछ कहती' है। 'सही' कहती है या 'गलत'; यह अलहदा बहस का मुद्दा हो सकता है। मगर मैं बहस कभी नहीं करना चाहूंगा। पत्नी के कहे पर पति को बहस कभी करनी चाहिए भी नहीं। बहस बेलन में तब्दील होते देर ही कितनी लगती है।

जी हां, मुझे यह स्वीकार करने में रत्तीभर एतराज नहीं कि मैं सोशल मीडिया का मूर्ख हूं। जिनके लिए होगा लेकिन मेरे लिए मूर्ख होना न तो पाप है न शर्मिंदा होने का कोई कारण। खुशनसीब होते हैं वो जिनमें मूर्खता जन्मजात होती है। मुझमें है, इस बात का मुझे गर्व है।

एक मैं ही क्यों सोशल मीडिया पर मौजूद हर शख्स किसी न किसी लेबल पर मूर्ख ही है। अपनी मूर्खता का प्रमाण वो अक्सर अपनी पोस्टों से देता रहता है। कुछ मूर्ख तो इतने महान हैं कि वे 24x7 फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से समाज-दुनिया में क्रांति करने का जोर लगाते रहते हैं। पर क्रांति है की होना तो दूर, उनके आस-पास भी नहीं फटकती। क्रांति कोई लड्डू-पेड़ा थोड़े ही है कि खाया और हो गई।

सोशल मीडिया पर मूर्खता दर्शाने का अपना आनंद है। किसी भी छोटे से छोटे मुद्दे पर ट्रॉलिंग का लेबल चढ़ा कर उसे एकाध दिन खूब भुनाया जा सकता है। जिसे देखो वो ही बहती गंगा में हाथ धोने आ जाता है। आनंद तो वे लोग भी खूब लेते हैं जो अक्सर ट्रोलिंग पर लंबा-चौड़ा भाषण देते पाए जाते हैं।

दूसरे की मूर्खता पर हंसना सबसे आसान होता है बा-मुकाबले अपनी मूर्खता पर हंसने के।

मैं तो कहता हूं, सोशल मीडिया की गाड़ी चल ही हम जैसे सोशल मूर्खों के कारण रही है। अगर हम अपनी मूर्खताओं को जग-जाहिर न करें तो न यहां कोई हंसे न मुस्कुराए। सब बुद्विजीवियों की तरह या तो माथे पर बल डाले बैठे रहें या फिर किसी गंभीर विमार्श में अपनी खोपड़ी खपाते रहें। वो तो बुद्विजीवियों ने सोशल मीडिया पर अपना कब्जा जमा रखा है वरना यह प्लेटफॉर्म उनके लिए है ही नहीं। वे तो किताबों के पन्नों पर ही चंगे लगते हैं।

जो करते हों उनकी वे जाने पर मैं सोशल मीडिया पर जरा भी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करता। यह वो जगह है ही नहीं जहां बुद्धि को खर्च किया जाए। यह तो नितांत मनोरंजन की जगह है। जहां आप अपनी निजताओं का त्याग कर सुकून भरी सांस ले सकते हैं। अपने खान-पान से लेकर सोने-जागने तक के सिलसिले को लिख अपनी वॉल भर सकते हैं। तिस पर भी आप जुकरबर्ग को सिर्फ इसलिए कोसते रहें कि उसने आपकी निजता का ख्याल नहीं रखा, तो महाराज आप बहुत बड़े वाले हैं। अपनी निजता अपने हाथ। जुकरबर्ग ने कोई ठेका थोड़े न लिया हुआ है आपकी निजताओं के सरंक्षण का।

लेकिन मुझ जैसे मूर्ख इन सब बोगस चिंताओं में नहीं पड़ते। हम सोशल मीडिया के मूर्खों का कुछ भी निजी नहीं। सबकुछ पब्लिक है। जो भी जब चाहे हमारी मूर्खताओं का आनंद उठा सकता है।

इसीलिए तो मैं पत्नी के मुझको सोशल मीडिया का मूर्ख कहने का बुरा नहीं मानता। अपने पति की काबिलियत को पत्नी से बेहतर कोई समझ सका है भला! नहीं न...!

तो अपनी मूर्खताओं पर खिझिये नहीं, उन्हें एन्जॉय कीजिए। जैसे मैं करता रहता हूं। सोशल मीडिया का लुत्फ खुद मूर्ख बने लिया ही नहीं जा सकता।

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

बे-फिक्र हूं 31 मार्च के आतंक से

जिन तमाम बातों की फिक्र मैं नहीं करता उनमें से एक 31 मार्च भी है। 31 मार्च को भी मैं वैसे ही बरतता हूं जैसे अन्य तारीखों को। मार्च एंड है तो क्या! कोई हव्वा थोड़े है। मैं तो बस इतना जनता हूं कि मार्च एंड में मुझे अपना कुछ भी क्लोज नहीं करना है। जो जैसा चल रहा है, चलते रहने देना है।

31 मार्च की फिक्र तो वे करें जिनके लंबे-चौड़े बैंक बैलेंस हैं। या फिर वे जिन्हें काले को सफेद में बदलकर खुद को सरकार और इनकम-टैक्स की निगाह में पवित्र दिखाना है।

लेकिन अपने साथ ऐसा कोई रगड़ा नहीं। जो हैसियत बाहर है वही भीतर। महीने का एंड तो छोड़िए, यहां तो जेब का हाजमा दस तारीख तक आते-आते ही गड़बड़ाने लगता है। ख़र्च और महीना कैसे निपट पाता है, मुझसे बेहतर भला कौन जानता होगा। फिर भी, कोई गम और फिक्र नहीं।

लेखक होने का चाहे कोई फायदा मिला हो या नहीं लेकिन इतना फायदा तो मिला ही है कि पूंजी के भंडार नहीं भरे हैं। ज्यादा पूंजी जोड़कर करना भी क्या है! पूंजी को तो यों भी आवारा कहा-माना गया है। वैसे, आवारगी एक धांसू विधा है पर पूंजीगत आवारगी में अपना रत्तीभर विश्वास नहीं।

पैसा हाथ का मैल है। इस मैल का यश पूंजीपतियों को ही मुबारक।
मार्च के महीने में मैंने बहुतों को हड़बड़ाते देखा है। एक अजीब किस्म का डर उन्हें चेहरों पर पढ़ा है। अपने सीए की बटरिंग करते सुना है। टैक्स के झंझटों में इतना उलझे रहते हैं कि अपनी सेहत के समीकरण तक बिगाड़ देते हैं। माना कि मार्च सबसे खर्चीला और टिपिकल महीना है पर हव्वा थोड़े है।

इतना कमाते ही क्यों हो कि हर तरफ की जमा-पूंजी का हिसाब-किताब रखना पड़े। रात को तिजोरी में ताला डालके सोना पड़े। बैंक से नोट निकालने पर्सनल गनर के साथ जाना पड़े। किताबों में हेरा-फेरी करनी पड़े। अफसरों की जेबें गर्म करनी पड़ें। दिल पर हर वक़्त यह बोझ लदा रहे कि हाय! इतना पैसा कैसे संभाल पाऊंगा?

अमां, कमाई उतनी ही क्यों नहीं करते जितनी जेब गवाही दे। जेब की औकात से बाहर कमाओगे टेंशन तो रहेगी ही महाराज। लेकिन हम कहां मानते हैं। लोग तो लाश का भी सौदा कर जाते हैं यहां।

सुख से हूं कि लेखक हूं। न ऊंची-मोटी कमाई है। न घर में तिजोरी की जगह है न जेब पर अतिरिक्त बोझ। जितना कमा पा रहा हूं, जीवन की गाड़ी टनाटन चल रही है। फकीरी का भी अपना ही आनंद है शिरिमानजी।

सबको मालूम है, साथ कुछ लेकर नहीं जाना। सब जोड़ा-जाड़ा यहीं छोड़ जाना है। फिर भी, आदमी टेंशनग्रस्त है। 31 मार्च की फिक्र में यों दुबला हुआ जा रहा है मानो सबकुछ क्लियर कर वो कोई बहुत बड़ा तीर मार लेगा! सरकार से ईनाम पाएगा! समस्त पाप धो लेगा!

जिन्हें 31 मार्च के लिए फिक्रमंद रहना है, रहें। मैं उनकी फिक्रमंदी के लिए दुआरत हूं।

गुरुवार, 29 मार्च 2018

उनसे भूल हो गई, उनका माफी दई दो...

एक जमाने में उनके 'आंदोलन' खूब चर्चा में रहते थे, आजकल 'माफीनामे' चर्चा में हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जिस दिन वो विरोधी दल के नेता से माफी न मांग रहे हों। कोई दब-छिपकर नहीं, खुलकर माफी मांग रहे हैं। हालांकि उनको इस तरह माफी मांगते देखना अच्छा तो नहीं लग रहा लेकिन सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते। उनके साथ भी लगभग यही सीन बन रहा है।

माफी मांगना उनके लिए न केवल समय मांग है बल्कि राजनीति का तकाजा भी। जीवन में अपने विरोधियों से लड़ने-भिड़ने की भी एक सीमा होती है महाराज। होते हैं कुछ साहसी लोग जो पूरी जिंदगी ही लड़ने में बीता देते हैं। लेकिन अगर माफी मांगकर बीच का रास्ता निकल आए तो माफी इतनी बुरी भी नहीं। वैसे भी, राजनीति में नेता को हर कदम देख-भाल कर उठाना चाहिए। कब, किस मोड़ पर किस पार्टी या नेता का दामन थामना पड़ जाए, इसका विशेष ख्याल रखना पड़ता है।
मैं देख रहा हूं कुछ लोग उनके माफी मांगने से खुश नहीं। फेसबुक, ट्विटर पर अपनी नाराजगी उनसे लगातार व्यक्त भी कर रहे हैं। उनकी ईमानदारी, उनके साहस, उनकी निष्ठा पर सवाल उठा रहे हैं। अपने विरोधियों की तरफ झुका हुआ तक कह रहे हैं।

बड़े नादान हैं लोग। कुछ समझते ही नहीं। यों भी, किसी को सलाह देना बहुत आसान है मगर जब खुद पर पड़ती है तो ऊपर से लेकर नीचे तक के टांके ढीले हो जाते हैं। राजनीति में रहकर विरोधी नेताओं से थोड़ा-बहुत विरोध तो चलता है। मगर विरोध इतना तगड़ा भी न हो कि अगले की लाइफ मुकदमों के झमेले में ही उलझ कर रह जाए।

एकाध मुकदमा हो तो बंदा लड़ भी ले किंतु यहां तो उन पर मुकदमों की लिस्ट खाने के मीनू से भी कहीं अधिक लंबी है। पूरी जिंदगी लड़कर भी चार-पांच फिर भी बाकी रह जाएंगे। तो बेहतर और बीच का रास्ता तो यही है कि एक-एक कर विरोधी नेताओं से माफी मांग ली जाए। कम से कम आगे का राजनीतिक सफर तो सुकून से कटेगा।

बात जहां तक ऊंचे आदर्शों, ईमानदारी, सत्यता आदि की है, ये सब किताबों में ही अच्छी लगती हैं, राजनीतिक और सामाजिक जीवन इसके उलट ही होता है। उलट होना चाहिए भी। इमानदारी के चक्कर में अगर पड़े रहेंगे तो दो वक्त की छोड़िए, एक वक्त की रोटी भी नसीब न होगी महाराज।

मैं नहीं समझता, माफी मांगकर वे कोई पाप कर रहे हैं। बल्कि माफी के आदर्श को समाज के बीच स्थापित कर रहे हैं। बता रहे हैं, शांति और चैन का रास्ता माफी मांग कर ही निकल सकता है। माफी कठोर से कठोर को पिघलाने का माआदा रखती है। माफी मांगकर बंदा जीवन में ऊंचे मानक बना सकता है। माफी मांगकर न केवल राजनीतिक कॅरियर बल्कि नौकरी को जाने से लेकर शादी को टूटने तक से बचाया जा सकता है। शमी यही तो गलती कर रहा है। बीवी से माफी मांग ले तो झगड़ा तुरंत सेट हो जावे। पता नहीं लोगों को अपनी बीवी से माफी मांगने में इतनी शर्म क्यों आती है। एक मैं हूं जो 24x7 अपनी न केवल अपनी बीवी बल्कि जो रास्ते में मिल जाता है उससे बे-बात ही माफी मांग लेता हूं।

सॉरी कहने में कोई एक्स्ट्रा एनर्जी थोड़े न बर्न करनी है।
ऐसा भी कोई है दुनिया में जो माफी न मांग रहा हो! हर कोई अपने-अपने स्तर पर किसी न किसी मसले को लेकर माफी मांग ही रहा है। यह बात अलग है कि माफियों के रंग अलग-अलग हैं। पर माफी तो मांग ही रहे हैं न।

इतिहास किस्म-किस्म के माफीनामों से भरा पड़ा है। सबसे ज्यादा माफीनामे राजनीति के हैं। जिन्होंने माफी नहीं मांगी उनका हश्र या तो दुर्योधन जैसा हुआ या फिर कंस जैसा। रावण भी अगर माफी मांग लेता तो आज बहुतों का आदर्श होता! नहीं क्या?

किसी को हो चाहे न हो पर मुझे तो आदरणीय के माफीनामे पर घणा गर्व है। बल्कि मुझे तो यह सीख हासिल हुई है कि जब, जहां अपना दांव कमजोर पड़ने लगे तुरंत माफी मांग लो। इसी में खुद की भलाई है। हर वक़्त की ऐंठबाजी ठीक न होती पियारे।

और फिर वे माफी ही तो मांग रहे हैं। कोई चोरी-चकारी थोड़े न कर रहे। माफी में शर्मिंदा होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। यह बहती गंगा में हाथ धोने जैसा करम है।

अतीत में की गई भूलें एक-एक कर अब वो सुधार रहे हैं। यह एक अच्छी शुरुआत है। बाकी लोगों का क्या है उनका तो कम ही है कहना।

अभी जिन्होंने उन्हें माफी नहीं दी है, मुझे पूरी उम्मीद है, एक दिन वे भी उन्हें माफी दे ही देंगे। अंत में जीत तो माफी की ही होनी है।

मंगलवार, 27 मार्च 2018

आइए, मूर्तियां लगाएं

पहले मैं मूर्तियों के खिलाफ था। जबकि मुझे नहीं होना चाहिए था। मूर्तियां रहती हैं तो राजनीतिक व सामाजिक दलों को गाहे-बगाहे 'फेम' दिलवाती रहती हैं। पक्षियों के रहने-बैठने का ठिकाना होती हैं। मूर्तियों के नीचे खड़े होकर नारे लगाने और क्रांति करने का हौसला पैदा होता है। मूर्तियां रह-रहकर हमें इतिहास के सबक भी याद दिलाती हैं। कभी-कभार महापुरुषों की मूर्तियों के गले मालाएं डालने से लेकर आयोजन की डोरियां लपेटने के काम भी आती हैं। जब बस नहीं चलता तो कुछ कुंठित लोग मूर्तियां तोड़ते हैं। मूर्तियां तोड़कर वे दूसरे की विचारधारा को धकिया अपनी विचारधारा थोपने की जुगाड़ में रहते हैं।

कुछ दिन पहले मोहल्ले वालों ने चौराहे पर मेरी मूर्ति लगाना तय किया। इस बाबत मुझसे मेरी सहमति भी मांगी गई। किंतु मैंने यह कहते हुए मना करने की कोशिश की कि मेरी मूर्ति लगाने से बेहतर यह होगा कि किसी क्रांतिकारी महापुरुष की मूर्ति लगाई जाए। मगर मोहल्ले वालों को मेरा सुझाव पसंद नहीं आया। वे मेरी ही मूर्ति लगाने पर डटे रहे।

जब मैंने उनसे पूछा कि 'आप लोग मेरी ही मूर्ति लगाने की जिद पर क्यों अड़े हुए हैं?' तो उनका जवाब था- 'आप चूंकि न केवल हमारे मोहल्ले बल्कि शहर के भी बड़े लेखक हैं इस नाते हम चौराहे पर आपकी मूर्ति लगाना चाहते हैं। आपकी मूर्ति हमें सोच, विचार, धैर्य और लेखन का हौसला देती रहेगी।'

अपने प्रति उनके इतने गंभीर विचार जानकर पहले तो मैं खुद पर शर्मिंदा हुआ। फिर उनसे कहा- 'सज्जनों, अमूमन मूर्तियां तो मर चुके लोगों की लगती हैं मैं तो फिलहाल अभी आपके बीच हूं।' तभी एक सज्जन बोल पड़े- 'लेकिन हम यह करिश्मा आपके जीते-जी करना चाहते हैं। आप बस अपनी नाक और गर्दन का नाप दे दीजिए मूर्ति के वास्ते।' नाक और गर्दन का नाप सुनकर मैं थोड़ा चौंका! इतने में उन्हीं सज्जन ने बात को संभालते हुए कहा- 'मूर्ति में दो ही चीजों का खास ख्याल रखना चाहिए। एक- गर्दन, दूसरा- नाक। अप्रिय स्थिति में सबसे अधिक चोट इन्हीं पर पड़ती है।'

खैर, उनके समझाने-बुझाने पर मैंने चौराहे पर अपनी मूर्ति लगाने की इजाजत दे दी। मोहल्लेदारी में ज्यादा भाव खाना ठीक नहीं। सबका साथ में ही तो मेरा विकास संभव है।

लेकिन अभी हाल मूर्तियां तोड़े जाने की खबरों ने मुझे थोड़ा डरा-सा दिया है। मैं अपनी मूर्ति (जोकि अभी बनी भी नहीं है) के बारे में सोचने लगा। कल को यही सब अगर मेरी मूर्ति के साथ हुआ? वैचारिक असहमति रखने वाले किसी सरफिरे ने मेरी भी मूर्ति को तोड़ डाला तो मैं क्या करूंगा? कैसे बचाऊंगा अपनी नाक और गर्दन टूटने से? स्टैच्यू की तरह खड़े बुत कहां अपनी रक्षा खुद कर पाते हैं। जब तक उन्हें बचाने को लोग आते हैं सिरफिरे अपना काम तमाम कर चुके होते हैं।

'तो क्या इस डर से मूर्तियां लगाना छोड़ दिया जाए?' मैंने खुद से ही प्रश्न किया। भीतर से आवाज आई- 'नहीं। कदापि नहीं। मूर्तियां लगना अगर बंद हो जाएंगी तो कितने ही मूर्तिसाज बेरोजगार हो जाएंगे। फिर कलाकार, शिल्पकार कैसे मूर्तियों में अपनी कल्पनाओं के रंग भर पाएंगे। जैसे- रोटी, कपड़ा, मकान और मोबाइल जरूरी है उसी तरह समाज के जीने और अपनी आस्थाओं को बनाए-बचाए रखने के लिए मूर्तियां भी जरूरी हैं।'

वो देश भी कोई देश है महाराज जहां मूर्तियां न हों। चूंकि हम बड़े लोकतंत्र हैं इस नाते मूर्तियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी ज्यादा बनती है। सेक्युलरिज्म क्या होता है यह विरोधियों को हमसे सीखना चाहिए। हम मूर्तियों के प्रति भी एकदम सेक्युलर भाव रखते हैं। हमारे यहां लेनिन से लेकर गांधी, पेरियार से लेकर प्रेमचंद तक की मूर्तियां हैं। जिस तरह चंद सरफिरों ने कुछ मूर्तियों को खंडित किया उसकी हर कोई कड़ी निंदा कर रहा है। कड़ी निंदा करने का अपना असर होता है।

कोई कितना ही बड़ा मूर्तिपूजक या मूर्तिभंजक क्यों न हो मूर्ति के प्रति थोड़ी-बहुत आस्था तो रखता ही है। इसीलिए तो गाहे-बगाहे मूर्तियां बनती और लगती भी रहती हैं।

बहरहाल, मैंने अपना मूर्ति विरोध छोड़ दिया है। मैं दिल से चाहता हूं न सिर्फ मेरी बल्कि आमो-खास की भी मूर्ति लगनी चाहिए। दो-चार कुंठित लोगों के तोड़ भर देने से मूर्तियां लगनी बंद थोड़े न हो जाएंगी। बंद होनी चाहिए भी नहीं।

सोमवार, 26 मार्च 2018

डाटा ही तो था, चोरी हो गया तो क्या!

इससे कहीं अच्छा तो पहले का जमाना था, जब सोशल मीडिया हमारे जीवन में दूर-दूर तलक नहीं था। चैन से खाते थे। सुकून से पीते थे। आराम से सोते थे। जी भरकर एक-दूसरे से घंटों बातें किया करते थे। जीवन में रंग, उमंग, तरंग सबकुछ था। संवेदनशील तब भी थे पर इतने भी नहीं कि भूत का नाम सुनते ही टेंशन में आ जाएं। हनुमान चालीसा पढ़ ली फिर भूत तो क्या उसके फरिश्ते भी पास फटकने की हिम्मत न करते थे!

मगर अब तो पूरा सीन ही बदल लिया है। संवेदनशील इतने हो गए हैं कि एक जरा-सा डाटा चोरी होने पर सोशल मीडिया से लेकर संसद तक कोहराम कटा पड़ा है। उधर ट्विटर पर 'डिलीट फेसबुक' हैशटैग चल रहा है तो इधर नेता लोग आपस में ही लड़े-भिड़े पड़े हैं। बच्चों की तरह एक-दूसरे पर 'मैंने नहीं, इसने किया' टाइप इल्जाम लगा रहे हैं। डाटा चोरी का इतिहास खंगाला जा रहा है। किस कंपनी ने किस पार्टी को चुनावों में कितना फायदा पहुंचाया पर विकट बहस छिड़ी है।

मतलब देश से अन्य सभी समस्याएं दूर हो चुकी हैं। जनता खुशहाली की ओर अग्रसर है। फिलहाल बड़ी और खास समस्या डाटा चोरी की ही है। नेता लोग इसी के समाधान में रात-दिन लगे पड़े हैं। जबकि जुकरबर्ग माफी मांग चुका है।

इतनी सिंपल-सी बात किसी को समझ न आ रही कि डाटा ही तो था चोरी हो गया। इसमें कौन-सा पहाड़ टूट गया महाराज। दुनिया में जाने क्या-क्या चोरी हो रहा है। हर तरफ चोर घात लगाए बैठे हैं। लेकिन फिर भी लोग खुश हैं। मस्ती के साथ जी रहे हैं। उन्हें मालूम है कि चोरी चली गई चीज वापस तो मिलने से रही फिर काहे को मातम मनाना? दो-चार मिनट का अफसोस जताया, छुट्टी!

डाटा कोई पहली दफा तो चुरा है नहीं। महीने, दो महीने में कोई न कोई खबर किसी न किसी के डाटा चुरने की आ ही जाती है। विकिलिक्स ने तो पिछले दिनों कितनी ही बड़ी-बड़ी हस्तियों के डाटा लीक किए। क्या हुआ? कुछ भी नहीं। थोड़े दिन हंगामा कटा फिर सब शांत।

किसी और क्या कहूं; मेरे ही फेसबुक का डाटा कितनी बार चुराया जा चुका है। मगर मैंने तो न कभी जुकरबर्ग से शिकायत की न सरकार से। जरा-जरा से मसलों की शिकायत करने लग जाऊंगा तो आधी जिंदगी तो शिकायतों के हवाले ही हो जाएगी। डाटा चुरना था चुर गया। इस पर अफसोस जतलाकर क्या करना!

देखो जी, यह सोशल प्लेटफॉर्म है। यहां डाटा चोरी होना कोई बड़ी बात नहीं। ऐसे मुद्दों को हल्के में लेना चाहिए।

लोग जब अपना दिल चुरने पर हल्ला नहीं काटते तो डाटा चोरी होने पर जाने क्यों चीखे पड़े हैं? डाटा को दिल की तरह ही ट्रीट करें। चोरी हो भी गया तो क्या; कम से कम किसी के काम तो आया। जितना बांटेगे उतना मिलेगा। इंसानियत का तकाजा भी यही है।

सोमवार, 19 मार्च 2018

लोन लीजिए, लोन लेने में कोई बुराई नहीं

फिलहाल, मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि बैंक से कर्ज (लोन) लेने में कोई बुराई नहीं। बल्कि फायदा ही फायदा है। माशाअल्लाह आप अगर अमीर बंदे है तो दसों उंगलियां घी में। लोन लेके चुकाओ न चुकाओ, कोई न टोकने वाला। लोन लेके विदेश भाग जाओ तो नहले पे दहला। फिर तो मुल्क की पुलिस, सीबीआई, ईडी आदि तरह-तरह की तरकीबें ही निकालती रहेंगी आपको स्वदेश वापस लाने की। जैसे- अभी नीरव मोदी के लिए लगी पड़ी हैं।

हालांकि पुराने जमाने के लोग आज भी ठीक नहीं मानते बैंक क्या किसी से भी कर्जा लेना। वे तो साफ कहते हैं, कर्जा लेके घर बनवाया या गाड़ी खरीदी किस काम का! जैसे- भीख मांगकर अपनी इच्छा पूरी कर ली हो। चूंकि वे आदर्शवादी लोग हैं तो लाजिमी है उन्हें लोन (कर्ज) आदि लेना गया-बीता काम तो लगेगा ही। आज के जमाने की हकीकत यही है कि बिना लोन लिए काम भी तो नहीं चल सकता न। या तो दिली तमन्नाएं पूरी कर लीजिए या फिर मुंह ताकते रहिए। हर किसी के जीवन में जरूरतें इस कदर बढ़ गई हैं। अगला लोन न ले तो क्या करे।

बैंक भी भला कहां कम हैं। लोन देने को यों तैयार बैठे रहते हैं मानो उनकी कोई पुरानी उधारी हो हम पर। एक दिन में कितने बैंकों से कितने एसएमएस आ जाते हैं, हमें खुद ध्यान नहीं रहते।

अच्छा, हर चीज का लोन उपलब्ध है। आप डिमांड तो कीजिए। इधर जब से मोबाइल फोन पर लोन क्या मिलने लगा है, अब तो शायद ही कोई हाथ खाली नजर आता हो, जिसने महंगे से महंगा मोबाइल न पकड़ रखा हो। किश्तों पर अस्सी हजार तक के मोबाइल लोग इतना आसानी से ऐसे खरीद लेते है जैसे साग-सब्जी।

लोन के चलन ने लोगों की जिंदगी को बदलकर रख दिया है।

लोन लेना भी एक सब्जबाग की ही तरह होता है। चीजें जितनी सरल ऊपर से नजर आती हैं भीतर से उतनी ही टेढ़ी होती हैं। बैंकिंग व्यवस्था में लोन की परिभाषा अमीर के लिए कुछ और गरीब के लिए कुछ और है। अमीर हजारों करोड़ का लोन लेके विदेश चंपत हो जाए, मंजूर है। लेकिन गरीब द्वारा दस-पन्द्रहा हजार का लोन न चुका पाने की स्थिति में उसके घर से लेकर कपड़े लत्ते तक जब्त कर लिए जाते हैं।

लोन का सुख भोगने के लिए अमीर होना आवश्यक है। अगर रसूखदार हैं तो बात ही क्या। फिर तो बैंक वाला घर आनकर आपको लोन दे जाएगा। चुकाने के तकादे भी हैसियत देखकर ही किए जाएंगे।

कभी-कभी तो मेरा दिल भी करता है कि मोटा-तगड़ा एक लोन मैं भी ले लूं। लोन का सुख क्या होता है, थोड़ा मैं भी भोग लूं। जब चुकाने की बारी आए तो विदेश भाग लूं। जैसे और लोगों पर बनी हैं मुझ पर भी तरह-तरह की खबरें बनेंगी। चैनलों पर बहसें होंगी। अखबारों में नाम और फोटू छपेगी।

बता दूं, बदनामी से मैं नहीं डरता। बदनामी तो हाथ का मैल है। जो जितना बदनाम है वो उतना ही नाम वाला है। जो सिद्ध-पुरूष लोन लेके विदेश भाग गए, जब वे अपनी बदनामी से कभी न डरे, तो भला मैं ही क्यों डरूं!

लोन भले ही एक कर्ज है। पर इसे लेना हमारा फर्ज है। नहीं तो बैंकों के पास पड़े-पड़े पैसे को घुन नहीं लग जाएगा! घुन न लगे, चूहें न काटे, चोर चुराकर न ले जाए इसीलिए तो बैंक लोगों को लोन देकर थोड़ा हल्का हो लेते हैं।

देखो जी, दुकान हर किसी की चलती रहनी चाहिए। चाहे वो बैंक हो या आम आदमी। लोन लेने में बुराई कोई नहीं। बल्कि खुद की हैसियत में चार चांद ही लगते हैं।

लोन के सहारे ही सही अगर दिल के कुछ अरमान पूरे हो रहे हैं तो कर लीजिए। क्योंकि जिंदगी न मिलेगी दोबारा। जब धरती पर आए हैं तो लोन से लेकर जेल तक का हर अनुभव लीजिए। परिणाम की चिंता कतई न कीजिए। चिंता चिता समान। नीरव मोदी, ललित मोदी, विजय माल्या अपनी-अपनी चिंताओं पर खाक ही तो डाले हुए हैं। और, बेहतर सुख में हैं!

चलिए फिर, लोन लेकर थोड़ा-बहुत फर्ज मैं भी निभा ही लूं। क्यों ठीक है न!

गुरुवार, 15 मार्च 2018

रिस्क से इश्क कीजिए

रिस्क लेने का अपना मजा है। दाल में नमक का स्वाद और दूध में पानी की मात्रा रिस्क लेकर ही समझ आती है। रिस्क लेकर ही पता चलता है कि आपका दिल वाकई मजबूत है या मजबूत करने की गोलियां ले रहे हैं। बिना रिस्क लिए तो आप पत्नी के बनाए खाने की 'बुराई-भलाई' भी नहीं कर सकते। मैं तो यहां तक कहता हूं, नेता बनना लेखक बनने से कहीं अधिक रिस्की है। चाहे तो खुद पर आजमा कर देख लीजिए।

रिस्क लेना क्या होता है यह मार्केटिंग के उस बंदे से पूछिए जो हर रोज अपने माल को बेचने की कोशिश अपनी नौकरी को रिस्क पर रखकर करता है।

इंसान की जाने दीजिए, अब तो जिंदगी भी इतनी सयानी हो चली है, वो साथ उसी का देना पसंद करती है जो रिस्क लेने का बूता रखता हो।
इश्क में भी दिलजलों की अब कोई औकात न रही। कद्र अब उन्हीं आशिकों की है, जो रिस्क के दम पर अपने प्रेम को शादी के मंडप तक निभा ले जाते हैं। लेकिन रिस्क लेने की हिम्मत होनी दो तरफा ही चाहिए। एक तरफा रिस्क बहुत जल्दी फिस्स हो जाता है।

कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो रिस्क लेने को टाइम की बर्बादी समझते हैं। जो और जैसा चल रहा है उसी को आनंद मानते हैं। समंदर में पैर डालने से इसलिए डरते हैं कहीं डूब न जाएं। शेर के मुंह में हाथ देने से इसलिए डरते हैं कहीं वो खा न जाए। और तो और अपने मोबाइल की गैलरी में लॉक इसलिए लगाकर रखते हैं कहीं बीवी के हाथ न पड़ जाए। बताइए, ये तो आलम है। इतना भी रिस्क लेने से अगर भय खाएंगे तो जीवन में क्या अनूठा कर पाएंगे?

रिस्क-विहीन जिंदगी बड़ी बोरिंग होती है। न कोई उत्साह होता है न उमंग। जिंदगी भी सोचती होगी, ये किस बोगस आत्मा में प्रवेश कर गई। मेरा तो बचपन तो यही मानना रहा है कि जिंदगी लंबी भले न ही पर रिस्की अवश्य होनी चाहिए।

इसीलिए तो मेरा प्रयास हमेशा यही रहता है कि मैं निरंतर रिस्क लेता रहूं। रिस्क लेने में एक अजीब किस्म का पागलपन होता है। ठीक वैसा ही जैसा अक्सर 'भाबी जी घर पर हैं' में सक्सेना जी हमें दिखाते रहते हैं। पगलेट टाइप हरकतें रिस्क को और भी आकर्षक बना देती हैं।

रिस्क बोझ नहीं। बल्कि बोझ तो वो सोच है जिसमें रिस्क लेने का दम नहीं होता। रिस्क से मोह पालिए। रिस्क से इश्क कीजिए। रिस्क को अपना खुदा-गवाह बनाइए। फिर देखिए, रिस्क लेना कितना आसान लगने लगेगा।

नेता या व्यापारी लोग अगर रिस्क न लें तो ताउम्र वहीं पड़े रहें जहां से शुरुआत की थी। सड़क से संसद तक की दौड़ बिना रिस्क लिए पूरी हो ही नहीं सकतीं।

सच कहूं तो रिस्क लेने के मामले में नेतागण मेरी प्ररेणा हैं। उन्हीं को देख-देखकर जीवन में जरा-बहुत रिस्क लेना सीख पाया हूं। मौका देखकर चौक मारने का रिस्क नेता से बेहतर कोई दूसरा सीखा ही नहीं सकता।

तो अपने रिस्क के प्रति इश्क का जज्बा बनाए रखिए और जीवन का आनंद लेते रहिए।

मंगलवार, 13 मार्च 2018

क्योंकि मृत्यु ही अंतिम सत्य है

जीवन मिथ्या है। इच्छा भ्रम है। मृत्यु ही अंतिम सत्य है। फिर इच्छा-मृत्यु से क्या घबराना!

यों भी, मृत्यु को समझने का कोई फायदा नहीं। मृत्यु तो एक न एक दिन आनी ही है। वो गाना है न 'जिंदगी तो बेवफा है एक दिन ठुकरएगी...।' तो जो ठुकरा दे उससे मोह पालना बेकार है।

सच बताऊं, मुझे तो बड़ी कोफ्त होती है लोगों की जीवन, मृत्यु, मूर्ति के प्रति भीषण आसक्ति देख-सुनकर।

अभी हाल इच्छा-मृत्यु पर फैसला क्या आया, लोग भिन्न-भिन्न कोणों से चिंतित होते हुए दिखने लगे हैं। अमां, इच्छा-मृत्यु पर क्या चिंतित होना? मृत्यु तो आनी है। चाहे इच्छा से आए या बे-इच्छा। जब भीष्म पितामह मृत्यु से पार न पा पाए तो हम-आप किस खेत की मूली हैं बंधु।

खुदकुशी से कहीं बेहतर विकल्प है इच्छा-मृत्यु। खुदकुशी की अपनी दिक्कतें हैं। हर किसी में इतना साहस होता भी नहीं कि अपनी जान की बाजी फ्री-फंड में लगा दे। जो लगा देते हैं वो 'कायर' हैं। लेकिन इच्छा-मृत्यु का तो सीन ही बिल्कुल अलग है। बस मृत्यु के प्रति आपको अपनी इच्छा जाहिर करनी है। आपको एहसास भी न होगा कि कब में इस दुनिया-ए-फानी से रुखसत हो लिए। न किसी से चिक-चिक न किसी से हुज्जत। अपनी मौत, अपनी मर्जी।

मैंने तो अपनी इच्छा पत्नी को बतला भी दी है कि मुझे मेरे अंत समय में इच्छा-मृत्यु ही चाहिए। मैं किसी का एहसान लेकर मरना नहीं चाहता। न पत्नी से अपने लिए सेवा-टहल करवाना चाहता हूं। न यमराज को कष्ट देना चाहता हूं कि वे धरती पर मुझे लेने आएं। उनकी जान को छत्तीस काम रहते हैं। वे उन्हें निपटाएं। अंततः टाइम उन्हीं का बचना है।

अधिक मशहूर होकर मरना भी कम मुसीबतों से भरा नहीं। लोग इस कदर आस्थावादी हैं कि इधर मशहूर बंदा खिसका नहीं, उधर तुरंत उसकी मूर्ति बनाके खड़ी करी दी। समाज में मूर्तिपूजा का क्या कम बोलबाला है, जो मूर्ति पर मूर्तियां तैयार होती रहती हैं। किसी सरफिरे ने मूर्ति के साथ अगर छेड़खानी या मार-तोड़ कर दी तो अलग झाड़।
इसीलिए जीवन मैंने इस बात का खास ख्याल रखा है कि मशहूर न होने पाऊं।

मैं तो कहता हूं, ये मूर्ति-फूर्ति, जीवन, मोह आदि सब क्षणिक हैं। अंतिम सत्य है मृत्यु ही। अगर इच्छा-मृत्यु है तो सोने पे सुहागा।
इच्छा-मृत्यु का अनुभव मैं भी लेना चाहता हूं। सुख-सुविधा से इतर कुछ डायरेक्ट अनुभव भी जीवन में जरूर लेने चाहिए। ताकि ऊपर वाले को भी हमसे ये शिकायत न रहे कि हम धरती पर केवल सुख ही भोगकर आए हैं।

जिन्हें इच्छा-मृत्यु में खामियां तलाशना है वे शौक से तलाशें। खाली आदमी कुछ तो करेगा, ये ही सही।

फिलहाल मुझे तो अंतिम सत्य (मृत्यु) को जानना है और वो मैं इच्छा-मृत्यु के बहाने जानकर रहूंगा।

गुरुवार, 8 मार्च 2018

शोक सभा का आकर्षण

शोक सभाएं मुझे बचपन से आकर्षित करती रही हैं। एक बार को किसी के सुख में शरीक न होऊं लेकिन शोक सभा में जरूर जाता हूं। शोक और दुख दोनों एकसाथ प्रकट हो जाते हैं। वरना, अलग से दुख प्रकट करना मुझे बड़ा अटपटा-सा लगता है। अक्सर भूल जाता हूं कि किस स्थिति में किस प्रकार का दुख प्रकट करूं। दुनिया में इतनी तरह के तो दुख हैं कि हर दुख कभी किसी दुख से मेल ही नहीं खाता।

दुख के मनो-विज्ञान को समझना मेरे बस की बात भी नहीं। सुना है, इसके लिए भी एक खास ट्रेनिंग की आवश्यकता होती है।

एक जमाने में शोक सभाएं थोड़ा मातम टाइप हुआ करती थीं। शामिल लोगों के चेहरे मुरझाए हुए से दिखते थे। शोक भी इतना विकट तरीके से व्यक्त किया जाता था कि गुजरने वाले की आत्मा भी कलप जाती होगी। काले कपड़ों में रूदलियां भी गाई जाती थीं।

लेकिन जैसे-जैसे वक़्त बदला शोक व्यक्त करने के ढंग और मायने दोनों बदल गए। अब की शोक सभाएं शोक सभाएं कम इवेंट मैनजमेंट अधिक लगती हैं। डिजिटल समय में शोक भी डिजाइनर हो चला है।
अभी हाल मुझे एक सज्जन की शोक सभा में शामिल होने का चांस मिला। सज्जन अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा जी कर दुनिया से रुखसत हुए थे। सो, उनकी शोक सभा में खास शोक नहीं था। हर चेहरे पर चार्मनेस छाई हुई थी। खासकर, मौजूद महिलाओं का ड्रेसिंग सेंस तो कमाल का था। उन पर व्हाइट ड्रेस खूब फब रही थी। ज्यादातर चेहरे 'लाइट मेकअप' में भी खासी लाइट मार रहे थे। शोक-संतप्त परिवार के सदस्य भी, लग रहा था, शोक सभा में शामिल होने की अच्छी ट्रेनिंग लेकर आए थे!

बारी-बारी से सबके मोबाइल बज रहे थे। सब एक-दूसरे को गैलरी में मौजूद 'स्टफ' दिखाने में मशगूल थे। व्हाट्सएप्प पर बातचीत का आदान-प्रदान हो रहा था। तो कुछ बीच-बीच में अपना फेसबुक और ट्विटर के स्टेटस भी अपडेट कर रहे थे। सेल्फी के शौकीनों ने शोक सभा को भी अपने शौक के रंग में रंग लिया था। लगे हाथ, एकाध के साथ सेल्फी मैंने भी ले ली। बहती गंगा में हाथ धोने से कभी चूकना नहीं चाहिए।

अच्छा, सेलिब्रिटियों की शोक सभाएं तो और भी गजब होती हैं। शायद ही कोई ऐसा चेहरे नजर आता हो जिसने आंखों पर काला चश्मा न चढ़ाया हो। कुछ चश्मे तो इतने बड़े होते हैं कि चार-पांच आंखों को ढक लें। शोक सभा में काला चश्मा पहनने के पीछे अपने आंसूओं को जग-जाहिर न करने की तरकीब रहती हो शायद।

सफेद कुर्ते-पायजामे और साड़ी व सलवार-सूट को देखकर तो ऐसा जान पड़ता है मानो अभी कुछ देर पहले ही ड्राई-क्लीन करवाए हों। कुछ हीरोइनें तो शोक सभा में भी 'न्यूड मेकअप' किए होती हैं। आखिर सेलिब्रिटी हैं, कुछ तो अलग दिखना चाहिए न।

पर शोक सभा का आकर्षण होता गजब है। मेरी तो दिली-तमन्ना है कि मेरी शोक सभा पूरी तरह ग्लैमरस और अट्रैक्टिव हो। ताकि शामिल हुए लोग मेरी शोक सभा फुल्ली एन्जॉय कर सकें।

मंगलवार, 6 मार्च 2018

उनका वामपंथ से मोहभंग होना

ताजा खबर तो यही है कि वे अब वामपंथी नहीं रहे। उन्होंने अपने वामपंथ का त्याग कर दिया। अपनी जिंदगी में वामपंथ से जुड़े प्रत्येक प्रतीक को बक्से में बंदकर गंगा में बहा दिया। अपने वामपंथी दोस्तों से किनारा कर लिया। घर के दरवाजे पर लगी 'कॉमरेड' नाम की नेमप्लेट से कॉमरेड हटाकर अपने नाम के साथ अपनी 'जाति' को जोड़ दिया। उनकी जाति को जान अड़ोसी-पड़ोसियों का उनके प्रति सम्मान बढ़ गया। वरना, इससे पहले तो वे उन्हें अपना पड़ोसी तक मानने से इंकार किया करते थे।

उनका वामपंथ से अचानक मोहभंग होना मुझे खासा खला। उन्हीं को तो देखकर मेरे मन में वामपंथ के प्रति मोह जागा था। वामपंथी विचारों को अपने जीवन में उतारने में लगा था। अपनी अलमारी में वामपंथी साहित्य को खूब स्पेस देने लगा था। और तो और अपने नाम के साथ जुड़े जाति के दंश से मुक्ति पाने का लगभग निर्णय ले चुका था। क्रांति में मेरा विश्वास बढ़ने लगा था। पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति मेरा गुस्सा शिखर पर पहुंच चुका था।

लेकिन उनका अपने विचार और पंथ से पलटी मारना मेरी वामपंथी रूझान के लिए झटका जैसा था। इतना जोर का झटका तो मुझे तब भी नहीं लगा था जब एक सज्जन ने मुझे पागलखाने में भर्ती होने की सलाह दी थी।

अभी हाल वो मुझे बीच राह मिले। बिना इधर-उधर की भूमिका बांधे मैंने उनसे पूछा- 'आप तो ऐसे न थे! यकायक वामपंथ से मोहभंग के क्या मायने समझूं?' वे बोले- 'कुछ भी समझने-बूझने की जरूरत नहीं। अंतिम सत्य यही है कि मैं अब वामपंथी न रहा।'

'वही तो पूछ रहा हूं कि क्यों वामपंथी नहीं रहे अब आप?' वे बोले- 'अब कुछ न धरा वामपंथ में। वामपंथ एक शोक गीत की तरह हो लिया है। कब तक विचार की लाठी से हम खुद को हांकते रहेंगे। राजनीति में अब विचार की नहीं बाहुबल और धनबल का बोलबाला है। ऐसे में कहां बचा रहेगा वामपंथ और वामपंथी। सो, किनारा करना ही बेहतर समझा'।

किंतु उनके चेहरे से शोकगीत जैसा कुछ नजर नहीं आ रहा था। बड़े आराम से थे। वरना, अपने विचार और पंथ को छोड़ने में किसे तकलीफ नहीं होती होगी भला?

वैसे, नेताओं के साथ यह सुविधा हमेशा ही रही है कि वे पार्टी या विचार को त्यागते वक़्त ज्यादा सोचने के झंझट में नहीं पड़ते। विकल्प उनके पास मौजूद रहते ही हैं।

क्या ऐसा ही कोई सुरक्षित विकल्प उनके पास भी तो मौजूद नहीं? वामपंथ को छोड़ कहीं राष्ट्र-पंथ के साथ आ रहे हों! ऐसा सिर्फ मेरा कयास भर है। सत्य तो फिलहाल उन्हीं के पेट में छिपा बैठा है।

निरंतर ढहते लाल दुर्ग को देखते हुए लग तो यही रहा है कि वामपंथ कहीं इतिहास बनकर ही न रह जाए! यों भी, कुछ हद तक इतिहास बन भी चुका है। पर, मेरे जैसों के लिए समस्या आन खड़ी हुई है कि वामपंथ के साथ अभी बने रहें या उनकी तरह मैं भी इससे मोहभंग कर कोई और विकल्प चुन लूं।

समस्या विकट है। भगवा के आगे लाल रंग फिलहाल फ्लैट है।