शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

बिकने में भला क्या हर्ज!

अजी, लोगों का क्या है वो तो रोटी जलने पर भी मुंह टेढ़ा कर लेते हैं। फिलहाल तो बहुत से लोग इस बात पर ही मुंह बनाए हुए हैं कि हर साल खिलाड़ी करोड़ों रुपये में बिक रहे हैं। यों बिकने को वे गलत मानते हैं। तरह-तरह के उल-जलूल सवाल करते हैं। कि, खिलाड़ी क्या बिकने के लिए होते हैं? अपना खेल, अपना ईमान भी भला कोई बेचता है? खिलाड़ियों का इस तरह बिकना देश के लोकतंत्र के लिए क्या ठीक है? आदि-आदि।

नादान हैं लोग। कुछ समझते ही नहीं। दुनिया के साथ चलना उन्हें आता ही नहीं। देखना ही नहीं चाहते कि वक़्त कितनी तेजी से बदल रहा है। महंगाई सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही चली जा रही है। लाइफ स्टाइल को मेनटेन करने के लिए 'अर्थ' की आवश्यकता तो हर किसी को होती ही है। है कि नहीं...!

न भूलें वे खिलाड़ी हैं कोई लेखक नहीं। कि, कम में या फिर खाली जेब भी गुजारा कर लेंगे! सब पैसे का ही खेल है बंधु। पैसा पास है तो हर कोई करीब है। पैसा पास नहीं तो 'हम आपके हैं कौन!' बिकना-बिकना तो दुनिया की रीत रही है।

जो खिलाड़ी जितना ऊंचा बिकता है, समाज और देश में उसे उतनी ही इज्जत मिलती है। खेल-प्रेमी उसके महंगा बिकने पर ससम्मान खड़े होकर तालियां बजाते हैं। उसके खेल का यशोगान किया जाता है। मीडिया उन्हें हाथों-हाथ लेता है। मैच में अगर बढ़िया खेल जाते हैं तो क्या कहने। विज्ञापन कंपनियां भी उन्हें झट से लपक लेती हैं। अपने हीरो विराट को ही देख लो।

और फिर, जब खिलाड़ी ही खुद बिक कर कभी शर्मसार नहीं होते तो भला हम कौन होते हैं, उन पर टिका-टिप्पणी करने वाले। चाहे खिलाड़ी हो या कलाकार या लेखक हर कोई यह चाहता है कि उसे उसके काम का मेहनताना मिले। इस दुनिया में संत कोई नहीं जो मुफ्त में सेवा किए जाए। अपना घर फूंक भला कौन तमाशा देखना चाहेगा।

यकीन मानिए, मुझे कभी-कभी बहुत अखरता है कि मैं क्यों नहीं बिकता? मुझे कोई क्यों नहीं खरीदता? लेखक हूं न! लेखक को कौन खरीदेगा! अगर खरीद भी लिया गया तो लेखक बिरादरी मुझे कितना गरियाएगी। कहेगी- लेखक होकर बिक गया। यहां तो जरा-सी बात का बतंगड़ बनते देर ही कितनी लगती है पियारे।

बिकने के इस खेल को जरा दूसरे तरीके से समझें। खिलाड़ी के बिकने के बाद उसमें अपने खेल के प्रति कॉन्फिडेंस डेवलप होता है। जिम्मेवार बनता है वो अपने खेल के प्रति। महंगा बिका खिलाड़ी पूरी कोशिश में रहता है कि वो अपना बेस्ट दे। हां, कभी-कभी चूक भी जाता है। तो क्या। क्रिकेट है ही 'लक वाई-चांस' का खेल।

खिलाड़ी कोई धर्मशाला खोले न बैठा है। कि, कोई भी मुफ्त में उसमें अपनी जगह बना ले। वो बिक रहा है। यही आज का अंतिम सत्य है। बाकी आदर्शवाद की तो संसार में कमी ही नहीं। जो बिकेगा वही पूरा एन्जॉय भी करवाएगा।

तो खिलाड़ियों के बिकने-बिकाने की प्रथा को यों ही बना रहने दें। उनके खेल का लुत्फ लें। इसी में परम सुख की प्राप्ति है।

3 टिप्‍पणियां:

Sunil Singh ने कहा…

उम्दा व्यंग

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन खुशवंत सिंह और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

बेनामी ने कहा…

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