मंगलवार, 15 मई 2018

मंटो पागल नहीं था

जब भी फुर्सत पाती है, मंटो की 'आत्मा' मेरे पास चली आती है। हालांकि मंटो को गुजरे पचास साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है मगर उसकी आत्मा में खास बदलाव नहीं आया है। वो दुनिया-समाज से तब भी नाराज थी, आज भी उतनी ही नाराज है। नाराज हो भी क्यों न! जिस समाज ने हमेशा उसे 'पागल' और उसके लिखे को 'अश्लील' समझा उससे 'नाराजगी' तो बनती है।

मंटो की आत्मा सवाल बहुत करती है। ऐसे-ऐसे सवाल अगर आज की हुकूमत सुन ले तो फिर से उसे 'पागलखाने' में डलवा दे। मगर उसके सवाल होते बहुत वाजिब हैं। वो समाज के- दिमागी स्तर पर- न बदलने पर बहुत खफा है।

मुझसे पूछती है- कितनी हैरानी की बात है, मेरे गुजरने और देश में लोकतंत्र के पैर जमाने के बाद भी लोग जिस्म में तो बदल गए लेकिन दिमागी तौर पर बीमार ही हैं, क्यों? क्या कहूं मंटो की आत्मा से कि उसके इस सवाल का जबाव मेरे पास तो क्या इस्मत आपा के पास भी न होगा।

दरअसल, ये बड़ा ही डरपोक और दब्बू किस्म का समाज है। यहां बखत उसी की है, जो जितना दिमागी से पैदल है। फिर चाहे वो लेखक हो या नेता।

मंटो की आत्मा को यह भी खबर है कि उस पर एक फिल्म तैयार है यहां। इस बात की खुशी उसे भी बहुत है कि लोग उसे पचास साल बीतने के बाद भी शिद्दत से याद करते हैं। उसको खूब पढ़ा और उस पर लिखा भी जा रहा है। लेकिन फिर भी यह दुनिया और समाज बदल क्यों नहीं रहा? कतई कुत्ते की पूंछ जैसा है, टेढ़ा का टेढ़ा।

'यह नहीं बदलने का मंटो साब'। मैं मंटो की आत्मा से कहता हूं। वो खामोश रहती है। थोड़ी हंसी के साथ कहती है कि न बदले मेरा क्या उखाड़ लेगा। मुझे तो जो लिखना था लिख दिया। कह दिया। 'खोल दो' के बाद भी लोग अगर अपनी सोच को नहीं खोलना चाहते तो उनकी मर्जी। पड़े रहें बंद कुएं में। बंद दिमाग और खब्ती विचारों के साथ।

मैं मंटो की आत्मा का दुख समझ सकता हूं। मन में सोतचा हूं- पागल मंटो नहीं, यह समाज ही था।

बुधवार, 9 मई 2018

गर्मी का डर

मनुष्य बड़ा ही डरपोक किस्म का प्राणी है। किसी न किसी बात पर हर वक्त डरा-सहमा सा रहता है। लेकिन 'डर के आगे जीत' होने का दावा भी करता है। हालांकि इस तरह के दावे विज्ञापनों में ही किए जाते, वास्तव में जब डर सामने होता है, तब सारी जीत दस्त बनकर निकल जाती है।

फिलहाल, इन दिनों मनुष्य गर्मी से डरा हुआ है। अभी चार-पांच महीने पहले तक सर्दी से डर हुआ था। थोड़े दिनों बाद जब मानसून शुरू होगा तब बरसात से डरा-डरा घूमेगा। डर को मनुष्य ने अपने व्यवहार में ऐसे शामिल कर लिया है कि नन्हे से कॉकरोच को देखकर भी विकट डर जाता है।

जब से मनुष्य ने यह सुना है कि इस बार गर्मी पेलके पड़ेगी, बस डर गया है। खुद को गर्मी से बचाए रखने के उपाय यूट्यूब पर देख-खोज रहा है। एक-दूसरे को गर्मी से बचाव के नुस्खे भी सुझा रहा है। फिर भी, गर्मी को गरियाने में लगा पड़ा है।

इस भले मनुष्य से यह पूछा जाए कि गर्मी को गरिया कर क्या हासिल हो जाएगा? गर्मी का स्वभाव ही तपाना है, वो तपाएगी ही। किसी के गरियाने या बौखलाने का असर गर्मी पर तो होने से रहा।

यों भी, गर्मी इस दफा कोई पहली बार तो पड़ नहीं रही। हर बार की यही कहानी है। गर्मियों के दिनों में ही पेड़ लगाने, पानी बचाने, प्रकृति से छेड़छाड़ न करने जैसी क्रांतिकारी बातें याद आती हैं। गर्मी के विदा लेते ही सारी बातें हवा में धूल उड़ाती जान पड़ती हैं।

बात-बात पर गाल बजाना मनुष्य का जन्म से ही स्वभाव रहा है। प्रकृति की रक्षा के वास्ते जाने कितनी ही कसमें हम हर रोज खाते हैं। पर नतीजा किसी का कुछ नहीं निकलता। जैसे- नेता जनता के समक्ष कसमें खाकर भूल जाते हैं, वैसे ही हम प्रकृति के समक्ष। हिसाब बराबर।
हर साल गर्मियों में पारा 50 पार निकल जाता है। टीवी हल्ला मचाता है। मनुष्य हाय गर्मी, हाय गर्मी चिल्लता है। मगर गर्मी है कि अपनी मर्जी से बाज नहीं आती। सोचने वाली बात है, गर्मी गर्मियों में नहीं पड़ेगी तो कब पड़ेगी?

मुझ जैसों को तो बेसब्री से इंतजार रहता है गर्मी का। हालांकि गर्मियां अब मेरे बचपन जैसी नहीं रहीं तो क्या आनंद तो अब भी उतना ही देती ही है। गर्मी के होने का अहसास ही बचपन की यादों में ले जाता है। बचपन की गर्मियां कितनी बे-फिक्र थीं। नानी का घर था। पास में घना पेड़ था। दोपहरें यों ही आपस में खेलते बीत जाती थीं। आंगन में पसरी धूप और उसी में खेलने की जिद का भी अपना ही मजा था।

मगर वो समय अब गुजर चुका है पर गर्मियां अपने स्वभाव में अब भी नहीं बदली हैं। हां, लोग जरूर बदल गए हैं। अब लोग गर्मी से घबराते हैं। ज्यादा गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पाते। पेड़ की नहीं एसी की ठंडक ढूंढ़ते हैं।

कितना डरपोक हो गया है मनुष्य न। गर्मी से डरता है।

मंगलवार, 1 मई 2018

लाल किला बिक थोड़े न रहा है

बात बहुत बड़ी नहीं, बस इतनी-सी है। कि, सरकार लाल किले की देख-भाल का जिम्मा एक निजी ग्रुप को सौंप रही है। तो क्या...! सौंपने दीजिए न। जब खुद से नहीं संभल-संवर पा रहा तो निजी ग्रुप ही देखे। इस बहाने लाल किला लाल किला तो नजर आएगा। निजी ग्रुप उसकी साफ-सफाई तो करता रहेगा। रंगाई-पुताई, धुलाई भी साथ-साथ हो जाया करेगी।

अब सरकार के पास इतना वक्त कहां धरा है कि वो देश की धरोहरों की देख-भाल करती फिरे। सरकार खुद की ही देख-भाल कर ले, ये ही बहुत है। आए दिन तो उसे कभी इस तो कभी उस राज्य के चुनावों में बिजी रहना पड़ता है। सरकार या मंत्री लोग चुनाव देखें या धरोहरों को। उनके लिए तो उनकी कुर्सी ही धरोहर है। वे तो उसे ही बचाए रखने में दिन-रात संघर्षरत रहते हैं।

अच्छा ही किया जो सरकार ने लाल किले की साफ-सफाई का अधिकार एक निजी ग्रुप को दे दिया। कम से कम अब वे लाल किले को अपना समझकर तो उसकी देख-रेख करेंगे। अब सब कुछ समय-प्रबंधन के साथ होगा। उम्मीद है, लाल किला का लाल रंग और भी निखर कर आएगा।

मगर उड़ाने वाले तो यह अफवाह उड़ा रहे हैं कि सरकार ने लाल किले को निजी हाथों बेच दिया। उसका सौदा कर दिया। धरोहर की इज्जत को नुकसान पहुंचाया। विश्व में देश का सिर शर्म से झुका दिया। आदि-आदि।

हद है। सरकार भला ऐसा क्यों करेगी। जितना प्यार विपक्ष लाल किला से करता है, उससे कहीं ज्यादा सरकार करती है। धरोहर को कैसे सहेजा जाए, यह सरकार से ज्यादा अच्छा कौन जानता है भला। सरकार के भीतर क्या कम धरोहरें हैं। जिन्हें वो आज भी करीने से सहेजे हुए है।
लाल किला जैसी धरोहर अगर सरकार की प्राथमिकता में नहीं होती तो उसके बारे में वो सोचती ही क्यों। यह बात सरकार भी अच्छे से जानती है कि धरोहर की हिफाजत जितना बेहतरीन तरीके से निजी ग्रुप कर लेगा शायद सरकार न कर पाए। कभी सरकारी दफ्तर और निजी ऑफिस के भीतर जाकर देखिए, फर्क स्वयं पता चल जाएगा।

कल तक लाल किले की चिंता किसी को नहीं थी। आज एक निजी ग्रुप को क्या कह दिया देख-भाल करने के लिए विपक्ष से लेकर बुद्धिजीवि तक यों चीख-चिल्ला रहे हैं मानो हिमालय पर्वत खिसक कर बरेली में शिफ्ट हो गया हो!

लाल किला को बेचने-फेचने की बातें सिर्फ अफवाहें हैं। अफवाहों के न सिर होते हैं न पैर। वे बे-पर ही यहां-वहां उड़ती रहती हैं। अतः अफवाहों पर ध्यान न दें। सरकार की मंशा को गलत न समझें। लाल किला कल भी अपना था। आज भी अपना है। हमेशा अपना ही रहेगा।

बुधवार, 25 अप्रैल 2018

उपवास से उपहास तक

उनके उपवास को उपहास का केंद्र खामखां बनाया गया। जबकि ऐसा किसी इतिहास या कानून की किताब में नहीं लिखा है कि उपवास मतलब नितांत 'भूखा' रहना। पहले या बीच-बीच में थोड़ी-बहुत टूंगा-टांगी चलती है। बंदा उपवास कर रहा है, कोई अपनी जान देने थोड़े न बैठा है। जीवन अनमोल है।

सोशल मीडिया तो झूठ और फोटोशॉप का पुलंदा है। जो धत्तकर्म कहीं नहीं हो सकते वो यहां होते रहते हैं। और, बेहद खुलकर होते हैं। सीन को थोड़ा समझने का प्रयास करें। पहली बात, सोशल मीडिया पर खाने की जो तस्वीर वायरल हो रही है, उसमें छोले-भटूरे नहीं पूरियां-छोले नजर आ रहे हैं। दूसरी बात, उस तस्वीर में अध्य्क्ष महोदय कहीं नहीं हैं। अब पार्टी के कुछ सदस्य बाहर जाकर कुछ खा-पी लेते हैं तो इसमें इतना हंगामा खड़ा करने का क्या मतलब! पेटपूजा से बड़ा कोई कर्म नहीं।

यों भी, यह कुछ घंटे का सांकेतिक उपवास था। सरकार को बस बताना भर था कि 'देखो, दलित हित के नाम पर उपवास हम भी कर सकते हैं।' जरा-सी देर के उपवास के लिए तमाम तरह की फॉर्मिल्टज निभाई जातीं, यह तो कोई अक्लमंदी नहीं होती! आगे जब कभी उन्हें लंबी भूख हड़ताल करनी होगी, तब देखा जाएगा।

हर किसी ने सोशल मीडिया और अखबारों में कथित छोले-भटूरे तो खूब देख लिए किंतु उपवास के पीछे का उद्देश्य समझने की कोशिश ही नहीं की। अमां, इतना आसान नहीं होता जन-हित के लिए सरकार से लड़ना-भिड़ना। धरने पर बैठना। आंदोलन करना। उपवास रखना। हरदम जनता को यह विश्वास दिलाते रहना कि तुम चिंता मत करो। हम मरते दम तक तुम्हारे साथ हैं। ऐसा कहने और करने का साहस केवल जन-नेता के पास ही होता है। और, उन्होंने यह करके भी दिखा दिया। यह क्या कम बड़ी बात रही?

पता नहीं कुछ लोग उनके हर प्रयास को मजाक में क्यों लेते हैं। वे कोई पहले जन-नेता तो हैं नहीं जो उपवास पर बैठे हों। अतीत में ऐसे नेताओं की फौज है जिन्होंने अपना राजनीतिक करियर ही उपवास के सहारे चमकाया है। उनमें से कोई सीएम बना बैठा है तो कोई मंत्री।

सामाजिक जीवन में भले ही न हों पर राजनीतिक जीवन में उपवास के अनेक लाभ हैं। सीधे शब्दों में कहूं तो बड़ा और मशहूर नेता बनने का रास्ता उपवास की गली में से होकर ही निकलता है। वो नेता ही किया जो अपनी जनता के हितों की खातिर कुछ देर भूखा न रह पाए। या दलित के घर खाना खाने न जाए!

अंदर ही अंदर मैं भी उनकी सांकेतिक भूख हड़ताल से प्रभावित हुआ हूं। मेरा भी दिल करने लगा है कि किसी दिन किसी सोशल मुद्दे पर मैं भी उपवास पर बैठूं। गोटी अगर फिट बैठ गई तो लेखक से नेता बनने की संभावनाएं किसी भी पॉलिटिकल पार्टी में तलाश लूंगा। जन-हित के वास्ते जितने काम मैं नेता बनकर कर सकता हूं, लेखक बने रहकर नहीं कर पाऊंगा। लेखक की इस दुनिया में सुनता ही कौन है! खुद की बीवी तक न सुनती।

भले ही उनके उपवास का सोशल मीडिया पर उपहास उड़ा पर कदम उन्होंने पीछे नहीं हटाए हैं। सरकार से 2019 में दो-दो हाथ करने की तैयारी में दिख रहे हैं। अच्छा है। बहुत अच्छा है। करें। मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।

तंज कसने वालो से मैं कहना चाहता हूं, छोले-भटूरे इतना बुरा आइटम नहीं कि आप उपहास उड़ाएं। बड़ा ही मस्त धंधा है। सही बताऊं, अगर मैं ज्यादा न पढ़ा होता तो आज निश्चित ही अपने शहर में मेरा भी छोले-भटूरे का ठेला होता। जितना मैं नौकरी कर कमा पा रहा हूं, इससे दोगुना छोले-भटूरे का ठेला लगा कर कमा लिया होता अब तक। जिंदगी चैन से गुजर रही होती।

अपने देश में हर टाइप का धंधा मंद हो सकता है पर खाने-पीने का कभी नहीं। बड़े-बड़े भूखड़ पड़े हैं यहां। खाने-पीने का फ्यूचर हमेशा ही ब्राइट है अपने देश में।

लोगों का क्या है वो तो कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं। अभी उन्होंने उनके उपवास को टारगेट किया कल को पीएम के किसी भाषण पर जोक बनाने लग जाएंगे। सोशल मीडिया के अपने चोचले हैं। अच्छा खासा उनका उपवास चल रहा था अगर सोशल मीडिया पर इसका उपहास न उड़ाया गया होता।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह उनका पहला उपवास था। पहले कदम में थोड़ी-बहुत गलतियां तो हो ही जाती हैं। परफेक्ट तो यहां कंप्यूटर भी न होता शिरिमानजी।

उपहास उड़ाने वाले खुद जरा आधा घंटा भूखा रहकर तो देख लें। कसम से भीतर तक के टांके ढीले न हो जाएं तो जो कहें वो हारने को तैयार हूं।
पॉपुलर नेता बनने के लिए ये सब तो करना पड़ेगा। अभी उन्होंने उपवास किया है, हो सकता है, कल को जन-हित की खातिर वनवास पर भी निकल जाएं। इरादे मजबूत होने चाहिए बाकी समय इतिहास लिखता रहता है। उनके उपवास ने भी कम बड़ा इतिहास नहीं रचा है! मानिए तो सही।

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

कैशलैस होइए, क्या समस्या है

जब 'पैसा हाथ का मैल है' तो 'एटीएम में कैश नहीं है' को लेकर इतना फिक्रमंद क्यों होना महाराज? नहीं है तो नहीं है। समझदारी तो इसमें है कि जो चीज नहीं है, काम उसके वगैर चलाया जाए। लेकिन नहीं...।
लगा पड़ा है हर कोई सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक कभी सरकार तो कभी बैंक को गरियाने में। गरियाते रहिए। गरियाने से न तो कैश एटीएम में भर जाएगा। न सरकार नतमस्तक होकर अपनी जेब से पैसा निकालकर आपके हाथ में धर देगी।

जबकि प्रधानमंत्री जी कितनी ही दफा हमसे कैशलैस होने का आह्वान कर चुके हैं। कितनी ही तरह की एप्स मौजूद हैं पैसे के लेन-देन के लिए। एक प्रकार से बैंक ही मोबाइल पर आ गया है। अब ज्यादा जरूरत न बैंकों के चक्कर काटने की रही, न कैश को जेबों में रखने की। लेकिन फिर भी लोग एटीएम और कैश के प्रति अपना मोह त्यागना नहीं चाहते।
कैशलैस होने के अपने फायदे हैं। सबसे बड़ा फायदा तो यही है कि जेब भारी-भरकम पर्स के बोझ से मुक्त रहती है। जेब कटने का खतरा भी न के बराबर रहता है। प्लास्टिक मनी से पैसा चुकाते वक्त चार लोगों की निगाह आप पर रहती है। सोसाइटी में आपका मान-सम्मान बढ़ता है।
अब तो कुछ एप्स से पेमेंट करने पर अच्छा-खासा 'कैश-बैक' भी मिलने लगा है। जेब में क्रेडिट कार्ड का होना खुद में कितना आत्मविश्वास भर देता है। इसे दिल से महसूस कीजिए।

न्यू इंडिया में रहना है तो कैश और एटीएम का मोह तो छोड़ना होगा। आदत तो डालने से डलती है जनाब। मुझे ही देखिए न। जेब में कैश होने के बावजूद पत्नी से साफ कह देता हूं पैसे नहीं हैं। जब भी कोई रिश्तेदार घर आने का मन बनाता है तो उनसे कह देता हूं कार्ड साथ में लेते आइएगा। बाहर नकदी की समस्या विकट है।

चाहे दूध वाला हो या सब्जी वाला सबको पेटीएम ही करता हूं। कैश का अपने साथ कोई रगड़ा नहीं। सिर्फ कहने या विज्ञापन के दिखाए जाने से ही थोड़े न बन जाएंगे हम न्यू या डिजिटल इंडिया। उस रूप में खुद को ढालना तो पड़ेगा ही न।

यकीन मानिए, इस कैश-वैश, एटीएम-फेटीएम में कुछ नहीं रखा। जितना जल्दी हो खुद को कैशलैस कर लीजिए। कैश के झंझट से मुक्ति पाइए। समय से दो कदम आगे चलने में ही भलाई है। कब तक यथास्थितिवाद में जीते रहेंगे महाराज।

मैं तो उस कल्पना भर से ही प्रफुल्लित हो जाता जब मुझे पूरा इंडिया कैशलैस नजर आता है। यों लगता है मानो किसी दूसरे ही संसार में आ गया हूं। कितना दिलचस्प होगा न कि एक भिखारी मुझसे कैशलैस भीख मांगे। या एक जूस वाला मुझे कैशलैस जूस पिलाए। इंडिया ऐसे ही तो बदलेगा। सरकार या बैंक को गरिया लेने से मन की भड़ास जरूर निकल जाएगी मगर कैश फिर भी हाथ-पल्ले न पड़ेगा।

तो क्यों न कैशलैस ही हुआ जाए। क्या समस्या है।

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

आतंकवादी नहीं हैं मच्छर

आजकल मुझे मच्छरों से पीड़ित लोग बहुत मिल रहे हैं। हर किसी की जुबान पर बस यही शिकायत है- 'मच्छरों ने आतंक मचा रखा है।' तो क्या मच्छर आतंकवादी हो गए हैं? नहीं। मैं मच्छरों की तुलना आतंक या आतंकवादी से करने के सख्त खिलाफ हूं। यह एक निरही जीव को बदनाम करने की कुत्सित साजिश है।

मैं इस बात की पूर्ण जिम्मेदारी लेने को तैयार हूं कि मच्छर कभी आतंक मचा ही नहीं सकते। आतंक न तो मच्छरों के स्वभाव में है न ही उनका शौक। यह मैं इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि मेरा उनका साथ 24x7 का है। न वे मुझसे एक पल को दूर रह सकते हैं न मैं उनसे।

सिर्फ हल्का-सा काट भर लेने के अतिरिक्त मच्छर कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। ईश्वर ने डंक उन्हें दिए ही इस बात के लिए हैं ताकि वे उनके माध्यम से खुद का दाना-पानी ले सकें। क्या हम मच्छरों के पेट की खातिर अपना थोड़ा-सा खून भी नहीं दे सकते? हे! मनुष्य, इतना भी स्वार्थी न बन कि एक नन्हे से जीव को जीवन भी न दे सके। यों भी बेचारे मच्छर की जिंदगी होती ही कितनी-सी है। बामुश्किल दस-पन्द्रह दिन।

मेरा ही खून दिन भर में जाने कितनी बार मच्छर पी लेते हैं किंतु मैंने न तो कभी बुरा माना न कभी शहर के डीएम साहब से शिकायत की। पी लेते हैं तो पी लें। इतने बड़े शरीर से चींटी बराबर खून अगर निकल भी जाएगा तो मेरा क्या चला जाएगा। जरूरतमंद को खून देना शास्त्रों में पुण्य का काम बताया गया है।

न जाने क्यों हम इंसान पुण्य कमाने से घबराते हैं। जबकि सबको पता है खाली हाथ आए थे, खाली हाथ ही जाना है। फिर भी...!

मच्छरों का वर्चस्व सर चढ़कर बोल रहा है। जमीन से लेकर जहाज तक में उनका रुतबा कायम है। अभी खबर पढ़ी कि एक विमान में मच्छर के काट लेने से अंदर विकट अप्रिय स्थिति बन गई। एयर-होस्टेस ने तो यात्री से यह तक कह डाला- 'हर कहीं हैं मच्छर। तुम देश बदल लो।'

मच्छरों से पार पाना फिलहाल असंभव-सा जान पड़ता है। लेकिन मच्छर आतंकवादी नहीं हैं।

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

नाम में कुछ न रखा

तय किया है कि मैं अपना नाम बदलूंगा! यह नाम अब मुझे जमता नहीं। न तो मेरे नाम में फिल्मी फील है न साहित्यिक प्रभाव। जब भी कोई मेरा नाम पुकारता है, लगता है, शुष्क नदी में पत्थर फेंक रहा हो! पता नहीं, क्या और क्यों सोचकर मेरे घर वालों ने मेरा यह नाम रख दिया।

बहुत अच्छे से याद है, जब क्लास में टीचर मुझे मेरे नाम से बुलाया करते तो सारे दोस्त मुझ पर हंसा करते थे। मजाक उड़ाते हुए कहते- कभी टाइम निकालकर दो-चार फूल हमारी बगिया में भी लगा जाना यार। कसम से उस वक़्त इतनी आक्रमक टाइप फील आती थी कि बस कुछ पूछिए मत। मन मसोस और मुट्ठी भिंच कर रह जाता था। लड़-भिड़ इसलिए नहीं सकता था क्योंकि मेरी गिनती क्लास के चरित्रवान स्टूडेंट्स में हुआ करती थी।

वैसे, मेरा चरित्रवान होना उनका कोरा भ्रम ही था। जबकि चरित्र से मेरा नाता दूर-दूर तक न तब था न अब है।

मैं अपने नाम के साथ कुछ ऐसा जोड़ना चाहता हूं ताकि भीड़ से अलग दिखूं। नाम से कुछ फेम तो कुछ बदनामी भी मिले। बदनामी से मैं डरता नहीं। क्योंकि लेखक आधा बदनाम ही होता है।

सोच रहा हूं, मैं भी अपने नाम के बीच में 'राम जी', 'शिव जी', 'गणेश जी', 'टकला', 'लंगड़ा', 'कबाड़ी', 'भूरा' आदि उपनाम लगा लूं। ये सभी नाम हिट हैं। और, आसानी से किसी की भी जुबान पर चढ़ जाने के लिए पर्याप्त हैं।

कोशिश मेरी यही रहेगी कि मेरे नाम पर थोड़ा सियासी बवाल भी हो। मेरे 'उपनाम' की प्रासंगिकता या अप्रासंगिकता पर नेता और बुद्धजीवि लोग आपस में बहस करें। मेरे उपनाम से जुड़ा इतिहास खंगाला जाए। सोशल मीडिया पर मेरे 'उपनाम' के स्क्रीन या फोटो-शॉप्ड लगे जाएं।
इससे मुझे और मेरे नाम दोनों को समान फायदा मिलेगा। साथ ही, इस अवधारणा पर लोगों का विश्वास मजूबत होगा कि नाम में कुछ न रखा। कभी भी कैसे भी इस्तेमाल कर लो।

मैं तो कहता हूं, एक मुझे ही नहीं हर किसी को अपने नाम के साथ कुछ-न-कुछ खिलवाड़ करते रहना चाहिए। इससे खुद के साथ-साथ कई लोगों का मन लगा रहता है।

बदनाम होकर नाम कमाने का चार्म ही कुछ अलग है बॉस।

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

लोटावाद की जय

सिवाय 'लोटावाद' को छोड़कर दुनिया के किसी भी वाद में मेरा रत्तीभर विश्वास नहीं। बाकी वादों के साथ अपनी-अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताएं हैं लेकिन लोटावाद के साथ ऐसा कुछ भी नहीं। यह वाद एकदम स्वतंत्र है।

हालांकि लोग ऐसा मानेंगे नहीं लेकिन अपनी-अपनी लाइफ में थोड़े-बहुत लोटे तो हम सभी हैं। जहां सुविधा या निजी हित देखें हैं, वहां लुढ़के भी हैं। सफलता का पूरा स्वाद केवल वही लोग चख पाते हैं, जिन्होंने लुढ़कने को अपने जीवन का मंत्र बनाया हुआ है।

खामखां के आदर्शों से दिल को सुकून तो अवश्य मिल सकता है किंतु पेट नहीं भरा जा सकता। पेट भरने के लिए लोटा तो बनना ही पड़ेगा।
लुढ़काऊपन लोटे में स्वभाविक है, बनावटी नहीं। जिस भी दिशा में चाहता है वो लुढ़क सकता है। लोटे के लुढ़कने पर किसी का जोर नहीं। यही वजह है कि लोटावादी अपने लोटावाद के साथ ज्यादा सहज रह पाते हैं। जैसे मैं।

दुनिया में जितने भी किस्म के वाद हैं, हर वाद अपने साथ किसी न किसी वैचारिक मजबूरी को ढोह रहा है। वैचारिक मजबूरियां तब अधिक बोझप्रद जान पड़ती हैं जब उन्हें जबरन थोपने की कोशिश की जाती है। आजकल यही हो रहा है। अपने-अपने वाद में यकीन रखने वाले वादी पूरी मुस्तैदी से लगे हैं दूसरे के वाद को खारिज करने में। उनके वाद ने उन्हें लोटा बना रखा है लेकिन वे यह मानेंगे थोड़े ही।

मगर लोटा-प्रेमी मस्त हैं अपने लोटावाद के साथ। उन्हें किसी के वाद से कोई मतलब नहीं। न उनकी किसी के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता है न वाद की मजबूरी। उनका पूरा ध्यान लुढ़कने में केंद्रित रहता है। जिसे वे अच्छे से निभा रहे हैं।

मुझे भी लोटावाद एक आदर्श वाद लगता है। इसीलिए हर किस्म के वाद से मैं खुद को दूर रखता हूं। चूंकि मुझे- अपनी सुविधानुसार- लुढ़कना पसंद है इसलिए लोटों में मेरा विश्वास गहन है।

समाज और दुनिया को समझने के लिए आपको लोटा बनना ही पड़ेगा। जब तक आप लुढ़केंगे नहीं, जान ही नहीं पाएंगे कि सयाने किस एंगल की ओर झुके हुए हैं।

ये वाद-फाद सब ऊपरी दिखवे हैं, असली मकसद है अपने काम का निकलना। काम निकालने के लिए इंसान किसी भी हद तक जा सकता है। वादवादी तो अपने-अपने वादों को खुद पर इसलिए ढो रहे हैं ताकि समाज की सहानुभूति जुटा सकें। नादान हैं।

अगर खुद की प्रासंगिकता को बचाए रखना है तो वैचारिक वादों से ध्यान हटाकर लोटावादी बनिए। जहां मतलब निकलता हुआ दिखे बस वहीं लोट जाइए। दुनिया क्या कहेगी, इसकी फिक्र दुनिया वालों पर छोड़िए।

लुढ़कते लोटावाद को अपने जीवन का अंतिम सत्य मानकर चलिए। दुनिया आपके कदमों में न हो तो मेरा नाम बदल देना।

आइए, खुद पर हंसा जाए

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हम खुद पर हंसने से कतराते हैं। हां, दूसरों पर हंसने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते। दूसरों पर हंसना हमें अपनी 'उपलब्धि' नजर आता है। कुछ चेहरे ऐसे भी होते हैं जिन्हें देखकर यह सोचना पड़ता है कि आखिर बार वे कब और कितना हंसे होंगे? एक अजीब टाइप की गंभीरता वे अपने चेहरे पर धरे रहते हैं। मानो, अपनी गंभीरता के दम पर शांति का नोबेल जीत लेने की तमन्ना रखते हों!

लेकिन वो लोग सबसे खतरनाक होते हैं जो अपनी हंसी हंसते और दूसरे की हंसी रोते हैं। इन पर हंसने का आप दुःसाहस भी नहीं कर सकते।
इतिहास गवाह है, दुर्योधन अपनी हंसी हंसता और दूसरे की हंसी रोता था। हिटलर कब हंसता था यह खुद उसको भी मालूम न रहता होगा!
इनसे इतर, चार्ली चैपलिन ने तो खैर हंसते-हंसाते ही अपनी जिंदगी गुजार दी। जॉनी वॉकर कभी उधार की हंसी नहीं हंसे। केश्टो मुखर्जी तो अपने चेहरे के चाप से ही हमें उन पर हंसने को मजबूर कर देते थे। लगभग ऐसा ही हाल मिस्टर बीन का है। उनकी शक्ल देखते ही हंसी आ जाए।

हंसी एक नायाब अस्त्र है खुद और दूसरों को मानसिक रूप से जवान रखने का। यों, हंसते तो हम सभी हैं पर अपने पर हंसी गई हंसी का कोई मुकाबला नहीं।

इसीलिए तो मेरी हरदम कोशिश यही रहती है कि मैं ज्यादा से ज्यादा खुद पर ही हंसूं। खुद पर कटाक्ष करूं। खुद की खिंचाई करूं। खुद की बेवकूफियों को केंद्र में रख खुद पर तंज कसूं। आखिर पता तो चले कि मुझमें खुद पर हंसने की कितनी कुव्वत है।

असली सुख तो मुझे तब हासिल होता है, जब लोग मुझ पर हंसकर खुश होते हैं। उनकी खुशी मेरे लिए मायने रखती है। वरना, भाग-दौड़ भरी जिंदगी में किसके पास इतना समय है कि वो किसी पर हंसकर खुश होए। खुशी और हंसी से तो लोग ऐसे दूर भागने लगे हैं जैसे बिल्ली को देखकर चूहा।

दिल से निकली हंसी की बात ही कुछ और है। पर कुछ लोग दिल से न हंस हंसने के लिए लॉफ्टर क्लब का सहारा लेते हैं। लॉफ्टर क्लबों की हंसी वास्तविक नहीं कृत्रिम होती हैं। वहां खुद से हंसा नहीं जाता, जबरन हंसाया जाता है।

न न मुझे उधार की ऐसी हंसी कतई स्वीकार नहीं। हंसने के लिए किसी का मुंह ताकने से बेहतर है कि खुद ही खुद पर हंस लें। किसी से शिकायत भी नहीं रहेगी।

बे-अक्ल हैं वे लोग जो मूर्खों पर गुसाते हैं। जबकि मूर्ख तो हंसी का सबसे उत्तम वाहक हैं। वे न हों तो लोग शायद हंस ही न पाएं! इसीलिए तो मुझे अपनी बेवकूफी पर गुस्सा नहीं, हंसी आती है। मैं चाहता भी यही हूं कि लोग मुझे पर हंसें ताकि हमारे दरमियान हंसी का कारोबार चलता रहे।

सोमवार, 9 अप्रैल 2018

मच्छर हैं सदा के लिए

'जियो और जीने दो' में मेरा विश्वास बचपन से है। अपनी तरफ से मेरी पूरी कोशिश रहती है- मैं न किसी को सताऊं, न मारूं, न दबाऊं। खुद भी सुकून की जिंदगी काटूं, दूसरे को भी काटने दूं। क्योंकि जीवन अनमोल है।

इसीलिए मैंने मच्छरों को मारना, उड़ाना, भागना कतई बंद कर दिया है। कमरे में विकट मच्छर होने के बावजूद न मैं कॉइल जलाता हूं न रैकेट ही चलाता हूं। उन्हें इत्मिनान से विचरण करने देता हूं। जहां जिधर भी बैठना चाहें बैठे रहने देता हूं। अब तो कमरे से मैंने सीलिंग फैन भी उखड़वा दिया है। हालांकि इस मुद्दे पर पत्नी से भीषण बहस कई दफा हो चुकी है मगर मैं अपने इरादे पर कायम हूं। क्योंकि जैसे मेरा जीवन अनमोल है वैसे ही मच्छरों का भी।

मच्छरों के प्रति हम बेहद नकारात्मक नजरिया रखते हैं। हर वक्त उनका विनाश करने का ही प्लान बनाते रहते हैं। अब तो सरकारें भी मच्छरों के अस्तित्व पर सख्त हो गई हैं। विडंबना देखिए, सरकार मधुमक्खी पालन पर तो जोर देती है किंतु मच्छर पालन पर गोल रहती है। क्या यह मच्छर प्रजाति का अपमान नहीं? जबकि मच्छर से कहीं ज्यादा नुकसान मधुमक्खी करती है। जिन्हें मधुमक्खी ने काटा हो, वे उस असहनीय पीड़ा को बेहतर समझ सकते हैं।

इंसान के आक्रामक व्यहवार को देखते हुए मच्छरों ने भी खुद को बदल लिया है। वे भी ढीठ हो चले हैं। इंसान कितनी ही जुगत कर ले उन्हें भगाने या मारने की अब न वे भगाते हैं न मरते। आलम यह है, उन पर किसी हानिकारक कॉइल, दवा, इस्प्रे, रेपिलेंट का भी कोई असर नहीं होता। वे धड़ल्ले से हमें काट रहे हैं। और अपना पेट भर रहे हैं।

देख रहा हूं, जिन मच्छरों से प्रायः मैं कटवाता रहता हूं, वे सेहत में बड़े बलशाली हैं। खूब मोटे-ताजा। किसी भी खाए-पीए मच्छर को दीवार पर बैठे देखता हूं, मेरा दिल अंदर से खासा गर्व फील करता है कि मेरा खून किसी के तो काम आ रहा। इंसान को खून पिलाने से कहीं बेहतर समझूंगा मच्छर को खून पिलाना। कम से कम वो मेरा एहसान तो मानेगा।

मैं सबकुछ सह सकता हूं लेकिन मच्छरों के प्रति बेवफाई बर्दाश्त नहीं कर सकता। चाहे कोई हो। मैं मच्छरों को यों बेमौत मारे जाने के सख्त खिलाफ हूं। मच्छर की उम्र यों भी 10-12 दिन की ही तो होती है। क्यों उसे उतने दिन सुकून से जीने दिया जाए। हमें किसी की भी जान लेने का लीगल अधिकार नहीं। नहीं तो हममें और जानवर में फर्क ही क्या रह जाएगा।

सोच रहा हूं, अपनी बची-खुची जिंदगी मच्छरों को बचाने, उनके हितों की रक्षा में खर्च कर दूं। इंसानों के साथ सहानुभूति जताने के हश्र उपेक्षा के रूप में ही मिला है मुझे। क्यों न अब मच्छरों के जीवन को ही बचाया जाए।

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

निजता का लीक होना

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी कभी था। अब सोशल मीडिया का प्राणी है। जागने से लेकर सोने तक के सारे काम अब वो सोशल मीडिया पर 'ही' करता है। उसकी उंगलियों को तब तक चैन नहीं पड़ता जब तक वो उससे छोटी से छोटी बात का स्टेटस उसके फेसबुक पर डलवा नहीं लेतीं।

सोशल मीडिया पर किसी का किसी से कुछ भी छिपा नहीं है। हर कोई हर एक के बारे में उसकी पसंद, उसके टहलने-घुमने का समय, उसने क्या खाया, क्या पचाया, कब किससे कहां मिला सब जानता है। आलम यह है कि दो पड़ोसी आपस में एक-दूसरे को न जानते हों, न कभी मिले हों पर सोशल मीडिया पर सारी औपचारिकताएं निभा लेते हैं। व्यक्तिगत रूप से मिलना अब बोझ टाइप मामला लगने लगा है।

इतना कुछ सोशल मीडिया पर डालते रहने पर कभी-कभी वो चीजें भी यहां आ लेती हैं जिन्हें नहीं आना चाहिए। निजता में खलल पड़ने जैसा मामला हो जाता है। निजता में खलल पड़ते ही लिकिंग का दौर शुरू हो जाता है। न केवल सोशल मीडिया, बाहर पर खूब हंगामा मचता है।
जिनका डाटा लीक होता है वो तो शोर मचाते हैं ही, वो लोग भी खूब उछल-कूद करते हैं जिन्हें इस मसले से न लेना एक न देना दो होता है। बहती गंगा में भला कौन हाथ नहीं धोना चाहेगा।

डाटा लीक के मुद्दे पर जितना राजनीतिक दल आपस में मुंह-जोरी कर रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा बुद्धिजीवि सुलग रहे हैं। ये सारा सीन घटित हो सोशल मीडिया पर ही रहा है। हालांकि हमाम में नंगे सभी हैं पर स्वीकार कोई नहीं करना चाहता। निजता पर बहसबाजी चल अवश्य रही है पर छींकने, खंखारने की पोस्टें और पाउट बनाने की सेल्फियां फिर भी फेसबुक पर छाई हुई हैं। इनमें कहीं कोई कमी नहीं आई है।

लोग इतनी-सी बात नहीं समझते कि सोशल मीडिया या फेसबुक पर हमारा कुछ भी निजी नहीं है। सबकुछ पब्लिक डोमेन है। हमने खुद ही सबको यह अधिकार दे रखा है कि 'आओ, हमारा कुछ भी लीक कर जाओ।'

सोशल मीडिया पर निजता का लीक होने भी 'बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा' टाइप मामला है। यहां जिसकी निजता सबसे अधिक लीक हुई है, वो रात भर में सेलिब्रिटी बन गया। मसला यह नहीं है कि क्या लीक हुआ, सुकून इस बात का है कि जो लीक हुआ चलो अच्छा ही हुआ। घर बैठे मिला फेम भला कौन नहीं लेना चाहेगा!

सौ बात की एक बात ये है पियारे कि निजताएं कितनी भी क्यों न लीक हो जाएं लेकिन हम सोशल मीडिया या फेसबुक का साथ नहीं छोड़ने वाले। चूंकि लिकिंग का मामला अभी नया-नया है तो हल्ला कट भी रहा है, जैसे-जैसे लीकता के मामले पुराने पड़ने लगेंगे सब भूल जाएंगे। कुछ दिनों बाद लोग खुद ही कहते मिलेंगे- जैसे पैसा हाथ का मैल है, उसी तरह निजता का लीक होने सोशल मीडिया का मैल है। लेकिन यह मैल डिजिटल है अतः लोगों से सध जाएगा।

फिर भी, आप अपनी निजता के लीक होने की चिंताएं करना चाहते हैं तो शौक से करें। आखिर दिमाग है आपका।

शनिवार, 31 मार्च 2018

सोशल मीडिया के मूर्ख

पत्नी मुझे सोशल मीडिया का मूर्ख कहती है। पत्नी है। सच ही कहती होगी! यों भी, पत्नियां अपने पतियों के बारे में 'झूठ' कहती कब हैं! खुद के बारे में पत्नी के कहे का पहले कभी बुरा नहीं माना तो अब क्या मानूंगा! यह क्या कम बड़ी बात है कि पत्नी मेरे बारे में 'कुछ कहती' है। 'सही' कहती है या 'गलत'; यह अलहदा बहस का मुद्दा हो सकता है। मगर मैं बहस कभी नहीं करना चाहूंगा। पत्नी के कहे पर पति को बहस कभी करनी चाहिए भी नहीं। बहस बेलन में तब्दील होते देर ही कितनी लगती है।

जी हां, मुझे यह स्वीकार करने में रत्तीभर एतराज नहीं कि मैं सोशल मीडिया का मूर्ख हूं। जिनके लिए होगा लेकिन मेरे लिए मूर्ख होना न तो पाप है न शर्मिंदा होने का कोई कारण। खुशनसीब होते हैं वो जिनमें मूर्खता जन्मजात होती है। मुझमें है, इस बात का मुझे गर्व है।

एक मैं ही क्यों सोशल मीडिया पर मौजूद हर शख्स किसी न किसी लेबल पर मूर्ख ही है। अपनी मूर्खता का प्रमाण वो अक्सर अपनी पोस्टों से देता रहता है। कुछ मूर्ख तो इतने महान हैं कि वे 24x7 फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से समाज-दुनिया में क्रांति करने का जोर लगाते रहते हैं। पर क्रांति है की होना तो दूर, उनके आस-पास भी नहीं फटकती। क्रांति कोई लड्डू-पेड़ा थोड़े ही है कि खाया और हो गई।

सोशल मीडिया पर मूर्खता दर्शाने का अपना आनंद है। किसी भी छोटे से छोटे मुद्दे पर ट्रॉलिंग का लेबल चढ़ा कर उसे एकाध दिन खूब भुनाया जा सकता है। जिसे देखो वो ही बहती गंगा में हाथ धोने आ जाता है। आनंद तो वे लोग भी खूब लेते हैं जो अक्सर ट्रोलिंग पर लंबा-चौड़ा भाषण देते पाए जाते हैं।

दूसरे की मूर्खता पर हंसना सबसे आसान होता है बा-मुकाबले अपनी मूर्खता पर हंसने के।

मैं तो कहता हूं, सोशल मीडिया की गाड़ी चल ही हम जैसे सोशल मूर्खों के कारण रही है। अगर हम अपनी मूर्खताओं को जग-जाहिर न करें तो न यहां कोई हंसे न मुस्कुराए। सब बुद्विजीवियों की तरह या तो माथे पर बल डाले बैठे रहें या फिर किसी गंभीर विमार्श में अपनी खोपड़ी खपाते रहें। वो तो बुद्विजीवियों ने सोशल मीडिया पर अपना कब्जा जमा रखा है वरना यह प्लेटफॉर्म उनके लिए है ही नहीं। वे तो किताबों के पन्नों पर ही चंगे लगते हैं।

जो करते हों उनकी वे जाने पर मैं सोशल मीडिया पर जरा भी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करता। यह वो जगह है ही नहीं जहां बुद्धि को खर्च किया जाए। यह तो नितांत मनोरंजन की जगह है। जहां आप अपनी निजताओं का त्याग कर सुकून भरी सांस ले सकते हैं। अपने खान-पान से लेकर सोने-जागने तक के सिलसिले को लिख अपनी वॉल भर सकते हैं। तिस पर भी आप जुकरबर्ग को सिर्फ इसलिए कोसते रहें कि उसने आपकी निजता का ख्याल नहीं रखा, तो महाराज आप बहुत बड़े वाले हैं। अपनी निजता अपने हाथ। जुकरबर्ग ने कोई ठेका थोड़े न लिया हुआ है आपकी निजताओं के सरंक्षण का।

लेकिन मुझ जैसे मूर्ख इन सब बोगस चिंताओं में नहीं पड़ते। हम सोशल मीडिया के मूर्खों का कुछ भी निजी नहीं। सबकुछ पब्लिक है। जो भी जब चाहे हमारी मूर्खताओं का आनंद उठा सकता है।

इसीलिए तो मैं पत्नी के मुझको सोशल मीडिया का मूर्ख कहने का बुरा नहीं मानता। अपने पति की काबिलियत को पत्नी से बेहतर कोई समझ सका है भला! नहीं न...!

तो अपनी मूर्खताओं पर खिझिये नहीं, उन्हें एन्जॉय कीजिए। जैसे मैं करता रहता हूं। सोशल मीडिया का लुत्फ खुद मूर्ख बने लिया ही नहीं जा सकता।

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

बे-फिक्र हूं 31 मार्च के आतंक से

जिन तमाम बातों की फिक्र मैं नहीं करता उनमें से एक 31 मार्च भी है। 31 मार्च को भी मैं वैसे ही बरतता हूं जैसे अन्य तारीखों को। मार्च एंड है तो क्या! कोई हव्वा थोड़े है। मैं तो बस इतना जनता हूं कि मार्च एंड में मुझे अपना कुछ भी क्लोज नहीं करना है। जो जैसा चल रहा है, चलते रहने देना है।

31 मार्च की फिक्र तो वे करें जिनके लंबे-चौड़े बैंक बैलेंस हैं। या फिर वे जिन्हें काले को सफेद में बदलकर खुद को सरकार और इनकम-टैक्स की निगाह में पवित्र दिखाना है।

लेकिन अपने साथ ऐसा कोई रगड़ा नहीं। जो हैसियत बाहर है वही भीतर। महीने का एंड तो छोड़िए, यहां तो जेब का हाजमा दस तारीख तक आते-आते ही गड़बड़ाने लगता है। ख़र्च और महीना कैसे निपट पाता है, मुझसे बेहतर भला कौन जानता होगा। फिर भी, कोई गम और फिक्र नहीं।

लेखक होने का चाहे कोई फायदा मिला हो या नहीं लेकिन इतना फायदा तो मिला ही है कि पूंजी के भंडार नहीं भरे हैं। ज्यादा पूंजी जोड़कर करना भी क्या है! पूंजी को तो यों भी आवारा कहा-माना गया है। वैसे, आवारगी एक धांसू विधा है पर पूंजीगत आवारगी में अपना रत्तीभर विश्वास नहीं।

पैसा हाथ का मैल है। इस मैल का यश पूंजीपतियों को ही मुबारक।
मार्च के महीने में मैंने बहुतों को हड़बड़ाते देखा है। एक अजीब किस्म का डर उन्हें चेहरों पर पढ़ा है। अपने सीए की बटरिंग करते सुना है। टैक्स के झंझटों में इतना उलझे रहते हैं कि अपनी सेहत के समीकरण तक बिगाड़ देते हैं। माना कि मार्च सबसे खर्चीला और टिपिकल महीना है पर हव्वा थोड़े है।

इतना कमाते ही क्यों हो कि हर तरफ की जमा-पूंजी का हिसाब-किताब रखना पड़े। रात को तिजोरी में ताला डालके सोना पड़े। बैंक से नोट निकालने पर्सनल गनर के साथ जाना पड़े। किताबों में हेरा-फेरी करनी पड़े। अफसरों की जेबें गर्म करनी पड़ें। दिल पर हर वक़्त यह बोझ लदा रहे कि हाय! इतना पैसा कैसे संभाल पाऊंगा?

अमां, कमाई उतनी ही क्यों नहीं करते जितनी जेब गवाही दे। जेब की औकात से बाहर कमाओगे टेंशन तो रहेगी ही महाराज। लेकिन हम कहां मानते हैं। लोग तो लाश का भी सौदा कर जाते हैं यहां।

सुख से हूं कि लेखक हूं। न ऊंची-मोटी कमाई है। न घर में तिजोरी की जगह है न जेब पर अतिरिक्त बोझ। जितना कमा पा रहा हूं, जीवन की गाड़ी टनाटन चल रही है। फकीरी का भी अपना ही आनंद है शिरिमानजी।

सबको मालूम है, साथ कुछ लेकर नहीं जाना। सब जोड़ा-जाड़ा यहीं छोड़ जाना है। फिर भी, आदमी टेंशनग्रस्त है। 31 मार्च की फिक्र में यों दुबला हुआ जा रहा है मानो सबकुछ क्लियर कर वो कोई बहुत बड़ा तीर मार लेगा! सरकार से ईनाम पाएगा! समस्त पाप धो लेगा!

जिन्हें 31 मार्च के लिए फिक्रमंद रहना है, रहें। मैं उनकी फिक्रमंदी के लिए दुआरत हूं।

गुरुवार, 29 मार्च 2018

उनसे भूल हो गई, उनका माफी दई दो...

एक जमाने में उनके 'आंदोलन' खूब चर्चा में रहते थे, आजकल 'माफीनामे' चर्चा में हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जिस दिन वो विरोधी दल के नेता से माफी न मांग रहे हों। कोई दब-छिपकर नहीं, खुलकर माफी मांग रहे हैं। हालांकि उनको इस तरह माफी मांगते देखना अच्छा तो नहीं लग रहा लेकिन सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते। उनके साथ भी लगभग यही सीन बन रहा है।

माफी मांगना उनके लिए न केवल समय मांग है बल्कि राजनीति का तकाजा भी। जीवन में अपने विरोधियों से लड़ने-भिड़ने की भी एक सीमा होती है महाराज। होते हैं कुछ साहसी लोग जो पूरी जिंदगी ही लड़ने में बीता देते हैं। लेकिन अगर माफी मांगकर बीच का रास्ता निकल आए तो माफी इतनी बुरी भी नहीं। वैसे भी, राजनीति में नेता को हर कदम देख-भाल कर उठाना चाहिए। कब, किस मोड़ पर किस पार्टी या नेता का दामन थामना पड़ जाए, इसका विशेष ख्याल रखना पड़ता है।
मैं देख रहा हूं कुछ लोग उनके माफी मांगने से खुश नहीं। फेसबुक, ट्विटर पर अपनी नाराजगी उनसे लगातार व्यक्त भी कर रहे हैं। उनकी ईमानदारी, उनके साहस, उनकी निष्ठा पर सवाल उठा रहे हैं। अपने विरोधियों की तरफ झुका हुआ तक कह रहे हैं।

बड़े नादान हैं लोग। कुछ समझते ही नहीं। यों भी, किसी को सलाह देना बहुत आसान है मगर जब खुद पर पड़ती है तो ऊपर से लेकर नीचे तक के टांके ढीले हो जाते हैं। राजनीति में रहकर विरोधी नेताओं से थोड़ा-बहुत विरोध तो चलता है। मगर विरोध इतना तगड़ा भी न हो कि अगले की लाइफ मुकदमों के झमेले में ही उलझ कर रह जाए।

एकाध मुकदमा हो तो बंदा लड़ भी ले किंतु यहां तो उन पर मुकदमों की लिस्ट खाने के मीनू से भी कहीं अधिक लंबी है। पूरी जिंदगी लड़कर भी चार-पांच फिर भी बाकी रह जाएंगे। तो बेहतर और बीच का रास्ता तो यही है कि एक-एक कर विरोधी नेताओं से माफी मांग ली जाए। कम से कम आगे का राजनीतिक सफर तो सुकून से कटेगा।

बात जहां तक ऊंचे आदर्शों, ईमानदारी, सत्यता आदि की है, ये सब किताबों में ही अच्छी लगती हैं, राजनीतिक और सामाजिक जीवन इसके उलट ही होता है। उलट होना चाहिए भी। इमानदारी के चक्कर में अगर पड़े रहेंगे तो दो वक्त की छोड़िए, एक वक्त की रोटी भी नसीब न होगी महाराज।

मैं नहीं समझता, माफी मांगकर वे कोई पाप कर रहे हैं। बल्कि माफी के आदर्श को समाज के बीच स्थापित कर रहे हैं। बता रहे हैं, शांति और चैन का रास्ता माफी मांग कर ही निकल सकता है। माफी कठोर से कठोर को पिघलाने का माआदा रखती है। माफी मांगकर बंदा जीवन में ऊंचे मानक बना सकता है। माफी मांगकर न केवल राजनीतिक कॅरियर बल्कि नौकरी को जाने से लेकर शादी को टूटने तक से बचाया जा सकता है। शमी यही तो गलती कर रहा है। बीवी से माफी मांग ले तो झगड़ा तुरंत सेट हो जावे। पता नहीं लोगों को अपनी बीवी से माफी मांगने में इतनी शर्म क्यों आती है। एक मैं हूं जो 24x7 अपनी न केवल अपनी बीवी बल्कि जो रास्ते में मिल जाता है उससे बे-बात ही माफी मांग लेता हूं।

सॉरी कहने में कोई एक्स्ट्रा एनर्जी थोड़े न बर्न करनी है।
ऐसा भी कोई है दुनिया में जो माफी न मांग रहा हो! हर कोई अपने-अपने स्तर पर किसी न किसी मसले को लेकर माफी मांग ही रहा है। यह बात अलग है कि माफियों के रंग अलग-अलग हैं। पर माफी तो मांग ही रहे हैं न।

इतिहास किस्म-किस्म के माफीनामों से भरा पड़ा है। सबसे ज्यादा माफीनामे राजनीति के हैं। जिन्होंने माफी नहीं मांगी उनका हश्र या तो दुर्योधन जैसा हुआ या फिर कंस जैसा। रावण भी अगर माफी मांग लेता तो आज बहुतों का आदर्श होता! नहीं क्या?

किसी को हो चाहे न हो पर मुझे तो आदरणीय के माफीनामे पर घणा गर्व है। बल्कि मुझे तो यह सीख हासिल हुई है कि जब, जहां अपना दांव कमजोर पड़ने लगे तुरंत माफी मांग लो। इसी में खुद की भलाई है। हर वक़्त की ऐंठबाजी ठीक न होती पियारे।

और फिर वे माफी ही तो मांग रहे हैं। कोई चोरी-चकारी थोड़े न कर रहे। माफी में शर्मिंदा होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। यह बहती गंगा में हाथ धोने जैसा करम है।

अतीत में की गई भूलें एक-एक कर अब वो सुधार रहे हैं। यह एक अच्छी शुरुआत है। बाकी लोगों का क्या है उनका तो कम ही है कहना।

अभी जिन्होंने उन्हें माफी नहीं दी है, मुझे पूरी उम्मीद है, एक दिन वे भी उन्हें माफी दे ही देंगे। अंत में जीत तो माफी की ही होनी है।

मंगलवार, 27 मार्च 2018

आइए, मूर्तियां लगाएं

पहले मैं मूर्तियों के खिलाफ था। जबकि मुझे नहीं होना चाहिए था। मूर्तियां रहती हैं तो राजनीतिक व सामाजिक दलों को गाहे-बगाहे 'फेम' दिलवाती रहती हैं। पक्षियों के रहने-बैठने का ठिकाना होती हैं। मूर्तियों के नीचे खड़े होकर नारे लगाने और क्रांति करने का हौसला पैदा होता है। मूर्तियां रह-रहकर हमें इतिहास के सबक भी याद दिलाती हैं। कभी-कभार महापुरुषों की मूर्तियों के गले मालाएं डालने से लेकर आयोजन की डोरियां लपेटने के काम भी आती हैं। जब बस नहीं चलता तो कुछ कुंठित लोग मूर्तियां तोड़ते हैं। मूर्तियां तोड़कर वे दूसरे की विचारधारा को धकिया अपनी विचारधारा थोपने की जुगाड़ में रहते हैं।

कुछ दिन पहले मोहल्ले वालों ने चौराहे पर मेरी मूर्ति लगाना तय किया। इस बाबत मुझसे मेरी सहमति भी मांगी गई। किंतु मैंने यह कहते हुए मना करने की कोशिश की कि मेरी मूर्ति लगाने से बेहतर यह होगा कि किसी क्रांतिकारी महापुरुष की मूर्ति लगाई जाए। मगर मोहल्ले वालों को मेरा सुझाव पसंद नहीं आया। वे मेरी ही मूर्ति लगाने पर डटे रहे।

जब मैंने उनसे पूछा कि 'आप लोग मेरी ही मूर्ति लगाने की जिद पर क्यों अड़े हुए हैं?' तो उनका जवाब था- 'आप चूंकि न केवल हमारे मोहल्ले बल्कि शहर के भी बड़े लेखक हैं इस नाते हम चौराहे पर आपकी मूर्ति लगाना चाहते हैं। आपकी मूर्ति हमें सोच, विचार, धैर्य और लेखन का हौसला देती रहेगी।'

अपने प्रति उनके इतने गंभीर विचार जानकर पहले तो मैं खुद पर शर्मिंदा हुआ। फिर उनसे कहा- 'सज्जनों, अमूमन मूर्तियां तो मर चुके लोगों की लगती हैं मैं तो फिलहाल अभी आपके बीच हूं।' तभी एक सज्जन बोल पड़े- 'लेकिन हम यह करिश्मा आपके जीते-जी करना चाहते हैं। आप बस अपनी नाक और गर्दन का नाप दे दीजिए मूर्ति के वास्ते।' नाक और गर्दन का नाप सुनकर मैं थोड़ा चौंका! इतने में उन्हीं सज्जन ने बात को संभालते हुए कहा- 'मूर्ति में दो ही चीजों का खास ख्याल रखना चाहिए। एक- गर्दन, दूसरा- नाक। अप्रिय स्थिति में सबसे अधिक चोट इन्हीं पर पड़ती है।'

खैर, उनके समझाने-बुझाने पर मैंने चौराहे पर अपनी मूर्ति लगाने की इजाजत दे दी। मोहल्लेदारी में ज्यादा भाव खाना ठीक नहीं। सबका साथ में ही तो मेरा विकास संभव है।

लेकिन अभी हाल मूर्तियां तोड़े जाने की खबरों ने मुझे थोड़ा डरा-सा दिया है। मैं अपनी मूर्ति (जोकि अभी बनी भी नहीं है) के बारे में सोचने लगा। कल को यही सब अगर मेरी मूर्ति के साथ हुआ? वैचारिक असहमति रखने वाले किसी सरफिरे ने मेरी भी मूर्ति को तोड़ डाला तो मैं क्या करूंगा? कैसे बचाऊंगा अपनी नाक और गर्दन टूटने से? स्टैच्यू की तरह खड़े बुत कहां अपनी रक्षा खुद कर पाते हैं। जब तक उन्हें बचाने को लोग आते हैं सिरफिरे अपना काम तमाम कर चुके होते हैं।

'तो क्या इस डर से मूर्तियां लगाना छोड़ दिया जाए?' मैंने खुद से ही प्रश्न किया। भीतर से आवाज आई- 'नहीं। कदापि नहीं। मूर्तियां लगना अगर बंद हो जाएंगी तो कितने ही मूर्तिसाज बेरोजगार हो जाएंगे। फिर कलाकार, शिल्पकार कैसे मूर्तियों में अपनी कल्पनाओं के रंग भर पाएंगे। जैसे- रोटी, कपड़ा, मकान और मोबाइल जरूरी है उसी तरह समाज के जीने और अपनी आस्थाओं को बनाए-बचाए रखने के लिए मूर्तियां भी जरूरी हैं।'

वो देश भी कोई देश है महाराज जहां मूर्तियां न हों। चूंकि हम बड़े लोकतंत्र हैं इस नाते मूर्तियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी ज्यादा बनती है। सेक्युलरिज्म क्या होता है यह विरोधियों को हमसे सीखना चाहिए। हम मूर्तियों के प्रति भी एकदम सेक्युलर भाव रखते हैं। हमारे यहां लेनिन से लेकर गांधी, पेरियार से लेकर प्रेमचंद तक की मूर्तियां हैं। जिस तरह चंद सरफिरों ने कुछ मूर्तियों को खंडित किया उसकी हर कोई कड़ी निंदा कर रहा है। कड़ी निंदा करने का अपना असर होता है।

कोई कितना ही बड़ा मूर्तिपूजक या मूर्तिभंजक क्यों न हो मूर्ति के प्रति थोड़ी-बहुत आस्था तो रखता ही है। इसीलिए तो गाहे-बगाहे मूर्तियां बनती और लगती भी रहती हैं।

बहरहाल, मैंने अपना मूर्ति विरोध छोड़ दिया है। मैं दिल से चाहता हूं न सिर्फ मेरी बल्कि आमो-खास की भी मूर्ति लगनी चाहिए। दो-चार कुंठित लोगों के तोड़ भर देने से मूर्तियां लगनी बंद थोड़े न हो जाएंगी। बंद होनी चाहिए भी नहीं।

सोमवार, 26 मार्च 2018

डाटा ही तो था, चोरी हो गया तो क्या!

इससे कहीं अच्छा तो पहले का जमाना था, जब सोशल मीडिया हमारे जीवन में दूर-दूर तलक नहीं था। चैन से खाते थे। सुकून से पीते थे। आराम से सोते थे। जी भरकर एक-दूसरे से घंटों बातें किया करते थे। जीवन में रंग, उमंग, तरंग सबकुछ था। संवेदनशील तब भी थे पर इतने भी नहीं कि भूत का नाम सुनते ही टेंशन में आ जाएं। हनुमान चालीसा पढ़ ली फिर भूत तो क्या उसके फरिश्ते भी पास फटकने की हिम्मत न करते थे!

मगर अब तो पूरा सीन ही बदल लिया है। संवेदनशील इतने हो गए हैं कि एक जरा-सा डाटा चोरी होने पर सोशल मीडिया से लेकर संसद तक कोहराम कटा पड़ा है। उधर ट्विटर पर 'डिलीट फेसबुक' हैशटैग चल रहा है तो इधर नेता लोग आपस में ही लड़े-भिड़े पड़े हैं। बच्चों की तरह एक-दूसरे पर 'मैंने नहीं, इसने किया' टाइप इल्जाम लगा रहे हैं। डाटा चोरी का इतिहास खंगाला जा रहा है। किस कंपनी ने किस पार्टी को चुनावों में कितना फायदा पहुंचाया पर विकट बहस छिड़ी है।

मतलब देश से अन्य सभी समस्याएं दूर हो चुकी हैं। जनता खुशहाली की ओर अग्रसर है। फिलहाल बड़ी और खास समस्या डाटा चोरी की ही है। नेता लोग इसी के समाधान में रात-दिन लगे पड़े हैं। जबकि जुकरबर्ग माफी मांग चुका है।

इतनी सिंपल-सी बात किसी को समझ न आ रही कि डाटा ही तो था चोरी हो गया। इसमें कौन-सा पहाड़ टूट गया महाराज। दुनिया में जाने क्या-क्या चोरी हो रहा है। हर तरफ चोर घात लगाए बैठे हैं। लेकिन फिर भी लोग खुश हैं। मस्ती के साथ जी रहे हैं। उन्हें मालूम है कि चोरी चली गई चीज वापस तो मिलने से रही फिर काहे को मातम मनाना? दो-चार मिनट का अफसोस जताया, छुट्टी!

डाटा कोई पहली दफा तो चुरा है नहीं। महीने, दो महीने में कोई न कोई खबर किसी न किसी के डाटा चुरने की आ ही जाती है। विकिलिक्स ने तो पिछले दिनों कितनी ही बड़ी-बड़ी हस्तियों के डाटा लीक किए। क्या हुआ? कुछ भी नहीं। थोड़े दिन हंगामा कटा फिर सब शांत।

किसी और क्या कहूं; मेरे ही फेसबुक का डाटा कितनी बार चुराया जा चुका है। मगर मैंने तो न कभी जुकरबर्ग से शिकायत की न सरकार से। जरा-जरा से मसलों की शिकायत करने लग जाऊंगा तो आधी जिंदगी तो शिकायतों के हवाले ही हो जाएगी। डाटा चुरना था चुर गया। इस पर अफसोस जतलाकर क्या करना!

देखो जी, यह सोशल प्लेटफॉर्म है। यहां डाटा चोरी होना कोई बड़ी बात नहीं। ऐसे मुद्दों को हल्के में लेना चाहिए।

लोग जब अपना दिल चुरने पर हल्ला नहीं काटते तो डाटा चोरी होने पर जाने क्यों चीखे पड़े हैं? डाटा को दिल की तरह ही ट्रीट करें। चोरी हो भी गया तो क्या; कम से कम किसी के काम तो आया। जितना बांटेगे उतना मिलेगा। इंसानियत का तकाजा भी यही है।

सोमवार, 19 मार्च 2018

लोन लीजिए, लोन लेने में कोई बुराई नहीं

फिलहाल, मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि बैंक से कर्ज (लोन) लेने में कोई बुराई नहीं। बल्कि फायदा ही फायदा है। माशाअल्लाह आप अगर अमीर बंदे है तो दसों उंगलियां घी में। लोन लेके चुकाओ न चुकाओ, कोई न टोकने वाला। लोन लेके विदेश भाग जाओ तो नहले पे दहला। फिर तो मुल्क की पुलिस, सीबीआई, ईडी आदि तरह-तरह की तरकीबें ही निकालती रहेंगी आपको स्वदेश वापस लाने की। जैसे- अभी नीरव मोदी के लिए लगी पड़ी हैं।

हालांकि पुराने जमाने के लोग आज भी ठीक नहीं मानते बैंक क्या किसी से भी कर्जा लेना। वे तो साफ कहते हैं, कर्जा लेके घर बनवाया या गाड़ी खरीदी किस काम का! जैसे- भीख मांगकर अपनी इच्छा पूरी कर ली हो। चूंकि वे आदर्शवादी लोग हैं तो लाजिमी है उन्हें लोन (कर्ज) आदि लेना गया-बीता काम तो लगेगा ही। आज के जमाने की हकीकत यही है कि बिना लोन लिए काम भी तो नहीं चल सकता न। या तो दिली तमन्नाएं पूरी कर लीजिए या फिर मुंह ताकते रहिए। हर किसी के जीवन में जरूरतें इस कदर बढ़ गई हैं। अगला लोन न ले तो क्या करे।

बैंक भी भला कहां कम हैं। लोन देने को यों तैयार बैठे रहते हैं मानो उनकी कोई पुरानी उधारी हो हम पर। एक दिन में कितने बैंकों से कितने एसएमएस आ जाते हैं, हमें खुद ध्यान नहीं रहते।

अच्छा, हर चीज का लोन उपलब्ध है। आप डिमांड तो कीजिए। इधर जब से मोबाइल फोन पर लोन क्या मिलने लगा है, अब तो शायद ही कोई हाथ खाली नजर आता हो, जिसने महंगे से महंगा मोबाइल न पकड़ रखा हो। किश्तों पर अस्सी हजार तक के मोबाइल लोग इतना आसानी से ऐसे खरीद लेते है जैसे साग-सब्जी।

लोन के चलन ने लोगों की जिंदगी को बदलकर रख दिया है।

लोन लेना भी एक सब्जबाग की ही तरह होता है। चीजें जितनी सरल ऊपर से नजर आती हैं भीतर से उतनी ही टेढ़ी होती हैं। बैंकिंग व्यवस्था में लोन की परिभाषा अमीर के लिए कुछ और गरीब के लिए कुछ और है। अमीर हजारों करोड़ का लोन लेके विदेश चंपत हो जाए, मंजूर है। लेकिन गरीब द्वारा दस-पन्द्रहा हजार का लोन न चुका पाने की स्थिति में उसके घर से लेकर कपड़े लत्ते तक जब्त कर लिए जाते हैं।

लोन का सुख भोगने के लिए अमीर होना आवश्यक है। अगर रसूखदार हैं तो बात ही क्या। फिर तो बैंक वाला घर आनकर आपको लोन दे जाएगा। चुकाने के तकादे भी हैसियत देखकर ही किए जाएंगे।

कभी-कभी तो मेरा दिल भी करता है कि मोटा-तगड़ा एक लोन मैं भी ले लूं। लोन का सुख क्या होता है, थोड़ा मैं भी भोग लूं। जब चुकाने की बारी आए तो विदेश भाग लूं। जैसे और लोगों पर बनी हैं मुझ पर भी तरह-तरह की खबरें बनेंगी। चैनलों पर बहसें होंगी। अखबारों में नाम और फोटू छपेगी।

बता दूं, बदनामी से मैं नहीं डरता। बदनामी तो हाथ का मैल है। जो जितना बदनाम है वो उतना ही नाम वाला है। जो सिद्ध-पुरूष लोन लेके विदेश भाग गए, जब वे अपनी बदनामी से कभी न डरे, तो भला मैं ही क्यों डरूं!

लोन भले ही एक कर्ज है। पर इसे लेना हमारा फर्ज है। नहीं तो बैंकों के पास पड़े-पड़े पैसे को घुन नहीं लग जाएगा! घुन न लगे, चूहें न काटे, चोर चुराकर न ले जाए इसीलिए तो बैंक लोगों को लोन देकर थोड़ा हल्का हो लेते हैं।

देखो जी, दुकान हर किसी की चलती रहनी चाहिए। चाहे वो बैंक हो या आम आदमी। लोन लेने में बुराई कोई नहीं। बल्कि खुद की हैसियत में चार चांद ही लगते हैं।

लोन के सहारे ही सही अगर दिल के कुछ अरमान पूरे हो रहे हैं तो कर लीजिए। क्योंकि जिंदगी न मिलेगी दोबारा। जब धरती पर आए हैं तो लोन से लेकर जेल तक का हर अनुभव लीजिए। परिणाम की चिंता कतई न कीजिए। चिंता चिता समान। नीरव मोदी, ललित मोदी, विजय माल्या अपनी-अपनी चिंताओं पर खाक ही तो डाले हुए हैं। और, बेहतर सुख में हैं!

चलिए फिर, लोन लेकर थोड़ा-बहुत फर्ज मैं भी निभा ही लूं। क्यों ठीक है न!

गुरुवार, 15 मार्च 2018

रिस्क से इश्क कीजिए

रिस्क लेने का अपना मजा है। दाल में नमक का स्वाद और दूध में पानी की मात्रा रिस्क लेकर ही समझ आती है। रिस्क लेकर ही पता चलता है कि आपका दिल वाकई मजबूत है या मजबूत करने की गोलियां ले रहे हैं। बिना रिस्क लिए तो आप पत्नी के बनाए खाने की 'बुराई-भलाई' भी नहीं कर सकते। मैं तो यहां तक कहता हूं, नेता बनना लेखक बनने से कहीं अधिक रिस्की है। चाहे तो खुद पर आजमा कर देख लीजिए।

रिस्क लेना क्या होता है यह मार्केटिंग के उस बंदे से पूछिए जो हर रोज अपने माल को बेचने की कोशिश अपनी नौकरी को रिस्क पर रखकर करता है।

इंसान की जाने दीजिए, अब तो जिंदगी भी इतनी सयानी हो चली है, वो साथ उसी का देना पसंद करती है जो रिस्क लेने का बूता रखता हो।
इश्क में भी दिलजलों की अब कोई औकात न रही। कद्र अब उन्हीं आशिकों की है, जो रिस्क के दम पर अपने प्रेम को शादी के मंडप तक निभा ले जाते हैं। लेकिन रिस्क लेने की हिम्मत होनी दो तरफा ही चाहिए। एक तरफा रिस्क बहुत जल्दी फिस्स हो जाता है।

कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो रिस्क लेने को टाइम की बर्बादी समझते हैं। जो और जैसा चल रहा है उसी को आनंद मानते हैं। समंदर में पैर डालने से इसलिए डरते हैं कहीं डूब न जाएं। शेर के मुंह में हाथ देने से इसलिए डरते हैं कहीं वो खा न जाए। और तो और अपने मोबाइल की गैलरी में लॉक इसलिए लगाकर रखते हैं कहीं बीवी के हाथ न पड़ जाए। बताइए, ये तो आलम है। इतना भी रिस्क लेने से अगर भय खाएंगे तो जीवन में क्या अनूठा कर पाएंगे?

रिस्क-विहीन जिंदगी बड़ी बोरिंग होती है। न कोई उत्साह होता है न उमंग। जिंदगी भी सोचती होगी, ये किस बोगस आत्मा में प्रवेश कर गई। मेरा तो बचपन तो यही मानना रहा है कि जिंदगी लंबी भले न ही पर रिस्की अवश्य होनी चाहिए।

इसीलिए तो मेरा प्रयास हमेशा यही रहता है कि मैं निरंतर रिस्क लेता रहूं। रिस्क लेने में एक अजीब किस्म का पागलपन होता है। ठीक वैसा ही जैसा अक्सर 'भाबी जी घर पर हैं' में सक्सेना जी हमें दिखाते रहते हैं। पगलेट टाइप हरकतें रिस्क को और भी आकर्षक बना देती हैं।

रिस्क बोझ नहीं। बल्कि बोझ तो वो सोच है जिसमें रिस्क लेने का दम नहीं होता। रिस्क से मोह पालिए। रिस्क से इश्क कीजिए। रिस्क को अपना खुदा-गवाह बनाइए। फिर देखिए, रिस्क लेना कितना आसान लगने लगेगा।

नेता या व्यापारी लोग अगर रिस्क न लें तो ताउम्र वहीं पड़े रहें जहां से शुरुआत की थी। सड़क से संसद तक की दौड़ बिना रिस्क लिए पूरी हो ही नहीं सकतीं।

सच कहूं तो रिस्क लेने के मामले में नेतागण मेरी प्ररेणा हैं। उन्हीं को देख-देखकर जीवन में जरा-बहुत रिस्क लेना सीख पाया हूं। मौका देखकर चौक मारने का रिस्क नेता से बेहतर कोई दूसरा सीखा ही नहीं सकता।

तो अपने रिस्क के प्रति इश्क का जज्बा बनाए रखिए और जीवन का आनंद लेते रहिए।

मंगलवार, 13 मार्च 2018

क्योंकि मृत्यु ही अंतिम सत्य है

जीवन मिथ्या है। इच्छा भ्रम है। मृत्यु ही अंतिम सत्य है। फिर इच्छा-मृत्यु से क्या घबराना!

यों भी, मृत्यु को समझने का कोई फायदा नहीं। मृत्यु तो एक न एक दिन आनी ही है। वो गाना है न 'जिंदगी तो बेवफा है एक दिन ठुकरएगी...।' तो जो ठुकरा दे उससे मोह पालना बेकार है।

सच बताऊं, मुझे तो बड़ी कोफ्त होती है लोगों की जीवन, मृत्यु, मूर्ति के प्रति भीषण आसक्ति देख-सुनकर।

अभी हाल इच्छा-मृत्यु पर फैसला क्या आया, लोग भिन्न-भिन्न कोणों से चिंतित होते हुए दिखने लगे हैं। अमां, इच्छा-मृत्यु पर क्या चिंतित होना? मृत्यु तो आनी है। चाहे इच्छा से आए या बे-इच्छा। जब भीष्म पितामह मृत्यु से पार न पा पाए तो हम-आप किस खेत की मूली हैं बंधु।

खुदकुशी से कहीं बेहतर विकल्प है इच्छा-मृत्यु। खुदकुशी की अपनी दिक्कतें हैं। हर किसी में इतना साहस होता भी नहीं कि अपनी जान की बाजी फ्री-फंड में लगा दे। जो लगा देते हैं वो 'कायर' हैं। लेकिन इच्छा-मृत्यु का तो सीन ही बिल्कुल अलग है। बस मृत्यु के प्रति आपको अपनी इच्छा जाहिर करनी है। आपको एहसास भी न होगा कि कब में इस दुनिया-ए-फानी से रुखसत हो लिए। न किसी से चिक-चिक न किसी से हुज्जत। अपनी मौत, अपनी मर्जी।

मैंने तो अपनी इच्छा पत्नी को बतला भी दी है कि मुझे मेरे अंत समय में इच्छा-मृत्यु ही चाहिए। मैं किसी का एहसान लेकर मरना नहीं चाहता। न पत्नी से अपने लिए सेवा-टहल करवाना चाहता हूं। न यमराज को कष्ट देना चाहता हूं कि वे धरती पर मुझे लेने आएं। उनकी जान को छत्तीस काम रहते हैं। वे उन्हें निपटाएं। अंततः टाइम उन्हीं का बचना है।

अधिक मशहूर होकर मरना भी कम मुसीबतों से भरा नहीं। लोग इस कदर आस्थावादी हैं कि इधर मशहूर बंदा खिसका नहीं, उधर तुरंत उसकी मूर्ति बनाके खड़ी करी दी। समाज में मूर्तिपूजा का क्या कम बोलबाला है, जो मूर्ति पर मूर्तियां तैयार होती रहती हैं। किसी सरफिरे ने मूर्ति के साथ अगर छेड़खानी या मार-तोड़ कर दी तो अलग झाड़।
इसीलिए जीवन मैंने इस बात का खास ख्याल रखा है कि मशहूर न होने पाऊं।

मैं तो कहता हूं, ये मूर्ति-फूर्ति, जीवन, मोह आदि सब क्षणिक हैं। अंतिम सत्य है मृत्यु ही। अगर इच्छा-मृत्यु है तो सोने पे सुहागा।
इच्छा-मृत्यु का अनुभव मैं भी लेना चाहता हूं। सुख-सुविधा से इतर कुछ डायरेक्ट अनुभव भी जीवन में जरूर लेने चाहिए। ताकि ऊपर वाले को भी हमसे ये शिकायत न रहे कि हम धरती पर केवल सुख ही भोगकर आए हैं।

जिन्हें इच्छा-मृत्यु में खामियां तलाशना है वे शौक से तलाशें। खाली आदमी कुछ तो करेगा, ये ही सही।

फिलहाल मुझे तो अंतिम सत्य (मृत्यु) को जानना है और वो मैं इच्छा-मृत्यु के बहाने जानकर रहूंगा।

गुरुवार, 8 मार्च 2018

शोक सभा का आकर्षण

शोक सभाएं मुझे बचपन से आकर्षित करती रही हैं। एक बार को किसी के सुख में शरीक न होऊं लेकिन शोक सभा में जरूर जाता हूं। शोक और दुख दोनों एकसाथ प्रकट हो जाते हैं। वरना, अलग से दुख प्रकट करना मुझे बड़ा अटपटा-सा लगता है। अक्सर भूल जाता हूं कि किस स्थिति में किस प्रकार का दुख प्रकट करूं। दुनिया में इतनी तरह के तो दुख हैं कि हर दुख कभी किसी दुख से मेल ही नहीं खाता।

दुख के मनो-विज्ञान को समझना मेरे बस की बात भी नहीं। सुना है, इसके लिए भी एक खास ट्रेनिंग की आवश्यकता होती है।

एक जमाने में शोक सभाएं थोड़ा मातम टाइप हुआ करती थीं। शामिल लोगों के चेहरे मुरझाए हुए से दिखते थे। शोक भी इतना विकट तरीके से व्यक्त किया जाता था कि गुजरने वाले की आत्मा भी कलप जाती होगी। काले कपड़ों में रूदलियां भी गाई जाती थीं।

लेकिन जैसे-जैसे वक़्त बदला शोक व्यक्त करने के ढंग और मायने दोनों बदल गए। अब की शोक सभाएं शोक सभाएं कम इवेंट मैनजमेंट अधिक लगती हैं। डिजिटल समय में शोक भी डिजाइनर हो चला है।
अभी हाल मुझे एक सज्जन की शोक सभा में शामिल होने का चांस मिला। सज्जन अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्सा जी कर दुनिया से रुखसत हुए थे। सो, उनकी शोक सभा में खास शोक नहीं था। हर चेहरे पर चार्मनेस छाई हुई थी। खासकर, मौजूद महिलाओं का ड्रेसिंग सेंस तो कमाल का था। उन पर व्हाइट ड्रेस खूब फब रही थी। ज्यादातर चेहरे 'लाइट मेकअप' में भी खासी लाइट मार रहे थे। शोक-संतप्त परिवार के सदस्य भी, लग रहा था, शोक सभा में शामिल होने की अच्छी ट्रेनिंग लेकर आए थे!

बारी-बारी से सबके मोबाइल बज रहे थे। सब एक-दूसरे को गैलरी में मौजूद 'स्टफ' दिखाने में मशगूल थे। व्हाट्सएप्प पर बातचीत का आदान-प्रदान हो रहा था। तो कुछ बीच-बीच में अपना फेसबुक और ट्विटर के स्टेटस भी अपडेट कर रहे थे। सेल्फी के शौकीनों ने शोक सभा को भी अपने शौक के रंग में रंग लिया था। लगे हाथ, एकाध के साथ सेल्फी मैंने भी ले ली। बहती गंगा में हाथ धोने से कभी चूकना नहीं चाहिए।

अच्छा, सेलिब्रिटियों की शोक सभाएं तो और भी गजब होती हैं। शायद ही कोई ऐसा चेहरे नजर आता हो जिसने आंखों पर काला चश्मा न चढ़ाया हो। कुछ चश्मे तो इतने बड़े होते हैं कि चार-पांच आंखों को ढक लें। शोक सभा में काला चश्मा पहनने के पीछे अपने आंसूओं को जग-जाहिर न करने की तरकीब रहती हो शायद।

सफेद कुर्ते-पायजामे और साड़ी व सलवार-सूट को देखकर तो ऐसा जान पड़ता है मानो अभी कुछ देर पहले ही ड्राई-क्लीन करवाए हों। कुछ हीरोइनें तो शोक सभा में भी 'न्यूड मेकअप' किए होती हैं। आखिर सेलिब्रिटी हैं, कुछ तो अलग दिखना चाहिए न।

पर शोक सभा का आकर्षण होता गजब है। मेरी तो दिली-तमन्ना है कि मेरी शोक सभा पूरी तरह ग्लैमरस और अट्रैक्टिव हो। ताकि शामिल हुए लोग मेरी शोक सभा फुल्ली एन्जॉय कर सकें।

मंगलवार, 6 मार्च 2018

उनका वामपंथ से मोहभंग होना

ताजा खबर तो यही है कि वे अब वामपंथी नहीं रहे। उन्होंने अपने वामपंथ का त्याग कर दिया। अपनी जिंदगी में वामपंथ से जुड़े प्रत्येक प्रतीक को बक्से में बंदकर गंगा में बहा दिया। अपने वामपंथी दोस्तों से किनारा कर लिया। घर के दरवाजे पर लगी 'कॉमरेड' नाम की नेमप्लेट से कॉमरेड हटाकर अपने नाम के साथ अपनी 'जाति' को जोड़ दिया। उनकी जाति को जान अड़ोसी-पड़ोसियों का उनके प्रति सम्मान बढ़ गया। वरना, इससे पहले तो वे उन्हें अपना पड़ोसी तक मानने से इंकार किया करते थे।

उनका वामपंथ से अचानक मोहभंग होना मुझे खासा खला। उन्हीं को तो देखकर मेरे मन में वामपंथ के प्रति मोह जागा था। वामपंथी विचारों को अपने जीवन में उतारने में लगा था। अपनी अलमारी में वामपंथी साहित्य को खूब स्पेस देने लगा था। और तो और अपने नाम के साथ जुड़े जाति के दंश से मुक्ति पाने का लगभग निर्णय ले चुका था। क्रांति में मेरा विश्वास बढ़ने लगा था। पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति मेरा गुस्सा शिखर पर पहुंच चुका था।

लेकिन उनका अपने विचार और पंथ से पलटी मारना मेरी वामपंथी रूझान के लिए झटका जैसा था। इतना जोर का झटका तो मुझे तब भी नहीं लगा था जब एक सज्जन ने मुझे पागलखाने में भर्ती होने की सलाह दी थी।

अभी हाल वो मुझे बीच राह मिले। बिना इधर-उधर की भूमिका बांधे मैंने उनसे पूछा- 'आप तो ऐसे न थे! यकायक वामपंथ से मोहभंग के क्या मायने समझूं?' वे बोले- 'कुछ भी समझने-बूझने की जरूरत नहीं। अंतिम सत्य यही है कि मैं अब वामपंथी न रहा।'

'वही तो पूछ रहा हूं कि क्यों वामपंथी नहीं रहे अब आप?' वे बोले- 'अब कुछ न धरा वामपंथ में। वामपंथ एक शोक गीत की तरह हो लिया है। कब तक विचार की लाठी से हम खुद को हांकते रहेंगे। राजनीति में अब विचार की नहीं बाहुबल और धनबल का बोलबाला है। ऐसे में कहां बचा रहेगा वामपंथ और वामपंथी। सो, किनारा करना ही बेहतर समझा'।

किंतु उनके चेहरे से शोकगीत जैसा कुछ नजर नहीं आ रहा था। बड़े आराम से थे। वरना, अपने विचार और पंथ को छोड़ने में किसे तकलीफ नहीं होती होगी भला?

वैसे, नेताओं के साथ यह सुविधा हमेशा ही रही है कि वे पार्टी या विचार को त्यागते वक़्त ज्यादा सोचने के झंझट में नहीं पड़ते। विकल्प उनके पास मौजूद रहते ही हैं।

क्या ऐसा ही कोई सुरक्षित विकल्प उनके पास भी तो मौजूद नहीं? वामपंथ को छोड़ कहीं राष्ट्र-पंथ के साथ आ रहे हों! ऐसा सिर्फ मेरा कयास भर है। सत्य तो फिलहाल उन्हीं के पेट में छिपा बैठा है।

निरंतर ढहते लाल दुर्ग को देखते हुए लग तो यही रहा है कि वामपंथ कहीं इतिहास बनकर ही न रह जाए! यों भी, कुछ हद तक इतिहास बन भी चुका है। पर, मेरे जैसों के लिए समस्या आन खड़ी हुई है कि वामपंथ के साथ अभी बने रहें या उनकी तरह मैं भी इससे मोहभंग कर कोई और विकल्प चुन लूं।

समस्या विकट है। भगवा के आगे लाल रंग फिलहाल फ्लैट है।

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

व्हाट्सएप्प पर होली

इस दफा 'व्हाट्सएप्प पर होली' खेलना तय हुआ है। जब पूरा देश ही व्हाट्सएप्प पर व्यस्त रहने लगा है तो होली को ही क्यों छोड़ा जाए। यह सही है कि व्हाट्सएप्प होली में पारंपरिक होली जैसी बात नहीं आ सकती हां दिल तो बहलाया ही जा सकता है न। आज के जमाने में दिल का बहलना बहुत जरूरी है। लगातार डिजिटल होते युग से भी तो हम दिल ही बहला रहे हैं। नहीं क्या!

व्हाट्सएप्प पर होली के अपने फायदे हैं। न व्यक्तिगत रूप से किसी को रंग लगाने का झंझट न छुटाने का रगड़ा। अपने घर के किसी भी कोने में बैठकर डिजिटली सबको होली के संदेश या रंग-बिरंगे फोटू व्हाट्सएप्प किए जाओ। एक ही संदेश को चाहे तीन लोगों को भेजो या छत्तीस को कोई न पूछने वाला। बस व्हाट्सएप्प पर उंगलियां चलती रहनी चाहिए। पिछले दिनों यह बात साबित भी हो चुकी है कि व्हाट्सएप्प पर शुभकामना संदेश भेजने वालों में हम भारतीय ही सबसे आगे रहते हैं।

व्हाट्सएप्प पर होली खेलकर मैं एक तीर से कई निशाने साध सकता हूं। चूंकि होली 'मस्ती' और 'बुरा न मानने' का फेस्टिवल है, इस नाते मैं अपनी उन पड़ोसनों को भी रंगीन फोटू और वीडियो भेज सकता हूं, जिनसे आमने-सामने खुलकर बात- बीवी के डर के कारण- कम ही हो पाती है। होली का सुरूर तो खैर सब पर चढ़ा रहता ही है।

शरारत आप न भी करना चाहें तो भी हो ही जाती है। यही तो होली की खासियत है। यों भी, दूर बैठकर डिजिटल शरारत करने का अपना ही मजा है। कम से कम इस तोहमत से तो बचे ही रहते हैं कि अगले ने होली पर मुझे छेड़ा। व्हाट्सएप्प पर छेड़-छाड़ का कहां कोई इतना बुरा मानता है। खासकर, होली पर तो 'बुरा' मानना चाहिए भी नहीं। फिर भी, जो बुरा मान लेते हैं, वे जाकर अपनी भैंस चराएं।

व्हाट्सएप्प भी होली के रंगों की तरह हर समय रंगीला रहता है। हर रंग के दर्शन अपको यहां हो जाएंगे। उम्र यहां मायने नहीं रखती। केवल रंग और रंगीन तबीयत मायने रखती है। प्रेम से ज्यादा फ़्लर्ट के रंगों से यह सराबोर रहता है। होली जैसे मौके पर व्हाट्सएप्प पर फ़्लर्ट सोने पे सुहागा है शिरिमान जी। फ़्लर्ट भी एक प्रकार का जीवन रंग ही तो है।

बाकी और त्यौहारों पर तो मौका मिलती नहीं, एक होली ही ऐसा त्यौहार है जहां आप अपने दिल की रंगीनियत दूसरे के समक्ष खोलकर रख सकते हैं। व्हाट्सएप्प के जीवन का हिस्सा बन जाने से यह काम और भी आसान हो गया है। एक मैं ही नहीं मेरे जैसे तमाम होली प्रेमी अपने जज्बातों के रंगों को बिखेरने के लिए इसी का तो सहारा ले रहे हैं। जीवन में रंगों का बने रहना इसीलिए तो जरूरी है।

हैं समाज में तब भी कुछ लोग जिन्हें डिजिटल होली खेलना नहीं सुहाता। उन्हें तो हाथों में पिचकारी थामे, एक-दूसरे पर पम्पों का मोर्चा खोले, भांग के नशे में मुलायम गालों पर चटख रंग लगाने में ही आनंद आता है। हालांकि असली वाली होली तो यही है। पर कहां अब लोगों कने इतना टाइम बचा है ऐसी बिंदास होली खेलने का। हर कोई अपने-अपने काम और समय के बोझ का ऐसा मारा हुआ है कि क्या होली, क्या दीवाली सब रस्म-अदायगी लगती है।

जो हो वक़्त के साथ चलने में ही सबसे बड़ी अक्लमंदी है। आज अगर ज्यादातर लोगों की पसंद डिजिटल या व्हाट्सएप्प होली है तो यही खेलो। क्या जाता है। यहां पानी के रंग न होकर डिजिटल रंग होंगे। पर होंगे तो रंग ही न। रंग तो हर किस्म का मजा देता है। चाहे करीब आकर लगाओ या व्हाट्सएप्प करके।

तो लीजिए, व्हाट्सएप्प होली का रंगीन लुत्फ। कोई बुरा मान भी जाए तो कह दीजिए- 'बुरा न मानो व्हाट्सएप्प होली है।'

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

जो भाग गया उसे भूल जा

दुनिया में ऐसा कोई है जो भाग न रहा हो? कोई वजह तो कोई बे-वजह भाग रहा है। बिन भागे कुछ भी मिलना संभव नहीं। आराम से बैठकर खाने-कमाने के दिन अब हवा हुए।

डॉक्टर्स भी यही कहते हैं, जितना हम भागेंगे उतना ही स्वस्थ रहेंगे।

कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो या तो चोरी करके भागते हैं या घोटाला करके। चोरी करने वाले अमूमन पकड़ लिए जाते हैं किंतु घोटालेबाज सीधे विदेश भाग जाते हैं। इसलिए पकड़ाई में मुश्किल से ही आ पाते हैं। फिर शुरू होती हैं उन्हें पकड़ने की कवायदें। जोकि अपने अंजाम तक पहुंचकर भी बेमानी-सी लगती हैं। उधर अगला अपने भाग जाने का जश्न मनाता है।

अभी हाल एक महाशय बैंक में ऊंचा घोटाला कर भागे हुए हैं। उनके भागने पर तरह-तरह के किस्से और चुटकुले हवा में तैर रहे हैं। कोई इसे सोची-समझी साजिश करार दे रहा है तो कोई सरकार की नाकामी।
विपक्ष के हाथ तगड़ा मुद्दा आ गया है वो सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक चिल्ल-पौं मचाए पड़ा है। इस-उस पर दोषारोपण का दौर जारी है। राजनीति जमकर हो रही है। मतलब- हर कोई अपने स्तर पर मजे लेने में लगा हुआ है।

घोटालेबाज के भागने के बाद हाय-तौबा मचना कोई नहीं बात नहीं। कुछ लोगों के जीवन का उद्देश्य ही किसी न किसी मसले पर हाय-तौबा काटना होता है। जब तक वे ऐसा नहीं करते उन्हें अपने होने का एहसास ही नहीं होता। खुद चाहे कितना ही इधर-उधर क्यों न भागते फिरें। लेकिन दूसरे के भागने पर यों बौराए-बौराए पड़ते हैं मानो अगले ने भागकर कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो!

साफ-सीधी-सी बात है, अगले को पूरा मौका मिला भाग निकलने का सो वो भाग गया। यहां रहकर करता भी क्या? लोग उसे चैन से जीने देते? जितने का उसने घोटाला किया उससे कहीं ज्यादा सवाल कर-करके उसकी ऐसी-तैसी मार देते। उसके मुंह पर कम पीठ पीछे इतनी बुराइयां, इतनी बुराइयां करते कि अगला दुखी होकर कहीं आत्महत्या के विकल्प को न चुन लेता! बात-बेबात ताने देने वाले क्या कम हैं यहां!

घोटाला कर भाग जाना इतना आसान न होता। कलेजा चाहिए होता है, कलेजा। लुत्फ तो यह है कि जिन लोगों की सांस दो कदम चलकर ही फुल जाती है वे भी अगले के भागने पर उसे जली-कटी सुना रहे हैं। ठीक है वो भाग गया। पर तुम्हारा तो कुछ लेके नहीं भागा न! होते हैं कुछ ऐसे लोग भी जिन्हें बेवजह हर मसले में अपनी टांग घुसेड़ने की बीमारी होती है।

अजी, हमें तो एहसानमंद होना चाहिए अगले का कि वो भागकर सबको अपने-अपने काम पर लगा गया। देश की बड़ी-बड़ी एजेंसियां लगी पड़ी हैं उसे पकड़कर लाने की जुगत में। सरकार के आला मंत्री जनता, विपक्ष और बुद्धिजीवियों को भरोसा दे रहे हैं कि वे उसे खींचकर भारत ले आएंगे। हालांकि अभी पिछले भागे हुए वीर तो पकड़ाई में रत्तीभर न आए हैं। ये महाराज कब तक आएंगे, कहना मुश्किल है। फिर भी, सरकार की कोशिशें जारी हैं। ऐसी कोशिशें मन भी खूब लगाए रखती हैं।

कभी मौका मिला मुझे तो मैं इनसे भागने की ट्रेनिंग अवश्य लेना चाहूंगा। बल्कि भाग-दौड़ में इंटरेस्ट रखने वाले हर खिलाड़ी को इनसे भागने के गुर सीखने चाहिए।

भागे हुए वीर कब तलक पकड़ाई में आएंगे यह तो ऊपर वाला भी नहीं जानता। पर अपनी तरफ से मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा कि जो भाग गया उसे भूल जा! 

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

घोटाला कर भागने वाले को 'वीर' कहते हैं!

घोटाला अपने नेचर में 'प्रेम' की तरह होता है। किया नहीं जाता, हो जाता है। जिनमें माआदा होता है वे अपने प्रेम को खींचकर शादी तक ले जाते हैं। जिनमें रिस्क लेने की हिम्मत नहीं होती वे बेगानी शादी में 'अब्दुल्ला' बनकर रह जाते हैं।

ठीक ऐसी ही प्रवृत्ति घोटालेबाज में पाई जाती है। घोटाला भी वही कर पाता है जिसमें हिम्मत होती है। समाज, जनता, मीडिया के ताने बर्दाश्त करने का जज्बा होता है। किए गए घोटाले पर कभी शर्म महसूस नहीं होती। चेहरे पर ताजगी, दिल में न्याय-व्यवस्था के प्रति आत्म-विश्वास बना रहता है। सरकार और पुलिस की नाक के नीचे भागने का हौसला रखता है।

घोटाला जितना बड़ा होता है, उसके चर्चे भी उतने ही बड़े होते हैं। घोटालेबाज रातभर में सुपरस्टार बन जाता है। सोशल मीडिया से लेकर चाय-पान के खोखे तक बस उसी के किस्से छाए रहते हैं। कुछ लोग उसे गरियाते तो कुछ उससे प्ररेणा भी लेते हैं। और, कुछ मेरे जैसे भी होते हैं जो रह-रहकर अपने लेखक होने को कोसते और घोटालेबाज न बन पाने पर गहरा अफसोस जाहिर करते हैं।

फिलहाल तो अभी मुझे उन सयाने लोगों पर दया आ रही है जो पीएनबी घोटाले के मेन हीरो को 'बुरा' कह रहे हैं। उसके विदेश भागने को हिकारत भरी निगाह से देख रहे हैं। कभी सरकार तो कभी व्यवस्था को गलिया रहे हैं।

क्यों भाई क्यों? अगले ने भागकर क्या गलत किया? यहां रुके रहकर उसे अपनी खोपड़ी थोड़े न तुड़वानी थी। जब उसके समकालीन घोटाला कर भाग सकते हैं तो वो क्यों नहीं? यों भागने पर किसी का जोर नहीं। कोई हर सुबह सेहत बनाने के लिए भागता है तो कोई खुद के बचाव में। ध्यान रखें। भाग वही पाता है, जिसकी टांगे मजबूत और घुटने कामयाब होते हैं।

हमें तो अगले को गलियाने की बजाए उसको थैंक्स बोलना चाहिए कि उसने घोटाले की प्रासंगिकता को बनाए रखा। हमारे कानों में घोटाला शब्द को पड़ने दिया। वरना इधर कुछ सालों में तो इस शब्द को ही हम भूलने से लगे थे।

मेरा ऐसा व्यक्तिगत मत है कि घोटाला कर भागने वाला 'कायर' नहीं बल्कि 'वीर' होता है। वीर लोग ही घोटाला कर भी पाते हैं। क्या नहीं!

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

शादी मुबारक इमरान भाई

'इमरान (भाई) खान को तीसरी शादी मुबारक।'

इतना स्टेटस लिख मैंने अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया ही था कि मुझे तरह-तरह के ताने दिए जाने लगे। पहली आपत्ति तो लोगों को यही थी कि मैंने पड़ोसी (दुश्मन) मुल्क के किसी बंदे को मुबारक दी ही क्यों? इस खबर को इग्नोर क्यों नहीं किया? एक सज्जन ने पूछा कि तीसरी शादी की भी क्या कोई मुबारकबाद देता है? एक और सज्जन ने लिखा- शादी एक पवित्र बंधन है। इमरान खान ने तीन शादियां कर इस पवित्र बंधन का मजाक उड़ाया है।

क़िस्सा-कोताह यह कि किसी को भी इमरान भाई का तीन शादियां करना जंचा नहीं। न जंचे। न पसंद आए। इससे उनकी सेहत पर तो फर्क पड़ने से रहा। वैसे भी, शादी करना या दो या तीन करना यह तो बंदे का नितांत निजी फैसला है। भला हम-आप कौन होते हैं अगले को रोकने-टोकने वाले। फिर, कोई न कोई वजह तो रही ही होगी न जो इमरान भाई को तीसरी शादी का विकल्प चुनना पड़ा। इतनी महंगाई के जमाने में भला कौन खुद पर अतिरिक्त खर्चे लादना चाहेगा! जरा ठंडे दिमाग से विचार कीजिए।

यों, शादी करना कोई गुनाह तो नहीं! मेरा बचपन से मानना रहा है, जब तलक सांसे चलती रहें बंदे-बंदी को अपना दिल जवान रखना चाहिए। दिल में आपके जितनी जगह होगी, उतना मानसिक सुकून भी हासिल होगा। इमरान भाई जैसे लोग भी हैं दुनिया में जो तीन शादियां कर अपने दिल और जज्बात को जवान रखे हुए हैं।

कुछ लोग इमरान भाई की उम्र पर भी बेवजह सवाल उठा रहे हैं। शादी से उम्र का क्या मतलब? इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिनमें उम्र के बंधन को दर-किनार कर शादियां की गईं हैं। अभी हाल हमारे यहां कबीर बेदी ने भी तो अपनी उम्र से बेहद कम उम्र की लड़की से शादी की थी। तब भी कई सवाल उठे थे। पर 'जब मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी।'

किसी को हो या न हो पर मुझे तो इमरान भाई की शादी पर गर्व है। जिस स्टेज में लोग अपनी तमाम जिम्मेवारियों से निजात पा चुकने के करीब या फिर ऊपर जाने की तैयारियों में अस्त-व्यस्त होते हैं उस स्टेज पर इमरान भाई ने शादी कर संसार में एक 'ऊंची मिसाल' पेश की है। साथ ही, यह सीख है उन लोगों के लिए भी जो एक शादी को ही जी का जंजाल समझ बैठते हैं।

यह मेरा निजी मत है कि आदमी को जीवन में शादी के लिए दो-चार विकल्प तो रखने चाहिए ही। आजकल जमाना बहुत दुष्ट हो चला है। किसी के पेट के अंदर का कुछ पता नहीं। कौन, कब, कहां 'गच्चा' दे जाए। सो, अपनी खुशहाली अपने हाथ।

सुना है, इमरान भाई की बीवी उनकी 'आध्यात्मिक गुरु' भी हैं। ऐ! खुदा, ऐसी आध्यात्मिक गुरु जिंदगी के किसी मोड़ पर मुझे भी मिले। आमीन।

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

सोनम गुप्ता की बेवफाई और प्रिया प्रकाश का आंख मट्टका

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर जितनी शिद्दत के साथ सोनम गुप्ता को बेवफा माना गया, मुझे बहुत खराब लगा। बिना जाने, न पहचाने, न देखे किसी को बेवफा होने का तमगा दे देना ठीक नहीं। हां, यह सही है कि इश्क का इतिहास तमाम तरह की बेवाफाईयों से भरा पड़ा है। पर उनकी की भी कोई न कोई मजबूरियां तो रही होंगी। यों ही कोई बेवफा न हो जाता।

महज एक दस रुपये के नोट पर 'सोनम गुप्ता बेवफा है' लिख देने भर से हम उसकी बेवफाई को जस्टिफाई नहीं कर सकते। मेरी सांत्वना सोनम गुप्ता के साथ है। और हमेशा रहेगी।

बेशक, सोनम गुप्ता सोशल मीडिया की सनसनी थी मगर वो इसके लिए नहीं बनी थी। क्या मालूम उसे बेवफा साबित करने में किसी विदेशी मीडिया का हाथ रहा हो! क्या मालूम यह कुछ प्यार में विकट धोखा खाए आशिकों की साजिश हो! क्या मालूम दुनिया की फिरकी लेने के लिए बैंक के किसी छोटे-मोटे कर्मचारी ने नोट पर 'सोनम गुप्ता बेवफा है' लिख दिया हो! कुछ भी हो सकता है। होने पर किसी का जोर नहीं।

वैसे, सोशल मीडिया की सनसनी के खेल बड़े अजीब हैं। अभी हम सोनम गुप्ता की बेवफाई के कांड से पूरी तरह मुक्त हो भी न पाए थे कि अब  प्रिया प्रकाश वारियर का आंख मट्टका आजकल गजब ढाहे हुआ है। प्रिया अभिनीत मलयाली फ़िल्म 'ओरू अदार लव' के एक टीजर ने सोशल मीडिया पर कोहराम मचा कर रख दिया है। खबर है, इस टीजर को अभी तक 1.50 करोड़ बार देखा जा चुका है।

पहली दफा देखकर तो मैं भी उसकी मोहक अदा पर मोहित हो लिया था। इतनी नजाकत और नफासत के साथ एक लड़की एक लड़के को आंख मारे और वो गश खाकर न गिर पड़े तो उसका इंसान होना ही बेकार है। बड़े ही नसीब वाले होते हैं वे जिन्हें ऐसे नयन-मट्टका में डूबने-उतरने का मौका मिलता है। मुझे कभी नहीं मिला। इस बात का अफसोस मुझे बचपन से है।

कहिए कुछ भी पर आंख मारने की अदा होती लड़कियों के पास ही है। लड़का चाहे कितने ही एंगल से आंख मार ले या अपनी आंख ही निकालकर बाहर रख दे फिर भी वो फील आ ही नहीं पाएगी।

मेरा निजी मत है कि प्रिया प्रकाश जैसी लड़कियों को ऐसे 'ऑसम नयन मट्टकों' के लिए आगे आना चाहिए। सोशल मीडिया पर तरह-तरह की बेतुकी चीजें सनसनी बनती रहती हैं, इन सन सब के बीच प्रिया प्रकाश अगर सनसनी बनती है तो यह देखना बेहद सुखद लगता है। यह भी एक अदा है अपने प्रेम या दिलचस्पी को जाहिर करने की।

सुना है, कुछ लोग उससे नाराज भी हैं। कुछ भावनाओं के आहत होने का मसला है। उफ्फ! ये भावनाएं भी।

पर प्रिया के आंख मट्टके में वो दम है जो आहत भावनाओं को भी पिघला सकता है।

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

आइए, हंसा जाए

हंसते हुए चेहरे मुझे बहुत भाते हैं। ऐसे चेहरों को देख मुझे जीवन के प्रति 'सकारात्मक ऊर्जा' मिलती है। हंसना इसलिए भी जरूरी है ताकि कुछ पलों के लिए ही सही आप तनाव-मुक्त हो सकें। लॉफिंग बुद्धा को देखा है, हमेशा की तरह बुक्काफाड़ हंसी के मोड में रहता है। हंसी ऐसी ही होनी चाहिए।

यों, दूसरों पर हंसने के तमाम बहाने हैं। कुछ लोगों को आनंद ही दूसरों पर हंसकर मिलता है। इतिहास दूसरों पर हंसी से भरा पड़ा है। अगर द्रौपदी दुर्योधन के गिरने पर न हंसी होती तो शायद इतना बड़ा कांड (महाभारत) भी न होता। उस जमाने में तो हंसने-रोने पर ही श्राप मिल जाया करते थे।

खैर...।

हंसने का असली मजा तो खुद पर है। बात तो तब है जब केले के छिलके पर पांव पड़ते ही रपटने जाने पर दूसरों के हंसने से पहले हम ही खुद पर हंस लें। पर ऐसा हम कर ही कहां पाते हैं। खुद पर हंसना दुनिया के सबसे कठिनतम कामों में से एक है। काल्पनिक तो छोड़िए, असल जिंदगी में ही ऐसे बहुत कम लोग मिलेंगे जिन्हें खुद पर हंस कर सुख मिलता हो।

ऐसा लेकिन मैंने अपने साथ नहीं होने दिया है। मुझे खुद पर हंसने में मजा आता है। आप भी बे-ख़ौफ होकर मुझ पर हंस सकते हैं। मेरी कोशिश भी हमेशा यही रहती है कि लोग मेरे लिखे, मेरे कहे, मेरी हरकतों और मेरे चेहरे पर हंसे। मुझ पर हंस कर अगर दूसरे का खून बढ़ रहा है तो यह मेरे लिए सम्मान की बात है। यों भी लोगबाग अब कम ही हंसते-मुस्कुराते नजर आते हैं। सोशल मीडिया ने तो मानो हंसी पर ग्रहण ही लगा दिया है।

हालांकि हंसी के भी अपने कायदे हैं। बे-कायदे की हंसी कभी-कभी अच्छे-खासे कांड करवा देती है। फिर भी, हमें अपने दिलों में हंसी के प्रति गुंजाइश तो रखनी ही चाहिए। हंसी पर बिफर जाना मूर्खता है। जो हंस नहीं सकता। जो दूसरे की हंसी को एन्जॉय नहीं कर सकता। जो केवल अपनी ही हंसी हंसता है, उसका जीना भी क्या जीना है लल्लू।

जब आप चार्ली चैपलिन की हंसी पर हंस सकते हैं तो खुद पर किसी के हंस देने पर आपको क्यों आपत्ति हो भला!

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

इश्क में उम्र का क्या काम

कहते हैं- इश्क उम्र की बंदिशों का मोहताज नहीं होता। इश्क कभी भी, कैसी भी उम्र वाला कर सकता है। इतिहास कम और ज्यादा उम्र में इश्क करने वालो के किस्सों से भरा पड़ा है। दिल अगर जवान है तो इश्क एक से कीजिए या अनेक से सब कुबूल है।

यों, लोगबाग इश्क करने की राय तो एक ही से देते हैं। उससे आगे को 'वासना' कहते हैं। अजी, लोगों का क्या है वे तो जिंदगी को भी 'ईमानदारी' के साथ जीने की राय देते हैं, क्या इतने विकट तिकड़मी समय में जिंदगी ईमानदारी के साथ जी जा सकती है? लोगों को रायचंद बने रहने दें, आप तो वही करें जो आपका दिल कहता है। इश्क के मामले में किसी की नहीं केवल दिल की ही सुननी चाहिए।

सच कह रहा हूं। मुझे अगर अपने दिल का सहारा न मिला होता तो मैं जीवन में इतने इश्क चला ही न पाता। जब भी किसी से नया इश्क हुआ, दिल ने हमेशा यही कहा- 'फिक्र न कर। इश्क किए जा।'

ज्यादा मात्रा में किए गए इश्क से पास से कुछ नहीं जाता, किस्म किस्म के अनुभव ही हाथ आते हैं। जीवन में जिसने इश्क के अनुभव ले लिए फिर उसके तईं दुनियादारी को समझना इतना कठिन नहीं रह जाता।

इश्क में प्रकृति के साथ-साथ इंसान की चेष्टाओं एवं कु-चेष्टाओं का हर रंग मौजूद रहता है। कुछ इश्क बैठे-ठाले हो जाते हैं तो कुछ के लिए पापड़ तक बेलने पड़ जाते हैं। मुझे लगता है, इश्क करना या होना पुराने जमाने में ज्यादा आसान था। क्योंकि तब आशिक और माशूका के बीच इतनी चालाकियां न थीं। आज के डिजिटल समय में इस बात का ही कन्फर्म न रह पाता कि इश्क आशिक का सच्चा वाला है या माशूका का। क्या पता, एक ही चैटिंग एप पर कई से इश्क एक साथ फरमाया जा रहा हो। कसमें-वादों का सिलसिला हर तरफ से सामान चल रहा हो। दिल के जो इमोजी उसे भेजे जा रहे हैं, हो सकता है, इसे भी भेजे जा रहे हों। मोबाइल फोन के जमाने में इश्क के प्लेटफार्म पर गाड़ी कहीं से भी कहीं को चलाई और दौड़ाई जा सकती है।

चलो अच्छा ही है न। कम से कम युवा पीढ़ी एक ही के साथ हिलग के बोर तो नहीं हो रही। बाजार के असर ने तो इश्क को और भी ग्लोबल कर दिया। कभी वेलेंटाइन विदेशों में मनाया जाता था, अब शहर से लेकर गांव-देहात तक में पूर्ण उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। देश बदल रहा है। यही तो 'न्यू इंडिया' है पियारे।

ऐसा लोगों का भरम है कि इश्क को निभा पाना खासा कठिन होता है। अगर कठिन ही होता तो कृष्ण जी ने अपने समय में इतना इश्क न फरमाया होता। इश्क निभाना उतना ही सरल है जिनता पकौड़ा तलना। बस आंच का ख्याल रखना पड़ता है। कहीं ज्यादा तलकर 'जल' न जाए। बाकी एक के बाद एक इश्क करते रहिए, सब निभ जाएंगे।

और हां, इश्क करते या वेलेंटाइन मानते वक़्त इस पर खाक डालिए कि लोग क्या कहेंगे। 'अमर प्रेम' का वो गाना तो याद है न- 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...'। तो जो कह रहा है, कहने दीजिए। आप बस इश्क, प्यार, मोहब्बत के दरिया में यों ही डूबते-उतरते रहिए। बाकी श्रीराम जी भला करेंगे।

इश्क में उम्र पर भी इतना तबज्जो देने की जरूरत नहीं। इश्क बे-उम्र होता है। सैफ ने करीना या करीना ने सैफ से इश्क फरमाते वक़्त क्या उम्र का लिहाज किया? इधर इश्क परवान चढ़ा, उधर निकाह में तब्दील हुआ। अजी, खुद मैं कभी इश्कबाजी में उम्र को बीच में न लाया। जिससे हो गया, कर लिया। मन और दिल बहलता रहना चाहिए बस।

इश्क में बोल्ड बने रहने का जज़्बा रखिए। बाकी आगे की राहें खुद ब खुद आसान होती चली जाएंगी।

'इश्क कीजिए फिर समझिए जिंदगी क्या चीज है...'।

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

बजट, वसंत, वेलेंटाइन और पकौड़े

बजट

लोग भी अजीब हैं। बताइए, बजट को समझने में लगे पड़े हैं। जिसे देखो वो ही हाथ में गुलाबी अखबार की प्रति थामे, एक-दूसरे से बजट पर बहस करे चला जा रहा है। जबकि, यह हकीकत है, उसे अपने घर के बजट के बारे में रत्तीभर मालूम नहीं होगा। उसका हिसाब-किताब रखने के लिए पत्नी है। सबसे उम्दा पॉलिसी मुझे पत्नियों की लगती है: वे कभी बजट पर न खास चर्चा करती हुई मिलती हैं न दिमागी पर अतिरिक्त लोड लेती हुई। उन्हें तो अपने घर के बजट से मतलब। देश के बजट की वित्तमंत्री जानें या फिर अर्थशास्त्री लोग।

सही भी है। लोग जितनी ऊर्जा बजट को समझने-समझाने में बर्बाद कर देते हैं उतने में तो एक लेख या फ़िल्म के आइडिया पर काम किया जा सकता। लेकिन नहीं। लोगों को तो बीमारी है दूसरे के काम में अपनी टांग घुसेड़ने की। जबकि बजट में समझने लायक कुछ होता ही नहीं। महज आंकड़ों और बड़ी-बड़ी योजनाओं-परियोजनाओं की जुमलेबाजी होती है। बजट के बहाने कुछ सरकार के तो कुछ जनता के हित साध लिए जाते हैं।

किसानों पर कागजों पर मेहरबानी कर दी जाती है। जबकि देश में किसान और खेती के हालात क्या हैं, बच्चा-बच्चा जानता है। तिस पर भी दावा यह कि ये किसानों का बजट है।

वसंत

वसंत का असर बजट पर भारी है। वसंत का चार्म हर किसी को मदहोश किए पड़ा है। वासंती हवा बह रही है। हालांकि मौसम में अभी कुछ सर्दी बाकी है फिर भी मजा दे रही है।

दिल में वसंत की उमंग का आलम ये है कि मचला-मचला जा रहा है। एक जगह दिल लगा होने के बावजूद कोशिश में है दूसरी जगह भी सेट हो जाए। सोशल मीडिया के जमाने में यह असंभव भी तो नहीं।
कवि वसंत पर कविता अब पन्नों या डायरी पर नहीं बल्कि अपने फेसबुक पेज पर लिख रहा है। तो कुछ ऊंचे टाइप का कवि अपनी वसंतमय कविता ट्विटर पर ट्वीट कर रहा है। वसंत पूरी तरह से डिजिटल हो लिया है। होएगा भी कैसे नहीं। आखिर यह 'न्यू इंडिया' का वसंत जो है।

नए जमाने का यूथ व्हाट्सएप्प पर वसंत सेलिब्रेट कर रहा है। वो ज्यादा कुछ वसंत के बारे में न जानते हुए भी पूरी शिद्दत से लगा पड़ा है वसंत-प्रधान कविता या वन-लाइनर को ग्रुप में फैलाने में।

उधर वसंत पसोपेश में है कि ये हो क्या रहा है? पर कर भी क्या सकता है, वसंत अपने डिजिटल होने पर खीझ भी रहा है और प्रसन्न भी हो रहा है। पर जमाने के साथ चलने को प्रतिबद्ध है।

वेलेंटाइन

वसंत में वेलेंटाइन का शबाब अपने जोरों पर है। अपनी-अपनी सुविधा-सुरक्षा के हिसाब से सभी इसको मनाने में व्यस्त हैं। युवा (प्रेमी) युगल वेलेंटाइन पर पेड़ों के पीछे कम घर के किसी कोने में बैठ अपने दिली अरमान व्हाट्सएप्प कर पूरे कर रहे हैं। 'प्रेम' यानी 'डिजिटल लव' को सुकून से चलाए रखने का इससे उम्दा दूसरा माध्यम नहीं।

दूसरी तरफ, लाठी वीर इस जुगाड़ में हैं कहीं कोई पवित्र भारतीय संस्कृति का ढोल बजाता हुआ दिखे-मिले तो तुरंत उसे मुर्गा बना अपने 'मन की भड़ास' शांत कर लें। सालभर उन्हें इसी दिन का तो इंतजार रहता है। इस बहाने टीवी, अखबार में उनके चेहरे भी चमक जाते हैं। देशवासियों को भी पता चल जाता है कि लाठी वीर कितने संस्कृति और सभ्यता के हितैषी हैं।

मगर आज का यूथ भी घणा होशियार है। वेलेंटाइन डे घर से बाहर मनाने का खतरा कम ही उठाता है। चूंकि एक-दूसरे को कार्ड या लव-लैटर देने की परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है इसलिए उसे जो कहना-सुनना होता है अपने स्मार्टफोन पर ही कर लेता है। तकनीक ने प्रपोज करना अब इतना सरल बना दिया कि एक व्हाट्सएप्प में काम पूरा। हमें अपने समय में तो सौ दफा सोचना पड़ा था तब कहीं जाकर दस लाइनों का पत्र लिख पाए थे। खैर, समय-समय की बात...।

पकौड़े

पकौड़ों का वसंत और वेलेंटाइन से सीधा कोई सरोकार नहीं पर चर्चा में खूब हैं। शायद ही कोई ऐसा घर, दफ्तर या सोशल प्लेटफॉर्म बचा हो, जहां पकौड़ों का जिक्र न छिड़ा हो। उस दिन तो एक बड़े मंत्री जी ने भी कह डाला- बेरोजगारी से भला है पकौड़े बेचना। काश! उनका यह कथन कुछ बरस पहले आ गया होता तो कहे को मैं लेखक बनता, मोहल्ले के नुक्कड़ पर खड़ा हो पकौड़े नहीं बेच रहा होता।

राजनीतिक मंचों और सोशल मीडिया पर बहसबाजी से पकौड़ों को जो अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि मिली है, उस आधार पर मैं कह सकता हूं, देश में पकौड़ों का भविष्य उज्ज्वल है। अब तो मेरे दिमाग में भी यह विचार बैठने लगा है कि अपनी नौकरी और लेखन छोड़ पकौड़े बेचूं। काम काम होता है। काम में भला कैसी शर्म! ठीक है न...!

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

इन-बॉक्स में वेलेंटाइन

वेलेंटाइन डे बड़ी सहूलियत के साथ मनाना चाहिए। न दिमाग पर लोड हो न 'लोग क्या कहेंगे' टाइप चिंता। अजी, कुछ लोगों ने तो जन्म ही धरती पर इस शर्त के साथ लिया है कि उन्हें कुछ न कुछ कहते ही रहना है। सो, मोके-बेमौके कहते रहते हैं।

यों, वेलेंटाइन मनाने वाले भला कहां चिंता किया करते हैं लोगों के कहने-सुनने की। चिंता करनी चाहिए भी नहीं। जीवन और दुनिया में वैसे ही चिंताएं क्या कम हैं!

हां, तो मैं कह रहा हूं वेलेंटाइन मनाने की सबसे धांसू जगह फेसबुक का इन-बॉक्स है! सुरक्षित भी। सम्मानजनक भी। हर प्रकार के बाहरी झंझटों से मुक्त। यहां कैसी भी, कितनी भी कसमें खाइए-खिलाइए कोई आपको रोकने-टोकने वाला नहीं। अब तो वीडियो कॉलिंग की भी सुविधा है। जितना दिल चाहे बातें कीजिए। डेटा की कोई फिक्र नहीं। आटे से कहीं सस्ता तो आजकल डेटा मिल रहा है। डेटा कंपनियां अपने ग्राहकों पर पूरी तरह मेहरबान हैं। दो वक्त की रोटी मिले या न मिले पर डेटा मिलने में जरा भी बाधा नहीं आनी चाहिए।

वेलेंटाइन प्रेम-मोहब्बत के इजहार का पर्व है। ये पर्व प्यार के अरमान और अहसास को दिल में जिलाए रखता है। अपने मन की बात जो लोग सीधा नहीं कह पाते इन-बॉक्स में आनकर कह डालते हैं। उद्देश्य- बात पहुंचनी चाहिए चाहे इन-बॉक्स से पहुंचे या लैटर-बॉक्स से।

वैसे, समाज में इन-बॉक्स की इमेज कोई खास अच्छी नहीं। मुझ जैसे इज्जतदार लोग तो इन-बॉक्स की छाया तक से दूर रहते हैं। चाहे कोई कितना ही अपना या करीबी क्यों न हो, मैं तो साफ कह देता हूं- मुझे छत पर आकर मिलना मंजूर है इन-बॉक्स में घुसकर नहीं। आज के निरंतर टेढ़े होते समय में किसी की नीयत का कोई भरोसा नहीं। क्या मालूम कौन घात लगाए बैठा हो, इन-बॉक्स की चैट का स्क्रीनशॉट बनाकर सोशल मीडिया पर वाइरल करने में।

अपना तो एक ही के साथ ढंग से वेलेंटाइन डे मन जाए यही बहुत है। क्या करें, वैवाहिक जीवन के अपने कष्ट है पियारे। मन हो या न हो प्रेम की अलख तो जलाए रखनी ही पड़ती है, नहीं तो रात को रोटी मिले न मिले!

फिर भी हैं कुछ ऐसे इन-बॉक्स वीर जो अपने प्रेम और फ़्लर्ट को साथ-साथ साधे हुए हैं। उन्हें सलाम है मेरा। एक तीर से कई निशाने साधने की कला हमें उनसे सीखनी चाहिए।

इन-बॉक्स में वेलेंटाइन मनाने का एक फायदा यह भी है कि यहां बहुत अधिक शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती। किस्म-किस्म के इमोटिकॉन्स आपकी बात का इजहार करने में सक्षम हैं। हर इमोटिकॉन का मतलब हर कोई समझता है। दो प्रेमियों के बीच इमोटिकॉन्स एक प्रकार से सेतु की भूमिका निभा रहे हैं आजकल।

इन-बॉक्स और व्हाट्सएप्प सबसे सुरक्षित जगहें हैं लव-शव करने के लिए। इन सब पर वेलेंटाइन डे अगर फूल-फल रहा है तो यह प्यार के डिजिटल होने का शुभ संकेत है। आखिर हम 'न्यू इंडिया' में कदम रख चुके हैं भाई।

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

बैक बैंचर होने का सुख

मेरा नाम 'ए' से होने के बावजूद मेरी कोशिश यही रहती थी कि क्लास में मैं चौथी या छठी बैंच पर ही बैठूं। बैठता भी था। इसके दो फायदे मुझे मिल जाया करते थे: पहला, टीचर की निगाह मुझ पर आसानी से नहीं पड़ती थी। दूसरा, याद न करने के कारण टीचर को सुनाने से बच जाता था। किंतु, यह लक हर समय नहीं काम आता था। बारी जब 'नेमवाइज' हाजरी या सुनाने की आती थी तब आगे आना ही होता था। तब डांट तो पड़ती ही थी, साथ में चार-पांच संटीयों का स्वाद भी चखने को मिल जाता था दोनों हाथों पर।

घर आनकर यह भी नहीं बता सकता था कि आज टीचर ने सुताई की। तब सुताई का मामला दोहरा भी हो सकता था। मजबूरी थी। अतः उस डांट और मार का कड़वा घूंट पीकर रह जाना होता था। पर, जो भी हो उसमें परम-आनंद था। आजकल के बच्चों की तरह नहीं कि टीचर ने बच्चे को जरा-सा टच क्या कर दिया, मां-बाप राशन-पानी लेकर टीचर और प्रिंसिपल पर सवार हो लिए। समय-समय की बात है।

लेकिन बैक बैंचर होने में शर्म मुझे कभी महसूस नहीं हुई। उल्टा मजा ही आता था। पीछे बैठके किसी के चिकोटी काटो या टीचर का कार्टून बनाओ, कोई देखने वाला नहीं। क्लास में ज्यादा एक्टिव या पढ़ाकू होने के अपने नुकसान थे। दिमाग पर लोड उतना ही रखो जितना वो वहन कर पाए। ज्यादा पढ़-लिखकर कौन-सा मुझे देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनना था। लेखक कैसे बन गया, इसी पर मुझे आज भी आश्चर्य होता है। जबकि लेखक होने-बनने की तो कभी सोची भी नहीं थी। मेरी पढ़ाई-लिखाई के स्तर को देखकर पिता जी अक्सर मुझे या तो गधा बनने का आशीर्वाद देते थे या फिर रिक्शा चलाने का। दुर्भाग्य से मैं दोनों ही उपलब्धियों में पिछड़ गया।

लोग ऐसा समझते हैं कि बैक बैनचर होना नुकसानदेह है। इससे मान गिरता है। जग-हंसाई होती है। विफलता का सूचक है। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। अरे, बड़े नसीब वाले होते हैं वो जिन्हें स्टूडेंट लाइफ और जीवन में बैक बैंचर होने का सौभाग्य प्राप्त होता है। आगे वाली बैंच पर बैठकर कुछ देर तो अच्छा लगता है पर यह ज्यादा कामयाब नहीं। ध्यान रहे, गालियां फ्रंट वाले को ही पड़ती हैं, पीछे वाले को नहीं।

फिर भी कुछ ऐसे लोग हैं समाज में जिन्हें बैक बैंचर होने में बड़ी शर्म आती है। वे अपने पीछे बैठने को बड़ा मुद्दा बना राजनीति करने लग जाते हैं। कायदा तो यह है कि जिसे जहां जगह मिल जाए, वो वहीं बैठ जाए। लेकिन नहीं। पीछे बैठकर उनकी इज्जत को बट्टा लगता है। वे यह भूल जाते हैं, इमेज में अगर दम होगा तो वो पीछे बैठने में भी उतनी ही चमकेगी जितनी की आगे। बैक बैनचर या फ्रंट बैनचर होना सब बेमतलब के शोशे हैं, भला आदमी तो कहीं भी एडजस्ट हो लेता है।

वो तो चलो (बचपन) स्कूल की बातें रहीं, मैं तो अपने दफ्तर में भी बैक बैंचर ही हूं। करते रहें, अन्य दफ्तर वाले बॉस की जी-हुजूरी पर मुझे तो पीछे बैठ सबकुछ देखने में ही आनंद आता है। कम से कम बॉस की खामखां की डांट तो बच ही जाता हूं। कोई चापलूसी का आरोप तो नहीं लगता न। काफी है।

बैक बैंचर होने में तमाम सुख हैं। जीवन में कभी इस अनुभव को आजमा कर तो देखिए।

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

नुक्कड़ पर पकौड़े बेचकर दिखाओ

मुझे चुनौती मिली है। किसी और से नहीं। खुद की बीवी से। चुनौती में कहा गया है- 'एक दिन लेखन छोड़ मोहल्ले के नुक्कड़ पर खड़े होकर पकौड़े बेचकर दिखा दो। तुम्हें मान जाऊंगी।'

बात लेखन से चलकर पकौड़े बेचने तक न आती अगर मैंने उसे बजट की मोटी-मोटी बातें बता दी होतीं। किंतु, मेरी समस्या यह है कि बजट मुझे बचपन से ही कभी समझ न आया। क्या सस्ता हुआ। क्या महंगा। ये तो चलो अखबार में पढ़कर जान लेता लूं। पर टैक्स आदि से जुड़ी बड़ी-बड़ी बातें मैं नहीं समझ पाता।

अच्छा, बीवी का सारा जोर टैक्स पर रहता है। वो मुझसे पूछती है, 'वित्तमंत्री जी ने किस पर कितना और क्यों टैक्स लगाया? आय में छूट की सीमा कितनी रही? खेती-किसानों को क्या दिया? क्या छीना? ईएमई का क्या रहा?' और भी ऐसी जटिलतम बातें।

हर दफा बीवी को मैं यही बोलता हूं- 'प्रिये, मैं सिर्फ लेखक हूं। अर्थशास्त्री नहीं। बजट को समझ पाने में मेरा दिमाग कतई 'जीरो' है।'

बीवी इतने पर ही मुझ पर भड़कती हुई कहती है- 'तुम्हें समझ है किस बात की? अभी पिछले दिनों तुमसे जीएसटी के बारे में पूछा था तो तुमने साफ मना कर दिया, मैं इस बारे कुछ नहीं जानता। राशन और दूध वाले का बिल जोड़ने को दिया तो तुम जोड़ न पाए। पता नहीं, लेखक कैसे बन बैठे?'

'देखो प्रिये, लेखक बनना और बजट को समझकर समझाने में बहुत फर्क है। लेखक बनना इतना आसान न होता जितना तुम समझती हो। बजट तो फिर भी अखबारों में पढ़कर या किसी अर्थशास्त्री को पकड़कर समझा जा सकता है लेकिन लेखक तो खुद की वैचारिकता के दम पर ही बनता है।' मैंने समझाने की हल्की-सी कोशिश की।

'लेखक कैसे बनते हैं यह भाषण मुझे न दो। मुझे भीतर की सारी हकीकत मालूम है। लेखक बनकर तुम खुद को इतना ही महान मानते हो तो- बजट को छोड़ो- जरा नुक्कड़ पर पकौड़े बेचकर ही दिखा दो तो मान जाऊंगी तुम्हें।' बीवी का पलटवार।

अब बस यही सुनना बाकी रह गया था। लेखक बनकर नुक्कड़ पर पकौड़े बेचने से तो बेहतर यही रहेगा कि मैं लिखना ही क्यों न छोड़ दूँ। न रहेगा सांप। न टूटेगी लाठी।