मंगलवार, 30 जनवरी 2018

बजट और लेखक

बजट हर साल आता है। हर बार कुछ नहीं घोषणाएं होती हैं। पुरानी कुछ घोषणाओं को विस्तार दिया जाता है। क्या आम, क्या खास सभी के लिए बजट में कुछ न कुछ रहता है। फिर भी, बजट से कुछ लोग खुश तो कुछ नाराज होते ही हैं। टीवी चैनलों पर बहसें होती हैं। अर्थशास्त्री लोग अपना अलग रंग अलापते हैं तो राजनीतिक दल अपना। हालांकि नतीजा किसी के कहने-सुनने का कुछ नहीं निकलता, बस थोड़ी-बहुत देर का 'आर्थिक मनोरंजन' हो जाता है। अगले दिन अखबार का पहला पन्ना एक उम्दा से कार्टून से साथ हमारे सामने होता है।

खैर...

लेखक बड़ी खामोशी के साथ इस सब को देखता है। मन में सोचता है, बजट में सबको कुछ न कुछ दिया जाता है लेकिन उसे ही क्यों अछूत समझ, हर बार दरकिनार किया जाता है। क्या लेखक इस देश का नागरिक नहीं? क्या उसके अरमान नहीं? क्या उसकी अपनी आर्थिक परेशानियां नहीं? क्या उसका घर-परिवार नहीं? क्या सरकार या बजट पर उसका अधिकार नहीं? आखिर वोट तो उसने भी दिया था!

बजट के दौरान लेखक अक्सर ऐसे ही प्रश्नों से अपने आप से उलझता रहता है। उसे मालूम है, सरकार या वित्तमंत्री से उलझकर उसे सिर्फ खोखली सांत्वना के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलना। क्योंकि देश में जितनी भी छोटी-बड़ी योजनाएं-परियोजनाएं बनती हैं उनमें लेखक की भूमिका 'जीरो' होती है। लेखक तो लिख-लिखाकर ही अपने मन और दिमाग की भूख को शांत कर सकता है। इसके अलावा वो और कर भी क्या सकता है हुजूर। तिस पर भी उसे प्रशंसा कम गालियां ही अधिक सुनने को मिलती हैं।

अजी, किसी और का क्या कहूं, खुद मैंने लेखक होकर किसी का क्या उखाड़ लिया। बजट में वित्तमंत्री जी को यह तक तो लिख न सका कि हम लेखकों के पारिश्रमिक के वास्ते भी बजट में कोई प्रावधान या योजना रखिए। कब तलक हम कम पारिश्रमिक में लिख-लिख कर शोषित होते रहेंगे। वैसे, मैं बहुत बड़ा लेखक-व्यंग्यकार हूं। पर क्या फायदा...?

बुरा न मानिएगा किंतु यह सत्य है कि लेखक देश-समाज का सबसे निरीह प्राणी है। दुनिया भर की चिंता का बोझ अपने सिर पर उठाए फिरता है मगर उसकी चिंता से सरोकार न सरकार को है न वित्तमंत्री को। केवल लिखकर अपना घर-परिवार चलाने की खुशफहमी तो (हिंदी का लेखक) सपने में भी नहीं पाल सकता। एक बहुत बड़े लेखक-कहानीकार थे। सोचा तो उन्होंने लिखकर ही अपना परिवार चलाने का था पर जिन परिस्थितियों में उनका अंत हुआ लिखने में भी ख़ौफ आता है।

चूंकि अब देश में 'न्यू इंडिया', 'मेक इन इंडिया' और 'गरीब हितैषी' सरकार है, अतः मैं चाहूंगा कि वित्तमंत्री जी इस बजट में कुछ न कुछ हम लेखकों के लिए भी रखें। उन्हें भी कुछ दें। वायदों का झुंझन्ना न थमाएं। हम लेखकों को भी लगे कि हम अनाथ नहीं बजट में हमारी भी कुछ भूमिका है।

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