गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

इश्क में उम्र का क्या काम

कहते हैं- इश्क उम्र की बंदिशों का मोहताज नहीं होता। इश्क कभी भी, कैसी भी उम्र वाला कर सकता है। इतिहास कम और ज्यादा उम्र में इश्क करने वालो के किस्सों से भरा पड़ा है। दिल अगर जवान है तो इश्क एक से कीजिए या अनेक से सब कुबूल है।

यों, लोगबाग इश्क करने की राय तो एक ही से देते हैं। उससे आगे को 'वासना' कहते हैं। अजी, लोगों का क्या है वे तो जिंदगी को भी 'ईमानदारी' के साथ जीने की राय देते हैं, क्या इतने विकट तिकड़मी समय में जिंदगी ईमानदारी के साथ जी जा सकती है? लोगों को रायचंद बने रहने दें, आप तो वही करें जो आपका दिल कहता है। इश्क के मामले में किसी की नहीं केवल दिल की ही सुननी चाहिए।

सच कह रहा हूं। मुझे अगर अपने दिल का सहारा न मिला होता तो मैं जीवन में इतने इश्क चला ही न पाता। जब भी किसी से नया इश्क हुआ, दिल ने हमेशा यही कहा- 'फिक्र न कर। इश्क किए जा।'

ज्यादा मात्रा में किए गए इश्क से पास से कुछ नहीं जाता, किस्म किस्म के अनुभव ही हाथ आते हैं। जीवन में जिसने इश्क के अनुभव ले लिए फिर उसके तईं दुनियादारी को समझना इतना कठिन नहीं रह जाता।

इश्क में प्रकृति के साथ-साथ इंसान की चेष्टाओं एवं कु-चेष्टाओं का हर रंग मौजूद रहता है। कुछ इश्क बैठे-ठाले हो जाते हैं तो कुछ के लिए पापड़ तक बेलने पड़ जाते हैं। मुझे लगता है, इश्क करना या होना पुराने जमाने में ज्यादा आसान था। क्योंकि तब आशिक और माशूका के बीच इतनी चालाकियां न थीं। आज के डिजिटल समय में इस बात का ही कन्फर्म न रह पाता कि इश्क आशिक का सच्चा वाला है या माशूका का। क्या पता, एक ही चैटिंग एप पर कई से इश्क एक साथ फरमाया जा रहा हो। कसमें-वादों का सिलसिला हर तरफ से सामान चल रहा हो। दिल के जो इमोजी उसे भेजे जा रहे हैं, हो सकता है, इसे भी भेजे जा रहे हों। मोबाइल फोन के जमाने में इश्क के प्लेटफार्म पर गाड़ी कहीं से भी कहीं को चलाई और दौड़ाई जा सकती है।

चलो अच्छा ही है न। कम से कम युवा पीढ़ी एक ही के साथ हिलग के बोर तो नहीं हो रही। बाजार के असर ने तो इश्क को और भी ग्लोबल कर दिया। कभी वेलेंटाइन विदेशों में मनाया जाता था, अब शहर से लेकर गांव-देहात तक में पूर्ण उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। देश बदल रहा है। यही तो 'न्यू इंडिया' है पियारे।

ऐसा लोगों का भरम है कि इश्क को निभा पाना खासा कठिन होता है। अगर कठिन ही होता तो कृष्ण जी ने अपने समय में इतना इश्क न फरमाया होता। इश्क निभाना उतना ही सरल है जिनता पकौड़ा तलना। बस आंच का ख्याल रखना पड़ता है। कहीं ज्यादा तलकर 'जल' न जाए। बाकी एक के बाद एक इश्क करते रहिए, सब निभ जाएंगे।

और हां, इश्क करते या वेलेंटाइन मानते वक़्त इस पर खाक डालिए कि लोग क्या कहेंगे। 'अमर प्रेम' का वो गाना तो याद है न- 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...'। तो जो कह रहा है, कहने दीजिए। आप बस इश्क, प्यार, मोहब्बत के दरिया में यों ही डूबते-उतरते रहिए। बाकी श्रीराम जी भला करेंगे।

इश्क में उम्र पर भी इतना तबज्जो देने की जरूरत नहीं। इश्क बे-उम्र होता है। सैफ ने करीना या करीना ने सैफ से इश्क फरमाते वक़्त क्या उम्र का लिहाज किया? इधर इश्क परवान चढ़ा, उधर निकाह में तब्दील हुआ। अजी, खुद मैं कभी इश्कबाजी में उम्र को बीच में न लाया। जिससे हो गया, कर लिया। मन और दिल बहलता रहना चाहिए बस।

इश्क में बोल्ड बने रहने का जज़्बा रखिए। बाकी आगे की राहें खुद ब खुद आसान होती चली जाएंगी।

'इश्क कीजिए फिर समझिए जिंदगी क्या चीज है...'।

2 टिप्‍पणियां:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन बैंक की साख पर बट्टा है ये घोटाला : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

उम्र का ही तो तकाजा है ये मर्ज