मंगलवार, 30 जनवरी 2018

बजट और लेखक

बजट हर साल आता है। हर बार कुछ नहीं घोषणाएं होती हैं। पुरानी कुछ घोषणाओं को विस्तार दिया जाता है। क्या आम, क्या खास सभी के लिए बजट में कुछ न कुछ रहता है। फिर भी, बजट से कुछ लोग खुश तो कुछ नाराज होते ही हैं। टीवी चैनलों पर बहसें होती हैं। अर्थशास्त्री लोग अपना अलग रंग अलापते हैं तो राजनीतिक दल अपना। हालांकि नतीजा किसी के कहने-सुनने का कुछ नहीं निकलता, बस थोड़ी-बहुत देर का 'आर्थिक मनोरंजन' हो जाता है। अगले दिन अखबार का पहला पन्ना एक उम्दा से कार्टून से साथ हमारे सामने होता है।

खैर...

लेखक बड़ी खामोशी के साथ इस सब को देखता है। मन में सोचता है, बजट में सबको कुछ न कुछ दिया जाता है लेकिन उसे ही क्यों अछूत समझ, हर बार दरकिनार किया जाता है। क्या लेखक इस देश का नागरिक नहीं? क्या उसके अरमान नहीं? क्या उसकी अपनी आर्थिक परेशानियां नहीं? क्या उसका घर-परिवार नहीं? क्या सरकार या बजट पर उसका अधिकार नहीं? आखिर वोट तो उसने भी दिया था!

बजट के दौरान लेखक अक्सर ऐसे ही प्रश्नों से अपने आप से उलझता रहता है। उसे मालूम है, सरकार या वित्तमंत्री से उलझकर उसे सिर्फ खोखली सांत्वना के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलना। क्योंकि देश में जितनी भी छोटी-बड़ी योजनाएं-परियोजनाएं बनती हैं उनमें लेखक की भूमिका 'जीरो' होती है। लेखक तो लिख-लिखाकर ही अपने मन और दिमाग की भूख को शांत कर सकता है। इसके अलावा वो और कर भी क्या सकता है हुजूर। तिस पर भी उसे प्रशंसा कम गालियां ही अधिक सुनने को मिलती हैं।

अजी, किसी और का क्या कहूं, खुद मैंने लेखक होकर किसी का क्या उखाड़ लिया। बजट में वित्तमंत्री जी को यह तक तो लिख न सका कि हम लेखकों के पारिश्रमिक के वास्ते भी बजट में कोई प्रावधान या योजना रखिए। कब तलक हम कम पारिश्रमिक में लिख-लिख कर शोषित होते रहेंगे। वैसे, मैं बहुत बड़ा लेखक-व्यंग्यकार हूं। पर क्या फायदा...?

बुरा न मानिएगा किंतु यह सत्य है कि लेखक देश-समाज का सबसे निरीह प्राणी है। दुनिया भर की चिंता का बोझ अपने सिर पर उठाए फिरता है मगर उसकी चिंता से सरोकार न सरकार को है न वित्तमंत्री को। केवल लिखकर अपना घर-परिवार चलाने की खुशफहमी तो (हिंदी का लेखक) सपने में भी नहीं पाल सकता। एक बहुत बड़े लेखक-कहानीकार थे। सोचा तो उन्होंने लिखकर ही अपना परिवार चलाने का था पर जिन परिस्थितियों में उनका अंत हुआ लिखने में भी ख़ौफ आता है।

चूंकि अब देश में 'न्यू इंडिया', 'मेक इन इंडिया' और 'गरीब हितैषी' सरकार है, अतः मैं चाहूंगा कि वित्तमंत्री जी इस बजट में कुछ न कुछ हम लेखकों के लिए भी रखें। उन्हें भी कुछ दें। वायदों का झुंझन्ना न थमाएं। हम लेखकों को भी लगे कि हम अनाथ नहीं बजट में हमारी भी कुछ भूमिका है।

सोमवार, 29 जनवरी 2018

राजनीति में 'रजनीकांत स्टाइल'

रजनीकांत का राजनीति जॉइन करना राजनीति के लिए 'सौभाग्य' की बात है। यकीनन, राजनीति का सीना भी गर्व से फूल गया होगा। अब तक राजनीति में हमें 'मनोरंजन' ही देखने को मिला करता था, अब 'एक्शन' और 'मनोरंजन' दोनों देखने को मिलेंगे।

रजनीकांत की राजनीति उस तरह की नहीं होगी जैसी देश के नेता अब तक करते चले आए हैं। उनकी राजनीति में सबकुछ पलक झपकते ही संभव हो जाएगा। जनता की समस्याओं का निराकरण बुलेट ट्रेन की स्पीड से भी तेज गति से होगा। जिन निर्णयों को लेने में नेता लोग महीनों-सालों लगा देते हैं, उन्हें रजनीकांत स्टाइल में क्षण भर में निपटा दिया जाएगा। भ्रष्टाचार करने वालों पर 'शिवा' कहर बनकर टूटेगा। घोटाला करने से पहले नेता-अफसर सौ दफा सोचेगा कहीं 'रजनी' न आ जाए। न फुटपाथ पर कोई नंगे बदन सोएगा, न सड़कों पर कोई भीख मांगेगा।

'रामराज्य' तो खैर नहीं कह सकता हां 'रजनी-राज्य' की ओर देश अवश्य बढ़ने लगेगा!

अब तक देश ने केजरीवाल जी की 'अलग तरह की राजनीति' देखी, अब रजनीकांत की देखेगा। यह हमारे देश की राजनीति का सौभाग्य है कि इसे थोड़े-थोड़े समय बाद 'अलग तरह की राजनीति' करने वाले नेता मिल जाते हैं।

यों तो राजनीति हर नेता की लगभग एक जैसी ही रहती है बस किरदारों का जरा-बहुत हेर-फेर हो जाता है। चुनावी मौसम में तो राजनीति एकदम फिल्मी सीन की तरह चलने लगती है। हर नेता अभिनेता के रोल में आ जाता है। जनता उसके अभिनय में कभी सनी देओल तो कभी रजनीकांत तलाशती मिलती है।

लेकिन अभिनेता का नेता बनना और भी दिलचस्प होता है। कितना कुछ भी कर ले मगर उसके भीतर से अभिनेता वाले लटके-झटके नहीं जा पाते। किसी न किसी बहाने प्रदर्शित हो ही जाते हैं। देश की राजनीति का रंग-ढंग कुछ ऐसा बन भी लिया है कि यहां जनता को भी तड़क-भड़क और अवतार टाइप नेता भाने लगे हैं।

सिर्फ चुनावी वादे ही नहीं, जनता अपने नेता के कपड़ों से लेकर हाव-भाव और उसकी पर्सनल लाइफ में भी इंटरेस्ट लेती है। ऐसी करिश्माई राजनीति के लिए रजनीकांत एकदम मुफीद नेता हैं। उनका तो हाथ भी इस स्टाइल में उठता है कि उनके प्रेमी उसी पर बिछ जाते हैं।

हर वक़्त की परंपरागत राजनीति देखकर जो बोर हो चुके हैं उन्हें 'रजनीकांत स्टाइल' राजनीति अवश्य ही पसंद आएगी। हां, यह अलग बहस का विषय हो सकता है कि रजनी स्टाइल राजनीति वोट में कितना कन्वर्ट हो पाती है!

ये तो मानना ही पड़ेगा कि रजनीकांत का ऐसा-वैसा नहीं जनता के बीच जबर क्रेज़ है। उनके राजनीति में कदम रखने की खबर आते ही सोशल मीडिया पर तो एक तरह से दिवाली का सीन नजर आने लगा। उनके प्रशंसक नाचने-गाने लगे। बॉलीवुड बधाईयां देने उतर आया। साथ-साथ उन्होंने राजनीति के कई पुराने धुरंधरों को भी खासा परेशानी में डाल दिया।

चलिए खैर। आप तो राजनीति में रजनीकांत के होने को ही अब एन्जॉय कीजिए।

रविवार, 28 जनवरी 2018

इसलिए नहीं जाता पुस्तक मेला

नया साल शुरू होते ही हर बार मैं यह संकल्प लेता हूं कि कुछ भी हो इस दफा पुस्तक मेला में जाना ही है। पर पुस्तक मेला की तारीख नजदीक आते-आते सारा संकल्प ठंडा पड़ जाता है। जाना अगले साल पर टाल खुद को समझा लेता हूं।

लेकिन अंदर की बात बताऊं, मैं पुस्तक मेला जाना ही नहीं चाहता। डरता हूं वहां जाने से। एक तरह का 'अपराधबोध' घेर लेता है मुझे। खुद के लेखक होने पर 'ग्लानि' टाइप होने लगती है। खुद को धिक्कारता हूं कि इतना वक़्त हो गया मुझे लेखक बने किंतु अभी तक मेरी कोई किताब नहीं! किसी आयोजन, किसी समीक्षा में मेरा नाम नहीं। मुझसे जूनियर लेखकों की अब तक दर्जनों किताबें आ चुकी हैं। टनाटन चल-बिक रही हैं। और मैं... आज भी वहीं हूं जहां दस बरस पहले था।

फिर क्या मुंह लेकर जाऊंगा पुस्तक मेला में! कोई चेला या पाठक मुझसे पूछ ही बैठा- सर, आपकी किताब किस स्टाल पर मिलेगी तो क्या जवाब दूंगा उसे! मेरी तो सेकंड भर में किरकिरी हो जाएगी। हालांकि किताब न होने पर पत्नी सैंकड़ों दफा मेरी किरकिरी कर चुकी है। वो पत्नी है। उसे हक है मेरी किरकिरी करने का। उससे तो पलटकर मैं पूछ भी नहीं सकता- जानेमन, क्यों हरदम मेरी किरकिरी करने पर आमादा रहती हो? खैर...

आदर्शवाद मैं चाहे कितना ही छाड़ लूं पर एक लेखक के लिए उसकी किताब का होना उतना ही जरूरी है जितना मोबाइल में फेसबुक का होना। बिन फेसबुक मोबाइल की कोई औकात नहीं। फेसबुक ही वो प्लेटफॉर्म है जहां लेखक अपनी किताब, अपनी बात, अपने जज्बात, अपनी इज्जती-बेज्जती सबका चर्चा खुलकर कर सकता है। और, पुस्तक मेला के दिनों में तो लेखक जितनी किताबें अपने स्टाल पर नहीं उससे अधिक तो फेसबुक पर बिकवा लेता है। सब मार्केटिंग के फंडे हैं। अब किताब को किताब समझकर नहीं, माल समझकर बेचा-बिकवाया जाता है। बेचना ही लेखक का धेय है अब। (अपवादों को फिलहाल जाने दें)

न जाने का एक कारण यह भी है कि कौन लेखक या पाठक मेरे संग सेल्फी लेगा? फेसबुक पर छाए ज्यादातर स्टेटस में लेखकों-पाठकों की सेल्फियां उन्हीं के संग हैं जिनकी किताबें हैं। किताब का लेखक अपनी किताब की प्रति हाथ में थामे अपने चहेतों संग तरह-तरह की सेल्फियां ले रहा है। पुस्तकों के लोकार्पण तो हो ही रहे हैं उससे कहीं अधिक सेल्फियां लोकार्पित होती दिख रहीं हैं। पुस्तक मेला में उस लेखक को लेखक माना ही नहीं जाता जिसकी दर्जनभर सेल्फियां अपनी किताब और पाठकों के संग-साथ न हों।

किंतु मेरे साथ तो ऐसा कोई सीन ही नहीं। न कोई किताब है, न भविष्य में लाने की कोई योजना। बस एक लेखक ही तो हूं। अखबारों में व्यंग्य ही तो लिखता हूं। वरना, तो तमाम व्यंग्यकार ऐसे भी हैं जो न केवल व्यंग्य बल्कि कविता, कहानी, उपन्यास आदि भी लिख लेते हैं। सही है न। जमाना भीषण कॉम्पिटिशन है महाराज। चोर को सिर्फ चोरी में ही नहीं, ईमानदारी में भी सिद्धहस्त होना चाहिए। ताकि एक रोजगार बंद हो तो दूसरे से खर्चा-पानी चलता रहे।

मेरे विचार में तो पुस्तक मेला साल में एक बार नहीं बल्कि 365 दिन लगा रहना चाहिए। इस बहाने कितने ही फेसबुक वीरों को अपनी किताब लाने और स्थापित लेखकों को अपनी किताब बेचने का मौका मिलता रहेगा। मुफ्त की मार्केटिंग का सबसे उम्दा सोर्स है यह। बस किताबें महंगी होने का रोना न रोया जाए। किताबों को भी उसी शिद्दत से खरीदा जाए जैसे हम मोबाइल और कपड़े-लत्ते खरीदते हैं। आखिर लेखक को भी अपनी मेहनत का फल मिलना चाहिए कि नहीं मिलना चाहिए।

लेखक को उसकी किताब ही ऊंचा और महान बनाती है। मगर इतनी-सी बात मेरे भेजे में नहीं घुसती। पता नहीं मैं लेखक बना ही क्यों...? अजीब-सा लगता है न यह सोचकर भी कि मियां हैं तो लेखक पर किताब कोई न है! बे-किताब लेखक होने से तो अच्छा मेरे लिए यह रहेगा कि मैं छोले-भटूरे बचूं! कम से कम मेरे नाम और काम की इज्जत तो बनी रहेगी मार्केट में। यों, सिर्फ लेखक बने रहकर घास छीलने से क्या हासिल!

खुद की कोई किताब न होने की टीस पाले ही मैं पुस्तक मेला में जाने से खुद को बचाता हूं।

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

पतियों का लोकतंत्र खतरे में है!

मैं चिंतित हूं। जानता हूं, चिंता को चिता समान बताया गया है। फिर भी मैं चिंतित हूं। आप मेरी चिंता का रहस्य जानेंगे तो आप भी निश्चित ही चिंतित हो उठेंगे।

मैं चिंतित इस बात से नहीं कि लोकतंत्र खतरे में है! हमारा लोकतंत्र कभी खतरे में हो ही नहीं सकता। मैं जानता हूं- सेना, सरकार और नेता लोग मिलकर लोकतंत्र की बेहतर तरीके से रक्षा कर रहे हैं।

इससे इतर, मेरी चिंता का सबब पतियों का लोकतंत्र खतरे में होने से है। अपने शादीशुदा जीवन को स्टेक पर लेकर मैं यह बात खुली ज़बान से कहना चाहता हूं कि पत्नियों ने हम पतियों के लोकतंत्र को विकट खतरे में डाला हुआ है।

चाहता तो मैं यहां सिर्फ अपने लोकतंत्र के खतरे में होने की बात कह-कर सकता था लेकिन नहीं। मुझे अपने साथ-साथ देश के समस्त पतियों के लोकतंत्र की भी चिंता है। चिंता हो भी क्यों न! हम पति हैं तो क्या...आखिर हम भी इंसान हैं। दर्द हमें भी होता है। हम भी अपने लोकतंत्र में खुलकर सांस लेना चाहते हैं।

अपनी इस चिंता को मैं अब से नहीं कई सालों से मन के भीतर दबाए हूं। खुलकर कभी कहा-बोला इसलिए नहीं कि दुनिया उल्टा मुझे ही स्त्री-विरोधी न घोषित कर दे। खुद पत्नी ही मुझ पर चौड़ी न हो ले। लेकिन सहन करने की भी एक सीमा होती है महाराज। और, इस सत्य को तो कोई झुठला सकता ही नहीं कि शादीशुदा जीवन में जितना एक पति सह लेता है, उतना पत्नियां नहीं। जनता हूं.. जनता हूं.. यह सुनकर पत्नी बिरादरी को बुरा जरूर लगा होगा। पर मैं अब चुप न रहूंगा।

वो तो उस दिन जज सहेबानों के बेबाक बोलों को सुनकर मेरे भीतर का ज़मीर भी जाग गया नहीं तो मैं यों ही बर्दाश्त करता रहता पत्नी से मिले रंजोगम।

क्या मजाक समझ रखा है हम पतियों को! जब जहां जैसे चाहो लट्टू की मानिंद नचा लो। मायके की धमकी के दम पर हमसे खाना बनवा लो। बच्चे संभलवा लो। बर्तन मंजवा लो। साग-सब्जी मंगवा लो। शॉपिंग के लिए क्रेडिट कार्ड समर्पित करवा लो। तुम फ़्लर्ट करो तो ठीक पति जरा निगाह उठाकर देख भी ले तो हजारों जली-कटी बातों के अफसाने।

भला कोई कब तक सहे। कभी न कभी तो 'बोल कि लब आजाद हैं तेरे...' जैसा दुःसाहस करना ही पड़ेगा न। मतलब- ऑफिस में बॉस का झिड़कियां झेलो, घर में पत्नी की ऐंठ...। न न ये तानाशाही अब न चलेगी।

जब पतियों के खतरे में पड़े लोकतंत्र को बचाने का बीड़ा मैंने उठा ही लिया है तो यह संघर्ष ऐसे ही चलेगा। जिन पतियों में साहस हो वे मुझसे जुड़ सकते हैं। लोकतंत्र चाहे देश का हो या पति का उसकी हिफाजत जरूरी है। फिर चाहे लाख तूफां आएं या जान भी जाए पर कदम अब न पीछे हटेंगे न डिगेंगे।

बुधवार, 24 जनवरी 2018

सेंसेक्स का आशावाद

दुनिया सिर्फ 'उम्मीद' पर ही नहीं 'आशावाद' पर भी टिकी है। आशावादी न हों तो दुनिया नकारात्मक मोड में जाकर तबाह हो जाए। किसी और की मैं नहीं जानता किंतु मेरे जीवन के आशावाद का आधार 'ओशो' और 'सेंसेक्स' की आशावादिता पर ही जमा खड़ा है।

अभी यहां चर्चा का विषय 'ओशो' नहीं 'सेंसेक्स' है। ओशो पर फिर कभी।

सेंसेक्स में गजब का आशावाद है। अपने जीवन के इतने लंबे सफर में ऐसी न जाने कितनी ही विकट परिस्थितियां उसे दर-पेश आईं मगर आशावाद का दामन उसने न छोड़ा। हालांकि कई दफा वो नकारात्मकता की अंधी गलियों में भी भटका। अर्श से फर्श का स्वाद भी चखा। कई तगड़े झटके भी अर्थव्यवस्था और अपने चाहने वालों को दिए तब भी आशावाद का दामन थाम वो बार-बार खड़ा होता रहा। अपने विश्वास को डिगने न दिया। अपने आत्मसम्मान को ठेस न लगने दी।

यही वजह है, जो आज सेंसेक्स 36000 के शिखर पर चढ़ अपनी कामयाबी पर इठला रहा है। पर, बिना किसी ऐंठ के। वरना दुनिया तो ऐसे लोगों से भरी पड़ी है जो चींटी भर कामयाबी पर हाथी जैसा गर्व करने की आदत डाल लेते हैं। अपनी जमीन को भूल हवा में उड़ने लगते हैं। 'जो कुछ हूं बस मैं ही हूं' सरीखी खुशफहमी पाल लेते हैं।

सेंसेक्स अपनी सफलता पर 'इठला' जरूर लेता है लेकिन 'घमंड' नहीं करता। लड़खड़ाने के बाद भी खड़ा जरूर होता है। यह उसका भीतरी आशावाद नहीं तो और क्या है। यही तो उसकी शक्ति है।

महज साड़े तीन साल में सेंसेक्स ने 24000 हजार से 36000 का सफर तय किया है। यह न तो कोई हंसी-खेल था, न ही इतना आसान। यहां तो कुछ लोगों के सफलता की दो सीढ़ियां चढ़ने में ही टांके ढीले हो जाते हैं। कुछ तो हार मानकर ही बैठ जाते हैं। पर जो चढ़ते रहते हैं, एक दिन शिखर उनके कदम चुम ही लेता है। जोकि सेंसेक्स ने कर दिखाया भी।

ज्यादा नहीं तो 19 सालों से तो मैं ही देख रहा हूं सेंसेक्स को चढ़ते-उतरते। नकारात्मकता को ठोकर मार आशावाद का हाथ थामे रहते। तब सेंसेक्स कहां था, आज कहां है। खुद ही देख लीजिए। अपने खिलाफ खड़े होने वाले हर मंदड़िये को फिलहाल उसने धूल चटा रखी है। शेयर मार्केट का हर मंदड़िया पसोपेश में है कि क्या करे, क्या न करे? उनके दिन का हर इंतजार इस बात पर जाकर खत्म हो जाता है कि सेंसेक्स औंधे-मुंह गिर क्यों नहीं रहा! प्रायः गिरे हुए हुए लोग ही ऐसी कामना रखते हैं।

मैं यह मानता हूं कि सेंसेक्स की कामयाबी देश की अर्थव्यवस्था का सकारात्मक पहलू है। दुनिया बहुत उम्मीदों के साथ हमारी ओर देख रही है। चहूं ओर अपने देश का डंका बज रहा है। ऐसे में सेंसेक्स की जिम्मेदारी डबल हो जाती है कि वो अपने आशावाद पर यों ही बना रहे।

सेंसेक्स का आशावाद हमारा आशावाद नहीं क्या! उम्मीद है, सेंसेक्स का यही आशावाद उसे 40 हजार के पार भी ले जाएगा एक दिन।

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

लोकतंत्र के खतरे बनाम वैवाहिक जीवन के खतरे

खतरा कभी कहकर नहीं आता। अक्सर वे चीजें भी, अचानक से, खतरे में आ जाती हैं, जिनके बारे में हमारे पुरखों ने कभी सोचा भी न होगा। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया में जितनी तरह के लोग हैं, उतनी ही तरह के खतरे भी। सरल शब्दों में- दुनिया खतरों और खतरों के खिलाड़ियों से भरी पड़ी है।

अभी पिछले दिनों चार सम्मानित जजों ने जिस प्रकार 'लोकतंत्र के खतरे' में होने की आशंका व्यक्त की, उससे मुझे भी यह 'नैतिक बल' मिला कि मैं भी अपने 'वैवाहिक जीवन के खतरे' में होने पर कुछ बात रखूं।

इस संसार में मैं कोई अकेला पति नहीं जो इस खतरे को झेल रहा हो! लगभग हर कैटिगरी का पति अपना जीवन इसी खतरे के बीच- रोज जीते हुए, रोज मरते हुए- काट रहा है। यह मेरा निजी विचार है कि वैवाहिक जीवन की जितनी परेशानियां हैं, खतरे भी कम नहीं। खतरों की तलवार हर वक़्त सर पर लटकी रहती है। पति होने के नाते- हर रोज- इस तलवार से कैसे पार पा रहा हूं, यह सिर्फ मैं ही जानता हूं।

पहले मुझे भी औरों की तरह यही लगता था कि वैवाहिक जीवन के अपने मजे हैं, अपना आनंद है। जीवन में प्यार ही प्यार है और कुछ नहीं। जीवन में 24x7 वसंत ही वसंत है। शुरू में तो पत्नी के नखरों में मुझे खुद के प्रति सम्मान दिखाई देता था। उनको पूरा करने को यों तत्पर रहता, इतना तो कभी मैं हाईस्कूल पास करने को तत्पर नहीं रहा।

लेकिन वक़्त जैसे-जैसे बीतता गया, चीजें भी बदलती गईं। नखरे मुसीबत लगने लगे। खुद की आजादी खतरे में पड़ी महसूस होने लगी। वैवाहिक जीवन की रंगत बे-रंग होने लगी। कभी-कभी तो लगता, ये कहां किस झंझट में आकर फंस गया। मगर अब कुछ हो भी तो नहीं सकता था न।  एक बार को आप पब्लिक डोमेन में जाकर लोकतंत्र के खतरे में होने के खिलाफ आवाज बुलंद कर सकते हैं लेकिन पत्नी या वैवाहिक जीवन के खिलाफ कहने की हिम्मत नहीं जुटा सकते। अरे, दुनिया के कुछ कहने या हंसी उड़ाने की बात जाने दीजिए, उससे पहले पत्नी और घर वाले ही ऐसी-तैसी कर डालेंगे।

मैंने ऐसे बहुत बड़े-बड़े खलीफा देखे हैं, जो मंचों पर तमाम क्रांतिकारी बातें करते, नारे लगाते हैं पर अपनी पत्नी के आगे यों भीगी बिल्ली बने रहते हैं मानो कुछ पता ही न हो; समाज या देश में क्या चल रहा है। खुद के वैवाहिक जीवन के खतरे में होने का कभी जिक्र तक न करेंगे और लोकतंत्र के खतरे में होने के मसले पर पूरे देश में अफरा-तफरी मचा देंगे।

इसलिए तो मैं लोकतंत्र को छोड़ अपने वैवाहिक जीवन को बचाने में अधिक ध्यान देता हूं। वैसे, मैं अपने देश के लोकतंत्र की तरफ से बिल्कुल निश्चिंत हूं। देश का लोकतंत्र कभी खतरा में हो ही नहीं सकता। मुझे पता है, इस वक़्त देश में 56 इंच छाती वाली सरकार है, जो लोकतंत्र की स्वतंत्रता को बचाए-बनाए रखने को 24x7 प्रतिबद्ध है! देख नहीं रहे आप, सरकार ने कैसे पाकिस्तान और चीन की पुंगी बजा रखी है। अमरीका हमारे देश के लोकतंत्र का लोहा मानता है! इजराइल के प्रधानमंत्री अभी हाल सरकार-ए-आली से इम्प्रेस होके गए ही हैं!
अभी आप हमारे लोकतंत्र का जलवा दोवास में देखिएगा!

वही तो मैं कह रहा हूं कि ईरान से लेकर तुरान तक हमारे देश के लोकतंत्र और लोकतांत्रिक सरकार के चर्चे हैं और यहां चंद लोगों को लोकतंत्र खतरे में जान पड़ रहा है! कमाल है न।

मैं तो कहता हूं, वैवाहिक जीवन के लोकतंत्र को बचाना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि इसी पर मेरे-आपके जीवन की पूरी कायनात टिकी है। यह अगर बचा हुआ है तो मानिए देश, समाज, दुनिया में सबकुछ बचा हुआ है! देश और सरकार से नाराजगी तो फिर भी रखी जा सकती है किंतु पत्नी से नाराजगी रखने का मतलब है, दाना-पानी पर सीधी चोट। मजाक न समझें। सौ परसेंट सही कह रहा हूं मैं।

जैसाकि मैंने ऊपर अपने वैवाहिक जीवन के खतरे में होने का जरा-सा जिक्र किया, यह सच है। जो भी है, इसे बचाए-बनाए रखना तो अब मेरी ही जिम्मेदारी है न। मैं चाहे रोऊं, चाहे हंसूं झेलना मुझको ही है। यह आजमाई हुई बात है कि मुसीबत के वक़्त न अपना न पराया कोई पास नहीं आता। सब कन्नी काट लेते हैं।

अपने-अपने वैवाहिक जीवन के लोकतंत्र को बचाएं। देश का लोकतंत्र बचाए रखने को पूरा सरकार और सेना का अमला है। निश्चिंत रहें।

गुरुवार, 18 जनवरी 2018

तबला और ठंड

हालांकि मुझे तबला बजाना नहीं आता फिर भी बजाने की कोशिश में सिर्फ इसलिए लगा पड़ा हूं ताकि ठंड न लगे। मगर ठंड इतनी ढीठ है कि लगे बिना मान ही नहीं रही। तबले पर भारी पड़ रही है। तबले के सिरों पर जिनती तगड़ी थाप जमाता हूं ठंड उतनी ही विकट चढ़ी आती है। उंगलियां तक पनाह मांग जाती हैं लेकिन ठंड का ताप कम नहीं होता।

हां, पत्नी अच्छे से तबला बजा लेती है। एक शादी में तबला बजाते देखकर ही मैंने उसे पसंद किया था। फिर आपस में प्रेम-इजहार का कुछ ऐसा तबला बजा कि नौबत शादी तक आ ली।

खैर, मैंने पत्नी को तबला बजाने के लिए इसलिए बोला कि शायद लय-ताल में बजने से ठंड अपना प्रकोप हम पर से कुछ कम कर ले। पर उसने तबला बजाने से यह कहते हुए साफ इंकार कर दिया कि वो अपनी नाजुक उंगलियों को इस भीषण ठंड में 'अतिरिक्त कष्ट' नहीं देना चाहती।

आगे मैंने यह जानते-समझते हुए जिद नहीं करी कि जिद के परिणाम मेरे फेवर में बुरे हो सकते हैं। मैं नहीं चाहता इतनी ठंड में मेरी चारपाई बाहर खुले आंगन में पड़े। बहरहाल, पत्नी के 'दो टूक' कहे का कड़वा घूंट मुस्कुराते हुए पी गया। ऐसा करना मेरी ही नहीं, हम पतियों की नियति है।

खैर, पड़ोस में पड़ा अखबार का पहला पन्ना बता रहा है कि ठंड अभी अपना जोर बनाए रखेगी। हाल-फिलहाल कोई संभावना नजर नहीं आ रही कम होने की। खबर में बसी ठंडक मुझे भीतर से और अधिक गलाए जा रही है। तबला मेरे दिलोदिमाग पर ऐसा बज रहा है कि कान के पर्दे सुन्न-से पड़ने लगे हैं।

ठंड का भी अजीब खेला है। न किसी की सुनती है न किसी के बस में ही आती है। इसका भी वही हिसाब है- 'भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस खड़ी पगुराये'। इन दिनों जब सूरज महाराज ठंड और कोहरे को मात न दे पा रहे तो हम किस खेत की मूली है। उत्तर भारत से लेकर अमेरिका तक ठंड अकेली सबका बैंड बजा रही है।

यहां अपनी घर बैठे कुल्फी जमी पड़ी है फिर उनका जेल में क्या हाल होगा। इस उमर में इतना सितम, ठीक नहीं। सोचने वाली बात है, इतनी उग्र ठंड में बंदा खुद को संभालेगा या तबला बजाएगा? तबला लय में ही बजे इसकी कोई गारंटी नहीं।

वक़्त का तकाजा तो यही कहता है कि तबले-सबले पर खाक डालिए, ठंड के प्रकोप से खुद को बचाने की फिक्र कीजिए। खुद सलामत हैं तो देर-सवेर तबला भी बज ही जाएगा।

यहां तो अपनी उंगलियां की-पैड पर चलते जमने-सी लगीं हैं। मैं इन्हें अतिरिक्त कष्ट दे रहा हूं। मुझे इनकी फिक्र करनी चाहिए। तबला अभी नहीं तो फिर कभी बजाना सीख लूंगा। अभी तो फिलहाल ठंड से बचना मेरी प्राथमिकता में है। ये जाए तो कुछ सुकून मिले।

'बिजी' रहने और 'टाइम' न मिलने के बीच फंसे हम

जब कोई मुझसे मिलकर यह कहता है- 'यार, मैं बड़ा बिजी हूं।' फिर उससे दूसरा कोई प्रश्न करता ही नहीं। क्योंकि दूसरे प्रश्न का जवाब उसके पास यही होगा- 'टाइम नहीं है।'

'बिजी' और 'टाइम' ये दो जुमले हमारी ज़बान पर इस कदर चढ़ लिए हैं, कभी-कभी तो मुझे लगता है, आगे चलकर सरकार इन्हें 'आधार' से लिंक करने का फरमान न जारी कर दे! आज के समाज में किसी परिवार का ऐसा कोई सदस्य नहीं होगा जो 'बिजी' न हो या जिसके पास 'टाइम' न हो।

आलम यह है, बंदा कुछ भी न करता हो, नितांत खाली बैठा हो तब भी कहता हुआ यही मिलेगा कि बिजी हूं। बिजी होने-रहने का चस्का हमें इस कदर लग चुका है, कभी तो मैं हैरान हो जाता हूं कि ये 24x7 बिजी रहने वाले महापुरुष नींद में कैसे 'फ्री' रह पाते होंगे?

जब से इंसान के हाथ में मोबाइल आया है, तब से बिजी रहने और टाइम न मिलने की अदावतें ज्यादा बढ़ गईं हैं। यह भी एक शाश्वत हकीकत है कि दुनिया में सबसे अधिक झूठ मोबाइल पर ही बोले जाते हैं। मोबाइल पर बोले जाने वाले प्रमुख झूठों में 'बिजी' और 'टाइम' ही हैं। मैंने तो संडास में मोबाइल लिए बैठे लोगों को भी 'बिजी' और 'टाइम' का बहाना मारते देखा है।

यों भी मोबाइल पर बोले जाने वाले सफेद झूठ संभवतः कम पकड़े जाते हैं।

हालांकि लोगबाग ऐसा कहते हैं कि अगला युद्ध 'पानी' के लिए लड़ा जाएगा मगर मुझे लगता है अगला युद्घ 'बिजी' और 'टाइम' जैसे शब्दों के लिए ही लड़ा जाएगा! दुनिया में जब सब बिजी और किसी के पास टाइम नहीं होगा तो अगला ऑप्शन युद्ध का ही बचता है।
धीरे-धीरे अब यह बात मुझे समझ आने लगी है कि क्यों लोग मुझसे कटे रहते हैं। क्योंकि जब भी कोई मुझे पूछता है- क्या कर रहे हो तो तुरंत बोल देता हूं- जी खाली हूं। फ्री हूं। जबकि मुझे ये न बोलकर हमेशा यही बोलना चाहिए- यार, बहुत बिजी हूं। सांस लेने तक का टाइम नहीं। तब लोग मुझसे ज्यादा खुश और जुड़े भी रहेंगे।

खाली और फ्री आदमी की समाज में कोई औकात नहीं।

मंगलवार, 16 जनवरी 2018

चम्मच खतरे में है!

बहरहाल, यह तो नहीं बता सकता कि लोकतंत्र कितना खतरे में है कितना नहीं। यह जजों और बुद्धिजीवियों के विमर्श का विषय है। हां, इतना जरूर बता सकता हूं कि लोकतंत्र में चम्मच खतरे में हैं! चम्मचों से चमचों का अस्तित्व खतरे में है। यह खतरा छोटा-मोटा नहीं, बहुत बड़ा है।

इतिहास में ऐसा पहली दफा हुआ है, जब सोशल मीडिया के माध्यम से चम्मच चोरी की घटना सामने आई। मुद्दा चूंकि एक बड़ी मुख्यमंत्री साहिबा ने उठाया था तो सामने आना ही था। वरना तो तमाम रूटीन चोरियों के साथ चम्मच चोरी की वारदात भी दबी की दबी रह जाती। जब हीरे-जवाहरात चोरी होने की घटनाएं कुछ समय बाद ठंडी पड़ लेती हैं, ये तो बेचारे चम्मच थे!

कोई माने या न माने मगर मैं तो चम्मच के चुर जाने को लोकतंत्र का सबसे दुखद पहलू मानता हूं। अरे, इससे क्या होता है कि चम्मच रसोई का आइटम है। इसकी जरूरत सिर्फ खाना खाने या परोसने के लिए पड़ती है। तरह-तरह के चम्मच प्लेट्स की शोभा बढ़ाते हैं। एक दिन की छोड़िए, बस एक टाइम ही बिना चम्मच खाना खाकर देखिए- अमां, दाल-चीनी के भाव मालूम पड़ जाएंगे।

खुदा-न-खास्ता चम्मच बिरादरी अगर हड़ताल कर दे तो रसोई में न खाना पकेगा न कोई खाएगा। भूखमरी की नौबत आ जाएगी। क्या समझे!

चम्मच मूलतः शांतिप्रिय होते हैं। न किसी से उलझते हैं न अपना दुख-दर्द किसी से बांटते। अपनी छोटी किंतु सुखद लाइफ में मस्त रहते हैं। पर इसका ये मतलब तो नहीं कि उन्हें शादियों या पार्टियों में चुरा लिया जाए। चोरी चले जाने की खबर तक थाने में दर्ज न करवाई जाए। वैसे तो हम बड़े ही जिम्मेदार नागरिक बने फिरते हैं। कार, कूलर, मग्गा, कुत्ता चुर जाए तो थाना छोड़ अखबारों तक में खबर देने से नहीं चूकते।
आसमान सर पर उठा लेते हैं। यहां चम्मच चोरी हो गए तो सब कानों में तेल डाले ऐसे बैठे हैं मानो कुछ हुआ ही न हो। वाकई, किसी ने सही कहा है धरती पर इंसान से ज्यादा मतलबी प्राणी कोई और नहीं।

अब तक एक भी बंदा निकलकर सामने नहीं आया है जिसने चम्मच चोरों के खिलाफ चोरी की रपट दर्ज कराई हो। सब मिलकर सोशल मीडिया पर चम्मचों पर चुटकुले बनाने में लगे हैं। विडंबना देखिए, इनमें वो लोग भी शामिल हैं जो चम्मचों की सहायता से आज किसी न किसी के चमचे बने मौज काट रहे हैं।

और एक मैं हूं जब से इस खबर का पता चला है, खुद को गहरे सदमे में फील कर रहा हूं। रात-दिन इसी चिंता में डूबा जा रहा हूं, चोरी गए चम्मच पता नहीं किस हालत में होंगे? उनके साथ कैसा बर्ताव बरता जा रहा होगा?

चम्मच का चोरी होना लोकतंत्र का लिए खतरे की घंटी है! देश में जब चम्मच ही सुरक्षित नहीं फिर आम आदमी की बिसात ही क्या? जजों और बुद्धिजीवियों को इस मसले को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए। साथ ही, राजनीतिक दलों को इस मसले पर राजनीति कतई नहीं करनी चाहिए।

ध्यान रखें, चम्मच की हिफाजत में ही देश का लोकतंत्र और चमचे सुरक्षित हैं। मेरे विचार में इस मसले को यूएन तक लेके जाना चाहिए। नहीं क्या...!

सोमवार, 15 जनवरी 2018

आधार, फेसबुक और मियां की बेचैनी

मियां मेरे लंगोटिया यार हैं। मोहल्ले में ही रहते हैं। जीवन का अच्छा और बुरा समय हमने साथ बिताया है। दिल में छिपी जो बात अपनी बेगम से न कह पाते, मुझसे कह देते हैं। मैं इत्मीनान से सुन भी लेता हूं। जरूरत पड़ती है तो अपनी तरफ से राय टाइप भी दे देता हूं। हालांकि ऐसा सौ में पांच बार ही होगा।

कल ही की बात रही। मियां हाथ में किसी अंग्रेजी अखबार की प्रति थामे तेज हवा के झोंके की मानिंद घर में दाखिल हुए। पास पड़ी कुर्सी पर जोरदार तशरीफ रखी। अखबार में छपी एक खबर को मेरे सामने करते हुए बोले- 'क्या अब यही दिन देखना बाकी रह गया था? मतलब प्राइवेसी का कोई मोल ही नहीं रह जाएगा! आखिर ये सरकार चाहती क्या है?'

माजरा मेरी समझ में अब भी नहीं आया था कि क्यों मियां इतना भड़क रहे हैं? चूंकि अंग्रेजी में मेरा हाथ और दिमाग बचपन से ही तंग रहा है सो मियां से उक्त खबर के बाबत पूछा। इस भीषण सर्दी में भी चार घूंट ठंडे पानी से गला तर करने और थोड़ा शांत पड़ने के बाद मियां ने खुलासा किया कि 'सरकार अब फेसबुक को आधार से लिंक करने पर विचार कर रही है!'

'तो इसमें इतनी हैरानी और हत्थे से उखड़े वाली क्या बात है?' मैंने मियां से पूछा। 'वाह जी वाह बात क्यों नहीं है? आखिर निजता भी कोई चीज होती है कि नहीं! क्या जरूरत है सरकार या फेसबुक को हमारी निजता पर डाका डालनी की।' मियां ने खासा तैश में प्रतिकार किया।

'न न ऐसा कुछ नहीं है महाराज। बल्कि सरकार और फेसबुक तो हमारी निजता को इस प्लेटफॉर्म पर बचाने की जुगत में हैं। आधार के फेसबुक से लिंक होते ही इना, मीना, एंजल प्रिया, डॉली, बबली टाइप तमाम फर्जी एकाउंट्स पर रोक लग जाएगा। यहां सिर्फ वही टिका रहेगा जो जेनुइन है। समझे न।'

'समझना क्या है? मैं इस मनमानी को चलने न दूंगा। इस मसले को यूएन तक लेके जाऊंगा। सड़कों पर आंदोलन करूंगा। तानाशाही नहीं चलेगी..नहीं चलेगी..।' नारा बुलंद करते हुए मियां अपने घर को निक्कल लिए। मैंने उन्हें पुकारा भी मगर वे न पलटे।

एक बे-किताब लेखक होने की व्यथा-कथा

मैं केवल अपनी ही निगाह में लेखक हूं। अपने लेखक होने पर केवल मुझे ही गर्व है। लेकिन पत्नी मुझे लेखक नहीं मानती। गर्व करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। यों, गर्व तो उसे मेरी पत्नी होने पर भी नहीं है। फिर भी, कुछ रस्में समाज को बहलाए रखने की खातिर निभा ली जाती हैं।

बाकी कुछ सोच रहे हों या न सोच रहे हों आप यह तो जरूर सोच ही रहे होंगे कि पत्नी को खुद पर मेरी पत्नी होने का गर्व भला क्यों नहीं है? वैसे तो एक लोकतांत्रिक मुल्क में हर पति-पत्नी को एक-दूसरे पर गर्व करने न करने का व्यक्तिगत अधिकार है। किसी पर किसी की जोर-जबर्दस्ती नहीं। न गर्व करने-करवाने के लिए एक-दूसरे को कोई हड़का ही सकता है। अब पत्नियां पुराने जमाने जैसी नहीं रहीं। अपने पतियों पर अपना जोर उतना ही रखती हैं जितना लेखक अपने विचारों पर रखता है।
तो पति की बेहतरी इसी में है कि वो अपनी पत्नी के कहे पर रिएक्ट कतई न करे। बुझे मन से ही सही यह स्वीकार कर ले कि पत्नी जो कह रही है वो ही दुनिया का अंतिम किंतु शाश्वत सत्य है। यही वजह है कि मैं भी पत्नी के कहे-बोले को बिना ईफ एंड बट किए मान लेता हूं।

अच्छा तो अब बताता हूं कि पत्नी क्यों मुझे लेखक मनाने से इंकार और क्यों मुझ पर गर्व नहीं करती। हालांकि इस वजह का कोई बहुत बड़ा कारण नहीं। कारण केवल इतना-सा है कि इतने बरस लेखक होने के बाद भी अभी तक मेरी कोई किताब क्यों नहीं आई है? हम पति-पत्नी के मध्य बहस और आंशिक झगड़े का कारण सिर्फ किताब है।

पत्नी को लगता है कि किताब आ जाने पर ही लेखक के लेखन और चरित्र को पहचान मिलती है। तब ही वो लेखक होने की गिनती में गिना जाता है। इस बाबत मैंने कई दफा उसे शांति से बैठाकर समझाया कि लेखक की पहचान केवल किताब नहीं बल्कि उसके लेखन को पाठकों से मिला अपार प्यार है। जोकि मुझे सहर्ष हासिल भी है। लेकिन नहीं। उसके तईं न मेरा लेखन मायने रखता है न पाठकों का प्यार। उसे तो मतलब मेरी किताब से है बस।

दरअसल, उसे किताबों के प्रकाशन के पीछे की राजनीति तो मालूम नहीं। न कोई अहसास है लेखक-प्रकाशक के बीच बनी रहने वाली अनबन का। अरे, अपनी किताब ले आना कोई इतना आसान थोड़े न है, जितना वो समझती है। कितनी तरह के दंद-फंद करने-करवाने पड़ते हैं। प्रकाशक कोई इतना सीधा तो होता नहीं कि बिना 'कुछ लिए' वो किताब छाप देगा। अपनी जेब से पैसा देकर अपनी किताब छपवाने का मुझको कोई शौक नहीं।

मैं तो चलो छोटा-मोटा लेखक ठहरा। बड़े और वरिष्ठ किस्म के लेखकों के भी पसीने छूट जाते हैं अपनी किताब को निकलवाने में। आजकल के भीषण बाजारवाद के दौर में अपना माल (किताब) बेचना इतना आसान नहीं। लेखक को भी अपनी किताब की वैसी ही मार्केटिंग करनी पड़ती है जैसे सेल्समैन अपने प्रोडक्ट की करता है। चेतन भगत के अपनी किताब को प्रमोट करने के फंडे देखे हैं न।

पत्नी इतने से भी संतुष्ट नहीं। दो टूक कह देती है, जैसा वे लोग करते हैं तुम भी करो न। क्या हर्ज है। बन जाओ न अपनी किताब के सेल्समैन! क्या मार्केटिंग में एमबीए घुइयां छीलने के लिए किया था!

अरे, मेरी किताब न सही पर इतने अखबारों में निरंतर छप तो रहा हूं न। यह भी तो एक प्रकार का प्रकाशन और मेरे लेखन की पब्लिसिटी है। रोज लिखना इतना भी सरल नहीं होता प्रियवर।

यहां-वहां छपके और रोज लिखके तुम न कोई बहुत बड़ा तीर मार रहे हो न मुझ पर कोई अहसान ही कर रहे हो। लेखक हो क्या इतना भी न करोगे। रोज ठेला लगाने या रिक्शा चलाने वाला कभी कहता है कि मैं ये-ये करता हूं। अपने पेट की खातिर सब मेहनत करते हैं श्रीमानजी। तुम कोई अनोखे न हो। बताइये, ये तो पत्नी का जवाब होता है।
इस मुद्दे पर उससे ज्यादा बहसबाजी करो तो वही चिर-परिचित धमकी 'घर छोड़कर चली जाऊंगी'।

स्साला कभी-कभी तो बड़ी खुंदक आती है खुद पर कि काहे मैं लेखक बन गया! नेता या बिजनेसमैन होता तो सही था। तब कम से कम मेरे ऊपर चौबीस घंटे 'बे-किताब लेखक' होने का ताना तो नहीं मारा जा रहा होता। जिंदगी ठाठ से कटती। न पत्नी के नखरे उठाने को सौ दफा सोचना पड़ता।

खैर, ये सब तो ख्याली बातें हैं। बातों से पेट कहां भरता है पियारे।
अब तो इसी उधेड़बुन में उलझा हुआ हूं कि कैसे भी करके अपने ऊपर से 'बे-किताब लेखक' होने का कलंक मिटा सकूं। 10-12 न सही कम से कम अपनी एक किताब लाके तो पत्नी को दिखा ही दूँ।  किताब के बहाने हमारे बीच हर वक़्त रहने वाला गतिरोध कुछ तो दूर हो।

जानता हूं, मेरे लिए ये सब जुगाड़-तुगाड़ करना कठिन होगा। पर इसके अतिरिक्त कोई और चारा भी तो नहीं। एक किताब आ जाने से पत्नी की निगाह में 'बहुत अच्छा पति' तो नहीं हां 'कुछ अच्छा पति' होने का सम्मान तो पा ही जाऊंगा।

उम्मीद है, अगले पुस्तक मेला तक मेरे किताब भी होगी मार्केट में।