सोमवार, 15 जनवरी 2018

एक बे-किताब लेखक होने की व्यथा-कथा

मैं केवल अपनी ही निगाह में लेखक हूं। अपने लेखक होने पर केवल मुझे ही गर्व है। लेकिन पत्नी मुझे लेखक नहीं मानती। गर्व करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। यों, गर्व तो उसे मेरी पत्नी होने पर भी नहीं है। फिर भी, कुछ रस्में समाज को बहलाए रखने की खातिर निभा ली जाती हैं।

बाकी कुछ सोच रहे हों या न सोच रहे हों आप यह तो जरूर सोच ही रहे होंगे कि पत्नी को खुद पर मेरी पत्नी होने का गर्व भला क्यों नहीं है? वैसे तो एक लोकतांत्रिक मुल्क में हर पति-पत्नी को एक-दूसरे पर गर्व करने न करने का व्यक्तिगत अधिकार है। किसी पर किसी की जोर-जबर्दस्ती नहीं। न गर्व करने-करवाने के लिए एक-दूसरे को कोई हड़का ही सकता है। अब पत्नियां पुराने जमाने जैसी नहीं रहीं। अपने पतियों पर अपना जोर उतना ही रखती हैं जितना लेखक अपने विचारों पर रखता है।
तो पति की बेहतरी इसी में है कि वो अपनी पत्नी के कहे पर रिएक्ट कतई न करे। बुझे मन से ही सही यह स्वीकार कर ले कि पत्नी जो कह रही है वो ही दुनिया का अंतिम किंतु शाश्वत सत्य है। यही वजह है कि मैं भी पत्नी के कहे-बोले को बिना ईफ एंड बट किए मान लेता हूं।

अच्छा तो अब बताता हूं कि पत्नी क्यों मुझे लेखक मनाने से इंकार और क्यों मुझ पर गर्व नहीं करती। हालांकि इस वजह का कोई बहुत बड़ा कारण नहीं। कारण केवल इतना-सा है कि इतने बरस लेखक होने के बाद भी अभी तक मेरी कोई किताब क्यों नहीं आई है? हम पति-पत्नी के मध्य बहस और आंशिक झगड़े का कारण सिर्फ किताब है।

पत्नी को लगता है कि किताब आ जाने पर ही लेखक के लेखन और चरित्र को पहचान मिलती है। तब ही वो लेखक होने की गिनती में गिना जाता है। इस बाबत मैंने कई दफा उसे शांति से बैठाकर समझाया कि लेखक की पहचान केवल किताब नहीं बल्कि उसके लेखन को पाठकों से मिला अपार प्यार है। जोकि मुझे सहर्ष हासिल भी है। लेकिन नहीं। उसके तईं न मेरा लेखन मायने रखता है न पाठकों का प्यार। उसे तो मतलब मेरी किताब से है बस।

दरअसल, उसे किताबों के प्रकाशन के पीछे की राजनीति तो मालूम नहीं। न कोई अहसास है लेखक-प्रकाशक के बीच बनी रहने वाली अनबन का। अरे, अपनी किताब ले आना कोई इतना आसान थोड़े न है, जितना वो समझती है। कितनी तरह के दंद-फंद करने-करवाने पड़ते हैं। प्रकाशक कोई इतना सीधा तो होता नहीं कि बिना 'कुछ लिए' वो किताब छाप देगा। अपनी जेब से पैसा देकर अपनी किताब छपवाने का मुझको कोई शौक नहीं।

मैं तो चलो छोटा-मोटा लेखक ठहरा। बड़े और वरिष्ठ किस्म के लेखकों के भी पसीने छूट जाते हैं अपनी किताब को निकलवाने में। आजकल के भीषण बाजारवाद के दौर में अपना माल (किताब) बेचना इतना आसान नहीं। लेखक को भी अपनी किताब की वैसी ही मार्केटिंग करनी पड़ती है जैसे सेल्समैन अपने प्रोडक्ट की करता है। चेतन भगत के अपनी किताब को प्रमोट करने के फंडे देखे हैं न।

पत्नी इतने से भी संतुष्ट नहीं। दो टूक कह देती है, जैसा वे लोग करते हैं तुम भी करो न। क्या हर्ज है। बन जाओ न अपनी किताब के सेल्समैन! क्या मार्केटिंग में एमबीए घुइयां छीलने के लिए किया था!

अरे, मेरी किताब न सही पर इतने अखबारों में निरंतर छप तो रहा हूं न। यह भी तो एक प्रकार का प्रकाशन और मेरे लेखन की पब्लिसिटी है। रोज लिखना इतना भी सरल नहीं होता प्रियवर।

यहां-वहां छपके और रोज लिखके तुम न कोई बहुत बड़ा तीर मार रहे हो न मुझ पर कोई अहसान ही कर रहे हो। लेखक हो क्या इतना भी न करोगे। रोज ठेला लगाने या रिक्शा चलाने वाला कभी कहता है कि मैं ये-ये करता हूं। अपने पेट की खातिर सब मेहनत करते हैं श्रीमानजी। तुम कोई अनोखे न हो। बताइये, ये तो पत्नी का जवाब होता है।
इस मुद्दे पर उससे ज्यादा बहसबाजी करो तो वही चिर-परिचित धमकी 'घर छोड़कर चली जाऊंगी'।

स्साला कभी-कभी तो बड़ी खुंदक आती है खुद पर कि काहे मैं लेखक बन गया! नेता या बिजनेसमैन होता तो सही था। तब कम से कम मेरे ऊपर चौबीस घंटे 'बे-किताब लेखक' होने का ताना तो नहीं मारा जा रहा होता। जिंदगी ठाठ से कटती। न पत्नी के नखरे उठाने को सौ दफा सोचना पड़ता।

खैर, ये सब तो ख्याली बातें हैं। बातों से पेट कहां भरता है पियारे।
अब तो इसी उधेड़बुन में उलझा हुआ हूं कि कैसे भी करके अपने ऊपर से 'बे-किताब लेखक' होने का कलंक मिटा सकूं। 10-12 न सही कम से कम अपनी एक किताब लाके तो पत्नी को दिखा ही दूँ।  किताब के बहाने हमारे बीच हर वक़्त रहने वाला गतिरोध कुछ तो दूर हो।

जानता हूं, मेरे लिए ये सब जुगाड़-तुगाड़ करना कठिन होगा। पर इसके अतिरिक्त कोई और चारा भी तो नहीं। एक किताब आ जाने से पत्नी की निगाह में 'बहुत अच्छा पति' तो नहीं हां 'कुछ अच्छा पति' होने का सम्मान तो पा ही जाऊंगा।

उम्मीद है, अगले पुस्तक मेला तक मेरे किताब भी होगी मार्केट में।

1 टिप्पणी:

Vimal Shukla ने कहा…

मैं भी बे किताब लेखक हूँ भाई आपका व्यंग्य पढ़कर अपनी भी आँख भर आई|