बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

बजट, वसंत, वेलेंटाइन और पकौड़े

बजट

लोग भी अजीब हैं। बताइए, बजट को समझने में लगे पड़े हैं। जिसे देखो वो ही हाथ में गुलाबी अखबार की प्रति थामे, एक-दूसरे से बजट पर बहस करे चला जा रहा है। जबकि, यह हकीकत है, उसे अपने घर के बजट के बारे में रत्तीभर मालूम नहीं होगा। उसका हिसाब-किताब रखने के लिए पत्नी है। सबसे उम्दा पॉलिसी मुझे पत्नियों की लगती है: वे कभी बजट पर न खास चर्चा करती हुई मिलती हैं न दिमागी पर अतिरिक्त लोड लेती हुई। उन्हें तो अपने घर के बजट से मतलब। देश के बजट की वित्तमंत्री जानें या फिर अर्थशास्त्री लोग।

सही भी है। लोग जितनी ऊर्जा बजट को समझने-समझाने में बर्बाद कर देते हैं उतने में तो एक लेख या फ़िल्म के आइडिया पर काम किया जा सकता। लेकिन नहीं। लोगों को तो बीमारी है दूसरे के काम में अपनी टांग घुसेड़ने की। जबकि बजट में समझने लायक कुछ होता ही नहीं। महज आंकड़ों और बड़ी-बड़ी योजनाओं-परियोजनाओं की जुमलेबाजी होती है। बजट के बहाने कुछ सरकार के तो कुछ जनता के हित साध लिए जाते हैं।

किसानों पर कागजों पर मेहरबानी कर दी जाती है। जबकि देश में किसान और खेती के हालात क्या हैं, बच्चा-बच्चा जानता है। तिस पर भी दावा यह कि ये किसानों का बजट है।

वसंत

वसंत का असर बजट पर भारी है। वसंत का चार्म हर किसी को मदहोश किए पड़ा है। वासंती हवा बह रही है। हालांकि मौसम में अभी कुछ सर्दी बाकी है फिर भी मजा दे रही है।

दिल में वसंत की उमंग का आलम ये है कि मचला-मचला जा रहा है। एक जगह दिल लगा होने के बावजूद कोशिश में है दूसरी जगह भी सेट हो जाए। सोशल मीडिया के जमाने में यह असंभव भी तो नहीं।
कवि वसंत पर कविता अब पन्नों या डायरी पर नहीं बल्कि अपने फेसबुक पेज पर लिख रहा है। तो कुछ ऊंचे टाइप का कवि अपनी वसंतमय कविता ट्विटर पर ट्वीट कर रहा है। वसंत पूरी तरह से डिजिटल हो लिया है। होएगा भी कैसे नहीं। आखिर यह 'न्यू इंडिया' का वसंत जो है।

नए जमाने का यूथ व्हाट्सएप्प पर वसंत सेलिब्रेट कर रहा है। वो ज्यादा कुछ वसंत के बारे में न जानते हुए भी पूरी शिद्दत से लगा पड़ा है वसंत-प्रधान कविता या वन-लाइनर को ग्रुप में फैलाने में।

उधर वसंत पसोपेश में है कि ये हो क्या रहा है? पर कर भी क्या सकता है, वसंत अपने डिजिटल होने पर खीझ भी रहा है और प्रसन्न भी हो रहा है। पर जमाने के साथ चलने को प्रतिबद्ध है।

वेलेंटाइन

वसंत में वेलेंटाइन का शबाब अपने जोरों पर है। अपनी-अपनी सुविधा-सुरक्षा के हिसाब से सभी इसको मनाने में व्यस्त हैं। युवा (प्रेमी) युगल वेलेंटाइन पर पेड़ों के पीछे कम घर के किसी कोने में बैठ अपने दिली अरमान व्हाट्सएप्प कर पूरे कर रहे हैं। 'प्रेम' यानी 'डिजिटल लव' को सुकून से चलाए रखने का इससे उम्दा दूसरा माध्यम नहीं।

दूसरी तरफ, लाठी वीर इस जुगाड़ में हैं कहीं कोई पवित्र भारतीय संस्कृति का ढोल बजाता हुआ दिखे-मिले तो तुरंत उसे मुर्गा बना अपने 'मन की भड़ास' शांत कर लें। सालभर उन्हें इसी दिन का तो इंतजार रहता है। इस बहाने टीवी, अखबार में उनके चेहरे भी चमक जाते हैं। देशवासियों को भी पता चल जाता है कि लाठी वीर कितने संस्कृति और सभ्यता के हितैषी हैं।

मगर आज का यूथ भी घणा होशियार है। वेलेंटाइन डे घर से बाहर मनाने का खतरा कम ही उठाता है। चूंकि एक-दूसरे को कार्ड या लव-लैटर देने की परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है इसलिए उसे जो कहना-सुनना होता है अपने स्मार्टफोन पर ही कर लेता है। तकनीक ने प्रपोज करना अब इतना सरल बना दिया कि एक व्हाट्सएप्प में काम पूरा। हमें अपने समय में तो सौ दफा सोचना पड़ा था तब कहीं जाकर दस लाइनों का पत्र लिख पाए थे। खैर, समय-समय की बात...।

पकौड़े

पकौड़ों का वसंत और वेलेंटाइन से सीधा कोई सरोकार नहीं पर चर्चा में खूब हैं। शायद ही कोई ऐसा घर, दफ्तर या सोशल प्लेटफॉर्म बचा हो, जहां पकौड़ों का जिक्र न छिड़ा हो। उस दिन तो एक बड़े मंत्री जी ने भी कह डाला- बेरोजगारी से भला है पकौड़े बेचना। काश! उनका यह कथन कुछ बरस पहले आ गया होता तो कहे को मैं लेखक बनता, मोहल्ले के नुक्कड़ पर खड़ा हो पकौड़े नहीं बेच रहा होता।

राजनीतिक मंचों और सोशल मीडिया पर बहसबाजी से पकौड़ों को जो अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि मिली है, उस आधार पर मैं कह सकता हूं, देश में पकौड़ों का भविष्य उज्ज्वल है। अब तो मेरे दिमाग में भी यह विचार बैठने लगा है कि अपनी नौकरी और लेखन छोड़ पकौड़े बेचूं। काम काम होता है। काम में भला कैसी शर्म! ठीक है न...!

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