बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

व्हाट्सएप्प पर होली

इस दफा 'व्हाट्सएप्प पर होली' खेलना तय हुआ है। जब पूरा देश ही व्हाट्सएप्प पर व्यस्त रहने लगा है तो होली को ही क्यों छोड़ा जाए। यह सही है कि व्हाट्सएप्प होली में पारंपरिक होली जैसी बात नहीं आ सकती हां दिल तो बहलाया ही जा सकता है न। आज के जमाने में दिल का बहलना बहुत जरूरी है। लगातार डिजिटल होते युग से भी तो हम दिल ही बहला रहे हैं। नहीं क्या!

व्हाट्सएप्प पर होली के अपने फायदे हैं। न व्यक्तिगत रूप से किसी को रंग लगाने का झंझट न छुटाने का रगड़ा। अपने घर के किसी भी कोने में बैठकर डिजिटली सबको होली के संदेश या रंग-बिरंगे फोटू व्हाट्सएप्प किए जाओ। एक ही संदेश को चाहे तीन लोगों को भेजो या छत्तीस को कोई न पूछने वाला। बस व्हाट्सएप्प पर उंगलियां चलती रहनी चाहिए। पिछले दिनों यह बात साबित भी हो चुकी है कि व्हाट्सएप्प पर शुभकामना संदेश भेजने वालों में हम भारतीय ही सबसे आगे रहते हैं।

व्हाट्सएप्प पर होली खेलकर मैं एक तीर से कई निशाने साध सकता हूं। चूंकि होली 'मस्ती' और 'बुरा न मानने' का फेस्टिवल है, इस नाते मैं अपनी उन पड़ोसनों को भी रंगीन फोटू और वीडियो भेज सकता हूं, जिनसे आमने-सामने खुलकर बात- बीवी के डर के कारण- कम ही हो पाती है। होली का सुरूर तो खैर सब पर चढ़ा रहता ही है।

शरारत आप न भी करना चाहें तो भी हो ही जाती है। यही तो होली की खासियत है। यों भी, दूर बैठकर डिजिटल शरारत करने का अपना ही मजा है। कम से कम इस तोहमत से तो बचे ही रहते हैं कि अगले ने होली पर मुझे छेड़ा। व्हाट्सएप्प पर छेड़-छाड़ का कहां कोई इतना बुरा मानता है। खासकर, होली पर तो 'बुरा' मानना चाहिए भी नहीं। फिर भी, जो बुरा मान लेते हैं, वे जाकर अपनी भैंस चराएं।

व्हाट्सएप्प भी होली के रंगों की तरह हर समय रंगीला रहता है। हर रंग के दर्शन अपको यहां हो जाएंगे। उम्र यहां मायने नहीं रखती। केवल रंग और रंगीन तबीयत मायने रखती है। प्रेम से ज्यादा फ़्लर्ट के रंगों से यह सराबोर रहता है। होली जैसे मौके पर व्हाट्सएप्प पर फ़्लर्ट सोने पे सुहागा है शिरिमान जी। फ़्लर्ट भी एक प्रकार का जीवन रंग ही तो है।

बाकी और त्यौहारों पर तो मौका मिलती नहीं, एक होली ही ऐसा त्यौहार है जहां आप अपने दिल की रंगीनियत दूसरे के समक्ष खोलकर रख सकते हैं। व्हाट्सएप्प के जीवन का हिस्सा बन जाने से यह काम और भी आसान हो गया है। एक मैं ही नहीं मेरे जैसे तमाम होली प्रेमी अपने जज्बातों के रंगों को बिखेरने के लिए इसी का तो सहारा ले रहे हैं। जीवन में रंगों का बने रहना इसीलिए तो जरूरी है।

हैं समाज में तब भी कुछ लोग जिन्हें डिजिटल होली खेलना नहीं सुहाता। उन्हें तो हाथों में पिचकारी थामे, एक-दूसरे पर पम्पों का मोर्चा खोले, भांग के नशे में मुलायम गालों पर चटख रंग लगाने में ही आनंद आता है। हालांकि असली वाली होली तो यही है। पर कहां अब लोगों कने इतना टाइम बचा है ऐसी बिंदास होली खेलने का। हर कोई अपने-अपने काम और समय के बोझ का ऐसा मारा हुआ है कि क्या होली, क्या दीवाली सब रस्म-अदायगी लगती है।

जो हो वक़्त के साथ चलने में ही सबसे बड़ी अक्लमंदी है। आज अगर ज्यादातर लोगों की पसंद डिजिटल या व्हाट्सएप्प होली है तो यही खेलो। क्या जाता है। यहां पानी के रंग न होकर डिजिटल रंग होंगे। पर होंगे तो रंग ही न। रंग तो हर किस्म का मजा देता है। चाहे करीब आकर लगाओ या व्हाट्सएप्प करके।

तो लीजिए, व्हाट्सएप्प होली का रंगीन लुत्फ। कोई बुरा मान भी जाए तो कह दीजिए- 'बुरा न मानो व्हाट्सएप्प होली है।'

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