रविवार, 28 जनवरी 2018

इसलिए नहीं जाता पुस्तक मेला

नया साल शुरू होते ही हर बार मैं यह संकल्प लेता हूं कि कुछ भी हो इस दफा पुस्तक मेला में जाना ही है। पर पुस्तक मेला की तारीख नजदीक आते-आते सारा संकल्प ठंडा पड़ जाता है। जाना अगले साल पर टाल खुद को समझा लेता हूं।

लेकिन अंदर की बात बताऊं, मैं पुस्तक मेला जाना ही नहीं चाहता। डरता हूं वहां जाने से। एक तरह का 'अपराधबोध' घेर लेता है मुझे। खुद के लेखक होने पर 'ग्लानि' टाइप होने लगती है। खुद को धिक्कारता हूं कि इतना वक़्त हो गया मुझे लेखक बने किंतु अभी तक मेरी कोई किताब नहीं! किसी आयोजन, किसी समीक्षा में मेरा नाम नहीं। मुझसे जूनियर लेखकों की अब तक दर्जनों किताबें आ चुकी हैं। टनाटन चल-बिक रही हैं। और मैं... आज भी वहीं हूं जहां दस बरस पहले था।

फिर क्या मुंह लेकर जाऊंगा पुस्तक मेला में! कोई चेला या पाठक मुझसे पूछ ही बैठा- सर, आपकी किताब किस स्टाल पर मिलेगी तो क्या जवाब दूंगा उसे! मेरी तो सेकंड भर में किरकिरी हो जाएगी। हालांकि किताब न होने पर पत्नी सैंकड़ों दफा मेरी किरकिरी कर चुकी है। वो पत्नी है। उसे हक है मेरी किरकिरी करने का। उससे तो पलटकर मैं पूछ भी नहीं सकता- जानेमन, क्यों हरदम मेरी किरकिरी करने पर आमादा रहती हो? खैर...

आदर्शवाद मैं चाहे कितना ही छाड़ लूं पर एक लेखक के लिए उसकी किताब का होना उतना ही जरूरी है जितना मोबाइल में फेसबुक का होना। बिन फेसबुक मोबाइल की कोई औकात नहीं। फेसबुक ही वो प्लेटफॉर्म है जहां लेखक अपनी किताब, अपनी बात, अपने जज्बात, अपनी इज्जती-बेज्जती सबका चर्चा खुलकर कर सकता है। और, पुस्तक मेला के दिनों में तो लेखक जितनी किताबें अपने स्टाल पर नहीं उससे अधिक तो फेसबुक पर बिकवा लेता है। सब मार्केटिंग के फंडे हैं। अब किताब को किताब समझकर नहीं, माल समझकर बेचा-बिकवाया जाता है। बेचना ही लेखक का धेय है अब। (अपवादों को फिलहाल जाने दें)

न जाने का एक कारण यह भी है कि कौन लेखक या पाठक मेरे संग सेल्फी लेगा? फेसबुक पर छाए ज्यादातर स्टेटस में लेखकों-पाठकों की सेल्फियां उन्हीं के संग हैं जिनकी किताबें हैं। किताब का लेखक अपनी किताब की प्रति हाथ में थामे अपने चहेतों संग तरह-तरह की सेल्फियां ले रहा है। पुस्तकों के लोकार्पण तो हो ही रहे हैं उससे कहीं अधिक सेल्फियां लोकार्पित होती दिख रहीं हैं। पुस्तक मेला में उस लेखक को लेखक माना ही नहीं जाता जिसकी दर्जनभर सेल्फियां अपनी किताब और पाठकों के संग-साथ न हों।

किंतु मेरे साथ तो ऐसा कोई सीन ही नहीं। न कोई किताब है, न भविष्य में लाने की कोई योजना। बस एक लेखक ही तो हूं। अखबारों में व्यंग्य ही तो लिखता हूं। वरना, तो तमाम व्यंग्यकार ऐसे भी हैं जो न केवल व्यंग्य बल्कि कविता, कहानी, उपन्यास आदि भी लिख लेते हैं। सही है न। जमाना भीषण कॉम्पिटिशन है महाराज। चोर को सिर्फ चोरी में ही नहीं, ईमानदारी में भी सिद्धहस्त होना चाहिए। ताकि एक रोजगार बंद हो तो दूसरे से खर्चा-पानी चलता रहे।

मेरे विचार में तो पुस्तक मेला साल में एक बार नहीं बल्कि 365 दिन लगा रहना चाहिए। इस बहाने कितने ही फेसबुक वीरों को अपनी किताब लाने और स्थापित लेखकों को अपनी किताब बेचने का मौका मिलता रहेगा। मुफ्त की मार्केटिंग का सबसे उम्दा सोर्स है यह। बस किताबें महंगी होने का रोना न रोया जाए। किताबों को भी उसी शिद्दत से खरीदा जाए जैसे हम मोबाइल और कपड़े-लत्ते खरीदते हैं। आखिर लेखक को भी अपनी मेहनत का फल मिलना चाहिए कि नहीं मिलना चाहिए।

लेखक को उसकी किताब ही ऊंचा और महान बनाती है। मगर इतनी-सी बात मेरे भेजे में नहीं घुसती। पता नहीं मैं लेखक बना ही क्यों...? अजीब-सा लगता है न यह सोचकर भी कि मियां हैं तो लेखक पर किताब कोई न है! बे-किताब लेखक होने से तो अच्छा मेरे लिए यह रहेगा कि मैं छोले-भटूरे बचूं! कम से कम मेरे नाम और काम की इज्जत तो बनी रहेगी मार्केट में। यों, सिर्फ लेखक बने रहकर घास छीलने से क्या हासिल!

खुद की कोई किताब न होने की टीस पाले ही मैं पुस्तक मेला में जाने से खुद को बचाता हूं।

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