शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

बैक बैंचर होने का सुख

मेरा नाम 'ए' से होने के बावजूद मेरी कोशिश यही रहती थी कि क्लास में मैं चौथी या छठी बैंच पर ही बैठूं। बैठता भी था। इसके दो फायदे मुझे मिल जाया करते थे: पहला, टीचर की निगाह मुझ पर आसानी से नहीं पड़ती थी। दूसरा, याद न करने के कारण टीचर को सुनाने से बच जाता था। किंतु, यह लक हर समय नहीं काम आता था। बारी जब 'नेमवाइज' हाजरी या सुनाने की आती थी तब आगे आना ही होता था। तब डांट तो पड़ती ही थी, साथ में चार-पांच संटीयों का स्वाद भी चखने को मिल जाता था दोनों हाथों पर।

घर आनकर यह भी नहीं बता सकता था कि आज टीचर ने सुताई की। तब सुताई का मामला दोहरा भी हो सकता था। मजबूरी थी। अतः उस डांट और मार का कड़वा घूंट पीकर रह जाना होता था। पर, जो भी हो उसमें परम-आनंद था। आजकल के बच्चों की तरह नहीं कि टीचर ने बच्चे को जरा-सा टच क्या कर दिया, मां-बाप राशन-पानी लेकर टीचर और प्रिंसिपल पर सवार हो लिए। समय-समय की बात है।

लेकिन बैक बैंचर होने में शर्म मुझे कभी महसूस नहीं हुई। उल्टा मजा ही आता था। पीछे बैठके किसी के चिकोटी काटो या टीचर का कार्टून बनाओ, कोई देखने वाला नहीं। क्लास में ज्यादा एक्टिव या पढ़ाकू होने के अपने नुकसान थे। दिमाग पर लोड उतना ही रखो जितना वो वहन कर पाए। ज्यादा पढ़-लिखकर कौन-सा मुझे देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनना था। लेखक कैसे बन गया, इसी पर मुझे आज भी आश्चर्य होता है। जबकि लेखक होने-बनने की तो कभी सोची भी नहीं थी। मेरी पढ़ाई-लिखाई के स्तर को देखकर पिता जी अक्सर मुझे या तो गधा बनने का आशीर्वाद देते थे या फिर रिक्शा चलाने का। दुर्भाग्य से मैं दोनों ही उपलब्धियों में पिछड़ गया।

लोग ऐसा समझते हैं कि बैक बैनचर होना नुकसानदेह है। इससे मान गिरता है। जग-हंसाई होती है। विफलता का सूचक है। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। अरे, बड़े नसीब वाले होते हैं वो जिन्हें स्टूडेंट लाइफ और जीवन में बैक बैंचर होने का सौभाग्य प्राप्त होता है। आगे वाली बैंच पर बैठकर कुछ देर तो अच्छा लगता है पर यह ज्यादा कामयाब नहीं। ध्यान रहे, गालियां फ्रंट वाले को ही पड़ती हैं, पीछे वाले को नहीं।

फिर भी कुछ ऐसे लोग हैं समाज में जिन्हें बैक बैंचर होने में बड़ी शर्म आती है। वे अपने पीछे बैठने को बड़ा मुद्दा बना राजनीति करने लग जाते हैं। कायदा तो यह है कि जिसे जहां जगह मिल जाए, वो वहीं बैठ जाए। लेकिन नहीं। पीछे बैठकर उनकी इज्जत को बट्टा लगता है। वे यह भूल जाते हैं, इमेज में अगर दम होगा तो वो पीछे बैठने में भी उतनी ही चमकेगी जितनी की आगे। बैक बैनचर या फ्रंट बैनचर होना सब बेमतलब के शोशे हैं, भला आदमी तो कहीं भी एडजस्ट हो लेता है।

वो तो चलो (बचपन) स्कूल की बातें रहीं, मैं तो अपने दफ्तर में भी बैक बैंचर ही हूं। करते रहें, अन्य दफ्तर वाले बॉस की जी-हुजूरी पर मुझे तो पीछे बैठ सबकुछ देखने में ही आनंद आता है। कम से कम बॉस की खामखां की डांट तो बच ही जाता हूं। कोई चापलूसी का आरोप तो नहीं लगता न। काफी है।

बैक बैंचर होने में तमाम सुख हैं। जीवन में कभी इस अनुभव को आजमा कर तो देखिए।

4 टिप्‍पणियां:

smt. Ajit Gupta ने कहा…

पता नहीं क्यों और कैसे हम कभी भी बेक बेंचर नहीं रहे लेकिन इसके आनन्द अलग ही हैं।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, भूखा बुद्धिजीवी और बेइमान नेता “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Pammi ने कहा…

आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 14फरवरी 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Sudha Devrani ने कहा…

कायदा तो यह है कि जिसे जहां जगह मिल जाए, वो वहीं बैठ जाए। लेकिन नहीं। पीछे बैठकर उनकी इज्जत को बट्टा लगता है। वे यह भूल जाते हैं, इमेज में अगर दम होगा तो वो पीछे बैठने में भी उतनी ही चमकेगी जितनी की आगे।
बहुत सटीक...