बुधवार, 24 जनवरी 2018

सेंसेक्स का आशावाद

दुनिया सिर्फ 'उम्मीद' पर ही नहीं 'आशावाद' पर भी टिकी है। आशावादी न हों तो दुनिया नकारात्मक मोड में जाकर तबाह हो जाए। किसी और की मैं नहीं जानता किंतु मेरे जीवन के आशावाद का आधार 'ओशो' और 'सेंसेक्स' की आशावादिता पर ही जमा खड़ा है।

अभी यहां चर्चा का विषय 'ओशो' नहीं 'सेंसेक्स' है। ओशो पर फिर कभी।

सेंसेक्स में गजब का आशावाद है। अपने जीवन के इतने लंबे सफर में ऐसी न जाने कितनी ही विकट परिस्थितियां उसे दर-पेश आईं मगर आशावाद का दामन उसने न छोड़ा। हालांकि कई दफा वो नकारात्मकता की अंधी गलियों में भी भटका। अर्श से फर्श का स्वाद भी चखा। कई तगड़े झटके भी अर्थव्यवस्था और अपने चाहने वालों को दिए तब भी आशावाद का दामन थाम वो बार-बार खड़ा होता रहा। अपने विश्वास को डिगने न दिया। अपने आत्मसम्मान को ठेस न लगने दी।

यही वजह है, जो आज सेंसेक्स 36000 के शिखर पर चढ़ अपनी कामयाबी पर इठला रहा है। पर, बिना किसी ऐंठ के। वरना दुनिया तो ऐसे लोगों से भरी पड़ी है जो चींटी भर कामयाबी पर हाथी जैसा गर्व करने की आदत डाल लेते हैं। अपनी जमीन को भूल हवा में उड़ने लगते हैं। 'जो कुछ हूं बस मैं ही हूं' सरीखी खुशफहमी पाल लेते हैं।

सेंसेक्स अपनी सफलता पर 'इठला' जरूर लेता है लेकिन 'घमंड' नहीं करता। लड़खड़ाने के बाद भी खड़ा जरूर होता है। यह उसका भीतरी आशावाद नहीं तो और क्या है। यही तो उसकी शक्ति है।

महज साड़े तीन साल में सेंसेक्स ने 24000 हजार से 36000 का सफर तय किया है। यह न तो कोई हंसी-खेल था, न ही इतना आसान। यहां तो कुछ लोगों के सफलता की दो सीढ़ियां चढ़ने में ही टांके ढीले हो जाते हैं। कुछ तो हार मानकर ही बैठ जाते हैं। पर जो चढ़ते रहते हैं, एक दिन शिखर उनके कदम चुम ही लेता है। जोकि सेंसेक्स ने कर दिखाया भी।

ज्यादा नहीं तो 19 सालों से तो मैं ही देख रहा हूं सेंसेक्स को चढ़ते-उतरते। नकारात्मकता को ठोकर मार आशावाद का हाथ थामे रहते। तब सेंसेक्स कहां था, आज कहां है। खुद ही देख लीजिए। अपने खिलाफ खड़े होने वाले हर मंदड़िये को फिलहाल उसने धूल चटा रखी है। शेयर मार्केट का हर मंदड़िया पसोपेश में है कि क्या करे, क्या न करे? उनके दिन का हर इंतजार इस बात पर जाकर खत्म हो जाता है कि सेंसेक्स औंधे-मुंह गिर क्यों नहीं रहा! प्रायः गिरे हुए हुए लोग ही ऐसी कामना रखते हैं।

मैं यह मानता हूं कि सेंसेक्स की कामयाबी देश की अर्थव्यवस्था का सकारात्मक पहलू है। दुनिया बहुत उम्मीदों के साथ हमारी ओर देख रही है। चहूं ओर अपने देश का डंका बज रहा है। ऐसे में सेंसेक्स की जिम्मेदारी डबल हो जाती है कि वो अपने आशावाद पर यों ही बना रहे।

सेंसेक्स का आशावाद हमारा आशावाद नहीं क्या! उम्मीद है, सेंसेक्स का यही आशावाद उसे 40 हजार के पार भी ले जाएगा एक दिन।

3 टिप्‍पणियां:

Dhruv Singh ने कहा…

आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'शुक्रवार' २६ जनवरी २०१८ को लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन राष्ट्रीय मतदाता दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Renu ने कहा…

बहुत सार्थक लेख है --