बुधवार, 19 दिसंबर 2018

काम निकलने से मतलब

मैं काम निकालने में अधिक विश्वास रखता हूं। काम निकलना चाहिए बस, चाहे वो कैसे या कहीं से भी निकले। साफ सीधा-सा फलसफा है, भूख लगने पर खाना ही पेट की अगन को शांत करता है, ऊंची या गहरी बातें नहीं। बातों से ही अगर पेट भर रहा होता तो आज किसान न खेती कर रहा होता, न रसोई में चूल्हे ही जलते नजर आते।

ठीक यही फंडा काम निकालने पर लागू होता है। काम निकालने का बहुत कुछ संबंध 'जुगाड़' से है। है तो है, इसमें गलत भी क्या है। अरे भई, जो बंदा या आईडिया काम निकालने के वक़्त काम न आ सका, वो बेकार है। जुगाड़ के काम में अगर हम आदर्शवाद का राग अलापेंगे तो, मैं समझता हूं, हमसे बड़ा बेवकूफ कोई न होगा!

रुपए-पैसे के मामले में मैं काम निकालने या चलाने को ही महत्त्व देता हूं। जरूरत के वक़्त उसी दोस्त से मांगता हूं, जो वक़्त पर काम चला दे। आई बला को टलवा दे। यही असली दोस्ती है। ज्यादा हिसाब-किताब से अगर चलूंगा तो जिंदगी भर खुद को सिमेटते ही रह जाऊंगा।

देखा जाए तो एक मैं ही नहीं पूरी दुनिया काम निकालने के पैटर्न पर ही चल रही है। कोई राजनीति में तो कोई लेखन में तो कोई प्रेम में तो कोई शादी-ब्याह में काम निकालने में लगा पड़ा है। खासकर, राजनीति और लेखन तो टिके ही काम निकालने के दम पर हुए हैं। नेता चुनाव में ऊंचे वायदे तो लेखक ऊंची बातें कर काम निकाल रहा है। सार यह है कि दुकानें दोनों की ही चल रही हैं। दुकानों का चलते रहना महत्त्वपूर्ण है। बाकी तो बातें हैं। बातों का क्या...।

पहले मैं भी काम निकालने जैसी शॉर्टकट विद्या पर यकीन नहीं करता था। काम चलाने या निकालने वालो को तुच्छ निगाह से देखा करता था। लेकिन एक दिन एक तांत्रिक ने मुझे बताया- 'बेटा, दुनिया-समाज बड़ा मतलबी है। काम निकालने में विश्वास करता है। काम निकल जाने के बाद पलटकर पूछता है- आप कौन? तो जितना और जहां से हो सके काम निकाले जा। फल अवश्य मिलेगा।'

बस उसी दिन से, तांत्रिक की बात मानते हुए, काम निकालने पर ही जोर दे रहा हूं।

बदलते वक्त ने समाज को बड़ा चालू और चालाक बना दिया है। उसका सारा फोकस दूसरे को उल्लू बना अपना काम निकालने पर ही रहता है। आप रोते रहिए सामाजिकता का रोना मगर समाज को चलना अपने तौर तरीके से ही है। फिर भी, हैं कुछ ऐसे लोग भी जो चौबीस घंटे समाज क्या कहेगा की चिंता में ही घुले रहते हैं। जबकि यही समाज काम निकल जाने के बाद पूछता तक नहीं।

दुनिया, समाज, रिश्ते, संबंध सब प्रोफेशनल हो चले हैं। अपनी फंसी को सुलझाने के लिए गधे को बाप बनाने से भी न चूकें।

झूठ क्यों बोलूं- मैंने भी काम निकालने को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है। समझ चुका हूं, बेबजह जज्बाती होने में कुछ न धरा। अपना काम निकलवाते रहो। दुनिया-समाज इसी में खुश है।

पत्नियां वो ही ज्यादा प्रसन्न रहती हैं, जो पतियों से अपना काम निकल जाने के बाद उन्हें अपनी ताकत का एहसास तो करवा देती हैं। उनसे जीत पाना बड़ा मुश्किल। किसी और पर क्या टिप्पणी करूं खुद इस दर्द को अक्सर ही झेलता रहता हूं। मगर खुश हूं। पत्नी की मर्जी सर-आंखों पर।

काम निकलवाने के प्रति प्रतिबद्धता बनाए रखिए। ऊपर वाला सब देख रहा है।

रविवार, 18 नवंबर 2018

अंकल ही कहो मुझे

सुनने में पहले जरूर थोड़ा अटपटा टाइप लगता था। मगर अब आदत-सी हो गई। यों भी, आदतें जितनी व्यावहारिक हों, उतनी ठीक। ज्यादा मनघुन्ना बनने का कोई मतलब नहीं बैठता। यह संसार सामाजिक है। समाज में किस्म-किस्म के लोग हैं। तरह-तरह की बातें व अदावतें हैं। तो जितना एडजस्ट हो जाए, उतना ठीक।

ओहो, बातों-बातों यह तो बताया ही नहीं कि क्या सुनने की आदत पड़ गई है मुझे। दरअसल, बात कुछ यों है कि अब मैं भाई या भाईसाहब के मुकाबले' अंकल' अधिक पुकारा जाने लगा लूं। बाहर वालो का क्या कहूं, खुद की घरवाली भी मुझे अंकल कहकर ही प्रायः संबोधित करती है।

यों, बाहर वाले को तो फिर भी अंकल शब्द पर हल्की-सी आंखें चढ़ा सकता हूं किन्तु घरवाली तो आखिर घरवाली ही ठहरी न।

लेकिन कोई नहीं। अंकल संबोधन को मैंने अब लाइफ-स्टाइल में शामिल कर लिया है। सही भी है न। इस पर किस-किस से भिडुंगा, किस-किस पर आंखें तरेरुंगा। किस-किस पर मन ही मन बद्दुआएं दर्ज करवाऊंगा।

साफ-सीधी सी बात है, उम्र भी तो हो चली है अब। दिल बेशक कितना ही जवान क्यों न हो, सिर और दाढ़ी के सफेद पड़ते बाल; बाहर के राज बे-पर्दा कर ही देते हैं। जैसे, पीने के बाद शराबी बदबू को जेब में कैद कर नहीं रख सकता।

माशाअल्लाह शादीशुदा हूं। दो प्यारी बच्चियों का बाप हूं। चालीस पार उम्र जा चुकी है। घर-परिवार में कई बच्चों का मामा, मौसा, ताऊ, चाचा, फूफा भी हूं। अब भी अंकल न कहलाऊंगा तो भला क्या उम्र के आखिरी दौर में कहलाऊंगा!

अंकल होना या पुकारे जाना गाली थोड़े है। मैंने तो बड़े-बड़े फिल्मी स्टारों तक को अंकल कहे जाते अपने दोनों कानों से सुना है।

इस कड़वी हकीकत से क्या मुंह फेरना, जब दुनिया में आए हैं तो एक दिन अंकल भी कहे जाएंगे ही। मगर कुछ मोहतरमाएं ऐसी हैं, जो खुद के 'आंटी' पुकारे जाने पर बड़ा खराब-सा चेहरा-मोहरा बना लेती हैं। मानो- उन्हें गाली ही दे दी हो! छूटते ही कहती हैं, 'आंटी मत कहो मुझे!' यह भी कोई बात हुई भला!

इस संसार में एक भगवान-खुदा ही है जिसे कोई अंकल नहीं कहता। वरना तो हम इंसान पैदाइशी अंकल-आंटी ही हैं!

गुरुवार, 18 अक्तूबर 2018

अंदर का रावण

मैं नहीं चाहता मेरे अंदर का रावण मरे! मैं उसे हमेशा जिंदा रखना चाहता हूं। वो जिंदा रहेगा तो दुनिया के आगे मेरा कमीनापन उजागर करता रहेगा। मुझे भरे बाजार नंगा करता रहेगा। मेरा सच और झूठ सामने लाता रहेगा।

हां, मैं बहुत अच्छे से जानता हूं कि रावण की छवि दुनिया-समाज में कतई अच्छी नहीं। उस पर कपटपूर्ण सीता हरण और राम से युद्ध करने संबंधित तमाम इल्जाम हैं। जिद्दी, और अहंकारी भी उसे कहा जाता है। इसीलिए लोग रावण से इतनी नफरत करते हैं। शायद ही कोई अपने बच्चे का नाम रावण रखता हो। उसकी पूजा करता हो। उसे सम्मान देता हो। तब ही तो हर दशहरे पर अपने अंदर के रावण को मारने का आवाहन किया जाता है।

मगर रावण है की मरता ही नहीं। देश, दुनिया, समाज के भीतर उसकी पहुंच दिन-प्रति-दिन बढ़ती ही जा रही है। बलात्कार, चोरी, डकैती, घपला, घोटाला, हत्या आदि में हमें रावण का ही प्रतिरूप देखने-सुनने को मिलता है।

विडंबना देखिए, हमारे बीच से न बुराई का अंत हो पा रहा है न शोषण का। बल्कि और गहरा ही रहा है। तिस पर भी लोग कह रहे हैं, अपने अंदर के रावण को मारिए। मरेगा क्या खाक, जब हम ही नहीं चाहते कि वो मरे।

वैसे एक बात कहूं, बड़ा मुश्किल है अंदर के रावण का मार पाना। कोशिश चाहे कितनी ही कर लीजिए पर किसी न किसी रूप में रावण रहेगा जिंदा ही। पूरी तरह वो खत्म हो ही नहीं सकता। जिस दिन रावण मर लिया, समझिए उस दिन देश में रामराज्य आने से कोई नहीं रोक पाएगा। अमरीका भी नहीं।

जो हो लेकिन मैं अपने भीतर के रावण को जिंदा रखना चाहूंगा। क्योंकि ज्यादा सभ्य और ईमानदारी पूर्ण जिंदगी मैं जीना नहीं चाहता। जिंदगी में कुछ तो ऐसी बदनामियां-बुराइयां हो ताकि लोग भी मुझे- इस बहाने ही सही- याद तो रखें। जब कभी रावण का जिक्र हो, साथ में मेरा नाम भी लिया जाए। समाज में सभी अच्छा करने वाले होंगे तो बुरों को कौन पूछेगा! अच्छाई-बुराई में बैलेंस बराबर का होना चाहिए।

कहना न होगा मौजूदा रावणों से कहीं बेहतर उस समय का रावण था। वो जो भी, जैसा भी था कम से कम आज के रावणों जितना भ्रष्ट तो नहीं था। हां, ये बात अलग है कि भीषण अहंकार के कारण उसकी मति मारी गई थी। जिसकी अंत में उसे उचित सजा भी मिली। वो कहावत है न- विनाश काले, विपरीत बुद्धि।

तो इसीलिए, मैं चाहता हूं मेरे अंदर का रावण थोड़ा-बहुत जीवित रहे। ताकि कुछ डर भी मन में बना रहे। सच कहूं- कभी-कभी तो मेरा दिल अपना नाम रावण कर लेने का भी करता है। मगर...।

इस जन्म में तो खैर बनावटी रावण का किरदार ही निभा रहा हूं। पर चाहता हूं अगला जन्म रावण के रूप में ही लूं। आखिर अनुभव तो ले सकूं रावण की विकराल इमेज का। लेकिन विष नाभि में न रख किसी डिजिटल बॉक्स में रखूंगा।

फिलहाल, अभी मेरे अंदर का रावण पूछ रहा है कि मैं तो किसी 'मी टू' कांड में शामिल नहीं?

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

चिंता कीजिए, मस्त रहिए

जब मेरे कने करने को कुछ खास नहीं होता, तब मैं सिर्फ 'चिंता' करता हूं। 'चिंता' मुझे 'चिंतन' करने से कहीं बेहतर लगती है! मुद्दा या मौका चाहे जो जैसा हो, मैं चिंता करने का कारण ढूंढ ही लेता हूं। ऐसा कर मुझे दिमागी सुकून मिलता है। मन ही मन महसूस होता है, मानो मैंने बहुत बड़ा तीर मार लिया हो।

कहा तो यही जाता है कि चिंता चिता समान। मगर मेरे लिए इस कहावत के कोई मायने नहीं हैं। करना हमेशा वही चाहिए, जिसे करने का दिल करे।

और फिर एक अकेला मैं ही नहीं हूं। यहां सैकड़ों लोग हैं, जो बहाने या बे-बहाने कोई न कोई चिंता करते ही रहते हैं। उन्हें तो कभी कुछ नहीं हुआ। चैन से चिंता कर रहे हैं। आराम से जी रहे। यही नहीं, मैंने तो हंसते-खेलते लोगों तक को चिंता के समंदर में डूबते-उतरते देखा है।

फिर मैं ही क्या गलत कर रहा हूं!

हमें नहीं भूलना चाहिए कि हम मूलतः चिंता-पसंद समाज हैं। चिंता करने की आदत हमारी नस-नस में समाई हुई है। जिस रोज हम चिंता नहीं करते- ट्रेनें समय से नहीं चल पातीं! अफसर घूस नहीं ले पाता। अस्पतालों में मरीज भर्ती नहीं होते। सिस्टम काम नहीं करता। योजनाएं-परियोजनाएं संचालित नहीं हो पातीं। पेट्रोल-डीजल से लेकर सेंसेक्स तक अवसाद की सी अवस्था में आ जाते हैं।

बिन चिंताओं के न समाज चल पाएगा न सरकार न नेता न व्यवस्था।
जहां-जहां जिन-जिन भी क्षेत्रों में चिंताएं रही हैं, उन्होंने ही सबसे अधिक तरक्की की है। चाहे तो इतिहास खंगाल लीजिए।

चिंताएं जिंदगी को आसान बनाती हैं। संघर्ष करने का जज्बा पैदा करती हैं। खाली दिमाग को शैतान का घर नहीं बनने देतीं। जबकि चिंतन दिमाग का दही करता है। इंसान के भीतर बुद्धिजीवियों जैसी फीलिंग लाता है। भीड़ के बीच अकेला बनाता है।

सामूहिक व व्यवहारिक होने के नाते चिंता-प्रदान मनुष्य अधिक सोशल होता है। इंसान वही जो केवल सुख में ही नहीं, हर किसी की चिंता में भी अपनी चिंता का पथ ढूंढ ले।

अब मुझे ही देख लीजिए, मैं उतना चिंता-ग्रस्त खुद की चिंता से नहीं रहता, जितना दूसरों की चिंताओं के बहाने रहता हूं। ऐसा कर मुझे सुख मिलता है।
कोई चाहे माने या न माने चिंता के मामले में सबसे ऊपर नेता ही आते हैं। शायद ही कोई ऐसा नेता हो जो जनता की चिंता न करता हो! यहां तो ऐसे नेता भी कम नहीं जिन्होंने अपना पूरा जीवन ही जनता की चिंता में खर्च कर दिया।
अगर चिंताएं न होतीं तो देश इतना विकास भी न कर पाता। मेरा मस्तक नेताओं की जन-चिंताओं के प्रति गर्व से उठा रहता है।

बे-समझ हैं वे लोग जो चिंता की सकरात्मकता को नहीं समझते। अक्सर ही चिंता नहीं चिंतन करने की सलाहें दिया करते हैं। ऐसे बुद्धिमानों के न मैं मुंह लगता हूं, न उनके मुंह लगाता।

शुक्र है, चिंताओं का जिन्होंने मुझे सामाजिक और बौद्धिक स्तर पर बचाए रखा है। वरना मैं भी किसी बुद्धिजीवि की मिनिंद घर के किसी कोने में बैठकर चिंतन ही कर रहा होता। चिंता करता हूं तो ज्यादा प्रसन्न रह पाता हूं।

'मी टू' की बहस के बीच 'मी टू'

हालांकि ऐसा कुछ है नहीं फिर भी सचेत तो रहना पड़ेगा न। जब से 'मी टू' से जुड़े किस्से कब्र से बाहर आए हैं, मेरा बीपी थोड़ा बढ़-सा गया है। बचपन से लेकर अब तक की गई अपनी 'ओछी शरारतों' पर गहन चिंतन करना शुरू कर दिया है। शायद कहीं कोई ऐसा किस्सा याद आ जाए, जहां 'मी टू' टाइप कुछ घटा हो। मगर याद कुछ नहीं आ रहा।

एकाध दफा तो पत्नी भी पूछ बैठी- 'ऐसा कुछ तुमने तो किसी के संग नहीं किया न?' ज्यादा ऊंची सफाई न देकर बस 'न' में सिर हिला देता हूं। वो क्या है कि बातों की बातों में ज़बान का कोई भरोसा नहीं होता; बातों को कितनी दूर तलक खींच कर ले जावे। अतः चुप रहना ही बेहतर।

समय बड़ा खराब आ लिया है। लेकिन समय जब से डिजिटल हुआ है और भी पेचीदा हो गया। पता न रहता किसी का कब का गड़ा मुर्दा किधर निकाल फेंके। डिजिटल समय में तो बात इतनी रफ्तार से एक छोर से हजारों छोरों तक फैलती है कि बंदा सफाई देते-देते अधमरा टाइप हो जाए।

दरअसल, वायरल होने वाले मुद्दों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि बहती गंगा में सब के सब हाथ धोने निकल पड़ते हैं। स्वयं चरित्र में चाहे कैसे भी हों पर दूसरे के चरित्र का फालूदा बनाकर ही दम लेते हैं। जो भी 'मी टू' की शिकार हुई हैं, उनके प्रति मेरी पूर्ण सहानुभूति। किंतु अब तो वे भी 'मी टू', 'मी टू' बोलने लगे हैं, जिन्हें हिंदी में 'मिट्ठू' तक लिखना नहीं आता।

समाज में तरह-तरह के विचित्र चरित्र के प्राणी भरे पड़े हैं महाराज। क्या कर लीजिएगा!

वो दौरे-दौरा ही कुछ अलग था, जब दिलफेंक आशिकों की समाज में कद्र हुआ करती थी। उनकी मोहब्बतों के किस्से आम हुआ करते थे। हजारों लोग उनसे प्रेरणा हासिल किया करते थे। झूठ क्या बोलूं, दो-चार से तो मैं ही व्यक्तिगत तौर पर प्रभावित रहा हूं।

लेकिन इस 'मी टू' मय तारीख में हर कोई अब दिल देने से बचना चाहेगा। क्या पता दिल देने के बदले 'कॉन्ट्रोवर्सी' ही न गले पड़ जाए।

तो जनाब खुद को बचाए रखिए। अभी 'मी टू' की हवा जोरों पर है।

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2018

इतना बुरा भी नहीं भूलना

हालांकि अभी मैं उस भूलने-भालने वाली उम्र में नहीं मगर फिर भी भूलने लगा हूं। कभी भी कुछ भी कैसे भी भूल जाता हूं। दो-चार दफा तो अपने घर का पता ही भूल चुका हूं। वो तो भला हो पड़ोसियों का उन्होंने मुझे घर पहुंचाया। लेकिन बेमकसद किसी के घर में घुस जाना मुझ जैसे शरीफ लेखक को सुहाता नहीं। पर क्या करूं। याददाश्त साथ नहीं देती।

यों भूलने या याददाश्त के कमजोर होने की शिकायत मेरे खानदान में कभी किसी को नहीं रही। अपने अंत समय तक सभी- बाकी जगहों से बेशक लाचार हो गए हों किंतु- याददाश्त के मामले में चुस्त-दुरुस्त ही रहे। मैं ही क्यों इस बीमारी का शिकार हुआ, यह खोज का विषय है। पर खोज करे कौन!

कम उम्र में याददाश्त का बिखरना ठीक संकेत नहीं- ऐसा मेरे डॉक्टर का मानना है। डॉक्टर भी मेरी भूलने की बीमारी से थोड़ा हतप्रभ है। इसके लिए वो मेरे लेखन को जिम्मेवार मानता है। कहता है- तुम लेखक होने के नाते सोचते बहुत हो, इस कारण इस समस्या का शिकार बन गए हो।

जबकि सच यह है कि मैं न के बराबर सोचता हूं। सोचकर लिखने को मैं लेखन की तौहीन मानता हूं। ऐसा लेखक होने से भी क्या फायदा, जो सोचकर लिखे। दिमाग और सोच पर पहले से ही इतने बोझ हैं, एक लेखकीय सोच का बोझ और उस पर लादना उचित नहीं।

कभी-कभी तो मैं भी अपनी भूलने की बीमारी से उकता-सा जाता हूं। फिर बाद सोचता हूं, जीवन में किसी न किसी खास आदत या रोग का बने रहना आवश्यक है। नहीं तो लाइफ बड़ी बोरिंग टाइप लगने लगती है।

और फिर भूलता ही तो हूं। भूलवश किसी को छेड़ता तो नहीं न!

जैसे- दाग अच्छे हैं वैसे ही भूलना भी इतना बुरा नहीं। याददाश्त का शिकार आदमी हमेशा व्यस्त रहता है। दिनभर कुछ न कुछ खोजता रहता है। खुद ही किसी चीज को कहीं रखकर कई बार ढूंढने लगता है, इससे बड़ी खूबसूरत आदत भला और क्या हो सकती है! मैं खुशनसीब हूं!

चूंकि सबको पता चल चुका है कि मेरी याददाश्त में थोड़ी प्रॉब्लम आ गई है इसलिए मेरे भूलने का अब कोई बुरा नहीं मानता। पत्नी भी नहीं। वो तो अक्सर ही मेरा यह कहकर उत्साह बढ़ाती है कि भूलने के लिए जिगर चाहिए होता है, तुम खुशकिस्मत हो। हर बात को हर वक़्त याद रखना दिमाग और सोच का अपमान है।

भूलने की बीमारी मुझे अगर नहीं रही होती तो शायद मैं इतना सफल लेखक भी न बन पाता! ऊंचा लेखक बनने के लिए जरा-बहुत भूलने का साहस खुद में विकसित करना ही चाहिए।

मुझे तो प्रायः यह सुनकर ही बड़ी हैरानी होती है कि लोग इतनी पुरानी-पुरानी बातों, किस्सों, घटनाओं को कैसे याद रख लेते हैं? रत्तीभर भूलते तक नहीं। कुछ तो ऐसे भी होते हैं, जिन्हें पूर्वजन्म की बातें तक याद रहती हैं।

ऐसी स्मरण शक्ति से भी क्या फायदा कि गड़े मुर्दे दिमाग में हर वक़्त चहलकदमी करते रहें।

मैं मेरी याददाश्त के साथ खुश हूं। भूलने से कभी कोई नुकसान नहीं हुआ मुझे। एकदम नॉर्मल रहता हूं। कभी-कभार यहां-वहां चला भी जाऊं तो अड़ोसी-पड़ोसी वापस घर पहुंचा देते हैं। और क्या चाहिए। याददाश्त को हर वक़्त चुस्त रख कौन-सा मुझे न्यूटन या आइंस्टाइन बनना है।

शनिवार, 29 सितंबर 2018

बिग बॉस का घर

मनुष्य मूलतः दोगली प्रजाति प्राणी है। दोगलापन उसकी नस-नस में बसा है। सामने कुछ और पीठ पीछे कुछ। दिनभर में जब तक दो-चार बातें इधर की उधर, उधर की इधर कर नहीं लेता उसकी रोटी हजम नहीं होती। दूसरों की जलाने और सुलगाने में उसे उतना ही आनंद आता है, जितना दूधिए को दूध में पानी मिलाने में।

मनुष्य के इसी दोगलेपन को ध्यान में रखकर ही 'बिग बॉस' नामक रियलिटी शो का आविष्कार किया गया होगा! यह शो सम्भवतः बनाया ही इसलिए गया है ताकि भिन्न-भिन्न स्वभाव के व्यक्ति अपने-अपने दुचित्तेपन को दुनिया के सामने रख सकें। बता सकें कि इंसान का दिल और दिमाग भी हाथी के दांत की तरह ही होता है। भीतर से कुछ, बाहर से कुछ।

हालांकि बहुत लोगों का ऐसा मानना है कि 'बिग बॉस' समाज और समाजिकता के लिए खतरा है। भाषा और संस्कृति का दुश्मन है। इससे हम केवल एक-दूसरे की बुराई करना ही सिखते हैं। लेकिन, मैं इन तर्कों से सहमत नहीं। इंसान के अंदर और बाहर के चरित्र को जानने के लिए यह रियलिटी शो बहुत जरूरी है। देखा नहीं, इस घर के सदस्य कितनी छोटी-छोटी बातों पर- एक-दूसरे से- कितना विकट लड़ लेते हैं। 'बिग बॉस' के अलावा क्या आम जिंदगी में हम छोटी-छोटी बातों पर लड़ते या बहस नहीं करते?

समाज में लोग लड़ने के मामले में इस कदर महान हैं कि रिक्शे वाले से लेकर सब्जी वाले तक से दो रुपये के लिए अच्छा-खासा लड़ लेते हैं। जहां चार लोग इकट्ठे हों और लड़े नहीं, बहस न करें, मुंह जोरी न हो- ऐसा तो संभव ही नहीं।
पता है, 'बिग बॉस' की असली सफलता क्या है; वो है तरह-तरह के सेलिब्रिटी के पर्दे के पीछे वाले चरित्र को दर्शकों के सामने रखना। उन्हें देखकर, उनकी बातचीत और व्यवहार से रूबरू होकर लगता ही नहीं कि वे हमसे कुछ भी अलग हैं। बस उन्हें सेलिब्रिटी होने का एक ऊंचा टैग मिला हुआ है। उनकी आपस में लड़ाइयां देखकर हूबहू वही फीलिंग आती है, जो अपने मोहल्ले में हो रही लड़ाइयों को देखकर आती थी।

एक 'बिग बॉस' के घर में मौजूद घर वाले ही नहीं बल्कि हम सब किसी न किसी रूप में अंदर या बाहर बिग बॉस को ही जी और खेल रहे हैं। दुचित्तेपन और दोगलेपन की इंतहा है हमारे। पलभर में किसी के साथ कुछ भी कर डालें। किसी को कुछ भी घोषित कर दें। फूल देते-देते कब किसको पत्थर मार दें, कुछ नहीं पता।

तमाम ऊहापोह से भरा जीवन एक मनोरंजन ही है 'बिग बॉस' की तरह। सुख-दुख की तरह यहां कमीन-पंती भी जरूरी है। सब कुछ अच्छा-अच्छा या आदर्श-मय होगा तो नीरसता ही बढ़ाएगा। बिगड़ैल आइनों में खुद की बिगड़ी शक्ल देखना भी आवश्यक है महाराज।

कोशिश में तो खैर मैं भी लगा हूं 'बिग बॉस' के घर जाने की। देखिए किस्मत कब साथ देती है। मगर उससे पहले उस घर के लायक कोई ऊंचा कांड तो कर लूं!

शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

सब जादू-टोने का असर है

अभी रुपए की फिसलन रुक नहीं पाई, उधर तेल की बढ़ी कीमत अलग आग लगा रही है। विरोध का फोकस कभी रुपए पर केंद्रित हो जाता है तो कभी तेल पर। सरकार परेशान है, करे तो क्या करे। दबी जुबान में उसने कह भी दिया है- कीमतों पर नियंत्रण उसके बस से बाहर है!

कुछ हद तक बात सही भी है। रुपए का लुढ़कना और तेल का रॉकेट होना; सरकार की मर्जी से थोड़े न हो रहा। ये तो अदृश्य किस्म की ताकतें हैं, जो सब करवा रही हैं। मुझे तो कुछ-कुछ जादू-टोने का असर लग रहा है। वरना, रुपए और तेल पर एक साथ आफत कभी आई है भला!

दुनिया और समाज में चिढ़ने वाले भी कम नहीं। जलने वाले भी कम नहीं। मन-भेद और मत-भेद रखने वाले भी कम नहीं। ऐसे में क्यों न गिरे रुपया और क्यों न बढ़े तेल की कीमत। चाहे कितना भी न मानें फिर भी जादू-टोना कहीं न कहीं तो अपना असर छोड़ता ही है।

मैंने तो सुना है, जादू-टोटका करने व करवाने वाले बड़े ऊंचे खिलाड़ी होते हैं। हर किस्म की काट होती है उनके कने। ये लोग तो कभी-कभी विज्ञान को भी धूल चटा देते हैं। मैं इनका भुक्तभोगी हूं इसीलिए कह रहा हूं।

कुछ साल पहले एक बेहद करीबी सज्जन ने मेरे लेखन से चिढ़कर मुझ पर ही जादू-टोना करवा दिया था। बड़ी मुश्किल से राहत पाई थी। जिंदगी बड़ी बदरंग-सी बन गई थी तब।

कोई चाहे माने या न माने मुझे तो रुपए और तेल के खेल में विरोधियों के टोने-टोटके की ही बू आ रही है। और, ये टोटका अब से नहीं सदियों से चल रहा है। न सरकार न वित्तमंत्री न अर्थशास्त्री न बुद्धिजीवि न नेता न जनता कोई भी इस चाल को समझ ही नहीं पा रहा। सब अपने-अपने गणित बैठाने में लगे हैं।

रुपए और तेल पर कोई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय दबाब नहीं है, सब जादू-टोने का प्रभाव है।

मेरे विचार में तो सरकार को किसी अच्छे से झाड़-फूंक वाले बाबा या तांत्रिक से संपर्क साधना चाहिए। उससे सलाह लेनी चाहिए। हो सकता है, किसी शरारती ने रुपए के भीतर और तेल के कुओं में ताबीज-फाबिज गाड़ रखा हो। टोटके भी सैकड़ों प्रकार के होते हैं।

थोड़ा ध्यान हम-आप भी रखें। गाड़ियां कम खरीदें। कम चलाएं। तेल पर निर्भरता कम करें। खर्चों पर नियंत्रण रखें। रुपए को ज्यादा से ज्यादा जेबों में रखे रहने दें।... बाकी सरकार अपने स्तर से देख ही लेगी।
साथ-साथ फोकस टोने-टोटके पर ही बनाएं। ये बुरे दिन हमें इसी कारण से देखने को मिल रहे हैं।

आप भी अपने स्तर से पता करें, मैं भी कर रहा हूं। जैसे ही कोई काबिल तांत्रिक नजर आए तुरंत सरकार को बताएं। इस जादू-टोने का काट सिर्फ उसी के पास हो सकता है। एंवाई हवा में विरोध के तीर छोड़ते रहने से कुछ न होगा। संकट सिर के ऊपर खड़ा है।

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

इंस्टाग्राम पर शायरी

इधर, मुझ इंस्टाग्राम पर शायरी करने का भूत सवार हुआ है। लोग फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप पर शेर कह रहे हैं, मैंने सोचा क्यों न मैं इंस्टाग्राम पर शायरी करूं। यह थोड़ा लीक से हटकर भी रहेगा और मुझे एक नए सोशल प्लेटफार्म पर शायर होने की इज्जत भी हासिल हो जाएगी। एक पंथ, दो काज होने का अपना ही मजा है।

एक ही तरह का लेखन करते-करते मुझे बोरियत महसूस होती है। इसीलिए अपने लेखन में नित नए-नए प्रयोग कर लिया करता हूं।
जब से लोगों के जीवन में सोशल मीडिया ने कदम रखा है, हर कोई अपने मन की बात अपने अंदाज में कह-लिख रहा है। कोई खुद की आत्ममुग्धताओं पर लिख रहा है तो कोई दूसरे को पटखनी देने के लिए। मगर सबसे ज्यादा हाथ लोग कविताओं और शेरो-शायरी में ही आजमा रहे हैं।

फेसबुक तो कवियों और कविताओं की शरण-स्थली है। मन में भाव चाहे जैसा हो फेसबुक पर वो कविता की शक्ल में आ ही जाता है। आलम यह है, जिन्होंने जीवन में कभी कविता का 'क' नहीं पढ़ा-जाना, वे भी मस्त होकर यहां कविताएं लिख रहे हैं। खूब तबीयत से लिख रहे हैं।
एकाध दफा तो मैंने भी कविता के मैदान में हाथ आजमाए पर बात बनी नहीं। मेरी कविता कविता कम 'अ-कविता' ज्यादा जान पड़ती थी। फिर एक दिन मेरे एक शुभचिंतक में समझाया कि तुम कविता का पल्लू छोड़कर शायरी का दामन थाम लो, वो भी इंस्टाग्राम पर। यहां शायरी की अच्छी-खासी डिमांड है। शायरी का बाजार भी खूब है।

शुभचिंतक की सलाह को संज्ञान में लेते हुए मैंने इंस्टाग्राम पर तुरंत शायरी करना शुरू कर दी। ऊपर वाले का करम से मेरी शायरी यहां खूब फल रही है। अब तो अच्छे-खासे फॉलोवर्स भी बढ़ गए हैं मेरे।

वैसे, शेरों की तुकबंदी तो मैं बचपन से ही बैठा लिया करता था। कहीं से कैसा भी शेर बना डालता था। लगे हाथ दाद भी मिल जाया करती थी। बाद के दिनों में जब इश्क-मोहब्बत में पड़ा तो पढ़ाई से ज्यादा मन शेरों-शायरी में रमा करता था। बाज दफा तो मुझे खुद में मीर, दाद, ग़ालिब की आत्मा घुसी जान पड़ती थी। यों भी, इश्क की अगन अच्छों-अच्छों को शायर और कवि बना देती है।

इंस्टाग्राम पर शेरों-शायरी का अपना आनंद है। गुलज़ार साहब को यहां जो रूतबा हासिल है, देखते ही बनता है। गुलज़ार साहब के शेर और कविताएं यहां बिखर कर अपनी खुशबू फैलाए रहते हैं। मैं भी उन्हीं के पदचिन्हों पर चलने की कोशिश में लगा रहता हूं। कभी-कभी मेरे कहे शेर जम भी जाते हैं। भरपूर वाह वाह भी पा जाते हैं। यह मेरे शेरों की मार्केटिंग के लिए भी अच्छा है।

सिर्फ लिखने से ही बात नहीं बनती, जब तक कुछ कमाई-धमाई न हो। तमाम सोशल प्लेटफार्म के साथ-साथ इंस्टाग्राम भी कमाई का मस्त माध्यम बनकर उभर रहा है। अपने सेलिब्रिटी लोग तो यहां से लाखों पीट रहे हैं। जब वे अपनी ब्रांड-इमेज के दम पर कमा सकते हैं तो मैं ही क्यों पीछे रहूं शायरी के दम पर कमाने में। शायर हो या लेखक थोड़ा-बहुत मनी-माइंडेड तो उसे होना ही चाहिए।

क्या बुरा है, इंस्टाग्राम पर शायरी का दौर भी चलता रहे और कमाई भी होती रहे। शेरों-शायरी तो हर उम्र के लोगों की जान और पसंद होती ही है। यों भी, शायरी में एक अजीब-सा सुख है। सुख ही अंतिम सत्य है।

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

72 पर टिका रुपया

डॉलर ने एक दफा फिर से रुपए को टंगड़ी मार गिरा दिया है। रुपया 71 के स्तर पर चारों खाने चित्त पड़ा है। बड़ी उम्मीद से वो सरकार और रिजर्व बैंक की तरफ देख रहा है; कोई तो आकर उसे उठाए। उससे सांत्वना के दो बोल बोले। उसमें फिर से उठने का जोश भरे।

अफसोस, सरकार की तरफ से रुपए की गिरावट पर चिंता प्रकट करना तो दूर उसे उठाने की कोशिश भी नहीं की जा रही। अपनी उपेक्षा से रुपए में जबरदस्त रोष है। लेकिन देशहित की खातिर वो अपना रोष जतला नहीं सकता। कल को लोग कहीं यह न कहने लगें कि देखो, अब तो रुपया भी खुद को लोकतंत्र में असुरक्षित महसूस कर रहा है। तिल का ताड़ बनते देर ही कितनी लगती है यहां।

देश की इज्जत रुपए के लिए प्रथम है।

सच कहूं, मैं व्यक्तिगत तौर पर रुपए की सेहत के प्रति फिक्रमंद हूं। मेरी निगाहें हर पल स्क्रीन पर टिकी रहती हैं, जहां रुपए के रेट में घट-बढ़ चलती है। रुपए को जब भी लाल तीर पर लटका देखता हूं, मेरा कलेजा मुंह को आ जाता है। मन करता है, अभी इसी वक्त अपने हाथों से रुपए को हरे तीर पर लाकर खड़ा कर दूं।
मगर कुछ चीजों को हम चाह कर भी अपने बस में नहीं कर सकते।

यह कोई पहली दफा नहीं, जब रुपए पर गिरावट के बादल छाए हैं। ऐसा नवंबर 2016 और अगस्त 2013 में भी हो चुका है। तब भी रुपए ने खुद को बड़ी मुश्किल से संभाला था। तब भी सरकार और वित्तमंत्री ने कुछ खास नहीं किया था। तब भी उसे विपक्ष के मजाक का सबब बनना पड़ा था।
अब जब रुपया लुढ़ककर 72 पर आ टिका है, सरकार कह रही है कि वो जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेगी। ये ग्लोबल समस्या है।

ये क्या बात हुई भला! एक तरफ रुपए की जान पर बन गई है और सरकार अब भी जल्दी के मूड में नहीं! अब एक्शन में नहीं आएगी तो क्या तब आएगी जब रुपया 59पर आ टिकेगा। माना कि रुपया बे-ज़बान होता है पर इसका यह मतलब नहीं कि उसे कैसे भी दबा लिया जाए।

सरकार और वित्त मंत्री महोदय शायद भूल रहे हैं कि अर्थव्यवस्था का सारा दारोमदार रुपए की इज्जत पर ही कायम है।

जिस तरह से रुपए के 72 होने पर उसका सरेआम मजाक उड़ाया जा रहा है। ट्विटर और फेसबुक पर चुटकुलों भरे तंज कसे जा रहे हैं। विपक्ष उसे 'बुरे दिनों' का खलनायक बता रहा है। ये सब देख-सुनकर बेहद दुख हो रहा है। सवा करोड़ की आबादी के बीच हमारा रुपए खुद को अकेला महसूस कर रहा है।

सरकार तो सबको साथ लेकर चलने का दावा चार साल से ठोक रही है। 'सबका साथ, सबका विकास' के तराने जोर-शोर से गा रही है। फिर भी, रुपए की गिरावट पर मौन। भला ऐसे कैसे होगा- सबका विकास?

एक अपने ही देश में नहीं बल्कि विश्वभर में रुपए की फिसलाहट से हमारी अच्छी-खासी किरकिरी हो रही है। उधर, डॉलर हमारे रुपए को निरंतर आंखे तरेरे रहा है। रुपए को धोबी पछाड़ देकर बाजार का राजा बना बैठा है।

रुपए की ये तौहीन देश बर्दाश्त नहीं करेगा। आखिर सहन करने की भी एक सीमा होती है।

थोड़े-बहुत सुधार से नहीं, पूरे और पक्के सुधार से ही रुपए की गिरती सेहत को सुधारा जा सकता है। डॉलर का बढ़ना देशहित में कतई नहीं। डॉलर विदेशी मुद्रा है। विदेशियों के आगे घुटने टेकना न तो हमें मंजूर है न ही रुपए को। इसीलिए तो इतना सब सहने के बाद भी रुपया जमा हुआ है, डॉलर की तानाशाही के आगे। रुपया बड़ा वीर है।

रुपया बचा रहेगा तो देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ इसका सम्मान भी बचा रहेगा। रुपए का 72 होना बहुत खल रहा है हमें।

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

कटी नाक का सुख

आईना निहारने का मुझे शौक नहीं। मजबूरीवश निहारता हूं ताकि अपनी नाक को देख सकूं।

चेहरे पर नाक मेरी मजबूरी है। आईने में अपनी साबूत नाक देखकर परेशान हो जाता हूं कि ये अभी भी जगह पर है, कटी क्यों नहीं!

साबूत नाक के अपने लफड़े हैं। कटी नाक के नहीं। हालांकि सुख सबसे अधिक नाक के कटने में ही है। लेकिन नाक-प्रेमी कटी नाक वालों को बेहद हेय दृष्टि से देखते हैं। कटी नाक वालों से हद दर्जे की नफरत करते हैं।

जबकि सच तो यह है कि साबूत नाक वाले बेहद दंभी और चालक होते हैं। हर वक्त अपनी नाक पर यों गर्व करते रहते हैं मानो ये ईश्वर का कोई वरदान हो!

लेकिन कटी नाक वाले साबूत नाक वालों से कहीं बेहतर और सज्जन होते हैं। मेरे ऐसे कई परिचित हैं, जिनकी नाक किसी न किसी बहाने कटी है मगर उन्हें इस बात का जरा भी अफसोस नहीं। न ही वे खुद को साबूत नाक वालों से कमतर समझते हैं।

मैंने ही खुद जाने कितनी दफा प्रयास करके देख लिया अपनी नाक को काटने का। किंतु नाक है कि कटने में ही नहीं आ पाती। बल्कि इस बार ईद पर मैंने बकरे की जगह अपनी नाक काटने की सिफारिश भी की थी। मगर कसाई ने मेरी काटने से यह कहते हुए मना कर दिया कि हम व्यंग्यकारों की नाक नहीं काटते।

सच कहूं, नाक कटे लोग मुझे बहुत पसंद हैं। मैं तो चाहता हूं दुनिया में मुझे सिर्फ नाक कटे लोग ही दिखाई पड़ें। साबूत नाक वाले बड़े मतलबी होते हैं।

अब तो उस दिन की प्रतीक्षा में हूं कि किसी रोज सो कर उठूं और मुझे अपनी नाक आईने में कटी मिले। पता नहीं, वो 'सौभाग्यशाली दिन' कब आएगा।

सोमवार, 27 अगस्त 2018

पर्सनल नार्मल के बीच फंसे हम

नॉर्मल लोग बड़ी आसानी से मिल जाते हैं। पर्सनल लोग खोजे नहीं मिल पाते। जीवन में घटने वाली तमाम घटनाओं के साथ जितना उम्दा सामंजस्य नार्मल लोग बैठा लेते हैं, उतना पर्सनल नहीं।

यों भी, पर्सनल होने के नार्मल होने से कहीं ज्यादा खतरे हैं। मगर जो इन दोनों को साध ले, वो ही सच्चा संत।

मेरी कोशिश यही रहती है कि मैं जीवन में उन्हीं लोगों की संगत में रहूं, जो पर्सनल कम नार्मल अधिक हैं। पर्सनल मत के लोग अधिकार जतलाते हैं। जबकि नार्मल लोग कूलता में विश्वास करते हैं।

जमाना खराब है। किसके मन में भूत बैठा है। और, किसके मन में राधा। कुछ पता नहीं रहता। एक कान की बात दूसरे कान को पता नहीं चल पाती। पहले तो फिर भी पेट में दबी रहती थीं बातें मगर अब मोबाइल पर आकर तुरंत ही वायरल हो जाती हैं। इज्जत का खतरा है।

पर्सनल से न ज्यादा दोस्ती भली न दुश्मनी।

कृष्ण को ही ले लीजिए। लोग उनके साथ कितना ही पर्सनल होने की कोशिश करें पर वे सबके साथ नार्मल ही रहते थे। यहां तक की गोपियों से भी बहुत पर्सनल न होकर नार्मल का रिश्ता ही रखते थे।

बाकी दुनियादारी में तो फिर भी चल जाता है पर्सनल-नार्मल का राग लेकिन राजनीति और साहित्य में न चल पाता। यहां तो जितनी टांग नार्मल वाला खींचता है, उससे ज्यादा पर्सनल वाला। मैंने तो कई दफा दोनों के मध्य तलवारें तक खींचती देखी-सुनी हैं।

हां, अपने मतलब को साधने के लिए अगर नार्मल या पर्सनल को अपना बाप तक बनाना पड़े तो आराम से बना लीजिए। काम का निकलना जरूरी है, बनिस्बत जोड़-घटाने के। क्या समझे...।

रविवार, 26 अगस्त 2018

लाइन मारते रहिए

लाइफ में सबकुछ मिलना इतना सरल न होता। संघर्ष तो करना ही पड़ता है। जीने से लेकर मृत्यु तक संघर्ष ही संघर्ष है।

फिर भी, कुछ संघर्ष ऐसे होते हैं जो 'लाइन मारने' पर निर्भर करते हैं। जी हां, लाइन मारना भी संघर्ष की ही निशानी है।

अमूमन लोग लाइन मारने को गलत-सलत अर्थों में ले लेते हैं। कहीं की बात कहीं ले जाकर लाइन का महत्व खत्म कर देते हैं। मैंने ऐसे भद्रजनों को बहुत करीब से देखा-जाना है, जिन्होंने नौकरी से लेकर शादी तक 'लाइन मार संघर्ष' किया है। जब तलक नौकरी में रहे बॉस को लाइन मारते रहे, जब शादी के बंधन में बंध गए बीवी को लाइन मारने का फर्ज निभाया। वो तो गनीमत रही कि बीवी ने उनकी लाइन मारने की आदत को कभी अदरवाइज नहीं लिया। सब स-हर्ष स्वीकार किया।

इन दिनों जिस तेजी से 'बाजार' हम पर लाइन मार रहा है, हम चारों खाने चित्त हैं। कोई पर्व, कोई त्यौहार, कोई उत्सव हो बाजार ग्राहकों पर लाइन मारना नहीं छोड़ता। लुत्फ यह है कि हम बाजार के लाइन मारने का रत्तीभर बुरा नहीं मानते। न उसे बीच चौराहे गलियाते हैं। न थाने में रपट दर्ज करवाते हैं। न सरकार न किसी पायदार मंत्री-संत्री से शिकायत ही करते हैं। बल्कि बाजार को पूरा चांस देते हैं कि वो आए और हम पर दिल खोलकर लाइन मारे।

किस्म-किस्म के ऑफर्स और डिस्काउंट लाइन मारने के बहाने ही तो हैं।

न केवल बाजार, देश-दुनिया में कहीं भी निकल जाइए- हर कहीं, हर कोई किसी न किसी दृष्टिकोण से लाइन मारता हुआ दिख ही जाएगा। ये बात अलग है कि हम किस लाइन मारने को किस प्रकार से लेते हैं।

साहित्य में क्या कम लाइन मारूं हैं! एक से बढ़कर एक लाइनबाज मिल जाएंगे यहां। लेख से लेकर किताब छपवाने तक लेखक-साहित्यकार जाने कितनी तरह की लाइनें मार देता है। आलम यह है, साहित्य की हर विधा में लाइन मारी जा रही है। कहीं ज्यादा तो कहीं कम।

कठिन और व्यस्त जीवन में अगर दो-चार दफा लाइन मारने का सुख मिल रहा है- मैं तो कहता हूं- ले लीजिए। चांस हाथ से निकल जाने के बाद कहीं 'पछताना' न पड़े।

बुधवार, 8 अगस्त 2018

कामयाबी के शिखर पर सेंसेक्स

सेंसेक्स ने कामयाबी का एक और नया शिखर पार कर लिया। उसे कोटि-कोटि बधाई।

दिली खुशी मिलती है सेंसेक्स को चढ़ता देख। बिना शोर-शराबा या शिकवा-शिकायत किए बेहद खामोशी से वो अपना काम करता रहता है। मैंने कभी उसे खुद से अपनी सफलता का जश्न मनाते या असफलता का रोना रोते नहीं देखा। यहां तक कि वो लोगों के कहे पर भी कभी अपने कान नहीं देता।

37 हजार तक का सफर उसके लिए इतना आसान नहीं था। यहां तक पहुंचने के लिए उसे जाने कितनी ही मुश्किलों से दो-चार होना पड़ा। किस-किस की क्या-क्या जली-कटी नहीं सुननी-झेलनी पड़ी। जाने कितनी ही दफा गिरा, टूटा, लुढ़का मगर हिम्मत फिर भी हिम्मत न हारी। हर बड़ी गिरावट के बाद खुद को संभालते हुए पुनः मुस्तैदी के साथ उठ खड़ा हुआ।

विपरीत परिस्थितियों में भी इसका हार न मानना मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत ताकत देता है। इसके संघर्ष को देख मेरे मन में कभी निराशा घर नहीं करती। सच कहूं- मैं जीवन में कभी महापुरुष नहीं बल्कि सेंसेक्स जैसा बनना पसंद करूंगा।

अब का नहीं बहुत पुराना परिचय है मेरा इससे। खूब याद है, जब ये  5 हजार के आस-पास टहला करता था। न बहुत ज्यादा गिरावट रहती थी, न बढ़त। कभी कहीं से जोर का झोंका कोई आ जाता तो ये डर-सा जाता था। अपने संवेदी स्वभाव के कारण जाने कितनी ही दफा छोटी-मोटी खबरों पर ये मुंह के बल गिरा है। मंदड़ियों ने कितनी ही बार इसे लहू-लुहान भी किया है।

पर इसने कभी किसी नकारात्मक खबर को दिल पर नहीं लिया, न ही अपने घाव किसी को दिखाए। हां, बीच-बीच में सेंटीमेंट जरूर बिगड़े पर जल्द सुधर भी गए।

सेंसेक्स हमारी अर्थव्यवस्था की जान है। ये बढ़ता है तो देश में आर्थिक खुशहाली के दर्शन होते हैं। न सिर्फ देश बल्कि विदेश तक में इसकी कामयाबी के गीत गाए जाते हैं।

अक्सर सेंसेक्स की सफलता रुपए की गिरावट के गम को गलत कर देती है। रुपया तो एक बार को फिर भी धोखा दे सकता है किंतु सेंसेक्स नहीं।

ऐसा मुझे तो याद नहीं पड़ता जब इसने किसी का जानबूझकर नुकसान किया हो! अति-उत्साही लोगों ने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारी है। अपनी खामियों का दोष जब लोग सेंसेक्स पर मढ़ते हैं तो मुझे बहुत बुरा लगता है। कलेजा मुंह को आ जाता है।

सेंसेक्स कभी न अपने लिए जीता है न किसी से कुछ मांगता। वो तो हरदम यही चाहता है कि लोग उसके मार्फ़त अधिक से अधिक आर्थिक फायदा उठा सकें। दो का चार कर सकें। आसमान सरीखी बुलंदियों को छू सकें।

दरअसल, गड़बड़ तब शुरू होती है जब लोग बाग खुद को सेंसेक्स का बाप समझने लगते हैं। उससे जीतने की हिरस करने लग जाते हैं। खुद को सट्टेबाजी में लिप्त कर लेते हैं। अपनी जमीन-जायदाद तक दांव पर लगा देते हैं।

जब मोटा नुकसान झेलते हैं, तब सेंसेक्स को गरियाते हैं। लेकिन सुधरते फिर भी नहीं। न सुधरना शायद इंसान की फितरत में शामिल हो चुका है।

ऐसे लोग भी कम नहीं जिनका दिल किस्म-किस्म के शेयर्स पर आया रहता है। शेयर्स को वे अपनी जान से भी ज्यादा सहेज कर रखते हैं। बढ़ने पर बेचते नहीं। गिरने पर रोना रोते हैं। और, गिरावट का सारा दोष बेचारे सेंसेक्स के माथे मढ़ देते हैं। समझते नहीं, सेंसेक्स खुद से नहीं बल्कि शेयर्स के सहारे ही चलता है। शेयर बढ़ेंगे तो सेंसेक्स भी बढ़ेगा। शेयर गिरेंगे तो सेंसेक्स भी गिरेगा।

मैं तो हमेशा ही सेंसेक्स को सकारात्मक रूप में देखने की कोशिश करता हूं। उसके प्रति मन में कभी कैसी भी दुर्भावना नहीं रखता। अगर कभी गिरता है तो उसे गीता का यह उपदेश 'जो होता है अच्छे के लिए होता है। जो होगा वो भी अच्छे के लिए होगा' ही सुनाता हूं।

सेंसेक्स विकट दयालु है। वो किसी का बुरा या नुकसान नहीं चाहता। उसकी शरण में जो भी आता है, सभी को बड़ी सहजता और सरलता से लेता है। कभी-कभी तो मुझे सेंसेक्स के दिल में कवि या साहित्यकार घुसा हुआ-सा जान पड़ता है।

सेंसेक्स इसलिए भी अधिक सहज है क्योंकि वो दिखावा नहीं करता। जैसा बाहर से है, वैसा ही भीतर से भी। उसका अब तक का रिकॉर्ड देख लीजिए, जो कभी उसने अपनी सफलता का जश्न मनाया हो। हां, उसके चाहने वाले मानते हैं, तो उसे अच्छा लगता है। इतनी विनम्रता तो इंसानों में भी नहीं पाई जाती।

मैं तो दिल से चाहता हूं, सेंसेक्स दिन दुगनी, रात चौगनी तरक्की करे। अभी इसने 37 हजार के स्तर को पार किया है, जल्द ही 44 हजार को भी क्रोस कर जाए। दुनिया को दिखा दे कि कामयाबी का रास्ता खमोशी से भी निकल सकता है।

औरों का नहीं मालूम लेकिन मेरे लिए तो प्रेरणा का दूसरा नाम सेंसेक्स है। इतनी ऊंचाई पर पहुंच कर भी खुद को इतना सहज रख पाना यह हर किसी के बस की बात नहीं।

ऊपर वाले से दुआ करता हूं, सेंसेक्स की ये ऊंचाई, उदारता और सहजता हमेशा बनी रहे।

गुरुवार, 2 अगस्त 2018

आइए, मुझे 'ट्रोल' कीजिए

यद्यपि मैं जानता हूं कि 'ट्रोल करना' या 'ट्रोल होना' दोनों ही सबसे खतरनाक सोशल अवस्थाएं हैं, फिर भी, मैं 'ट्रोल' होना चाहता हूं। ट्रोल होकर उससे मिलने वाले 'यश' या 'अपयश' को भुगतना चाहता हूं। देखना चाहता हूं, कल को मेरे ट्रोल होने पर अखबारों में जो 'हेड-लाइन' बनती हैं, वो कैसी होंगी। निजी अनुभव लेना चाहता हूं कि मेरे ट्रोल होने पर सोशल मीडिया और मेरे नाते-रिश्तेदार मेरे बारे में क्या और कैसी राय बनाते हैं।

ट्रोल होने पर किसकी निगाह में मैं कितना उठता और कितना गिरता हूं।
वैसे, अब तक देखने-सुनने में तो यही आया है कि जो ट्रोल हुआ, उसकी किस्मत चमक गई। रातोंरात सेलिब्रिटी होने का खिताब पा गया। कल तक जो उसके नाम और काम से परिचित न थे, सब जान गए। देश से लेकर विदेश तक में उसकी ट्रोलिंग की तूती बोलने लगी। बहुत से दिलजलों ने उसकी राहों पर चलना भी शुरू किया किंतु उतने सफल न हो सके, जितना कि वो।

किस्मत चमकने का सितारा हर किसी की जेब में नहीं होता। जैसे- पहले कभी मैं भी यही चाहता कि प्रियंका चोपड़ा की तरह मैं भी बॉलीवुड में नाम कमाऊं। मगर जब अपनी शक्ल आईने में देख लेता था, 'हीरो' बनने का भूत तुरंत मेरे सिर से उतर जाता था।

मैं अच्छे से जानता हूं कि खुद को ट्रोल किए जाने की ख्वाहिश मेरा काल्पनिक भूत है पर कभी-कभी दिल को खुश रखना भी जरूरी हो जाता है।

आजकल तो कवि लोग, सोशल मीडिया पर, दिल को भी ट्रोल करने से बाज नहीं आ रहे! दिल पर ट्रोलिंग-प्रधान कविताएं लिख रहे हैं। विडंबना यह है कि लोग भी ऐसी कविताओं को चटकारे लेकर पसंद कर रहे हैं।
ट्रोलिंग आलोचना का बिगड़ा रूप है। पहले जमाने में आलोचना खासी तमीज के साथ की जाती थी, अब ट्रोलिंग बदतमीज होकर की जा रही है। ट्रोलर्स के हाथ ट्रोलिंग का उस्तरा क्या आ गया, सबको निपटाने को तैयार बैठा रहता है।

इधर सरकार भी ट्रोलिंग को लेकर सख्त जान पड़ रही है। सोशल प्लेटफार्म भी ट्रोलिंग पर हिदायतें दे रहे हैं। मगर ट्रोलर्स हैं कि मानते ही नहीं। किसी न किसी रास्ते वे अगले को ट्रोल करने का नुक्ता छेड़ ही देते हैं।

मालूम है कि ट्रोलिंग के अनुभव काफी बुरे रहे हैं पर चार लोग जान तो पाए हैं अगले को। बस ऐसा ही कुछ मैं खुद के साथ भी चाहता हूं। अच्छे करम कर मशहूर न हो सका तो क्या, ट्रोलिंग से ही हो जाऊं क्या बुरा है। यों भी, बदनामी से मिली प्रसिद्धि मुझे कुछ ज्यादा ही रास आती है। नाम है तो दुनिया-जहान में पहचान है, वरना कुछ भी नहीं।

तो साहेबान, आप लोगों को खुली छूट देता हूं। आप आइए और मुझे जमकर ट्रोल कीजिए। मैं आपके द्वारा खुद को ट्रोल किए जाने का कतई बुरा न मानूंगा, इस बात की गारंटी देता हूं।

सोमवार, 30 जुलाई 2018

ख्याली पुलाव और इमरान खान

ख्याली पुलाव पकाने में हमारा जवाब नहीं। जब दिल किया किसी न किसी मसले पर ख्याली पुलाव पकाने बैठ गए। सबसे ज्यादा ख्याली पुलाव खाली दिमागों में ही पकते हैं। कभी-कभी इतना पक जाते हैं कि जलने की बू तक आने लगती है। लेकिन पकाने वाले को जलने की बू से कोई मतलब नहीं रहता। उसे तो सिर्फ पकाने से मतलब।

जैसे- पिछले दो-तीन दिनों से इस बात पर खूब ख्याली पुलाव पक रहे हैं कि इमरान खान सेना के इशारों पर काम करेंगे या अपनी मर्जी से। भारत को इमरान खान से आपसी मसलों को सुलझाने में दिलचस्पी लेनी चाहिए कि नहीं लेनी चाहिए।... साथ-साथ मेरे कान तो यह सुनकर भी खूब पक लिए हैं कि इमरान खान का अपना कोई वजूद नहीं, वो पाकिस्तानी फौज की कठपुतली हैं।

बैठे-ठाले ख्याली पुलाव पकाने वाली को मैं दिल से दाद देता हूं। उनके हत्थे कोई भी मसला चढ़ना चाहिए बस फिर देखिए वे पुलाव को घोटकर खिचड़ी न बना दें।

किस्म-किस्म के ख्याली पुलाव तब पक रहे हैं जब इमरान खान के हाथों में पाकिस्तान पर शासन की बागडोर अभी पूरी तरह से आई नहीं है। अभी तो सबकुछ हवा में जुमलों की मानिंद तैर रहा है। अपने पहले भाषण में इमरान ने अभी तो अपनी इच्छाएं ही जाहिर की हैं कि वे पाकिस्तान को क्या बनाने का ख्वाब रखते हैं। चीन, अफगानिस्तान, अमेरिका, भारत आदि के साथ किस प्रकार के रिश्ते रखना चाहते हैं। पर आगे का सीन तो उनके कुर्सी पर बैठने के बाद ही बनेगा।

मगर भाई लोग हैं कि ख्याली पुलाव को पका-पकाकर उसे पतली दाल सरीखा बना डाला है। यह तो लगभग वही बात हो गई कि शादी अभी ढंग से हुई नहीं कि खुशखबरी सुनने की बेताबी सिर चढ़कर बोलने लगी।

अमां, अगले को अभी ढंग से गद्दी पर बैठने तो दो। कामधाम अपने हाथों में लेने तो दो। ऊंट को पहाड़ के नीचे आने तो दो। प्रधानमंत्री की कुर्सी का पहला-पहला स्वाद चखने तो दो। दो बातें अपनी, चार बातें आवाम की, दस बातें सेना की सुनने तो दो। राजनैतिक और डिप्लोमेटिक मसलों का क्या है, ये तो जन्म-जिंदगी भर के रोग हैं। इनसे छुटकारा पाना नामुमकिन है जनाब।

यों भी, पाकिस्तान का इतिहास गवाह है वहां सरकार या प्रधानमंत्री अपनी मर्जी के नहीं सेना की तानाशाही के गुलाम होते हैं। वहां तो पत्ता भी सेना के आदमियों से पूछे वगैर नहीं हिलता। अब तक जाने कितने ही शासक आए और चले गए परंतु सेना का रुतबा जैसा था वैसा ही रहा।

पाकिस्तान में सरकारें हमारे हिंदुस्तान जैसी लोकतांत्रिक सोच वाली थोड़े न होती हैं। वो तो बस दुनिया को दिखाने भर के लिए होती हैं कि देखो, हमारे यहां भी एक चुनी हुई सरकार है। जबकि उसे चुनता और गुनता कौन है सब जानते हैं।

मैं तो कहता हूं, अच्छा ही हुआ जो इमरान खान पाकिस्तान के कप्तान बन लिए। बहुत लंबे समय से वे इस जुगाड़ में थे भी कि कब वो दिन आएगा जब मैं पाकिस्तान का वजीरे-आलम कहलाऊंगा। अब जाकर आया है वो दिन।

हालांकि इमरान राजनीति की पिच पर बहुत लंबे वक्त से खेल रहे हैं। मगर फिर भी राजनीति की पिच क्रिकेट की पिच से काफी अलहदा होती है। खेल में तो आपको दस-ग्यारह खिलाड़ियों को ही संभालना होता है पर राजनीति की पिच पर तो देश और विदेश के संबंधों को साथ-साथ संभालना पड़ता है। राह कठिन तो है पर है जोरदार। लुत्फ यह है कि नेताओं के तो पांच साल खेल-खेल में कट जाते हैं।

कहने वाले तो यह भी कह रहे हैं कि मियां इमरान खान अपनी शादी, अपने परिवार को तो संभाल न पाए, इतना बड़ा मुल्क क्या खाक संभाल पाएंगे। बड़े ही भोले हैं लोग। समझते ही नहीं। शादी और मुल्क को संभालने में फर्क होता है। शादी के साथ तो हमेशा 'तू नहीं और सही' का ऑप्शन रहता है। किंतु मुल्क के साथ ऐसा सीन नहीं। वहां तो बागडोर एक दफा हाथ से फिसली तो फिर इतनी आसानी से दोबारा हाथ न आती। मियां नवाज शरीफ को ही देख लो, मुल्क की अच्छी-खासी डोर उनके हाथों में थी पर सेना ने उनसे छीनकर इमरान के हाथों में दे दी। और फिर शादी-ब्याह उनका जाति मसला है, किसी को उससे क्या। लोगों हैं लोगों का तो काम ही है कहना।

सुना तो यह भी है कि उनकी तीसरी बीवी ने उनके पाकिस्तान का प्रधानमंत्री होने की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी। सुना है, सियासत के मसलों में इमरान अपनी तीसरी बीवी से सलाह अवश्य लेते हैं। अच्छा है। एक हमारे यहां के पति हैं जो सियासत तो दूर रोमांस पर भी कोई सलाह अपनी बीवियों से न लेते। घोर अन्याय। डर भी बना रहता है न उन्हें।

बहरहाल, जिन्हें शौक है वे मन से इमरान खान पर अपने ख्याली पुलाव पकाने में व्यस्त हैं। चलिए इस बहाने वे कुछ तो कर रहे हैं। खाली तो नहीं बैठे हैं न। खाली दिमाग वैसे भी शैतान का घर होता है। ख्याली पुलाव पकाने में भी थोड़ी-बहुत बुद्धि तो खर्च होती ही है।

बाकी उम्मीद पर दुनिया कायम है ही। इमरान खान से आशा नहीं, उम्मीद ही रखें कि वे सेना के शिकंजे को तोड़ अपने मुल्क के लिए कुछ बेहतर कर पाएं! भारत भी उन पर निगाह और उम्मीद दोनों बनाए रखे है।

सोमवार, 23 जुलाई 2018

दिल मिले न मिले, गले मिलते रहिए

किस्मत वाले होते हैं वो जिन्हें किसी का गले लगना या आंख मारना नसीब होता है। वरना इस मतलबी दुनिया में किसे फुर्सत है, किसी के गले लगने या मौका भांप आंख मारने की।

उन्होंने भी तो उस रोज संसद में यही किया था, भावावेश में जाकर उनके गले ही तो लगे थे। फिर, किसी को एक आंख मार अपना रूतबा जाहिर किया था। मगर लोगों को ये भी नागवार गुजरा। उनके गले लगने और आंख मारने में तरह-तरह के तंज कसे गए। बनाने वालों ने चुटकुले तक बना डाले। ऐसा भी कहीं होता है भला!

देखा भी गया है, तीज-त्यौहार पर तो दुश्मन भी गले मिल लेते हैं। मजाक-मजाक में आपस में आंख भी मार लेते हैं। फिर ये गले मिलना तो छोटे का अपने बड़े के प्रति आदर था। हां, आंख मारने पर पेंच हो सकता है। यह भी तो सकता है कि उन्होंने आंख मारी ही न हो, आंख खुशी के मारे खुद ब खुद दब गई हो।

वैसे, ये आंखें भी न बड़ी चालू चीज होती हैं। आंखों ही आंखों में इशारा कर बैठती हैं। गुस्ताखियां आंखें करती हैं। बदनाम बेचारा इंसान हो जाता है। लोग समझते हैं, ये सब इंसान ने ही अपनी आंखों से जानकर करवाया होगा। उन्हें क्या मालूम आंखें भी मौके की नजाकत देख शरारत कर बैठती हैं।

माने या न माने, गले मिलना और आंख मारना सच्चा सेक्युलरिज्म है। गले और आंखें यह नहीं देखतीं सामने वाली की जात या धर्म क्या है। वे तो प्यार-मोहब्बत में यकीन करती हैं। वो तो हम लोग हैं, जो अपनी निजी खुन्नस की खातिर उन्हें खलनायक बना डालते हैं।
कहते रहिए, वो उनके गले पड़े थे पर हकीकत तो यही है कि वे उनसे गले मिले थे।

मैं तो अब तक इस उम्मीद में रहता हूं कि काश! ऐसे ही कोई मुझसे भी गले मिले। या सरे-राह आंख ही मार दे।

बड़े मतलबी हो गए लोग, गले मिलने को भी सियासत से जोड़ने लगे हैं। आंख मारने को बेइज्जती से। पीठ पीछे खंजर भोंकने से तो कहीं बेहतर है सामने रहकर गले मिलना।

उनका गले मिलना लंबे समय तक याद रखा जाएगा। जो याद नहीं रखना चाहेंगे वे भूल ही करेंगे। दिल मिले न मिले, गले मिलते रहिए।

रविवार, 22 जुलाई 2018

गले मिलना, आंख मारना : सियासत का एक रंग

अविश्वास प्रस्ताव को गिरना ही था, गिर गया। अब तक जिद के आगे जीत सुनते आए थे, इस दफा जिद के आगे हार देख ली। हार भी कोई ऐसी-वैसी नहीं, तगड़ी वाली। लेकिन गिरने या हारने का उन्हें कोई अफसोस नहीं। वे उनके चीख-पुकार युक्त भाषण में फिलहाल अपनी जीत देखकर ही मुतमईन हैं।

देश का बुद्धिजीवि वर्ग भी उन्हें सुन गद-गद है। वे भी उनके भाषण में कथित बोल्डनेस के तार जोड़ने में लगे हुए हैं। चूंकि हम एक लोकतांत्रिक मुल्क हैं, इस नाते हर कोई स्वतंत्र है अपनी खुशी, अपना विरोध चुनने-जताने के लिए।

मुझे तो ऐसा लगता है, भाषणबाजी तो महज बहाना थी, असली मकसद झप्पी और आंख मारने में निहित ही था। यों तो हम बहुत-सी झप्पीयां देखते आए है, पर ये झप्पी 'शुद्ध राजनीतिक' थी। अगर राजनीतिक न होती तो झप्पी के तुरंत बाद आंख भी न मारी जाती। किंतु, ये वो वाली आंख नहीं मारी गई थी, जिसमें स्नेह और अपनापन समाया होता है। जिसमें एक आंख मारने पर ही पटने-पटाने के हाव-भाव छिपे होते हैं। जिसमें अंखियों से गोली चलती हुई प्रतीत होती है। और, जिस एक आंख मारने की घटना ने पिछले दिनों सोशल मीडिया पर अभूतपूर्व तहलका मचा दिया था।

जिस तत्परता के साथ आंख को मारा गया था, स्वयं आंख को भी उम्मीद न रही होगी। आंख ने झपक जाने के बाद सोचा तो अवश्य होगा कि हाय! ये मैंने क्या किया? आंखें अमूमन बहुत भोली होती हैं, उन्हें तो यह तक पता नहीं रहता कि इंसान कब किस पल उनसे क्या काम ले लेगा। चाहे अच्छे में या मजबूरी में, बदनाम आखिर आंखों को ही होना पड़ता है। इस बार भी हुईं।

फिलहाल उनकी झप्पी और आंख मारने के अलग-अलग सियासी मतलब निकाले जा रहे हैं। बात एक छोर से निकल, दूसरे छोर तक दूर बहुत दूर तलक जाने लगी है। कुछ कह रहे हैं, ऐसा भी भला होता है कहीं, तो कुछ ड्रामा बता रहे हैं। ये तो दुनिया है, यहां हर कोई कुछ भी कहने-बोलने को आजाद है। लेकिन नेता मंडली खुश नजर आ रही है। प्रस्ताव का गिरना या उठे रहना उनके लिए इतना बड़ा मुद्दा नहीं, वे तो 2019 की चौसर पर अपने-अपने दलों के भविष्य का अनुमान लगाने में व्यस्त हैं।

जनता उतना भोली भी अब नहीं रही, जैसे पहले कभी नजर आती थी। उसने आक्रामक भाषण को भी खूब समझा। झप्पी और आंख मारने के भी मजे लिए। भाषण पर होने वाली विकट हंगामेबाजी भी उसकी निगाह से छिपी नहीं। उसे अच्छे से मालूम है, कि गड्ढा कहां है। और पानी कहां भरा हुआ है। चुनाव युक्त वादे और जुमले उसे अब मनोरंजन का साधन मात्र लगते हैं। इसलिए तो वो खुद खामोश रहकर नेताओं को चीखने-चिल्लाने का मौका देती है। उसका उत्तर तो वोट में छिपा है।

कभी-कभी तो ऐसा लगता है, जब जनता के पास विकल्प नहीं होता तो वो किसी को भी गले लगा लेती। फिर, पांच साल तक निभाती है। झेलती है। यही होता है, गले लगाने और गले पड़ने का हश्र। कोई जरूरी नहीं जो गले लगा हो वो आपका हमदर्द ही हो। हो सकता है, जान कर गले पड़ रहा हो ताकि आपस में गलबहियों की गुंजाइश बनी रहे।

जिस तरह वे उनके करीब आ कर गले लगे, मानो दिल खिले। अब कितने खिले या नहीं खिले ये तो उनके दिल ही बता सकते हैं। पर सियासत में कभी-कभार ऐसे गले आपस में मिला लेने चाहिए। ताकि गलों को भी ये भरोसा रहे कि वे सिर्फ कटने के लिए ही नहीं होते।

इस झप्पी, आंख और गले मिलन के सीन को देखने के बाद सोच रहा हूं, मुझे भी अपने भीतर थोड़ा सुधार लाना चाहिए। किसी से दिल मिले न मिले हां गला अवश्य ही मिलाते रहना चाहिए। हर्ज तो आंख मारने में भी कुछ नहीं पर वो सीधी जगह जाकर ही लगे इस पर भरोसा बैठाना थोड़ा मुश्किल है।

कुछ भी कहिए, सियासत बहुत खूबसूरत शै है। अच्छा या खराब लगने की यहां अधिक टेंशन नहीं। दुनियादारी का झंझट नहीं। जनता को दिखाने के लिए दुश्मन हैं पर अंदर झप्पी और पप्पी की जगह बनी रहती है। गले मिलकर आंख मारने की छूट भी सियासत में ही संभव है। वरना ऐसा आम जिंदगी में करके देखिए कभी, दिन में चांद-सितारे न नजर आ जाएं तो कहिएगा।

कोई मलाल नहीं अविश्वास पर विश्वास कायम न हुआ। घर बैठे जो मनोरंजन हुआ उसे तो इतिहास भी याद रखेगा हमेशा। गर्व करिए कि देश के नेता न केवल अपने भाषणों से बल्कि झप्पी और आंख से भी खुद को कूल और जनता को बेफिक्र रखना जानते हैं।

सियासतदां सबकुछ साधना जानते हैं। वो तो हमारी ही बेचारगी है, जो उनकी तिकड़मों को समझ नहीं पाते। अगर समझ भी लें तो भी क्या।

सोच रहा हूं, उनकी तरह झप्पी और आंख मारने का एक प्रयोग मैं भी करके देख ही लूं शायद बरसों से बिगड़ी बात अब बन जाए। न बन पाई तो यह मानकर संतोष कर लूंगा- तुमसे न हो पाएगा बेटा।

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

हर कोई थूक रहा है

किसी वक़्त मुझे थूक और थूकने वालों से बहुत चिढ़ होती थी। किसी को भी थूकते देख दिमाग भन्ना जाता और दिल भीषण घृणा से भर उठता था। जी तो करता अभी उस बंदे का गिरेबान पकड़ उसके गले में जितना थूक जमा है अपनी उंगलियां डाल सब निकाल लूं। न आंगन टेढ़ा होगा। न राधा नाचेगी।

मतलब हद होती है, जहां जिसको स्पेस मिलता नहीं कि या तो थूक लेता है या फिर मूतने खड़ा हो जाता है। मानो हर सड़क, हर दीवार पर उनके बाप-दादाओं की हुकूमत चल रही हो! हम एक लोकतांत्रिक मुल्क है पर इसका यह अर्थ तो नहीं कि हमने अपने थूक को भी स्वतंत्र कर रखा है। जिधर मन किया आ...क... थू कर दिया। सभ्यता नाम की भी कोई चीज होती है जनाब। लेकिन थूक वीरों को सभ्यता-संस्कृति से क्या सरोकार। कभी-कभी तो उन्हें थूकता देख ऐसा फील होता है, मानो- ईश्वर ने उन्हें धरती पर उतरा ही केवल थूकने और थूकते रहने के लिए है।

जबकि और देशों में ऐसा नहीं है। वहां आप सड़क चलते कभी थूक कर देखिए। तुरंत चालान हो जाएगा। इंसान तो दूर वहां तो कुत्ता भी यों ही सड़क पर हगने से घबराता है। आखिर वे साफ-सफाई पसंद लोग हैं।

मगर हमारे यहां का तो सीन ही उल्टा है। यहां तो आप न थूकने वाले को, न मूतने वाले को, न कूड़ा फेंकने वाले को, न अपने कुत्ते को बीच सड़क हगाने वाले को टोक ही नहीं सकते। दो सेकंड में दोनों तरफ से तलवारें खींच आती हैं। बड़े ही बिंदास अंदाज में न केवल मां-बहन बल्कि पुरखों तक को याद फरमा लिया जाता है। बात बढ़ते-बढ़ते राजनीतिक रसूख तक आ पहुंचती है। मामला कोर्ट-कचहरी में भी आ लेता है।

तो भला ऐसी विकट स्थिति में कौन किसको थूकने से कह या मना कर सकता है! थूकने को तो हमने 'अभिव्यक्ति की आजादी' सरीखा बना लिया है। हमारे आस-पास की रंग-बिरंगी दीवारें इस आजादी की दास्तान स्वयं कहती हुई मिल जाएंगी।

वो दफ्तर, सरकारी या गैर-सरकारी, ही क्या जिसकी दीवारों पर पीक की कलाकृतियां न मिलें। आलम यह है, थूक वीर अपने थूक से दीवारों को इतना सजा देते हैं कि कभी-कभी तो वो पहचान में ही नहीं आ पातीं कि दीवारें हैं या पीकदान...!

मैं तो सोचता था कि थूका-थाकी के दीवाने सिर्फ मेरे ही शहर में हैं। मगर थूकने वालों की सभ्यता के दर्शन मैंने तो मुंबई में भी साक्षात किये हैं। आर्थिक राजधानी की दीवारें भी थूक के असर से बेअसर नहीं।

मेरे जैसे चंद 'थूक ना-पसंद' लोगों को थूक देखकर बेशक जलन होती हो पर थूकने वाले हर जलन से बे-फिक्र होते हैं। कहीं भी  थूककर उन्हें लगता है जैसे उन्होंने थूककर वहां अपने थूक की नाल गड़ दी हो। कभी पान-मसाला खाए बंदे को थूकते देखिए...। उसके मुंह से निकली पान की पीक कब किसके कपड़े रंग दे खुद उसे भी यह एहसास न रहता। न जाने कितनी दफा इस रंगत का सुख मेरे ही कपड़े भोग चुके हैं। मगर इस पाप के लिए अगले पर गुस्सा होने का तो मुझे नैतिक अधिकार ही नहीं। क्योंकि उसका एक 'सॉरी भाईसाहब' हर पाप पर भारी है।... कुछ ऐसे शालीन लोग भी मुझे मिले हैं, जो मुझ पर थूकने के बाद मुझी से रूमाल मांग मेरी शर्ट पोंछ चुके हैं। उनकी शालीनता देख वैसे ही मेरा गला भर आता है, उन पर गुस्सा होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।
कबीरा इस संसार में भांति-भांति के थूक-वीर...।

विडंबना देखिए, कूड़े-कचरे पर सख्ती, साफ-सफाई पर बड़ी-बड़ी बातें खूब हो रही हैं। स्वयं प्रधानमंत्री जी और राज्य सरकारें भी स्वच्छता मिशन में जी-जान से जुटी हुईं हैं। स्मार्ट सिटी का दर्जा पाने के लिए शहर संघर्षरत हैं। परंतु थूक-वीर सबसे बेखबर बस थूके ही जा रहे हैं। उनके ठेंगे से आप कूड़ा सड़क पर फैलाएं या डस्ट-बीन में डालें। उन्हें तो कहीं भी थूकने से मतलब। समझ नहीं आता, सरकार ने थूक और थूकने वालों को क्यों स्वच्छता अभियान से दूर रखा है!

कहा तो यह भी जाता है कि 'इंसान को अपना गुस्सा थूक देना चाहिए।' थूकने वाले जगह-जगह थूककर कहीं इसी कथन का तो पालन नहीं कर रहे? थूकने वालों में हो सकता है कुछ ऐसे बाशिंदें भी हों जो पान-मसाले के बहाने अपना गुस्सा थूककर बाहर निकालते हों!  इसीलिए वे कहीं भी थूकने से डरते न हों! शायद इसी गुस्से के कारण उनके मुंह में थूक की मात्रा ज्यादा बनती हो!... यह भारत है। यहां कुछ भी हो सकता है। मेरे विचार में यह गहन शोध का विषय है।

लेकिन अब सोच रहा हूं, थूकने वालों के प्रति मैं अपना नजरिया थोड़ा बदलूं। नाहक ही उन पर नाराज होने या चिढ़ने से कोई फायदा नहीं। खामखां, अपनी एनर्जी को क्यों वेस्ट करना। बैठे-ठाले क्यों किसी से पंगा लेना? हो सकता है, उनके थूकने के पीछे बड़े कारण रहे हों! यों भी, कोई शौकिया तो थूकेगा नहीं यहां-वहां!

चलिए। छोड़िए। इस बेतुकी बहस को। और भी गम हैं दुनिया में थूक के सिवा!

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

स्मार्टफोन न खरीद पाने का दुख

यों तो ऊपर वाले का दिया मेरे पास सबकुछ है, बस स्मार्टफोन ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि मैं स्मार्टफोन खरीद नहीं सकता। खरीद सकता हूं, लेकिन खरीदता इसलिए नहीं क्योंकि स्मार्टफोन मेरे लिए 'अशुभ' है!

पिछले दिनों शहर के एक ऊंचे ज्योतिष ने- मेरे ग्रहों के बर्ताव को देखते हुए- मुझे हिदायत दी कि मैं स्मार्टफोन न ही रखूं! यह मेरी सेहत और व्यवहार के वास्ते विकट अशुभ साबित हो सकता है! उन्होंने यह भी बताया- इसका असर मेरे जीवन पर तकरीबन दस साल तक बना रहेगा।

इस अशुभता से निजात पाने का जो उपाय उन्होंने बताया वो मेरे तईं कम से कम इस जीवन में तो कर पाना संभव नहीं। उपाय यह है कि हर हफ्ते शनिवार के दिन मुझे अपनी पत्नी से लड़ाई करनी होगी! पत्नी से लड़ लेने का मतलब आप समझते हैं न। अंधे कुएं में छलांग लगाने से क्या हासिल!

इसलिए चाहते हुए भी मैं स्मार्टफोन नहीं खरीद सकता।

बिन स्मार्टफोन के मेरी जेब और लाइफ तकरीबन खाली-खाली सी लगती है। इस दर्द को केवल मैं ही समझ सकता हूं। कई दफा दिल में उचंग उठती है कि ग्रहों की बंदिशों को धकिया कर अभी बाजार जाऊं और एक बढ़िया-सा स्मार्टफोन खरीद लूं। मगर नहीं खरीदता। कल को कहीं ग्रहों में ऊंच-नीच हो गई तो सारा दोष मेरे माथे ही मढ़ दिया जाएगा।

स्मार्टफोन का न होना मेरे लिए दुनिया के तमाम दुखों से कहीं बड़ा दुख है। कभी-कभी तो इस वहज से मैं ऑफिस और नाते-रिश्तेदारियों में होने वाले फंक्शन में भी नहीं जाता। क्या भरोसा कोई पूछ ही बैठे, आपके पास स्मार्टफोन नहीं है क्या? तब मेरे पास आसमान को ताकने के सिवाय कोई और रास्ता न होगा!

आप यकीन नहीं करेंगे, मेरे तो ऑफिस-बॉय के पास भी स्मार्टफोन है! अक्सर ही वो मुझे मेरे पास स्मार्टफोन न होने का अहसास कराता रहता है।

स्मार्टफोन पास होता है तो मन और जीवन में एक आत्मविश्वास-सा बना रहता है। दुनिया वालों पर एक ठसक सी कायम रहती है, सो अलग।

वाकई बड़े खुशनसीब हैं वे लोग जो स्मार्टफोन रखते हैं। सुना है, स्मार्टफोन रखने वालों के सितारे कभी गर्दिश में नहीं आते! जिसके पास स्मार्टफोन होता है, दुनिया उसे उसी तरह झुककर सलाम ठोकती है, जैसे पहले कभी मारुति-800 रखने वालों को ठोका करती थी।

समाज के बीच अपने स्टेटस को बनाए रखने के लिए इंसान क्या-क्या नहीं करता।

ग्रहों और ज्योतिष महाराज के मुताबिक अभी मुझे दस साल स्मार्टफोन के लिए इंतजार करना होगा। दस साल में दुनिया-समाज जाने कहां से कहां पहुंच जाएगा। यहां तो एक पल में ही टेक्नोलॉजी के भीतर-बाहर कितना कुछ बदल जाता है।

इस बात की भी क्या गारंटी है कि दस साल तक मैं इस धरती पर बना ही रहूं! लाइफ की कोई वेलिडिटी न होती प्यारे।

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

जल्द ही मैं भी अपना लक पहनकर चल सकूंगा

मैं कई दिनों से इस कोशिश में लगा हूं कि अपना लक पहनकर चल सकूं। लेकिन लक है कि मेरे खांचे में ही नहीं आ पा रहा। जबकि लक की जरूरत के मुताबिक मैंने अपना आकार-प्रकार भी घटा लिया है। बात फिर भी बन नहीं पा रही।

बार-बार दिल में यही ख्याल आता है कि मेरा लक दूसरों के लक से भिन्न क्यों है? भाग्य (लक) जब सबका साथ देता है तो मेरा क्यों नहीं दे रहा?
आप यकीन नहीं करेंगे। अपने लक को मनाने की खातिर मैंने 14 बुधवार के व्रत और 5 शनिवार की पूजा तक निपटा डाली है। अपनी नास्तिकता की प्रवृत्ति को आस्तिकता में तब्दील कर लिया है। मेरे भीतर इस धार्मिक परिवर्तन को देख घर वाले भी खासे आश्चर्यचकित हैं। सब कह रहे हैं कि ये मुझे हुआ क्या है? हालांकि मैं किसी के कहने-सुनने पर ध्यान नहीं देता। मुझे जो करना होता है, करता हूं।

आसपास के लोगों को जब मैं उनके पहने हुए लक के साथ चलता देखता हूं तो मन में भीषण ग्लानि-सी पैदा होती है। अपने-अपने लक के साथ लोग बड़े ही खुश नजर आते हैं। उनका जीवन मुझे अपने से ज्यादा सरल दिखाई देता है। आज लक का दिया उनके पास सबकुछ है। मेरे पास क्या है? ले देके एक उम्मीद। अब उम्मीद पर भी दुनिया या लक कहां कायम है! समय साथ सब बदल चुका है।

बताते हैं, मेरे लक में बचपन से ही खटाई पड़ी हुई है। जब मैं हुआ था, तब हस्पताल में बाढ़ आ गई थी! सूरज का रंग पीले से सिलेटी पड़ गया था! हवा उल्टी दिशा में बहने लगी थी! तब मुझसे अधिक मेरे लक (भाग्य) को कोसा गया था। यहां तक की डॉक्टर साहिब ने भी कह दिया था कि ये बच्चा बड़ा होकर बेहद अन-लक्की लेखक साबित होगा। देखिए, सबूत सामने है।

अपना लक अपने खिलाफ भी हो सकता है, यह मैंने खुद पर पड़ी तब जाना।

ऐसा भी नहीं है कि मेरी मेरे लक से बहुत बड़ी-बड़ी ख्वाहिशें हों। मुझे तो सिंपल उसे पहनकर चलना है। दुनिया को बताना है कि मैं भी अपना लक पहनकर चलने की हैसियत रखता हूं। उस पर भी मेरे साथ इतना भेदभाव। यह तो ठीक नहीं है।

अरे, लोग तो जाने क्या-क्या पहनकर चलते हैं। उसमें भी जाने कितना चोरी और उधार का शामिल होता है। मगर उनका लक तो उनसे खफा नहीं होता। तो मेरे लक को मुझसे ही क्या प्रॉब्लम है?

मेरा लक कहीं मतलबी तो नहीं हो गया है? हालांकि यह मेरी महज खामख्याली है। पर कभी-कभी न चाहते हुए भी अपने लक पर शक करना पड़ता है। शक करना तो वैसे भी मानव-प्रवृत्ति है। जाने कितने ही घर शक की आग में भस्म हो गए। फिर भी, मनुष्य ने शक पर विश्वास रखना बंद नहीं किया। तो मैं कौन-सा नया काम कर रहा हूं? किसी और के नहीं खुद के लक पर ही तो शक कर रहा हूं। हो सकता है, इसी से मुझे मानसिक शांति मिल जाए।

जो भी हो लेकिन मुझे इस बात का भी पक्का यकीन है कि एक दिन मैं अपने लक को खुद के फेवर में पटा ही लूंगा। औरों की तरह मैं भी अपना लक पहनकर चल सकूंगा। तब मुझे खुद पर शर्म भी नहीं आएगी।

फिलहाल, इस करिश्मे के इंतजार में हूं।

सोमवार, 9 जुलाई 2018

मेरे मरने के बाद...

जीते-जी इस बात का पता लगाना बेहद मुश्किल है कि ये दुनिया, समाज और नाते-रिश्तेदार आपके बारे में क्या और कैसा सोचते हैं। ये सब जानने के लिए आपको मरना पड़ेगा। क्योंकि इंसान की सामाजिक औकात का पता उसके मरने के बाद ही लगता है।

तो, एक दिन मैंने भी यही सोचा क्यों न मर ही लिया जाए। यों भी, जिंदा रहकर मैं कौन-सा अपने चमन को गुलजार कर रहा हूं। मरूंगा तो कम से कम चार लोग मेरी खैर-खबर तो लेंगे। मेरे बारे में दो बातें बुरी तो पांच अच्छी भी बोलेंगे। यमराज की भी एक दिन की दिहाड़ी पक्की हो जाएगी।

मौका पाते ही एक रोज मैंने अपने मरने की खबर वाइरल करवा दी। खबर एक घर से दूसरे घर कम, फेसबुक-व्हाट्सएप पर अधिक दौड़ी। जिसने सुना लगभग हिल-सा गया। अभी उम्र ही क्या थी...के जुमले फिजाओं में तैरने लगे। मेरे जाने को व्यंग्य लेखन का बहुत बड़ा नुकसान बताया गया। फेसबुक पर मेरे लिखे व्यंग्य टांगे जाने लगे। मुझ पर पोस्टें भी लिखी गईं। व्हाट्सएप पर मुझे धीर-गंभीर टाइप श्रद्धांजलि भी दी गई।

ये सब तो खैर सोशल मीडिया पर चलता रहा। आदमी का चरित्र सोशल मीडिया पर कुछ और जमीन पर कुछ और ही होता है।

जमीन पर मेरे खर्च होने की जमीनी हकीकत यह रही कि सब अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त रहे। मेरे मरने की खबर को 'आम खबर' की तरह ही लिया गया। दो-चार लेखक लोग मेरे घर मुझे 'अंतिम सलाम' कहने पहुंचे। दो-चार मिनट मेरे सिरहाने भी बैठे। एक ने तो आपसी खुसर-पुसर में यहां तक कह डाला- 'अच्छा ही हुआ जो महाराज निपट लिए। अखबार में कम से कम एक जगह, एक दिन तो खाली हुआ। वरना, तो जब तक रहा अखबार के कॉलम पर अपना हक जमाए रहा।'

दूसरे ने पहले वाले कि हां में हां मिलाते हुए कहा- 'ठीक फरमाया यार। व्यंग्य की बहुत बड़ी चिरांद था ये। खुद को शौकत थानवी और लतीफ घोंगी से कम नहीं समझता था। जबकि आता-जाता इसे व्यंग्य का 'व' तक नहीं था।' व्यंग्य लेखन पर बोझ थे मियां। तीसरे ने नुक्ता जोड़ा।

मैं अपने भूतपूर्व साथी लेखकों की अपने बारे में जाहिर की जा रही राय को सुन मन ही मन खुश हो रहा था। खुद को दुआएं भी दे रहा था कि अच्छा हुआ मुझे मेरी लेखकीय औकात का अहसास करवा दिया साथी लोगों ने। वरना तो मैं अपने को जाने क्या माने बैठा था।

मरने के बाद अमूमन आदमी को अपनी तारीफें ही सुनने को मिलती हैं मगर मैं लक्की रहा कि मुझे अपनी बुराइयां सुनने को मिलीं। बुरा बनकर रहने में भी सुख है। पर ये सुख हर किसी के नसीब में नहीं आ पाता।
एक बात मुझे और भी पसंद आई कि मेरे जाने के बाद न अखबारों में मेरे ऊपर कोई लेख ही आए न पत्रिकाओं ने मुझ पर केंद्रित अंक ही निकाले। अगर आ जाते तो ऊपर वाले को अपने लेखकीय चरित्र का स्पष्टीकरण देना मेरे तईं बड़ा कठिन पड़ता।

वैसे, बतौर लेखक मरने में हजार झंझट हैं। लोगबाग लेखक को बुद्धिजीवि समझ सेंटी टाइप हो जाते हैं। जबकि हकीकत यह है कि लेखक बुद्धिजीवि नहीं होता। सिर्फ अपनी बुद्धि की कमाई खाता है।

अगर आप भी लेखक हैं तो एक दफा मरकर जरूर देखिए। लोगों के भीतर छिपे, आपके बारे में, सारे सच पता चल जाएंगे।

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

देख लेना, गिरकर फिर उठेगा रुपया

गिरना एक स्वभाविक प्रक्रिया है। कुछ मैदान-ए-जंग में गिरते हैं तो कुछ मैदान-ए-बाजार में। गिरकर जो उठ या संभल नहीं पाते, दुनिया उन्हें बहुत जल्द भूला देती है। जैसे- शेयर बाजार के जाने कितने ही शेयर। आज उन शेयरों का अता-पता तक नहीं। एक बार गिरे तो कभी उठ ही न सके।

यह भी उतना ही सत्य है कि गिरने वाले की हंसी अवश्य बनाई जाती है। उस पर हंसकर उसे इस बात का एहसास कराया जाता है कि तूने गिरकर कितना बड़ा 'अनर्थ' कर डाला। फिर भी, होते है कुछ ऐसे लोग जो अपने गिरने का जबाव खीझकर नहीं बल्कि खुद को साबित कर देते हैं। जैसे- खेल के मैदान पर इस बात को जाने कितनी ही दफा सचिन तेंदुलकर और महेंद्र सिंह धोनी ने सिद्ध भी किया है।

हाल-फिलहाल तो गिरावट का संकट रुपए पर आन पड़ा है। रुपया गिरकर 69 पर अटक गया है। डॉलर ने रुपए को भरे बाजार पटखनी दे डाली है। गिरे रुपए का मजाक बनाया जा रहा है। कोई सोशल मीडिया पर चुटकले खींच रहा है तो कोई बाजार में बत्तीसी फाड़ रहा है। मंदड़िये रुपए के फिसलने पर खुश हैं तो तेजड़िये दुखी।

मगर रुपया स्थिर है। वो अपनी हंसी बनाने का बुरा नहीं मान रहा। उसे मालूम है कि यह गिरावट आंशिक है। गिरकर वो फिर से उठेगा। डॉलर को ईंट का जबाव पत्थर से देगा।

इससे पहले भी तो जाने कितनी दफा रुपया गिरा है। किसी ने संभाला नहीं, खुद ही संभला है। रुपया बहुत समझदार है। उसे अच्छे से मालूम है कि देश की अर्थव्यवस्था का दारोमदार उसके कंधों पर टिका है। वो गिरा-पड़ा रहेगा तो आर्थिक ढांचा ही गड़बड़ा जाएगा।

रही बात उसके लुढ़कने पर हंसने वालों की तो ये वही लोग हैं जो अपनी हंसी हंसते और दूसरे की हंसी पर रोते हैं। इनकी फिक्र रुपया नहीं करता।

रुपए को मैं अपनी प्रेरणा मानता हूं। उसके गिरकर उठने के जज्बे को सलाम करता हूं। ऐसा साहस बहुत कम लोगों में होता है। अपने इसी साहस के दम पर ही तो रुपया बाजार में अब तलक टिका हुआ है।

रुपया बरेली के बाजार में गिरा झुमका थोड़े है कि उठे ही न।

सोमवार, 2 जुलाई 2018

बुरा मानने वाले

ऐसे लोग मुझे बेहद पसंद हैं, जो बुरा मानते हैं। या कहूं, धरती पर जन्म ही उन्होंने बुरा मानने के लिए लिया होता है। वे इसी खुशफहमी में डूबे रहते हैं कि यह दुनिया टिकी ही उनकी बुरा मानने की आदत पर है। वे अगर बुरा नहीं मानेंगे तो विश्वभर की तमाम बुरी आत्माओं का भविष्य खतरे में आ जाएगा।

उनके बुरा मानने का कोई विषय या मुद्दा निर्धारित नहीं होता। किसी भी बात का बुरा मान सकते हैं। यों भी, बुरा मानने या जुबान चलाने में कभी एक नया पैसा खर्च नहीं करना होता।

बुरा मानने का तो ये है कि आप नल में पानी न आने से लेकर पक्षी के सिर पर हग देने तक का बुरा मान सकते हैं। हालांकि इन दोनों घटनाओं के घटने पर जोर किसी का भी नहीं है, तो क्या, उनको तो बुरा मानने से मतलब। कई बुरा मानने वाले मैंने तो ऐसे भी देखे हैं, जो अक्सर अपने जन्म लेने को ही बुरा मानते हैं। कहते हैं, जन्म लेकर जीवन की बहुत बड़ी गलती कर दी।

उन्हें समझाना बेकार है क्योंकि बुरा मानने को वे अपना लोकतांत्रिक हक मानते हैं।

सुन या देखकर ऐसा लगता जरूर है कि बुरा मानना बेहद सरल विधा है। किंतु ऐसा है नहीं। हर बात पर बुरा मानने के लिए आपको दिल से ज्यादा दिमाग को मजबूत करना होता है। काम सिर्फ बुरा मानने से ही नहीं चल जाता। डिपेंड यह करता है कि आप किस बात का कितनी देर या कितने लंबे समय तक बुरा मानते हैं। कुछ क्षणिक भर को बुरा मानते हैं तो कुछ जन्म-जिंदगी भर बुरा माने रहते हैं। बुरा माने रहने में धैर्य बहुत बड़ी भूमिका निभाता है।

निजी और सामाजिक जीवन में जब से सोशल मीडिया का असर बढ़ा है, लोगों की बुरा मानने की आदत में भी खासा इजाफा हुआ है। जहां तक मेरा अंदाजा कहता है, सोशल मीडिया पर तकरीबन अस्सी प्रतिशत लोग किसी न किसी बात पर बुरा मान ही जाते हैं। कभी-कभी तो मामला कोर्ट-कचहरी तक भी खींच जाता है।

बर्दाश्त करना क्या होता है, इस पर तो सोशल मीडिया पर बुरा मानने वाले वीर विचार करना ही पसंद नहीं करते। मानो- जब तक वे किसी बात का बुरा नहीं मान जाएंगे, उनका खाना हजम नहीं होगा।

गाहे-बगाहे मैं भी कोशिश करता रहता हूं बुरा मानने की लेकिन अभी वो बात मुझमें नहीं आ पाई है। मगर लगा हुआ हूं। एक दिन मैं भी बुरा मानने का हुनर सीख ही लूंगा। किसी और लाइन में भले ही नाम न कर पाऊं, बुरा मानने में तो कर ही लूंगा।

अच्छे और भले लगते हैं मुझे वे लोग जो अपने बुरा मानने को दिल में नहीं रखते। बाहर निकाल देते हैं। जमाना ही कुछ ऐसा हो चला है, जो जितना बुरा मानेगा, वो उतना ही बड़ा साहसी कहलाएगा।

शुक्रवार, 29 जून 2018

पाप का घड़ा

इन दिनों मेरे साथ कुछ भी ठीक नहीं हो रहा। कभी बनता काम बिगड़ जाता है, तो कभी सड़क चलते कोई भी लड़ लेता है। चार रोज हुए, उल्टे पैर की कन्नी उंगली में ऐसी चोट लगी कि दिन में चांद-सितारे नजर आने लगे। जैसे-तैसे उससे करार पाया तो अभी कोई फुटबॉल चुरा ले भागा। कल जेब से पांचों का नोट गिरकर जाने किस का भला कर गया।
आलम यह है कि अब तो खुद की शक्ल आईने में देखने से घबराने लगा हूं, क्या पता, आईना ही कहीं टेढ़ा-मेढ़ा न हो जाए!

शहर के सबसे समझदार ज्योतिष को अपना हाथ दिखाया तो उन्होंने मेरे ग्रहों का चाल-चलन दुरुस्त न बताकर दो हजार रुपए सीधे कर लिए। साथ में एक उपाय और बता दिया कि रोज आधी रात के बाद गधे की पूंछ के चार बाल तोड़कर शमशान की मिट्टी में गाड़ दूं। लेकिन इस बात का खास ख्याल रखूं कि गधा हर बार अलग होना चाहिए।

अब मेरा कोई गधों का कारोबार तो है नहीं कि हर रोज एक नया गधा मिल जाएगा। यों भी, शहर में हर रोज एक नए गधे को ढूंढना, सड़क पर गड्ढे ढूंढने से भी ज्यादा कठिन काम है। शहरी गधे देहाती गधों के मुकाबले यों भी सयाने होते हैं।

अतः ज्योतिष महाराज के उपाय से अपना पिंड छुड़ाया।

बहुत सोचने पर मैंने पाया कि ये सब मेरे 'ग्रह-दोष' के कारण न होकर मेरे 'पाप का घड़ा' भरने की वहज से है। मतलब- मेरे पापों का घड़ा भर चुका है। जब पाप का घड़ा ओवरफ्लो होने लगता है तब जीवन में ऐसी खतरनाक किस्म की घटनाएं होने लगती हैं।

यह बात अलहदा है कि किसी के पाप का घड़ा देर से भरता है तो किसी का जल्दी। लेकिन भरता अवश्य है, यह तय है।

मगर मैं मेरे पापों का घड़ा भरने से परेशान कतई नहीं हूं। बल्कि खुश ही हूं कि चलो, पाप का घड़ा मेरी उम्र के चालीसवें बसंत में ही भर गया। वरना तो लोगों के पापों का घड़ा अस्सी-नब्बे साल की उम्र तक भी न भर पाता। यह ऊपर वाले की मुझ पर अतिरिक्त कृपा रही। मैं उसका ऋणी हूं।

समय रहते जो काम निपट जाए उसी में भलाई है। मैं भी कब और कहां तक अपने पाप का घड़ा यहां-वहां लिए-लिए घूमता।

अब जबकि मेरे पाप का घड़ा भर ही चुका है, तो मैंने हर किसी से डरना भी छोड़ दिया है। यहां तक की बीवी से भी। पहले तो अनजाने डर के कारण से उसे मैं जबाव भी नहीं दे पाता था, मगर अब तुरंत दे देता हूं। ऑफिस में बॉस को भी जब मौका पड़ता है, खरी-खोटी सुना डालता हूं। मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाते। बस मन मसोस कर रह जाते हैं।

ऐसा लोगों का भरम है कि पाप का घड़ा भरना बुराई का प्रतीक है। जबकि ऐसा कुछ नहीं है। पाप का घड़ा भरते ही बंदा एकदम निडर टाइप हो लेता है। बिल्कुल मेरी तरह।

कम उम्र में पाप का घड़ा भर जाने का सबसे बड़ा फायदा यही मिलता है कि ज्यादा बड़े घड़े की जुगाड़ नहीं करनी पड़ती। छोटे घड़े से ही काम चल जाता है।

इतने ज्यादा पापों से भी क्या हासिल कि अतिरिक्त घड़े की व्यवस्था करनी पड़े। कम पाप, छोटा घड़ा।

पहले के मुकाबले आज के समय का इंसान ज्यादा समझदार है। वक्त से पहले ही अपने पापों का घड़ा भर जीवन से मुक्ति पा लेता है। किया भी क्या जाए; अब पाप ही इतने तरह के होने लगे हैं। पाप भी ऐसे-ऐसे की दांतों तले उंगली दबा ले।

बहरहाल, जिनके पापों का घड़ा जल्दी भर गया है, वे मेरी तरह जश्न मना सकते हैं। बाकी अपने घड़ों के भरने का इंतजार करें।

गुरुवार, 28 जून 2018

सपनों का न आना

मुझे सपने नहीं आ रहे। सपनों के न आने से मैं खासा परेशान हूं। पूरा दिन इसी सोच-विचार में निकल जाता है कि आखिर क्या कारण है, जो सपनों ने मुझसे किनारा कर लिया है।

सपने न आने की समस्या जब भी पत्नी या यार-दोस्तों के समक्ष रखता हूं तो यह कहकर मुझे टाल देते हैं कि 'अच्छा है जो तुम्हें सपने नहीं आ रहे। आजकल के वक्त में सपनों का न आना ही बेहतर।' मगर उन्हें मैं यह कैसे समझाऊं कि सपनों का न आना मेरे लिए सही नहीं है। सपनों से मुझे उतना ही प्यार है, जितना एक मां को अपने बच्चों से होता है।

सपने मेरे जीवन का आईना हैं। इस आईने में मैं वो सबकुछ देख पाता हूं, जो मुझे हकीकत में कहीं नजर नहीं आता। मुझे अपने पागलखाने में होने का अहसास सपने में ही तो हुआ था। मैं तमाम पागलों के बीच उनसे जिंदगी के असली मायने समझ-जान रहा था। उनसे बात करके कभी लगा ही नहीं कि वे पागल हैं। बल्कि मुझे तो यह दुनिया, यह समाज उनसे कहीं अधिक पागल नजर आया। मंटो में भी तो इस दुनिया को पागलखाना कहा था।

लोगों और दुनिया के पागल होने के प्रति मेरी धारण इससे भी और मजबूत होती है, जब वे यह कहते हैं कि इंसान को सपने आना उसके पागलपन की निशानी है। उन्हें क्या मालूम इस पागलपन में कितना सुकून है। वो इंसान ही क्या जिसे सपने नहीं आते।

या, कहीं ऐसा तो नहीं मुझे सपने मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल करने के कारण न आते हों? कहीं मोबाइल और सपने के बीच छत्तीस का आंकड़ा तो नहीं? मोबाइल से निकलने वाली खतरनाक तरंगें ही मेरे सपनों को दिमाग में आने से रोके रखती हों? मोबाइल पर मेरी जब से निर्भरता अधिक बढ़ी है, तब से एक सपनों ने ही नहीं बच्चों ने भी मेरे करीब आना छोड़ दिया है। जब तब वो तपाक से मुझसे कहा देते हैं कि पापा आपके पास क्या आएं, आप तो दिनभर मोबाइल में ही व्यस्त रहते हो!

तो क्या मोबाइल ही मेरे सपनों को काट रहा है! सम्भवता यही वजह हो सकती है मुझे सपने न आने की। सपनों को भी एक स्पेस चाहिए होता है, हमसे रू-ब-रू होने के लिए। मगर हमने तो उस खाली जगह में मोबाइल को कब्जा दे दिया है। फिर भला कैसे आएंगे सपने मुझे।
लेकिन मैं सपने चाहता हूं। इसके लिए चाहे मुझे मोबाइल को ही अपनी जिंदगी से रुखसत क्यों न करना पड़े। सपने नहीं आएंगे तो जिंदगी में उमंग कहां रह जाएगी। बिन सपनों के जिंदगी बड़ी बे-नूर होती है जनाब।

इसका मतलब और लोग भी मेरी तरह सपने न आने की समस्या से जूझ रहे होंगे न? कितना अन्याय कर रहे हैं हम अपने सपनों के साथ।

सोमवार, 25 जून 2018

ये तो होना ही था...

जिसका 'डर' कम 'यकीन' ज्यादा था, वही हुआ। एक और 'राजनीतिक गठबंधन' (बीजेपी-पीडीपी) 'ब्रेकअप' की भेंट चढ़ गया। देश का बच्चा-बच्चा जानता था कि 'गठबंधन' की बुनियाद खोखली है मगर फिर भी दोनों ने निभाने की जिद पकड़ रखी थी। गठबंधन में ऐसी 'जिदें' भला कहां कामयाब हुई हैं! इतिहास उठाकर देख लीजिए, हर गठबंधन अपने साथ-साथ देश की भी भद्द पिटवाकर ही टूटा है।

गठबंधन में कल तक जो 'हम साथ-साथ हैं' का गाना गुनगुनाया करते थे, अब एक-दूसरे को सर से लेकर पांव तक शब्द-वाणों से भेद रहे हैं। एक-दूसरे के इतिहास के गड़े मुर्दे उघाड़ रहे हैं। जैसे- गठबंधन का फर्ज निभाते-निभाते पति-पत्नी एक-दूसरे की कमियों के चित्रहार अपने-अपने नाते-रिश्तेदारों को दिखाते हैं, ठीक वैसा ही यहां भी हो रहा है।

दोनों ही दल देश की जनता को बता रहे हैं कि हमने इनके साथ क्या किया और इन्होंने हमारे साथ का बदला कैसे दिया। ठीक उसी गाने की तरह- 'अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का, यार ने ही लूट लिया घर यार का...।'

और कीजिए गठबंधन। सब-कुछ जानते-समझते हुए भी राजनीतिक दल आपस में गठबंधन कर लेते हैं। और जब नहीं चला पाते तो अपने घर का झगड़ा लेकर सड़क पर आ जाते हैं कि जनता या कोर्ट फैसला करे। जैसे- दोनों खाली बैठे हों!

हालांकि यह (बीजेपी-पीडीपी) साथ चालीस माह तक चला। पर हकीकत ये रही कि दोनों की आपस में चार पल भी न बनी। चालीस माह का संग-साथ चार सेकेंड में छूट गया। गठबंधन का साथ ऐसा ही होता है पियारे। चला तो चला। नहीं चला तो तुम अपने रास्ते खुश, हम अपने।

गठबंधन के फर्ज को निभाना हर एक के बस की बात न होती। चाहे शादी-व्याह का हो या राजनीतिक; जब तक समझौते करते रहेंगे, मजबूरियों को जिंदगी का हिस्सा बनाए रखेंगे, गठबंधन की गाड़ी चलती रहेगी। लेकिन जहां आपस में तू-तू, मैं-मैं शुरू हुई नहीं कि गठबंधन की गांठ पर ग्रहण का असर तुरंत प्रभावी हो लेता है।

इसीलिए तो मैं बिना चू-चपड़ किए बेहद शांति और समझौते के साथ अपनी शादी के गठबंधन को 'वीर तुम बढ़े चलो...' की तर्ज पर खींचे चला जा रहूं। ये कोई राजनीतिक गठबंधन तो है नहीं कि अभी इस दल के साथ हैं तो कल को उस दल के साथ हो लेंगे। क्या फर्क पड़ना है।
यहां तो गठबंधन की गाड़ी जरा-सी इधर-उधर हुई नहीं कि जान और जीवन दोनों सांसत में। इज्जतदार पति वही है, जो पत्नी के साथ अपने गठबंधन को बिना 'उफ्फ' किए साधे चला जाए। जैसे के मैं!

अभी थोड़ा-सा लग रहा है कि ये गठबंधन क्यों टूटा? जख्म अभी ताजा है न इसलिए। दिन जैसे-जैसे गुजरते जाएंगे बहुतों को तो याद भी न रहेगा कि ऐसा कोई गठजोड़ था भी!

इस घटना को 'ये तो होना ही था' की नियति मान भूल जाइए। बाकी आगे-आगे देखिए होता है क्या।

गुरुवार, 21 जून 2018

समाज को सुधारना चाहता हूं!

कई दिनों से मैं समाज को सुधारने की सोच रहा हूं! न न आप गलत समझ रहे हैं। मैं समाज को समाज के बीच जाकर नहीं, अपने लेखन के दम पर सुधराना चाहता हूं। समाज के लिए कुछ सुधार-पूर्ण लिखना चाहता हूं। समाज को बताना चाहता हूं कि वो ये-ये उपाय कर खुद को कैसे और किस हद तक सुधार सकता है।

हालांकि मैं यह बहुत अच्छे से जानता हूं कि समाज को- लेखन के दम पर सुधारना- हंसी-खेल नहीं। मगर फिर भी सुधार की एक कोशिश करके देख लेने में हर्ज ही क्या है प्यारे। सुधरा हुआ समाज किसे नहीं भाता। अपने लेखन के दम पर दस परसेंट भी अगर मैं समाज को सुधार लेता हूं तो मुझे मेरी 'समाज-सुधार' पर लिखी किताब की अच्छी-खासी रॉयल्टी मिल सकती है। समाज भी सुधार जाएगा और मेरी आर्थिक स्थिति भी। यानी, एक पंथ दो काज।

अपने दिमाग में पनपे समाज-सुधार के इस कीड़े की परिकल्पना जब मैंने पत्नी के सामने रखी तो उसे यकीन ही नहीं हुआ। उसने पूरी परिकल्पना पर पानी उड़ेलते हुए मुझसे कह दिया- 'तुम...तुम समाज को सुधरोगे! पहले खुद तो सुधर जाओ। समाज को बाद में सुधार लेना।' पत्नी का कटाक्ष भीतर तक सुलगा तो बहुत कुछ गया। पर वही है न कि पत्नियों से बहस नहीं कर सकते। पता चला, समाज को सुधारने के चक्कर में अपनी ही कहानी कहीं बिगड़ गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे।

वैसे, समाज में हर बात, हर मुद्दे पर सुधार की दरकार है। लेकिन एक सुधार तो समाज को अपने भीतर तुरंत ही कर लेना चाहिए, वो है: हर विषय में अपनी टांग घुसेड़ने की आदत। मैं समझता हूं, अगर समाज सिर्फ इसी आदत को सुधार ले तो अस्सी परसेंट तक सुधर सकता है।
एक समाज ही नहीं बल्कि घर-परिवार से लेकर राजनीतिक हलकों तक में आधे से अधिक झगड़े और मन-मुटाव बीच में टांग घुसेड़ने की वजह से ही होते हैं। मसला तब और बिगड़ जाता है जब टांग घुसेड़ने के साथ अपनी राय भी जाहिर की जाती है। कि, ये करो तो ऐसा होगा। वो करो तो वैसा होगा। सबसे ज्यादा राय के छौंक से दुखी नया-नवेला शादी-शुदा जोड़ा रहता है।

यों तो इस देश में राजा राम मोहन राय से लेकर ज्योतिबा फुले तक कई महान समाज-सुधराक हुए हैं। ऐसे में मेरा समाज को सुधराने के लिए प्रयास बेशक ऊंट में मुंह में जीरा टाइप ही होगा। मगर फिर भी, कोशिश करने में क्या जाता है। हो सकता है, मेरी किताब समाज सुधार की दिशा और दशा ही बदल दे। चेहरे पर किसी के थोड़े न लिखा होता है कि वो जीवन में वो कितना ऊंचा या नीचा जाएगा।

खैर, इधर-उधर की बातों पर खाक डालते हुए मैं समाज को सुधराने के उपायों पर लिखने बैठ गया हूं। मुझे अग्रिम शुभकामनाएं दें।

रविवार, 10 जून 2018

महाभारत काल में 'इंटरनेट' का होना

अगर वो बताते नहीं तो हमें भी कहां पता नहीं चल पाता कि महाभारत काल में भी 'इंटरनेट का अस्तित्व' था! मैं समझ नहीं पा रहा महाभारत के रचयिता और सीरियल बनाने वालों ने हमसे इस 'महत्त्वपूर्ण रहस्य' को छिपाए क्यों रखा? महाभारत काल में 'इंटरनेट' का होना कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। यह युद्ध से कहीं अधिक मायने रखती थी।

बल्कि मुझको तो ऐसा भी लगता है कि महाभारत की प्रत्येक घटना उस वक्त 'इंटरनेट' पर जरूर डाली गई होगी। यह गहन खोज का विषय है। इतिहासकारों एवं वैज्ञानिकों को इस पर अवश्य ही शोध करना चाहिए।
मुझे पक्का यकीन है, उन्होंने महाभारत काल में इंटरनेट होने की बात हवा में नहीं कही होगी। अवश्य ही उनके पास इसके ठोस तथ्य मौजूद होंगे। कोई और भले ही कर ले किंतु नेता लोग कभी इतिहास से छेड़छाड़ नहीं किया करते! हो सकता है, कभी उन्होंने भी उन जगहों की खुदाई की हो, जहां महाभारत का युद्ध घटा! जहां कौरव-पांडव आदि रहा करते थे। खुदाई के दौरान हो सकता है, उन्हें इंटरनेट चलाने वाली कोई डिवाइस मिली हो! सिम या फिर उस वक्त का कोई डेटा प्लान की शीट आदि ही हाथ आ गई हो!

जब उस दौर में इंटरनेट था ही तो यह भी संभव है कि किसी न किसी शक्ल में मोबाइल भी जरूर रहे ही होंगे। वरना, तब वे लोग इंटरनेट चलाते किस पर थे।

मुझे तो इस बात की भी हैरानी है कि पूर्व में हुईं इतनी खुदाइयों के बाद भी खुदाई-कर्त्ता वो नहीं खोज पाए जो उन्होंने एक ही बार में खोजकर देश को बता दिया। इससे यह बात भी प्रमाणित होती है कि देश के नेता सिर्फ राजनीति ही करना नहीं जानते बल्कि वे पैराणिक काल की भी ठीक-ठाक जानकारी रखते हैं।

उनके कहे पर मेरी सहमति इस कारण भी बनती है क्योंकि महाभारत के युद्ध का आंखों-देखा हाल संजय ने महाराज धृतराष्ट्र को सुनाया था। एक-एक पल की खबर उन्हें वे देते रहते थे। इतना ही नहीं वासुदेव कृष्ण भी युद्ध का परिणाम बहुत अच्छे से जानते थे। एक-दूसरे के खेमे की गुप्त सूचनाओं का आदान-प्रदान भी, तब के इंटरनेट के, माध्यम से ही होता रहा होगा।

इंटरनेट का तो खैर उन्होंने बता ही दिया, साथ ही, यह भी खोज और जिज्ञासा का विषय है कि क्या यूट्यूब का जलवा तब भी था! राजा-महाराजा अपना मनोरंजन गीत-संगीत-नृत्य आदि से तो करते ही थे, क्या दिल बहलाने को यूट्यूब का भी इस्तेमाल किया करते थे! जब इंटरनेट था तो संभव है, यूट्यूब भी रहा ही होगा! वैसे, इस विषय पर शोध किया जा सकता है।

अभी एक नेता ने और भी दिलचस्प बयान दिया कि नारदजी के पास गूगल समान जानकारियां रहती थीं। कुछ समय पहले इन्हीं नेता जी ने राम के तीरों को इसरो के रॉकेट जैसा बताया था! मगर लोग हैं कि इस सब को मजाक समझ हवा में उड़ा दे रहे हैं। किंतु मैं ऐसा कतई नहीं करता। बल्कि मुझे तो गर्व टाइप फील हो रहा है कि मेरे देश के नेता वैज्ञानिक सोच के मामले में दस कदम आगे हैं। बेशक, उनकी बातों-बयानों को सुनकर आपका सिर चकरा रहा होगा पर पौराणिक सत्य को कभी झुठलाया नहीं जा सकता।

न भूलें, डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को भी पिछले दिनों एक नेता ने चुनौती दी थी।

चलिए, वापस महाभारत पर लौटते हैं। अक्सर जब महाभारत के युद्ध के विषय में सोचता हूं तो मेरे दिमाग में बार-बार यही प्रश्न कौंधता है कि महाभारत का युद्ध कहीं इंटरनेट की मदद से तो नहीं लड़ा गया था? कहीं युद्ध के तौर-तरीकों को गूगल तो नहीं किया गया था? मामा शकुनि के बारे में अक्सर मुझे कुछ ऐसा ही शक होता है। उनके पास अपने प्रिय भांजे दुर्योधन को देने के लिए इतनी सलाहें थीं। इतने तो वाण भी न होंगे अर्जुन के तरकश में।

महाभारत के किसी भी पात्र की बात कर लीजिए, हर किसी में कुछ न कुछ इंटरनेटिए प्रभाव दिखेगा ही।

मुझे तो पांडवों द्वारा इंद्रप्रस्थ का निर्माण भी गूगल किया हुआ ही लगता है।

इतने प्रमाण मिलने के बाद भी उनके बयान 'महाभारत काल में इंटरनेट था' पर विश्वास न करना कोरी बेवकूफी ही कहलाएगी। शेष आपकी मर्जी।

शनिवार, 9 जून 2018

व्यंग्य में 'पाथ ब्रेकिंग'

जीवन में सफलता का रास्ता अच्छा पढ़ने या अच्छा करियर बनाने से ही नहीं निकलता, 'पाथ ब्रेकिंग' से भी निकलता है। 'पाथ ब्रेकिंग' की अवधारणा को काफी हद तक स्वरा भास्कर ने साबित भी किया है। खुलकर बताया कि मनुष्य के 'चरम सुख' का सुख 'पाथ ब्रेकिंग' में ही निहित है। हालांकि हमारा ऊपर से 'सभ्य' लगने-दिखने वाला समाज अभी 'पाथ ब्रेकिंग' के कॉन्सेप्ट पर नाक-मुंह जरूर सिकोड़ रहा है पर भीतर ही भीतर इसका दीवाना भी बन चुका है। लेकिन बताएगा थोड़े न!

वो तो लोगों को 'पाथ ब्रेकिंग' के कॉन्सेप्ट का एहसास 'वीरे दी वेडिंग' में हुआ जबकि यह उपलब्धि तो चचा वात्स्यायन जाने कब की हमें 'कामासूत्र' के रूप में दे चुके हैं। वही है न कि 'घर की मुर्गी दाल बराबर।'

लोगों के बेड-रूम का तो मुझे नहीं पता मगर सोशल मीडिया पर 'पाथ ब्रेकिंग' ने इन दिनों गजब ढाह रखा है। 'पाथ ब्रेकिंग' पर बनने वाले जोक और वन-लाइनर्स इसकी सफलता की कहानी खुद कह रहे हैं। 'पाथ ब्रेकिंग' शब्द को ईजाद करने वाले ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसका यह शब्द 'यूथ आइकन' बन जाएगा। आलम यह है कि अब तो सड़क चलते कोई भी पूछ लेता है 'और जनाब 'पाथ ब्रेकिंग' कैसी चल रही है?'

मेरे विचार में 'फॉग' के बाद सबसे ज्यादा पूछे जाने वाला सवाल 'पाथ ब्रेकिंग' ही है।

'पाथ ब्रेकिंग' में मुझे अनंत संभावनाएं नजर आ रही हैं। सबसे ज्यादा व्यंग्य में। व्यंग्य के लिए सबसे धांसू नजरिया है 'पाथ ब्रेकिंग'। एक से बढ़कर एक 'पाथ ब्रेकिंग' व्यंग्य लिखे जा सकते हैं। बल्कि मैं तो यहां तक कहने को तैयार हूं 'पाथ ब्रेकिंग' व्यंग्य का भविष्य है। मौजूदा दौर के व्यंग्यकारों को इस मसले पर गंभीर चिंतन करने की जरूरत है।

आपाधापी भरी जिंदगी में जैसे कुछ पल का 'चरम सुख' शरीर को लाइट रखने का काम करता है, वैसे ही व्यंग्य में 'पाथ ब्रेकिंग' मूड को रिफ्रेश करने के काम आएगा। दिमाग पर हर वक्त गंभीरता का लबादा ओढ़े रखना भी ठीक नहीं।

मैं तो यह सोचकर हैरान हूं कि हमारे पुराने और वरिष्ठ व्यंग्यकारों ने 'पाथ ब्रेकिंग' के कॉन्सेप्ट को अपने व्यंग्य लेखन में लेने का प्रयास क्यों नहीं किया? इतनी उत्तेजक रचनात्मकता से अपने पाठकों को महरूम क्यों रखा? माना कि व्यंग्य में जरा बहुत संवेदना, सरोकार, कलात्मकता जरूरी है किंतु 'पाथ ब्रेकिंग' भी उतनी ही आवश्यक है।

खैर...। जो हुआ सो हुआ। वो समय अलग था, यह समय अलग है।

व्यंग्य में नई चमक और गर्माहट पैदा करने के लिए 'पाथ ब्रेकिंग' जरूरी है। लेकिन ये व्यंग्य में आ तभी पाएगी जब हमारे जीवन में भी थोड़ी-बहुत 'पाथ ब्रेकिंग' का चांस बना रहे।

शुक्रवार, 8 जून 2018

फूफा जी का डांस

डांस हर कोई नहीं कर सकता। न डांस हर किसी को कराया जा सकता है। जो डांस नहीं कर सकते, उन्हें आंगन हर वक्त टेढ़ा ही नजर आता है। लेकिन विदिशा (मध्य प्रदेश) वाले फूफा जी ऐसे नहीं हैं। वे शादी में आए अन्य फूफओं से बहुत अलग हैं। आजकल तो अपने 'अद्भुत डांस' के चलते पूरी दुनिया में वायरल हो रखे हैं। दुनिया ही नहीं पूरा सोशल मीडिया उनके डांस का मुरीद बन बैठा है। ट्विटर पर उनके डांस को जमकर रि-ट्वीट किया जा रहा है। तो फेसबुक की पोस्टों में फूफा जी के चर्चे हैं।

जिसे देखो उसी की मोबाइल स्क्रीन पर फूफा जी डांस करते दिख जाएंगे। फूफा जी के डांस ने ऐसा रंग जमाया है कि बॉलीवुड से लेकर मामा जी तक को तारीफ करनी पड़ गई है। मामा जी ने तो यहां तक कह डाला कि मध्य प्रदेश के पानी में कुछ बात तो है। सही है। पानी आखिर कहीं तो अपना असर छोड़ता ही है।

फूफा जी के फुर्तीले डांस को देखकर एक बार फिर यह धारणा मजबूत हो चली है कि डांस में उम्र मायने नहीं रखती। बस दिल का जवां और शरीर का चुस्त होना जरूरी है। वजन भी खास मायने नहीं रखता फूफा जी को नाचता देखकर।

पता नहीं गोविंदा ने फूफा जी का डांस अभी देखा होगा कि नहीं। अगर देख लेंगे तो दीवाने वे भी उनके हुए बिना न मानेंगे।

फूफा जी को डांस करते जब से देखा है, मेरा दिल भी डांस करने को मचलने लगा है। बीच में पत्नी ने भी ताना मार दिया- 'देखो, ऐसे होता है डांस। तुम्हारी तरह नहीं सिर्फ हाथ-पैर हिला लिए।' पत्नी ने हल्की-सी हिदायत भी दे डाली- 'मेरी मानो थोड़े दिन विदिशा में रहकर फूफा जी से डांस सीख आओ।'

पत्नी की सलाह नेक है लेकिन नौकरी की अपनी दुश्वारियां हैं।
बचपन में बड़ी तमन्ना थी, जब भी माइकल जैक्सन को डांस करते देखता था, उस जैसा बनने की। वैसा ही डांस करने की। बॉडी को उतना ही लचीला बनाने की। केवल डांस के दम पर पूरी दुनिया पर छा जाने की। मगर हर कोई तो माइकल जैक्सन नहीं हो सकता न। जैक्सन बनने का ख्वाब ख्वाब ही रहा। फिलहाल, लेखक बन गया।

लेकिन फूफा जी के गोविंदा स्टाइल डांस ने दिल मोह लिया। शरीर में इतना लोच, इतनी स्फूर्ति जाने कहां से लाते हैं फूफा जी।

मानना तो पड़ेगा, डांस प्रेमी होते बहुत जिंदादिल हैं। कहीं भी, कैसे भी डांस करवा लो बिना शर्माए नाच जाते हैं। वे डांस कर अपने शरीर की चपलता को बनाए रखते हैं। और एक हम लेखक हैं, जो इस-उस पर टिका-टिप्पणी कर अपना दिल जलाते रहते हैं।

कितना खुशनसीब है वो परिवार जिसमें ऐसे मस्त डांसर फूफा जी हैं। फूफा शादियों में सिर्फ मुंह ही नहीं बिगाड़ते, डांस भी बिंदास करते हैं। जियो फूफा जी।

बुधवार, 6 जून 2018

फ्लिपकार्ट का बिकना

जब भी किसी को बिकते देखता हूं तो खास आश्चर्य नहीं होता। सोचता हूं, अगले में बिकने का गुण रहा होगा, इसीलिए तो बिका। वरना, इस घोर प्रतिस्पर्धा के समय में बिकना-बिकाना इतना आसान कहां।
मैं तो जब आईपीएल के खिलाड़ियों को बिकते देखता हूं तो यह हौसला मन में जगा रहता है कि बिकना इतना बुरा भी नहीं अगर ठीक-ठाक पैसे मिल रहे हों।

इसीलिए फ्लिपकार्ट ने ठीक किया वालमार्ट के हाथों बिक कर। खुद की मेहनत पर खड़ी की दुकान बंद करने से तो बेहतर था कि उसे बेच दिया जाए। जब बिजनेस की झोंक खुद से न संभल पा रही हो तो उसका तियां-पांचा कर ही देना चाहिए।

मगर फ्लिपकार्ट के बिकने पर देश का बुद्धिजीवि वर्ग बड़ा परेशान है। उनकी परेशानी को सुनकर लग तो ऐसा रहा है मानो- उनके बेटे की दुकान बिक गई हो! जबकि खुद बड़े आराम की जिंदगी बसर कर रहा है देश का बुद्धिजीवि वर्ग। सिवाय हर मुद्दे पर गाल बजाने और जुबान चटखाने के कोई खास काम उनके कने नहीं होता।

कह रहे हैं, फ्लिपकार्ट का बिकना देश को विदेशी पूंजीवाद के हाथों गिरवीं रख देने जैसा है। सरकार धीरे-धीरे कर देश के उद्योग-धंधों को विदेशी कंपनियों को सौंप रही है। पहली बात तो यह है कि फ्लिपकार्ट ने बिकने का फैसला खुद से किया है, सरकार का इस डील में कोई रोल ही नहीं बनता। और फिर ऐसा कौन-सा धंधा है, जहां विदेशी हस्तक्षेप नहीं है। खाने से लेकर जीने तक हर कहीं विदेशी आइटम्स का दबदबा है। पूंजीवाद का विरोध तो महज दिखावा है। बुद्धिजीवि खुद अंदर से कितना पूंजी में डूबे हुए हैं, सब जानते हैं।

वैसे, जब भी देशी कंपनियों को विदेशियों के हाथों बिकते देखता हूं तो यही सवाल मन में आता है कि हम भारतीयों को बाजार की मांग के मुताबिक चलना नहीं आता। कस्टमर्स का टेस्ट कंपनियां जान नहीं पातीं। जबकि अपना माल बेचने में विदेशी हमसे कहीं अधिक चालक और तेज होते हैं। अगर यह सच न होता तो मोबाइल मार्केट में चाइनीज फोनों की धूम न होती।

खैर, फिर भी दो बंदों ने फ्लिपकार्ट को इतने लंबे समय तक अपने दम पर टिकाए रखा बड़ी बात है। बाद में जब कंपनी हाथ से फिसलने लगी तो बेच दी। बिल्कुल ठीक किया। फिसलने से पहले संभल जाने में ही तो समझदारी है।

बिकना-बिकाना खुद को मार्केट में बनाए रखने के फंडे हैं। आज के दौर में कामयाब भी वही है जो खुद को ऊंचा बेच सके। चाहे खिलाड़ी हो या कलाकार या फिर लेखक ही क्यों न हो। अंटी में आता पैसा किसे बुरा लगता है जनाब।

मुझसे तो कोई आकर कहे कि मैं आपके लेखन को खरीदना चाहता हूं, मैं तो हंसी-हंसी स्वीकृति दे दूंगा। खरीद ले। पर पैसा मस्त दियो। पैसा ही जीवन का अंतिम सत्य है। बाकी सब हवाबाजी है महाराज।

खैर, जिसे बिकना था वो बिक गई। जिन्हें पूंजीवाद को गरियाना है, गरियाते रहें। मुनाफा पहले है। जज्बातों का कोई अचार थोड़े न डालना है उम्रभर। क्या समझे।