बुधवार, 8 अगस्त 2018

कामयाबी के शिखर पर सेंसेक्स

सेंसेक्स ने कामयाबी का एक और नया शिखर पार कर लिया। उसे कोटि-कोटि बधाई।

दिली खुशी मिलती है सेंसेक्स को चढ़ता देख। बिना शोर-शराबा या शिकवा-शिकायत किए बेहद खामोशी से वो अपना काम करता रहता है। मैंने कभी उसे खुद से अपनी सफलता का जश्न मनाते या असफलता का रोना रोते नहीं देखा। यहां तक कि वो लोगों के कहे पर भी कभी अपने कान नहीं देता।

37 हजार तक का सफर उसके लिए इतना आसान नहीं था। यहां तक पहुंचने के लिए उसे जाने कितनी ही मुश्किलों से दो-चार होना पड़ा। किस-किस की क्या-क्या जली-कटी नहीं सुननी-झेलनी पड़ी। जाने कितनी ही दफा गिरा, टूटा, लुढ़का मगर हिम्मत फिर भी हिम्मत न हारी। हर बड़ी गिरावट के बाद खुद को संभालते हुए पुनः मुस्तैदी के साथ उठ खड़ा हुआ।

विपरीत परिस्थितियों में भी इसका हार न मानना मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत ताकत देता है। इसके संघर्ष को देख मेरे मन में कभी निराशा घर नहीं करती। सच कहूं- मैं जीवन में कभी महापुरुष नहीं बल्कि सेंसेक्स जैसा बनना पसंद करूंगा।

अब का नहीं बहुत पुराना परिचय है मेरा इससे। खूब याद है, जब ये  5 हजार के आस-पास टहला करता था। न बहुत ज्यादा गिरावट रहती थी, न बढ़त। कभी कहीं से जोर का झोंका कोई आ जाता तो ये डर-सा जाता था। अपने संवेदी स्वभाव के कारण जाने कितनी ही दफा छोटी-मोटी खबरों पर ये मुंह के बल गिरा है। मंदड़ियों ने कितनी ही बार इसे लहू-लुहान भी किया है।

पर इसने कभी किसी नकारात्मक खबर को दिल पर नहीं लिया, न ही अपने घाव किसी को दिखाए। हां, बीच-बीच में सेंटीमेंट जरूर बिगड़े पर जल्द सुधर भी गए।

सेंसेक्स हमारी अर्थव्यवस्था की जान है। ये बढ़ता है तो देश में आर्थिक खुशहाली के दर्शन होते हैं। न सिर्फ देश बल्कि विदेश तक में इसकी कामयाबी के गीत गाए जाते हैं।

अक्सर सेंसेक्स की सफलता रुपए की गिरावट के गम को गलत कर देती है। रुपया तो एक बार को फिर भी धोखा दे सकता है किंतु सेंसेक्स नहीं।

ऐसा मुझे तो याद नहीं पड़ता जब इसने किसी का जानबूझकर नुकसान किया हो! अति-उत्साही लोगों ने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारी है। अपनी खामियों का दोष जब लोग सेंसेक्स पर मढ़ते हैं तो मुझे बहुत बुरा लगता है। कलेजा मुंह को आ जाता है।

सेंसेक्स कभी न अपने लिए जीता है न किसी से कुछ मांगता। वो तो हरदम यही चाहता है कि लोग उसके मार्फ़त अधिक से अधिक आर्थिक फायदा उठा सकें। दो का चार कर सकें। आसमान सरीखी बुलंदियों को छू सकें।

दरअसल, गड़बड़ तब शुरू होती है जब लोग बाग खुद को सेंसेक्स का बाप समझने लगते हैं। उससे जीतने की हिरस करने लग जाते हैं। खुद को सट्टेबाजी में लिप्त कर लेते हैं। अपनी जमीन-जायदाद तक दांव पर लगा देते हैं।

जब मोटा नुकसान झेलते हैं, तब सेंसेक्स को गरियाते हैं। लेकिन सुधरते फिर भी नहीं। न सुधरना शायद इंसान की फितरत में शामिल हो चुका है।

ऐसे लोग भी कम नहीं जिनका दिल किस्म-किस्म के शेयर्स पर आया रहता है। शेयर्स को वे अपनी जान से भी ज्यादा सहेज कर रखते हैं। बढ़ने पर बेचते नहीं। गिरने पर रोना रोते हैं। और, गिरावट का सारा दोष बेचारे सेंसेक्स के माथे मढ़ देते हैं। समझते नहीं, सेंसेक्स खुद से नहीं बल्कि शेयर्स के सहारे ही चलता है। शेयर बढ़ेंगे तो सेंसेक्स भी बढ़ेगा। शेयर गिरेंगे तो सेंसेक्स भी गिरेगा।

मैं तो हमेशा ही सेंसेक्स को सकारात्मक रूप में देखने की कोशिश करता हूं। उसके प्रति मन में कभी कैसी भी दुर्भावना नहीं रखता। अगर कभी गिरता है तो उसे गीता का यह उपदेश 'जो होता है अच्छे के लिए होता है। जो होगा वो भी अच्छे के लिए होगा' ही सुनाता हूं।

सेंसेक्स विकट दयालु है। वो किसी का बुरा या नुकसान नहीं चाहता। उसकी शरण में जो भी आता है, सभी को बड़ी सहजता और सरलता से लेता है। कभी-कभी तो मुझे सेंसेक्स के दिल में कवि या साहित्यकार घुसा हुआ-सा जान पड़ता है।

सेंसेक्स इसलिए भी अधिक सहज है क्योंकि वो दिखावा नहीं करता। जैसा बाहर से है, वैसा ही भीतर से भी। उसका अब तक का रिकॉर्ड देख लीजिए, जो कभी उसने अपनी सफलता का जश्न मनाया हो। हां, उसके चाहने वाले मानते हैं, तो उसे अच्छा लगता है। इतनी विनम्रता तो इंसानों में भी नहीं पाई जाती।

मैं तो दिल से चाहता हूं, सेंसेक्स दिन दुगनी, रात चौगनी तरक्की करे। अभी इसने 37 हजार के स्तर को पार किया है, जल्द ही 44 हजार को भी क्रोस कर जाए। दुनिया को दिखा दे कि कामयाबी का रास्ता खमोशी से भी निकल सकता है।

औरों का नहीं मालूम लेकिन मेरे लिए तो प्रेरणा का दूसरा नाम सेंसेक्स है। इतनी ऊंचाई पर पहुंच कर भी खुद को इतना सहज रख पाना यह हर किसी के बस की बात नहीं।

ऊपर वाले से दुआ करता हूं, सेंसेक्स की ये ऊंचाई, उदारता और सहजता हमेशा बनी रहे।

गुरुवार, 2 अगस्त 2018

आइए, मुझे 'ट्रोल' कीजिए

यद्यपि मैं जानता हूं कि 'ट्रोल करना' या 'ट्रोल होना' दोनों ही सबसे खतरनाक सोशल अवस्थाएं हैं, फिर भी, मैं 'ट्रोल' होना चाहता हूं। ट्रोल होकर उससे मिलने वाले 'यश' या 'अपयश' को भुगतना चाहता हूं। देखना चाहता हूं, कल को मेरे ट्रोल होने पर अखबारों में जो 'हेड-लाइन' बनती हैं, वो कैसी होंगी। निजी अनुभव लेना चाहता हूं कि मेरे ट्रोल होने पर सोशल मीडिया और मेरे नाते-रिश्तेदार मेरे बारे में क्या और कैसी राय बनाते हैं।

ट्रोल होने पर किसकी निगाह में मैं कितना उठता और कितना गिरता हूं।
वैसे, अब तक देखने-सुनने में तो यही आया है कि जो ट्रोल हुआ, उसकी किस्मत चमक गई। रातोंरात सेलिब्रिटी होने का खिताब पा गया। कल तक जो उसके नाम और काम से परिचित न थे, सब जान गए। देश से लेकर विदेश तक में उसकी ट्रोलिंग की तूती बोलने लगी। बहुत से दिलजलों ने उसकी राहों पर चलना भी शुरू किया किंतु उतने सफल न हो सके, जितना कि वो।

किस्मत चमकने का सितारा हर किसी की जेब में नहीं होता। जैसे- पहले कभी मैं भी यही चाहता कि प्रियंका चोपड़ा की तरह मैं भी बॉलीवुड में नाम कमाऊं। मगर जब अपनी शक्ल आईने में देख लेता था, 'हीरो' बनने का भूत तुरंत मेरे सिर से उतर जाता था।

मैं अच्छे से जानता हूं कि खुद को ट्रोल किए जाने की ख्वाहिश मेरा काल्पनिक भूत है पर कभी-कभी दिल को खुश रखना भी जरूरी हो जाता है।

आजकल तो कवि लोग, सोशल मीडिया पर, दिल को भी ट्रोल करने से बाज नहीं आ रहे! दिल पर ट्रोलिंग-प्रधान कविताएं लिख रहे हैं। विडंबना यह है कि लोग भी ऐसी कविताओं को चटकारे लेकर पसंद कर रहे हैं।
ट्रोलिंग आलोचना का बिगड़ा रूप है। पहले जमाने में आलोचना खासी तमीज के साथ की जाती थी, अब ट्रोलिंग बदतमीज होकर की जा रही है। ट्रोलर्स के हाथ ट्रोलिंग का उस्तरा क्या आ गया, सबको निपटाने को तैयार बैठा रहता है।

इधर सरकार भी ट्रोलिंग को लेकर सख्त जान पड़ रही है। सोशल प्लेटफार्म भी ट्रोलिंग पर हिदायतें दे रहे हैं। मगर ट्रोलर्स हैं कि मानते ही नहीं। किसी न किसी रास्ते वे अगले को ट्रोल करने का नुक्ता छेड़ ही देते हैं।

मालूम है कि ट्रोलिंग के अनुभव काफी बुरे रहे हैं पर चार लोग जान तो पाए हैं अगले को। बस ऐसा ही कुछ मैं खुद के साथ भी चाहता हूं। अच्छे करम कर मशहूर न हो सका तो क्या, ट्रोलिंग से ही हो जाऊं क्या बुरा है। यों भी, बदनामी से मिली प्रसिद्धि मुझे कुछ ज्यादा ही रास आती है। नाम है तो दुनिया-जहान में पहचान है, वरना कुछ भी नहीं।

तो साहेबान, आप लोगों को खुली छूट देता हूं। आप आइए और मुझे जमकर ट्रोल कीजिए। मैं आपके द्वारा खुद को ट्रोल किए जाने का कतई बुरा न मानूंगा, इस बात की गारंटी देता हूं।

सोमवार, 30 जुलाई 2018

ख्याली पुलाव और इमरान खान

ख्याली पुलाव पकाने में हमारा जवाब नहीं। जब दिल किया किसी न किसी मसले पर ख्याली पुलाव पकाने बैठ गए। सबसे ज्यादा ख्याली पुलाव खाली दिमागों में ही पकते हैं। कभी-कभी इतना पक जाते हैं कि जलने की बू तक आने लगती है। लेकिन पकाने वाले को जलने की बू से कोई मतलब नहीं रहता। उसे तो सिर्फ पकाने से मतलब।

जैसे- पिछले दो-तीन दिनों से इस बात पर खूब ख्याली पुलाव पक रहे हैं कि इमरान खान सेना के इशारों पर काम करेंगे या अपनी मर्जी से। भारत को इमरान खान से आपसी मसलों को सुलझाने में दिलचस्पी लेनी चाहिए कि नहीं लेनी चाहिए।... साथ-साथ मेरे कान तो यह सुनकर भी खूब पक लिए हैं कि इमरान खान का अपना कोई वजूद नहीं, वो पाकिस्तानी फौज की कठपुतली हैं।

बैठे-ठाले ख्याली पुलाव पकाने वाली को मैं दिल से दाद देता हूं। उनके हत्थे कोई भी मसला चढ़ना चाहिए बस फिर देखिए वे पुलाव को घोटकर खिचड़ी न बना दें।

किस्म-किस्म के ख्याली पुलाव तब पक रहे हैं जब इमरान खान के हाथों में पाकिस्तान पर शासन की बागडोर अभी पूरी तरह से आई नहीं है। अभी तो सबकुछ हवा में जुमलों की मानिंद तैर रहा है। अपने पहले भाषण में इमरान ने अभी तो अपनी इच्छाएं ही जाहिर की हैं कि वे पाकिस्तान को क्या बनाने का ख्वाब रखते हैं। चीन, अफगानिस्तान, अमेरिका, भारत आदि के साथ किस प्रकार के रिश्ते रखना चाहते हैं। पर आगे का सीन तो उनके कुर्सी पर बैठने के बाद ही बनेगा।

मगर भाई लोग हैं कि ख्याली पुलाव को पका-पकाकर उसे पतली दाल सरीखा बना डाला है। यह तो लगभग वही बात हो गई कि शादी अभी ढंग से हुई नहीं कि खुशखबरी सुनने की बेताबी सिर चढ़कर बोलने लगी।

अमां, अगले को अभी ढंग से गद्दी पर बैठने तो दो। कामधाम अपने हाथों में लेने तो दो। ऊंट को पहाड़ के नीचे आने तो दो। प्रधानमंत्री की कुर्सी का पहला-पहला स्वाद चखने तो दो। दो बातें अपनी, चार बातें आवाम की, दस बातें सेना की सुनने तो दो। राजनैतिक और डिप्लोमेटिक मसलों का क्या है, ये तो जन्म-जिंदगी भर के रोग हैं। इनसे छुटकारा पाना नामुमकिन है जनाब।

यों भी, पाकिस्तान का इतिहास गवाह है वहां सरकार या प्रधानमंत्री अपनी मर्जी के नहीं सेना की तानाशाही के गुलाम होते हैं। वहां तो पत्ता भी सेना के आदमियों से पूछे वगैर नहीं हिलता। अब तक जाने कितने ही शासक आए और चले गए परंतु सेना का रुतबा जैसा था वैसा ही रहा।

पाकिस्तान में सरकारें हमारे हिंदुस्तान जैसी लोकतांत्रिक सोच वाली थोड़े न होती हैं। वो तो बस दुनिया को दिखाने भर के लिए होती हैं कि देखो, हमारे यहां भी एक चुनी हुई सरकार है। जबकि उसे चुनता और गुनता कौन है सब जानते हैं।

मैं तो कहता हूं, अच्छा ही हुआ जो इमरान खान पाकिस्तान के कप्तान बन लिए। बहुत लंबे समय से वे इस जुगाड़ में थे भी कि कब वो दिन आएगा जब मैं पाकिस्तान का वजीरे-आलम कहलाऊंगा। अब जाकर आया है वो दिन।

हालांकि इमरान राजनीति की पिच पर बहुत लंबे वक्त से खेल रहे हैं। मगर फिर भी राजनीति की पिच क्रिकेट की पिच से काफी अलहदा होती है। खेल में तो आपको दस-ग्यारह खिलाड़ियों को ही संभालना होता है पर राजनीति की पिच पर तो देश और विदेश के संबंधों को साथ-साथ संभालना पड़ता है। राह कठिन तो है पर है जोरदार। लुत्फ यह है कि नेताओं के तो पांच साल खेल-खेल में कट जाते हैं।

कहने वाले तो यह भी कह रहे हैं कि मियां इमरान खान अपनी शादी, अपने परिवार को तो संभाल न पाए, इतना बड़ा मुल्क क्या खाक संभाल पाएंगे। बड़े ही भोले हैं लोग। समझते ही नहीं। शादी और मुल्क को संभालने में फर्क होता है। शादी के साथ तो हमेशा 'तू नहीं और सही' का ऑप्शन रहता है। किंतु मुल्क के साथ ऐसा सीन नहीं। वहां तो बागडोर एक दफा हाथ से फिसली तो फिर इतनी आसानी से दोबारा हाथ न आती। मियां नवाज शरीफ को ही देख लो, मुल्क की अच्छी-खासी डोर उनके हाथों में थी पर सेना ने उनसे छीनकर इमरान के हाथों में दे दी। और फिर शादी-ब्याह उनका जाति मसला है, किसी को उससे क्या। लोगों हैं लोगों का तो काम ही है कहना।

सुना तो यह भी है कि उनकी तीसरी बीवी ने उनके पाकिस्तान का प्रधानमंत्री होने की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी। सुना है, सियासत के मसलों में इमरान अपनी तीसरी बीवी से सलाह अवश्य लेते हैं। अच्छा है। एक हमारे यहां के पति हैं जो सियासत तो दूर रोमांस पर भी कोई सलाह अपनी बीवियों से न लेते। घोर अन्याय। डर भी बना रहता है न उन्हें।

बहरहाल, जिन्हें शौक है वे मन से इमरान खान पर अपने ख्याली पुलाव पकाने में व्यस्त हैं। चलिए इस बहाने वे कुछ तो कर रहे हैं। खाली तो नहीं बैठे हैं न। खाली दिमाग वैसे भी शैतान का घर होता है। ख्याली पुलाव पकाने में भी थोड़ी-बहुत बुद्धि तो खर्च होती ही है।

बाकी उम्मीद पर दुनिया कायम है ही। इमरान खान से आशा नहीं, उम्मीद ही रखें कि वे सेना के शिकंजे को तोड़ अपने मुल्क के लिए कुछ बेहतर कर पाएं! भारत भी उन पर निगाह और उम्मीद दोनों बनाए रखे है।

सोमवार, 23 जुलाई 2018

दिल मिले न मिले, गले मिलते रहिए

किस्मत वाले होते हैं वो जिन्हें किसी का गले लगना या आंख मारना नसीब होता है। वरना इस मतलबी दुनिया में किसे फुर्सत है, किसी के गले लगने या मौका भांप आंख मारने की।

उन्होंने भी तो उस रोज संसद में यही किया था, भावावेश में जाकर उनके गले ही तो लगे थे। फिर, किसी को एक आंख मार अपना रूतबा जाहिर किया था। मगर लोगों को ये भी नागवार गुजरा। उनके गले लगने और आंख मारने में तरह-तरह के तंज कसे गए। बनाने वालों ने चुटकुले तक बना डाले। ऐसा भी कहीं होता है भला!

देखा भी गया है, तीज-त्यौहार पर तो दुश्मन भी गले मिल लेते हैं। मजाक-मजाक में आपस में आंख भी मार लेते हैं। फिर ये गले मिलना तो छोटे का अपने बड़े के प्रति आदर था। हां, आंख मारने पर पेंच हो सकता है। यह भी तो सकता है कि उन्होंने आंख मारी ही न हो, आंख खुशी के मारे खुद ब खुद दब गई हो।

वैसे, ये आंखें भी न बड़ी चालू चीज होती हैं। आंखों ही आंखों में इशारा कर बैठती हैं। गुस्ताखियां आंखें करती हैं। बदनाम बेचारा इंसान हो जाता है। लोग समझते हैं, ये सब इंसान ने ही अपनी आंखों से जानकर करवाया होगा। उन्हें क्या मालूम आंखें भी मौके की नजाकत देख शरारत कर बैठती हैं।

माने या न माने, गले मिलना और आंख मारना सच्चा सेक्युलरिज्म है। गले और आंखें यह नहीं देखतीं सामने वाली की जात या धर्म क्या है। वे तो प्यार-मोहब्बत में यकीन करती हैं। वो तो हम लोग हैं, जो अपनी निजी खुन्नस की खातिर उन्हें खलनायक बना डालते हैं।
कहते रहिए, वो उनके गले पड़े थे पर हकीकत तो यही है कि वे उनसे गले मिले थे।

मैं तो अब तक इस उम्मीद में रहता हूं कि काश! ऐसे ही कोई मुझसे भी गले मिले। या सरे-राह आंख ही मार दे।

बड़े मतलबी हो गए लोग, गले मिलने को भी सियासत से जोड़ने लगे हैं। आंख मारने को बेइज्जती से। पीठ पीछे खंजर भोंकने से तो कहीं बेहतर है सामने रहकर गले मिलना।

उनका गले मिलना लंबे समय तक याद रखा जाएगा। जो याद नहीं रखना चाहेंगे वे भूल ही करेंगे। दिल मिले न मिले, गले मिलते रहिए।

रविवार, 22 जुलाई 2018

गले मिलना, आंख मारना : सियासत का एक रंग

अविश्वास प्रस्ताव को गिरना ही था, गिर गया। अब तक जिद के आगे जीत सुनते आए थे, इस दफा जिद के आगे हार देख ली। हार भी कोई ऐसी-वैसी नहीं, तगड़ी वाली। लेकिन गिरने या हारने का उन्हें कोई अफसोस नहीं। वे उनके चीख-पुकार युक्त भाषण में फिलहाल अपनी जीत देखकर ही मुतमईन हैं।

देश का बुद्धिजीवि वर्ग भी उन्हें सुन गद-गद है। वे भी उनके भाषण में कथित बोल्डनेस के तार जोड़ने में लगे हुए हैं। चूंकि हम एक लोकतांत्रिक मुल्क हैं, इस नाते हर कोई स्वतंत्र है अपनी खुशी, अपना विरोध चुनने-जताने के लिए।

मुझे तो ऐसा लगता है, भाषणबाजी तो महज बहाना थी, असली मकसद झप्पी और आंख मारने में निहित ही था। यों तो हम बहुत-सी झप्पीयां देखते आए है, पर ये झप्पी 'शुद्ध राजनीतिक' थी। अगर राजनीतिक न होती तो झप्पी के तुरंत बाद आंख भी न मारी जाती। किंतु, ये वो वाली आंख नहीं मारी गई थी, जिसमें स्नेह और अपनापन समाया होता है। जिसमें एक आंख मारने पर ही पटने-पटाने के हाव-भाव छिपे होते हैं। जिसमें अंखियों से गोली चलती हुई प्रतीत होती है। और, जिस एक आंख मारने की घटना ने पिछले दिनों सोशल मीडिया पर अभूतपूर्व तहलका मचा दिया था।

जिस तत्परता के साथ आंख को मारा गया था, स्वयं आंख को भी उम्मीद न रही होगी। आंख ने झपक जाने के बाद सोचा तो अवश्य होगा कि हाय! ये मैंने क्या किया? आंखें अमूमन बहुत भोली होती हैं, उन्हें तो यह तक पता नहीं रहता कि इंसान कब किस पल उनसे क्या काम ले लेगा। चाहे अच्छे में या मजबूरी में, बदनाम आखिर आंखों को ही होना पड़ता है। इस बार भी हुईं।

फिलहाल उनकी झप्पी और आंख मारने के अलग-अलग सियासी मतलब निकाले जा रहे हैं। बात एक छोर से निकल, दूसरे छोर तक दूर बहुत दूर तलक जाने लगी है। कुछ कह रहे हैं, ऐसा भी भला होता है कहीं, तो कुछ ड्रामा बता रहे हैं। ये तो दुनिया है, यहां हर कोई कुछ भी कहने-बोलने को आजाद है। लेकिन नेता मंडली खुश नजर आ रही है। प्रस्ताव का गिरना या उठे रहना उनके लिए इतना बड़ा मुद्दा नहीं, वे तो 2019 की चौसर पर अपने-अपने दलों के भविष्य का अनुमान लगाने में व्यस्त हैं।

जनता उतना भोली भी अब नहीं रही, जैसे पहले कभी नजर आती थी। उसने आक्रामक भाषण को भी खूब समझा। झप्पी और आंख मारने के भी मजे लिए। भाषण पर होने वाली विकट हंगामेबाजी भी उसकी निगाह से छिपी नहीं। उसे अच्छे से मालूम है, कि गड्ढा कहां है। और पानी कहां भरा हुआ है। चुनाव युक्त वादे और जुमले उसे अब मनोरंजन का साधन मात्र लगते हैं। इसलिए तो वो खुद खामोश रहकर नेताओं को चीखने-चिल्लाने का मौका देती है। उसका उत्तर तो वोट में छिपा है।

कभी-कभी तो ऐसा लगता है, जब जनता के पास विकल्प नहीं होता तो वो किसी को भी गले लगा लेती। फिर, पांच साल तक निभाती है। झेलती है। यही होता है, गले लगाने और गले पड़ने का हश्र। कोई जरूरी नहीं जो गले लगा हो वो आपका हमदर्द ही हो। हो सकता है, जान कर गले पड़ रहा हो ताकि आपस में गलबहियों की गुंजाइश बनी रहे।

जिस तरह वे उनके करीब आ कर गले लगे, मानो दिल खिले। अब कितने खिले या नहीं खिले ये तो उनके दिल ही बता सकते हैं। पर सियासत में कभी-कभार ऐसे गले आपस में मिला लेने चाहिए। ताकि गलों को भी ये भरोसा रहे कि वे सिर्फ कटने के लिए ही नहीं होते।

इस झप्पी, आंख और गले मिलन के सीन को देखने के बाद सोच रहा हूं, मुझे भी अपने भीतर थोड़ा सुधार लाना चाहिए। किसी से दिल मिले न मिले हां गला अवश्य ही मिलाते रहना चाहिए। हर्ज तो आंख मारने में भी कुछ नहीं पर वो सीधी जगह जाकर ही लगे इस पर भरोसा बैठाना थोड़ा मुश्किल है।

कुछ भी कहिए, सियासत बहुत खूबसूरत शै है। अच्छा या खराब लगने की यहां अधिक टेंशन नहीं। दुनियादारी का झंझट नहीं। जनता को दिखाने के लिए दुश्मन हैं पर अंदर झप्पी और पप्पी की जगह बनी रहती है। गले मिलकर आंख मारने की छूट भी सियासत में ही संभव है। वरना ऐसा आम जिंदगी में करके देखिए कभी, दिन में चांद-सितारे न नजर आ जाएं तो कहिएगा।

कोई मलाल नहीं अविश्वास पर विश्वास कायम न हुआ। घर बैठे जो मनोरंजन हुआ उसे तो इतिहास भी याद रखेगा हमेशा। गर्व करिए कि देश के नेता न केवल अपने भाषणों से बल्कि झप्पी और आंख से भी खुद को कूल और जनता को बेफिक्र रखना जानते हैं।

सियासतदां सबकुछ साधना जानते हैं। वो तो हमारी ही बेचारगी है, जो उनकी तिकड़मों को समझ नहीं पाते। अगर समझ भी लें तो भी क्या।

सोच रहा हूं, उनकी तरह झप्पी और आंख मारने का एक प्रयोग मैं भी करके देख ही लूं शायद बरसों से बिगड़ी बात अब बन जाए। न बन पाई तो यह मानकर संतोष कर लूंगा- तुमसे न हो पाएगा बेटा।

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

हर कोई थूक रहा है

किसी वक़्त मुझे थूक और थूकने वालों से बहुत चिढ़ होती थी। किसी को भी थूकते देख दिमाग भन्ना जाता और दिल भीषण घृणा से भर उठता था। जी तो करता अभी उस बंदे का गिरेबान पकड़ उसके गले में जितना थूक जमा है अपनी उंगलियां डाल सब निकाल लूं। न आंगन टेढ़ा होगा। न राधा नाचेगी।

मतलब हद होती है, जहां जिसको स्पेस मिलता नहीं कि या तो थूक लेता है या फिर मूतने खड़ा हो जाता है। मानो हर सड़क, हर दीवार पर उनके बाप-दादाओं की हुकूमत चल रही हो! हम एक लोकतांत्रिक मुल्क है पर इसका यह अर्थ तो नहीं कि हमने अपने थूक को भी स्वतंत्र कर रखा है। जिधर मन किया आ...क... थू कर दिया। सभ्यता नाम की भी कोई चीज होती है जनाब। लेकिन थूक वीरों को सभ्यता-संस्कृति से क्या सरोकार। कभी-कभी तो उन्हें थूकता देख ऐसा फील होता है, मानो- ईश्वर ने उन्हें धरती पर उतरा ही केवल थूकने और थूकते रहने के लिए है।

जबकि और देशों में ऐसा नहीं है। वहां आप सड़क चलते कभी थूक कर देखिए। तुरंत चालान हो जाएगा। इंसान तो दूर वहां तो कुत्ता भी यों ही सड़क पर हगने से घबराता है। आखिर वे साफ-सफाई पसंद लोग हैं।

मगर हमारे यहां का तो सीन ही उल्टा है। यहां तो आप न थूकने वाले को, न मूतने वाले को, न कूड़ा फेंकने वाले को, न अपने कुत्ते को बीच सड़क हगाने वाले को टोक ही नहीं सकते। दो सेकंड में दोनों तरफ से तलवारें खींच आती हैं। बड़े ही बिंदास अंदाज में न केवल मां-बहन बल्कि पुरखों तक को याद फरमा लिया जाता है। बात बढ़ते-बढ़ते राजनीतिक रसूख तक आ पहुंचती है। मामला कोर्ट-कचहरी में भी आ लेता है।

तो भला ऐसी विकट स्थिति में कौन किसको थूकने से कह या मना कर सकता है! थूकने को तो हमने 'अभिव्यक्ति की आजादी' सरीखा बना लिया है। हमारे आस-पास की रंग-बिरंगी दीवारें इस आजादी की दास्तान स्वयं कहती हुई मिल जाएंगी।

वो दफ्तर, सरकारी या गैर-सरकारी, ही क्या जिसकी दीवारों पर पीक की कलाकृतियां न मिलें। आलम यह है, थूक वीर अपने थूक से दीवारों को इतना सजा देते हैं कि कभी-कभी तो वो पहचान में ही नहीं आ पातीं कि दीवारें हैं या पीकदान...!

मैं तो सोचता था कि थूका-थाकी के दीवाने सिर्फ मेरे ही शहर में हैं। मगर थूकने वालों की सभ्यता के दर्शन मैंने तो मुंबई में भी साक्षात किये हैं। आर्थिक राजधानी की दीवारें भी थूक के असर से बेअसर नहीं।

मेरे जैसे चंद 'थूक ना-पसंद' लोगों को थूक देखकर बेशक जलन होती हो पर थूकने वाले हर जलन से बे-फिक्र होते हैं। कहीं भी  थूककर उन्हें लगता है जैसे उन्होंने थूककर वहां अपने थूक की नाल गड़ दी हो। कभी पान-मसाला खाए बंदे को थूकते देखिए...। उसके मुंह से निकली पान की पीक कब किसके कपड़े रंग दे खुद उसे भी यह एहसास न रहता। न जाने कितनी दफा इस रंगत का सुख मेरे ही कपड़े भोग चुके हैं। मगर इस पाप के लिए अगले पर गुस्सा होने का तो मुझे नैतिक अधिकार ही नहीं। क्योंकि उसका एक 'सॉरी भाईसाहब' हर पाप पर भारी है।... कुछ ऐसे शालीन लोग भी मुझे मिले हैं, जो मुझ पर थूकने के बाद मुझी से रूमाल मांग मेरी शर्ट पोंछ चुके हैं। उनकी शालीनता देख वैसे ही मेरा गला भर आता है, उन पर गुस्सा होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।
कबीरा इस संसार में भांति-भांति के थूक-वीर...।

विडंबना देखिए, कूड़े-कचरे पर सख्ती, साफ-सफाई पर बड़ी-बड़ी बातें खूब हो रही हैं। स्वयं प्रधानमंत्री जी और राज्य सरकारें भी स्वच्छता मिशन में जी-जान से जुटी हुईं हैं। स्मार्ट सिटी का दर्जा पाने के लिए शहर संघर्षरत हैं। परंतु थूक-वीर सबसे बेखबर बस थूके ही जा रहे हैं। उनके ठेंगे से आप कूड़ा सड़क पर फैलाएं या डस्ट-बीन में डालें। उन्हें तो कहीं भी थूकने से मतलब। समझ नहीं आता, सरकार ने थूक और थूकने वालों को क्यों स्वच्छता अभियान से दूर रखा है!

कहा तो यह भी जाता है कि 'इंसान को अपना गुस्सा थूक देना चाहिए।' थूकने वाले जगह-जगह थूककर कहीं इसी कथन का तो पालन नहीं कर रहे? थूकने वालों में हो सकता है कुछ ऐसे बाशिंदें भी हों जो पान-मसाले के बहाने अपना गुस्सा थूककर बाहर निकालते हों!  इसीलिए वे कहीं भी थूकने से डरते न हों! शायद इसी गुस्से के कारण उनके मुंह में थूक की मात्रा ज्यादा बनती हो!... यह भारत है। यहां कुछ भी हो सकता है। मेरे विचार में यह गहन शोध का विषय है।

लेकिन अब सोच रहा हूं, थूकने वालों के प्रति मैं अपना नजरिया थोड़ा बदलूं। नाहक ही उन पर नाराज होने या चिढ़ने से कोई फायदा नहीं। खामखां, अपनी एनर्जी को क्यों वेस्ट करना। बैठे-ठाले क्यों किसी से पंगा लेना? हो सकता है, उनके थूकने के पीछे बड़े कारण रहे हों! यों भी, कोई शौकिया तो थूकेगा नहीं यहां-वहां!

चलिए। छोड़िए। इस बेतुकी बहस को। और भी गम हैं दुनिया में थूक के सिवा!

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

स्मार्टफोन न खरीद पाने का दुख

यों तो ऊपर वाले का दिया मेरे पास सबकुछ है, बस स्मार्टफोन ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि मैं स्मार्टफोन खरीद नहीं सकता। खरीद सकता हूं, लेकिन खरीदता इसलिए नहीं क्योंकि स्मार्टफोन मेरे लिए 'अशुभ' है!

पिछले दिनों शहर के एक ऊंचे ज्योतिष ने- मेरे ग्रहों के बर्ताव को देखते हुए- मुझे हिदायत दी कि मैं स्मार्टफोन न ही रखूं! यह मेरी सेहत और व्यवहार के वास्ते विकट अशुभ साबित हो सकता है! उन्होंने यह भी बताया- इसका असर मेरे जीवन पर तकरीबन दस साल तक बना रहेगा।

इस अशुभता से निजात पाने का जो उपाय उन्होंने बताया वो मेरे तईं कम से कम इस जीवन में तो कर पाना संभव नहीं। उपाय यह है कि हर हफ्ते शनिवार के दिन मुझे अपनी पत्नी से लड़ाई करनी होगी! पत्नी से लड़ लेने का मतलब आप समझते हैं न। अंधे कुएं में छलांग लगाने से क्या हासिल!

इसलिए चाहते हुए भी मैं स्मार्टफोन नहीं खरीद सकता।

बिन स्मार्टफोन के मेरी जेब और लाइफ तकरीबन खाली-खाली सी लगती है। इस दर्द को केवल मैं ही समझ सकता हूं। कई दफा दिल में उचंग उठती है कि ग्रहों की बंदिशों को धकिया कर अभी बाजार जाऊं और एक बढ़िया-सा स्मार्टफोन खरीद लूं। मगर नहीं खरीदता। कल को कहीं ग्रहों में ऊंच-नीच हो गई तो सारा दोष मेरे माथे ही मढ़ दिया जाएगा।

स्मार्टफोन का न होना मेरे लिए दुनिया के तमाम दुखों से कहीं बड़ा दुख है। कभी-कभी तो इस वहज से मैं ऑफिस और नाते-रिश्तेदारियों में होने वाले फंक्शन में भी नहीं जाता। क्या भरोसा कोई पूछ ही बैठे, आपके पास स्मार्टफोन नहीं है क्या? तब मेरे पास आसमान को ताकने के सिवाय कोई और रास्ता न होगा!

आप यकीन नहीं करेंगे, मेरे तो ऑफिस-बॉय के पास भी स्मार्टफोन है! अक्सर ही वो मुझे मेरे पास स्मार्टफोन न होने का अहसास कराता रहता है।

स्मार्टफोन पास होता है तो मन और जीवन में एक आत्मविश्वास-सा बना रहता है। दुनिया वालों पर एक ठसक सी कायम रहती है, सो अलग।

वाकई बड़े खुशनसीब हैं वे लोग जो स्मार्टफोन रखते हैं। सुना है, स्मार्टफोन रखने वालों के सितारे कभी गर्दिश में नहीं आते! जिसके पास स्मार्टफोन होता है, दुनिया उसे उसी तरह झुककर सलाम ठोकती है, जैसे पहले कभी मारुति-800 रखने वालों को ठोका करती थी।

समाज के बीच अपने स्टेटस को बनाए रखने के लिए इंसान क्या-क्या नहीं करता।

ग्रहों और ज्योतिष महाराज के मुताबिक अभी मुझे दस साल स्मार्टफोन के लिए इंतजार करना होगा। दस साल में दुनिया-समाज जाने कहां से कहां पहुंच जाएगा। यहां तो एक पल में ही टेक्नोलॉजी के भीतर-बाहर कितना कुछ बदल जाता है।

इस बात की भी क्या गारंटी है कि दस साल तक मैं इस धरती पर बना ही रहूं! लाइफ की कोई वेलिडिटी न होती प्यारे।

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

जल्द ही मैं भी अपना लक पहनकर चल सकूंगा

मैं कई दिनों से इस कोशिश में लगा हूं कि अपना लक पहनकर चल सकूं। लेकिन लक है कि मेरे खांचे में ही नहीं आ पा रहा। जबकि लक की जरूरत के मुताबिक मैंने अपना आकार-प्रकार भी घटा लिया है। बात फिर भी बन नहीं पा रही।

बार-बार दिल में यही ख्याल आता है कि मेरा लक दूसरों के लक से भिन्न क्यों है? भाग्य (लक) जब सबका साथ देता है तो मेरा क्यों नहीं दे रहा?
आप यकीन नहीं करेंगे। अपने लक को मनाने की खातिर मैंने 14 बुधवार के व्रत और 5 शनिवार की पूजा तक निपटा डाली है। अपनी नास्तिकता की प्रवृत्ति को आस्तिकता में तब्दील कर लिया है। मेरे भीतर इस धार्मिक परिवर्तन को देख घर वाले भी खासे आश्चर्यचकित हैं। सब कह रहे हैं कि ये मुझे हुआ क्या है? हालांकि मैं किसी के कहने-सुनने पर ध्यान नहीं देता। मुझे जो करना होता है, करता हूं।

आसपास के लोगों को जब मैं उनके पहने हुए लक के साथ चलता देखता हूं तो मन में भीषण ग्लानि-सी पैदा होती है। अपने-अपने लक के साथ लोग बड़े ही खुश नजर आते हैं। उनका जीवन मुझे अपने से ज्यादा सरल दिखाई देता है। आज लक का दिया उनके पास सबकुछ है। मेरे पास क्या है? ले देके एक उम्मीद। अब उम्मीद पर भी दुनिया या लक कहां कायम है! समय साथ सब बदल चुका है।

बताते हैं, मेरे लक में बचपन से ही खटाई पड़ी हुई है। जब मैं हुआ था, तब हस्पताल में बाढ़ आ गई थी! सूरज का रंग पीले से सिलेटी पड़ गया था! हवा उल्टी दिशा में बहने लगी थी! तब मुझसे अधिक मेरे लक (भाग्य) को कोसा गया था। यहां तक की डॉक्टर साहिब ने भी कह दिया था कि ये बच्चा बड़ा होकर बेहद अन-लक्की लेखक साबित होगा। देखिए, सबूत सामने है।

अपना लक अपने खिलाफ भी हो सकता है, यह मैंने खुद पर पड़ी तब जाना।

ऐसा भी नहीं है कि मेरी मेरे लक से बहुत बड़ी-बड़ी ख्वाहिशें हों। मुझे तो सिंपल उसे पहनकर चलना है। दुनिया को बताना है कि मैं भी अपना लक पहनकर चलने की हैसियत रखता हूं। उस पर भी मेरे साथ इतना भेदभाव। यह तो ठीक नहीं है।

अरे, लोग तो जाने क्या-क्या पहनकर चलते हैं। उसमें भी जाने कितना चोरी और उधार का शामिल होता है। मगर उनका लक तो उनसे खफा नहीं होता। तो मेरे लक को मुझसे ही क्या प्रॉब्लम है?

मेरा लक कहीं मतलबी तो नहीं हो गया है? हालांकि यह मेरी महज खामख्याली है। पर कभी-कभी न चाहते हुए भी अपने लक पर शक करना पड़ता है। शक करना तो वैसे भी मानव-प्रवृत्ति है। जाने कितने ही घर शक की आग में भस्म हो गए। फिर भी, मनुष्य ने शक पर विश्वास रखना बंद नहीं किया। तो मैं कौन-सा नया काम कर रहा हूं? किसी और के नहीं खुद के लक पर ही तो शक कर रहा हूं। हो सकता है, इसी से मुझे मानसिक शांति मिल जाए।

जो भी हो लेकिन मुझे इस बात का भी पक्का यकीन है कि एक दिन मैं अपने लक को खुद के फेवर में पटा ही लूंगा। औरों की तरह मैं भी अपना लक पहनकर चल सकूंगा। तब मुझे खुद पर शर्म भी नहीं आएगी।

फिलहाल, इस करिश्मे के इंतजार में हूं।

सोमवार, 9 जुलाई 2018

मेरे मरने के बाद...

जीते-जी इस बात का पता लगाना बेहद मुश्किल है कि ये दुनिया, समाज और नाते-रिश्तेदार आपके बारे में क्या और कैसा सोचते हैं। ये सब जानने के लिए आपको मरना पड़ेगा। क्योंकि इंसान की सामाजिक औकात का पता उसके मरने के बाद ही लगता है।

तो, एक दिन मैंने भी यही सोचा क्यों न मर ही लिया जाए। यों भी, जिंदा रहकर मैं कौन-सा अपने चमन को गुलजार कर रहा हूं। मरूंगा तो कम से कम चार लोग मेरी खैर-खबर तो लेंगे। मेरे बारे में दो बातें बुरी तो पांच अच्छी भी बोलेंगे। यमराज की भी एक दिन की दिहाड़ी पक्की हो जाएगी।

मौका पाते ही एक रोज मैंने अपने मरने की खबर वाइरल करवा दी। खबर एक घर से दूसरे घर कम, फेसबुक-व्हाट्सएप पर अधिक दौड़ी। जिसने सुना लगभग हिल-सा गया। अभी उम्र ही क्या थी...के जुमले फिजाओं में तैरने लगे। मेरे जाने को व्यंग्य लेखन का बहुत बड़ा नुकसान बताया गया। फेसबुक पर मेरे लिखे व्यंग्य टांगे जाने लगे। मुझ पर पोस्टें भी लिखी गईं। व्हाट्सएप पर मुझे धीर-गंभीर टाइप श्रद्धांजलि भी दी गई।

ये सब तो खैर सोशल मीडिया पर चलता रहा। आदमी का चरित्र सोशल मीडिया पर कुछ और जमीन पर कुछ और ही होता है।

जमीन पर मेरे खर्च होने की जमीनी हकीकत यह रही कि सब अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त रहे। मेरे मरने की खबर को 'आम खबर' की तरह ही लिया गया। दो-चार लेखक लोग मेरे घर मुझे 'अंतिम सलाम' कहने पहुंचे। दो-चार मिनट मेरे सिरहाने भी बैठे। एक ने तो आपसी खुसर-पुसर में यहां तक कह डाला- 'अच्छा ही हुआ जो महाराज निपट लिए। अखबार में कम से कम एक जगह, एक दिन तो खाली हुआ। वरना, तो जब तक रहा अखबार के कॉलम पर अपना हक जमाए रहा।'

दूसरे ने पहले वाले कि हां में हां मिलाते हुए कहा- 'ठीक फरमाया यार। व्यंग्य की बहुत बड़ी चिरांद था ये। खुद को शौकत थानवी और लतीफ घोंगी से कम नहीं समझता था। जबकि आता-जाता इसे व्यंग्य का 'व' तक नहीं था।' व्यंग्य लेखन पर बोझ थे मियां। तीसरे ने नुक्ता जोड़ा।

मैं अपने भूतपूर्व साथी लेखकों की अपने बारे में जाहिर की जा रही राय को सुन मन ही मन खुश हो रहा था। खुद को दुआएं भी दे रहा था कि अच्छा हुआ मुझे मेरी लेखकीय औकात का अहसास करवा दिया साथी लोगों ने। वरना तो मैं अपने को जाने क्या माने बैठा था।

मरने के बाद अमूमन आदमी को अपनी तारीफें ही सुनने को मिलती हैं मगर मैं लक्की रहा कि मुझे अपनी बुराइयां सुनने को मिलीं। बुरा बनकर रहने में भी सुख है। पर ये सुख हर किसी के नसीब में नहीं आ पाता।
एक बात मुझे और भी पसंद आई कि मेरे जाने के बाद न अखबारों में मेरे ऊपर कोई लेख ही आए न पत्रिकाओं ने मुझ पर केंद्रित अंक ही निकाले। अगर आ जाते तो ऊपर वाले को अपने लेखकीय चरित्र का स्पष्टीकरण देना मेरे तईं बड़ा कठिन पड़ता।

वैसे, बतौर लेखक मरने में हजार झंझट हैं। लोगबाग लेखक को बुद्धिजीवि समझ सेंटी टाइप हो जाते हैं। जबकि हकीकत यह है कि लेखक बुद्धिजीवि नहीं होता। सिर्फ अपनी बुद्धि की कमाई खाता है।

अगर आप भी लेखक हैं तो एक दफा मरकर जरूर देखिए। लोगों के भीतर छिपे, आपके बारे में, सारे सच पता चल जाएंगे।

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

देख लेना, गिरकर फिर उठेगा रुपया

गिरना एक स्वभाविक प्रक्रिया है। कुछ मैदान-ए-जंग में गिरते हैं तो कुछ मैदान-ए-बाजार में। गिरकर जो उठ या संभल नहीं पाते, दुनिया उन्हें बहुत जल्द भूला देती है। जैसे- शेयर बाजार के जाने कितने ही शेयर। आज उन शेयरों का अता-पता तक नहीं। एक बार गिरे तो कभी उठ ही न सके।

यह भी उतना ही सत्य है कि गिरने वाले की हंसी अवश्य बनाई जाती है। उस पर हंसकर उसे इस बात का एहसास कराया जाता है कि तूने गिरकर कितना बड़ा 'अनर्थ' कर डाला। फिर भी, होते है कुछ ऐसे लोग जो अपने गिरने का जबाव खीझकर नहीं बल्कि खुद को साबित कर देते हैं। जैसे- खेल के मैदान पर इस बात को जाने कितनी ही दफा सचिन तेंदुलकर और महेंद्र सिंह धोनी ने सिद्ध भी किया है।

हाल-फिलहाल तो गिरावट का संकट रुपए पर आन पड़ा है। रुपया गिरकर 69 पर अटक गया है। डॉलर ने रुपए को भरे बाजार पटखनी दे डाली है। गिरे रुपए का मजाक बनाया जा रहा है। कोई सोशल मीडिया पर चुटकले खींच रहा है तो कोई बाजार में बत्तीसी फाड़ रहा है। मंदड़िये रुपए के फिसलने पर खुश हैं तो तेजड़िये दुखी।

मगर रुपया स्थिर है। वो अपनी हंसी बनाने का बुरा नहीं मान रहा। उसे मालूम है कि यह गिरावट आंशिक है। गिरकर वो फिर से उठेगा। डॉलर को ईंट का जबाव पत्थर से देगा।

इससे पहले भी तो जाने कितनी दफा रुपया गिरा है। किसी ने संभाला नहीं, खुद ही संभला है। रुपया बहुत समझदार है। उसे अच्छे से मालूम है कि देश की अर्थव्यवस्था का दारोमदार उसके कंधों पर टिका है। वो गिरा-पड़ा रहेगा तो आर्थिक ढांचा ही गड़बड़ा जाएगा।

रही बात उसके लुढ़कने पर हंसने वालों की तो ये वही लोग हैं जो अपनी हंसी हंसते और दूसरे की हंसी पर रोते हैं। इनकी फिक्र रुपया नहीं करता।

रुपए को मैं अपनी प्रेरणा मानता हूं। उसके गिरकर उठने के जज्बे को सलाम करता हूं। ऐसा साहस बहुत कम लोगों में होता है। अपने इसी साहस के दम पर ही तो रुपया बाजार में अब तलक टिका हुआ है।

रुपया बरेली के बाजार में गिरा झुमका थोड़े है कि उठे ही न।

सोमवार, 2 जुलाई 2018

बुरा मानने वाले

ऐसे लोग मुझे बेहद पसंद हैं, जो बुरा मानते हैं। या कहूं, धरती पर जन्म ही उन्होंने बुरा मानने के लिए लिया होता है। वे इसी खुशफहमी में डूबे रहते हैं कि यह दुनिया टिकी ही उनकी बुरा मानने की आदत पर है। वे अगर बुरा नहीं मानेंगे तो विश्वभर की तमाम बुरी आत्माओं का भविष्य खतरे में आ जाएगा।

उनके बुरा मानने का कोई विषय या मुद्दा निर्धारित नहीं होता। किसी भी बात का बुरा मान सकते हैं। यों भी, बुरा मानने या जुबान चलाने में कभी एक नया पैसा खर्च नहीं करना होता।

बुरा मानने का तो ये है कि आप नल में पानी न आने से लेकर पक्षी के सिर पर हग देने तक का बुरा मान सकते हैं। हालांकि इन दोनों घटनाओं के घटने पर जोर किसी का भी नहीं है, तो क्या, उनको तो बुरा मानने से मतलब। कई बुरा मानने वाले मैंने तो ऐसे भी देखे हैं, जो अक्सर अपने जन्म लेने को ही बुरा मानते हैं। कहते हैं, जन्म लेकर जीवन की बहुत बड़ी गलती कर दी।

उन्हें समझाना बेकार है क्योंकि बुरा मानने को वे अपना लोकतांत्रिक हक मानते हैं।

सुन या देखकर ऐसा लगता जरूर है कि बुरा मानना बेहद सरल विधा है। किंतु ऐसा है नहीं। हर बात पर बुरा मानने के लिए आपको दिल से ज्यादा दिमाग को मजबूत करना होता है। काम सिर्फ बुरा मानने से ही नहीं चल जाता। डिपेंड यह करता है कि आप किस बात का कितनी देर या कितने लंबे समय तक बुरा मानते हैं। कुछ क्षणिक भर को बुरा मानते हैं तो कुछ जन्म-जिंदगी भर बुरा माने रहते हैं। बुरा माने रहने में धैर्य बहुत बड़ी भूमिका निभाता है।

निजी और सामाजिक जीवन में जब से सोशल मीडिया का असर बढ़ा है, लोगों की बुरा मानने की आदत में भी खासा इजाफा हुआ है। जहां तक मेरा अंदाजा कहता है, सोशल मीडिया पर तकरीबन अस्सी प्रतिशत लोग किसी न किसी बात पर बुरा मान ही जाते हैं। कभी-कभी तो मामला कोर्ट-कचहरी तक भी खींच जाता है।

बर्दाश्त करना क्या होता है, इस पर तो सोशल मीडिया पर बुरा मानने वाले वीर विचार करना ही पसंद नहीं करते। मानो- जब तक वे किसी बात का बुरा नहीं मान जाएंगे, उनका खाना हजम नहीं होगा।

गाहे-बगाहे मैं भी कोशिश करता रहता हूं बुरा मानने की लेकिन अभी वो बात मुझमें नहीं आ पाई है। मगर लगा हुआ हूं। एक दिन मैं भी बुरा मानने का हुनर सीख ही लूंगा। किसी और लाइन में भले ही नाम न कर पाऊं, बुरा मानने में तो कर ही लूंगा।

अच्छे और भले लगते हैं मुझे वे लोग जो अपने बुरा मानने को दिल में नहीं रखते। बाहर निकाल देते हैं। जमाना ही कुछ ऐसा हो चला है, जो जितना बुरा मानेगा, वो उतना ही बड़ा साहसी कहलाएगा।

शुक्रवार, 29 जून 2018

पाप का घड़ा

इन दिनों मेरे साथ कुछ भी ठीक नहीं हो रहा। कभी बनता काम बिगड़ जाता है, तो कभी सड़क चलते कोई भी लड़ लेता है। चार रोज हुए, उल्टे पैर की कन्नी उंगली में ऐसी चोट लगी कि दिन में चांद-सितारे नजर आने लगे। जैसे-तैसे उससे करार पाया तो अभी कोई फुटबॉल चुरा ले भागा। कल जेब से पांचों का नोट गिरकर जाने किस का भला कर गया।
आलम यह है कि अब तो खुद की शक्ल आईने में देखने से घबराने लगा हूं, क्या पता, आईना ही कहीं टेढ़ा-मेढ़ा न हो जाए!

शहर के सबसे समझदार ज्योतिष को अपना हाथ दिखाया तो उन्होंने मेरे ग्रहों का चाल-चलन दुरुस्त न बताकर दो हजार रुपए सीधे कर लिए। साथ में एक उपाय और बता दिया कि रोज आधी रात के बाद गधे की पूंछ के चार बाल तोड़कर शमशान की मिट्टी में गाड़ दूं। लेकिन इस बात का खास ख्याल रखूं कि गधा हर बार अलग होना चाहिए।

अब मेरा कोई गधों का कारोबार तो है नहीं कि हर रोज एक नया गधा मिल जाएगा। यों भी, शहर में हर रोज एक नए गधे को ढूंढना, सड़क पर गड्ढे ढूंढने से भी ज्यादा कठिन काम है। शहरी गधे देहाती गधों के मुकाबले यों भी सयाने होते हैं।

अतः ज्योतिष महाराज के उपाय से अपना पिंड छुड़ाया।

बहुत सोचने पर मैंने पाया कि ये सब मेरे 'ग्रह-दोष' के कारण न होकर मेरे 'पाप का घड़ा' भरने की वहज से है। मतलब- मेरे पापों का घड़ा भर चुका है। जब पाप का घड़ा ओवरफ्लो होने लगता है तब जीवन में ऐसी खतरनाक किस्म की घटनाएं होने लगती हैं।

यह बात अलहदा है कि किसी के पाप का घड़ा देर से भरता है तो किसी का जल्दी। लेकिन भरता अवश्य है, यह तय है।

मगर मैं मेरे पापों का घड़ा भरने से परेशान कतई नहीं हूं। बल्कि खुश ही हूं कि चलो, पाप का घड़ा मेरी उम्र के चालीसवें बसंत में ही भर गया। वरना तो लोगों के पापों का घड़ा अस्सी-नब्बे साल की उम्र तक भी न भर पाता। यह ऊपर वाले की मुझ पर अतिरिक्त कृपा रही। मैं उसका ऋणी हूं।

समय रहते जो काम निपट जाए उसी में भलाई है। मैं भी कब और कहां तक अपने पाप का घड़ा यहां-वहां लिए-लिए घूमता।

अब जबकि मेरे पाप का घड़ा भर ही चुका है, तो मैंने हर किसी से डरना भी छोड़ दिया है। यहां तक की बीवी से भी। पहले तो अनजाने डर के कारण से उसे मैं जबाव भी नहीं दे पाता था, मगर अब तुरंत दे देता हूं। ऑफिस में बॉस को भी जब मौका पड़ता है, खरी-खोटी सुना डालता हूं। मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाते। बस मन मसोस कर रह जाते हैं।

ऐसा लोगों का भरम है कि पाप का घड़ा भरना बुराई का प्रतीक है। जबकि ऐसा कुछ नहीं है। पाप का घड़ा भरते ही बंदा एकदम निडर टाइप हो लेता है। बिल्कुल मेरी तरह।

कम उम्र में पाप का घड़ा भर जाने का सबसे बड़ा फायदा यही मिलता है कि ज्यादा बड़े घड़े की जुगाड़ नहीं करनी पड़ती। छोटे घड़े से ही काम चल जाता है।

इतने ज्यादा पापों से भी क्या हासिल कि अतिरिक्त घड़े की व्यवस्था करनी पड़े। कम पाप, छोटा घड़ा।

पहले के मुकाबले आज के समय का इंसान ज्यादा समझदार है। वक्त से पहले ही अपने पापों का घड़ा भर जीवन से मुक्ति पा लेता है। किया भी क्या जाए; अब पाप ही इतने तरह के होने लगे हैं। पाप भी ऐसे-ऐसे की दांतों तले उंगली दबा ले।

बहरहाल, जिनके पापों का घड़ा जल्दी भर गया है, वे मेरी तरह जश्न मना सकते हैं। बाकी अपने घड़ों के भरने का इंतजार करें।

गुरुवार, 28 जून 2018

सपनों का न आना

मुझे सपने नहीं आ रहे। सपनों के न आने से मैं खासा परेशान हूं। पूरा दिन इसी सोच-विचार में निकल जाता है कि आखिर क्या कारण है, जो सपनों ने मुझसे किनारा कर लिया है।

सपने न आने की समस्या जब भी पत्नी या यार-दोस्तों के समक्ष रखता हूं तो यह कहकर मुझे टाल देते हैं कि 'अच्छा है जो तुम्हें सपने नहीं आ रहे। आजकल के वक्त में सपनों का न आना ही बेहतर।' मगर उन्हें मैं यह कैसे समझाऊं कि सपनों का न आना मेरे लिए सही नहीं है। सपनों से मुझे उतना ही प्यार है, जितना एक मां को अपने बच्चों से होता है।

सपने मेरे जीवन का आईना हैं। इस आईने में मैं वो सबकुछ देख पाता हूं, जो मुझे हकीकत में कहीं नजर नहीं आता। मुझे अपने पागलखाने में होने का अहसास सपने में ही तो हुआ था। मैं तमाम पागलों के बीच उनसे जिंदगी के असली मायने समझ-जान रहा था। उनसे बात करके कभी लगा ही नहीं कि वे पागल हैं। बल्कि मुझे तो यह दुनिया, यह समाज उनसे कहीं अधिक पागल नजर आया। मंटो में भी तो इस दुनिया को पागलखाना कहा था।

लोगों और दुनिया के पागल होने के प्रति मेरी धारण इससे भी और मजबूत होती है, जब वे यह कहते हैं कि इंसान को सपने आना उसके पागलपन की निशानी है। उन्हें क्या मालूम इस पागलपन में कितना सुकून है। वो इंसान ही क्या जिसे सपने नहीं आते।

या, कहीं ऐसा तो नहीं मुझे सपने मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल करने के कारण न आते हों? कहीं मोबाइल और सपने के बीच छत्तीस का आंकड़ा तो नहीं? मोबाइल से निकलने वाली खतरनाक तरंगें ही मेरे सपनों को दिमाग में आने से रोके रखती हों? मोबाइल पर मेरी जब से निर्भरता अधिक बढ़ी है, तब से एक सपनों ने ही नहीं बच्चों ने भी मेरे करीब आना छोड़ दिया है। जब तब वो तपाक से मुझसे कहा देते हैं कि पापा आपके पास क्या आएं, आप तो दिनभर मोबाइल में ही व्यस्त रहते हो!

तो क्या मोबाइल ही मेरे सपनों को काट रहा है! सम्भवता यही वजह हो सकती है मुझे सपने न आने की। सपनों को भी एक स्पेस चाहिए होता है, हमसे रू-ब-रू होने के लिए। मगर हमने तो उस खाली जगह में मोबाइल को कब्जा दे दिया है। फिर भला कैसे आएंगे सपने मुझे।
लेकिन मैं सपने चाहता हूं। इसके लिए चाहे मुझे मोबाइल को ही अपनी जिंदगी से रुखसत क्यों न करना पड़े। सपने नहीं आएंगे तो जिंदगी में उमंग कहां रह जाएगी। बिन सपनों के जिंदगी बड़ी बे-नूर होती है जनाब।

इसका मतलब और लोग भी मेरी तरह सपने न आने की समस्या से जूझ रहे होंगे न? कितना अन्याय कर रहे हैं हम अपने सपनों के साथ।

सोमवार, 25 जून 2018

ये तो होना ही था...

जिसका 'डर' कम 'यकीन' ज्यादा था, वही हुआ। एक और 'राजनीतिक गठबंधन' (बीजेपी-पीडीपी) 'ब्रेकअप' की भेंट चढ़ गया। देश का बच्चा-बच्चा जानता था कि 'गठबंधन' की बुनियाद खोखली है मगर फिर भी दोनों ने निभाने की जिद पकड़ रखी थी। गठबंधन में ऐसी 'जिदें' भला कहां कामयाब हुई हैं! इतिहास उठाकर देख लीजिए, हर गठबंधन अपने साथ-साथ देश की भी भद्द पिटवाकर ही टूटा है।

गठबंधन में कल तक जो 'हम साथ-साथ हैं' का गाना गुनगुनाया करते थे, अब एक-दूसरे को सर से लेकर पांव तक शब्द-वाणों से भेद रहे हैं। एक-दूसरे के इतिहास के गड़े मुर्दे उघाड़ रहे हैं। जैसे- गठबंधन का फर्ज निभाते-निभाते पति-पत्नी एक-दूसरे की कमियों के चित्रहार अपने-अपने नाते-रिश्तेदारों को दिखाते हैं, ठीक वैसा ही यहां भी हो रहा है।

दोनों ही दल देश की जनता को बता रहे हैं कि हमने इनके साथ क्या किया और इन्होंने हमारे साथ का बदला कैसे दिया। ठीक उसी गाने की तरह- 'अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का, यार ने ही लूट लिया घर यार का...।'

और कीजिए गठबंधन। सब-कुछ जानते-समझते हुए भी राजनीतिक दल आपस में गठबंधन कर लेते हैं। और जब नहीं चला पाते तो अपने घर का झगड़ा लेकर सड़क पर आ जाते हैं कि जनता या कोर्ट फैसला करे। जैसे- दोनों खाली बैठे हों!

हालांकि यह (बीजेपी-पीडीपी) साथ चालीस माह तक चला। पर हकीकत ये रही कि दोनों की आपस में चार पल भी न बनी। चालीस माह का संग-साथ चार सेकेंड में छूट गया। गठबंधन का साथ ऐसा ही होता है पियारे। चला तो चला। नहीं चला तो तुम अपने रास्ते खुश, हम अपने।

गठबंधन के फर्ज को निभाना हर एक के बस की बात न होती। चाहे शादी-व्याह का हो या राजनीतिक; जब तक समझौते करते रहेंगे, मजबूरियों को जिंदगी का हिस्सा बनाए रखेंगे, गठबंधन की गाड़ी चलती रहेगी। लेकिन जहां आपस में तू-तू, मैं-मैं शुरू हुई नहीं कि गठबंधन की गांठ पर ग्रहण का असर तुरंत प्रभावी हो लेता है।

इसीलिए तो मैं बिना चू-चपड़ किए बेहद शांति और समझौते के साथ अपनी शादी के गठबंधन को 'वीर तुम बढ़े चलो...' की तर्ज पर खींचे चला जा रहूं। ये कोई राजनीतिक गठबंधन तो है नहीं कि अभी इस दल के साथ हैं तो कल को उस दल के साथ हो लेंगे। क्या फर्क पड़ना है।
यहां तो गठबंधन की गाड़ी जरा-सी इधर-उधर हुई नहीं कि जान और जीवन दोनों सांसत में। इज्जतदार पति वही है, जो पत्नी के साथ अपने गठबंधन को बिना 'उफ्फ' किए साधे चला जाए। जैसे के मैं!

अभी थोड़ा-सा लग रहा है कि ये गठबंधन क्यों टूटा? जख्म अभी ताजा है न इसलिए। दिन जैसे-जैसे गुजरते जाएंगे बहुतों को तो याद भी न रहेगा कि ऐसा कोई गठजोड़ था भी!

इस घटना को 'ये तो होना ही था' की नियति मान भूल जाइए। बाकी आगे-आगे देखिए होता है क्या।

गुरुवार, 21 जून 2018

समाज को सुधारना चाहता हूं!

कई दिनों से मैं समाज को सुधारने की सोच रहा हूं! न न आप गलत समझ रहे हैं। मैं समाज को समाज के बीच जाकर नहीं, अपने लेखन के दम पर सुधराना चाहता हूं। समाज के लिए कुछ सुधार-पूर्ण लिखना चाहता हूं। समाज को बताना चाहता हूं कि वो ये-ये उपाय कर खुद को कैसे और किस हद तक सुधार सकता है।

हालांकि मैं यह बहुत अच्छे से जानता हूं कि समाज को- लेखन के दम पर सुधारना- हंसी-खेल नहीं। मगर फिर भी सुधार की एक कोशिश करके देख लेने में हर्ज ही क्या है प्यारे। सुधरा हुआ समाज किसे नहीं भाता। अपने लेखन के दम पर दस परसेंट भी अगर मैं समाज को सुधार लेता हूं तो मुझे मेरी 'समाज-सुधार' पर लिखी किताब की अच्छी-खासी रॉयल्टी मिल सकती है। समाज भी सुधार जाएगा और मेरी आर्थिक स्थिति भी। यानी, एक पंथ दो काज।

अपने दिमाग में पनपे समाज-सुधार के इस कीड़े की परिकल्पना जब मैंने पत्नी के सामने रखी तो उसे यकीन ही नहीं हुआ। उसने पूरी परिकल्पना पर पानी उड़ेलते हुए मुझसे कह दिया- 'तुम...तुम समाज को सुधरोगे! पहले खुद तो सुधर जाओ। समाज को बाद में सुधार लेना।' पत्नी का कटाक्ष भीतर तक सुलगा तो बहुत कुछ गया। पर वही है न कि पत्नियों से बहस नहीं कर सकते। पता चला, समाज को सुधारने के चक्कर में अपनी ही कहानी कहीं बिगड़ गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे।

वैसे, समाज में हर बात, हर मुद्दे पर सुधार की दरकार है। लेकिन एक सुधार तो समाज को अपने भीतर तुरंत ही कर लेना चाहिए, वो है: हर विषय में अपनी टांग घुसेड़ने की आदत। मैं समझता हूं, अगर समाज सिर्फ इसी आदत को सुधार ले तो अस्सी परसेंट तक सुधर सकता है।
एक समाज ही नहीं बल्कि घर-परिवार से लेकर राजनीतिक हलकों तक में आधे से अधिक झगड़े और मन-मुटाव बीच में टांग घुसेड़ने की वजह से ही होते हैं। मसला तब और बिगड़ जाता है जब टांग घुसेड़ने के साथ अपनी राय भी जाहिर की जाती है। कि, ये करो तो ऐसा होगा। वो करो तो वैसा होगा। सबसे ज्यादा राय के छौंक से दुखी नया-नवेला शादी-शुदा जोड़ा रहता है।

यों तो इस देश में राजा राम मोहन राय से लेकर ज्योतिबा फुले तक कई महान समाज-सुधराक हुए हैं। ऐसे में मेरा समाज को सुधराने के लिए प्रयास बेशक ऊंट में मुंह में जीरा टाइप ही होगा। मगर फिर भी, कोशिश करने में क्या जाता है। हो सकता है, मेरी किताब समाज सुधार की दिशा और दशा ही बदल दे। चेहरे पर किसी के थोड़े न लिखा होता है कि वो जीवन में वो कितना ऊंचा या नीचा जाएगा।

खैर, इधर-उधर की बातों पर खाक डालते हुए मैं समाज को सुधराने के उपायों पर लिखने बैठ गया हूं। मुझे अग्रिम शुभकामनाएं दें।

रविवार, 10 जून 2018

महाभारत काल में 'इंटरनेट' का होना

अगर वो बताते नहीं तो हमें भी कहां पता नहीं चल पाता कि महाभारत काल में भी 'इंटरनेट का अस्तित्व' था! मैं समझ नहीं पा रहा महाभारत के रचयिता और सीरियल बनाने वालों ने हमसे इस 'महत्त्वपूर्ण रहस्य' को छिपाए क्यों रखा? महाभारत काल में 'इंटरनेट' का होना कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी। यह युद्ध से कहीं अधिक मायने रखती थी।

बल्कि मुझको तो ऐसा भी लगता है कि महाभारत की प्रत्येक घटना उस वक्त 'इंटरनेट' पर जरूर डाली गई होगी। यह गहन खोज का विषय है। इतिहासकारों एवं वैज्ञानिकों को इस पर अवश्य ही शोध करना चाहिए।
मुझे पक्का यकीन है, उन्होंने महाभारत काल में इंटरनेट होने की बात हवा में नहीं कही होगी। अवश्य ही उनके पास इसके ठोस तथ्य मौजूद होंगे। कोई और भले ही कर ले किंतु नेता लोग कभी इतिहास से छेड़छाड़ नहीं किया करते! हो सकता है, कभी उन्होंने भी उन जगहों की खुदाई की हो, जहां महाभारत का युद्ध घटा! जहां कौरव-पांडव आदि रहा करते थे। खुदाई के दौरान हो सकता है, उन्हें इंटरनेट चलाने वाली कोई डिवाइस मिली हो! सिम या फिर उस वक्त का कोई डेटा प्लान की शीट आदि ही हाथ आ गई हो!

जब उस दौर में इंटरनेट था ही तो यह भी संभव है कि किसी न किसी शक्ल में मोबाइल भी जरूर रहे ही होंगे। वरना, तब वे लोग इंटरनेट चलाते किस पर थे।

मुझे तो इस बात की भी हैरानी है कि पूर्व में हुईं इतनी खुदाइयों के बाद भी खुदाई-कर्त्ता वो नहीं खोज पाए जो उन्होंने एक ही बार में खोजकर देश को बता दिया। इससे यह बात भी प्रमाणित होती है कि देश के नेता सिर्फ राजनीति ही करना नहीं जानते बल्कि वे पैराणिक काल की भी ठीक-ठाक जानकारी रखते हैं।

उनके कहे पर मेरी सहमति इस कारण भी बनती है क्योंकि महाभारत के युद्ध का आंखों-देखा हाल संजय ने महाराज धृतराष्ट्र को सुनाया था। एक-एक पल की खबर उन्हें वे देते रहते थे। इतना ही नहीं वासुदेव कृष्ण भी युद्ध का परिणाम बहुत अच्छे से जानते थे। एक-दूसरे के खेमे की गुप्त सूचनाओं का आदान-प्रदान भी, तब के इंटरनेट के, माध्यम से ही होता रहा होगा।

इंटरनेट का तो खैर उन्होंने बता ही दिया, साथ ही, यह भी खोज और जिज्ञासा का विषय है कि क्या यूट्यूब का जलवा तब भी था! राजा-महाराजा अपना मनोरंजन गीत-संगीत-नृत्य आदि से तो करते ही थे, क्या दिल बहलाने को यूट्यूब का भी इस्तेमाल किया करते थे! जब इंटरनेट था तो संभव है, यूट्यूब भी रहा ही होगा! वैसे, इस विषय पर शोध किया जा सकता है।

अभी एक नेता ने और भी दिलचस्प बयान दिया कि नारदजी के पास गूगल समान जानकारियां रहती थीं। कुछ समय पहले इन्हीं नेता जी ने राम के तीरों को इसरो के रॉकेट जैसा बताया था! मगर लोग हैं कि इस सब को मजाक समझ हवा में उड़ा दे रहे हैं। किंतु मैं ऐसा कतई नहीं करता। बल्कि मुझे तो गर्व टाइप फील हो रहा है कि मेरे देश के नेता वैज्ञानिक सोच के मामले में दस कदम आगे हैं। बेशक, उनकी बातों-बयानों को सुनकर आपका सिर चकरा रहा होगा पर पौराणिक सत्य को कभी झुठलाया नहीं जा सकता।

न भूलें, डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को भी पिछले दिनों एक नेता ने चुनौती दी थी।

चलिए, वापस महाभारत पर लौटते हैं। अक्सर जब महाभारत के युद्ध के विषय में सोचता हूं तो मेरे दिमाग में बार-बार यही प्रश्न कौंधता है कि महाभारत का युद्ध कहीं इंटरनेट की मदद से तो नहीं लड़ा गया था? कहीं युद्ध के तौर-तरीकों को गूगल तो नहीं किया गया था? मामा शकुनि के बारे में अक्सर मुझे कुछ ऐसा ही शक होता है। उनके पास अपने प्रिय भांजे दुर्योधन को देने के लिए इतनी सलाहें थीं। इतने तो वाण भी न होंगे अर्जुन के तरकश में।

महाभारत के किसी भी पात्र की बात कर लीजिए, हर किसी में कुछ न कुछ इंटरनेटिए प्रभाव दिखेगा ही।

मुझे तो पांडवों द्वारा इंद्रप्रस्थ का निर्माण भी गूगल किया हुआ ही लगता है।

इतने प्रमाण मिलने के बाद भी उनके बयान 'महाभारत काल में इंटरनेट था' पर विश्वास न करना कोरी बेवकूफी ही कहलाएगी। शेष आपकी मर्जी।

शनिवार, 9 जून 2018

व्यंग्य में 'पाथ ब्रेकिंग'

जीवन में सफलता का रास्ता अच्छा पढ़ने या अच्छा करियर बनाने से ही नहीं निकलता, 'पाथ ब्रेकिंग' से भी निकलता है। 'पाथ ब्रेकिंग' की अवधारणा को काफी हद तक स्वरा भास्कर ने साबित भी किया है। खुलकर बताया कि मनुष्य के 'चरम सुख' का सुख 'पाथ ब्रेकिंग' में ही निहित है। हालांकि हमारा ऊपर से 'सभ्य' लगने-दिखने वाला समाज अभी 'पाथ ब्रेकिंग' के कॉन्सेप्ट पर नाक-मुंह जरूर सिकोड़ रहा है पर भीतर ही भीतर इसका दीवाना भी बन चुका है। लेकिन बताएगा थोड़े न!

वो तो लोगों को 'पाथ ब्रेकिंग' के कॉन्सेप्ट का एहसास 'वीरे दी वेडिंग' में हुआ जबकि यह उपलब्धि तो चचा वात्स्यायन जाने कब की हमें 'कामासूत्र' के रूप में दे चुके हैं। वही है न कि 'घर की मुर्गी दाल बराबर।'

लोगों के बेड-रूम का तो मुझे नहीं पता मगर सोशल मीडिया पर 'पाथ ब्रेकिंग' ने इन दिनों गजब ढाह रखा है। 'पाथ ब्रेकिंग' पर बनने वाले जोक और वन-लाइनर्स इसकी सफलता की कहानी खुद कह रहे हैं। 'पाथ ब्रेकिंग' शब्द को ईजाद करने वाले ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसका यह शब्द 'यूथ आइकन' बन जाएगा। आलम यह है कि अब तो सड़क चलते कोई भी पूछ लेता है 'और जनाब 'पाथ ब्रेकिंग' कैसी चल रही है?'

मेरे विचार में 'फॉग' के बाद सबसे ज्यादा पूछे जाने वाला सवाल 'पाथ ब्रेकिंग' ही है।

'पाथ ब्रेकिंग' में मुझे अनंत संभावनाएं नजर आ रही हैं। सबसे ज्यादा व्यंग्य में। व्यंग्य के लिए सबसे धांसू नजरिया है 'पाथ ब्रेकिंग'। एक से बढ़कर एक 'पाथ ब्रेकिंग' व्यंग्य लिखे जा सकते हैं। बल्कि मैं तो यहां तक कहने को तैयार हूं 'पाथ ब्रेकिंग' व्यंग्य का भविष्य है। मौजूदा दौर के व्यंग्यकारों को इस मसले पर गंभीर चिंतन करने की जरूरत है।

आपाधापी भरी जिंदगी में जैसे कुछ पल का 'चरम सुख' शरीर को लाइट रखने का काम करता है, वैसे ही व्यंग्य में 'पाथ ब्रेकिंग' मूड को रिफ्रेश करने के काम आएगा। दिमाग पर हर वक्त गंभीरता का लबादा ओढ़े रखना भी ठीक नहीं।

मैं तो यह सोचकर हैरान हूं कि हमारे पुराने और वरिष्ठ व्यंग्यकारों ने 'पाथ ब्रेकिंग' के कॉन्सेप्ट को अपने व्यंग्य लेखन में लेने का प्रयास क्यों नहीं किया? इतनी उत्तेजक रचनात्मकता से अपने पाठकों को महरूम क्यों रखा? माना कि व्यंग्य में जरा बहुत संवेदना, सरोकार, कलात्मकता जरूरी है किंतु 'पाथ ब्रेकिंग' भी उतनी ही आवश्यक है।

खैर...। जो हुआ सो हुआ। वो समय अलग था, यह समय अलग है।

व्यंग्य में नई चमक और गर्माहट पैदा करने के लिए 'पाथ ब्रेकिंग' जरूरी है। लेकिन ये व्यंग्य में आ तभी पाएगी जब हमारे जीवन में भी थोड़ी-बहुत 'पाथ ब्रेकिंग' का चांस बना रहे।

शुक्रवार, 8 जून 2018

फूफा जी का डांस

डांस हर कोई नहीं कर सकता। न डांस हर किसी को कराया जा सकता है। जो डांस नहीं कर सकते, उन्हें आंगन हर वक्त टेढ़ा ही नजर आता है। लेकिन विदिशा (मध्य प्रदेश) वाले फूफा जी ऐसे नहीं हैं। वे शादी में आए अन्य फूफओं से बहुत अलग हैं। आजकल तो अपने 'अद्भुत डांस' के चलते पूरी दुनिया में वायरल हो रखे हैं। दुनिया ही नहीं पूरा सोशल मीडिया उनके डांस का मुरीद बन बैठा है। ट्विटर पर उनके डांस को जमकर रि-ट्वीट किया जा रहा है। तो फेसबुक की पोस्टों में फूफा जी के चर्चे हैं।

जिसे देखो उसी की मोबाइल स्क्रीन पर फूफा जी डांस करते दिख जाएंगे। फूफा जी के डांस ने ऐसा रंग जमाया है कि बॉलीवुड से लेकर मामा जी तक को तारीफ करनी पड़ गई है। मामा जी ने तो यहां तक कह डाला कि मध्य प्रदेश के पानी में कुछ बात तो है। सही है। पानी आखिर कहीं तो अपना असर छोड़ता ही है।

फूफा जी के फुर्तीले डांस को देखकर एक बार फिर यह धारणा मजबूत हो चली है कि डांस में उम्र मायने नहीं रखती। बस दिल का जवां और शरीर का चुस्त होना जरूरी है। वजन भी खास मायने नहीं रखता फूफा जी को नाचता देखकर।

पता नहीं गोविंदा ने फूफा जी का डांस अभी देखा होगा कि नहीं। अगर देख लेंगे तो दीवाने वे भी उनके हुए बिना न मानेंगे।

फूफा जी को डांस करते जब से देखा है, मेरा दिल भी डांस करने को मचलने लगा है। बीच में पत्नी ने भी ताना मार दिया- 'देखो, ऐसे होता है डांस। तुम्हारी तरह नहीं सिर्फ हाथ-पैर हिला लिए।' पत्नी ने हल्की-सी हिदायत भी दे डाली- 'मेरी मानो थोड़े दिन विदिशा में रहकर फूफा जी से डांस सीख आओ।'

पत्नी की सलाह नेक है लेकिन नौकरी की अपनी दुश्वारियां हैं।
बचपन में बड़ी तमन्ना थी, जब भी माइकल जैक्सन को डांस करते देखता था, उस जैसा बनने की। वैसा ही डांस करने की। बॉडी को उतना ही लचीला बनाने की। केवल डांस के दम पर पूरी दुनिया पर छा जाने की। मगर हर कोई तो माइकल जैक्सन नहीं हो सकता न। जैक्सन बनने का ख्वाब ख्वाब ही रहा। फिलहाल, लेखक बन गया।

लेकिन फूफा जी के गोविंदा स्टाइल डांस ने दिल मोह लिया। शरीर में इतना लोच, इतनी स्फूर्ति जाने कहां से लाते हैं फूफा जी।

मानना तो पड़ेगा, डांस प्रेमी होते बहुत जिंदादिल हैं। कहीं भी, कैसे भी डांस करवा लो बिना शर्माए नाच जाते हैं। वे डांस कर अपने शरीर की चपलता को बनाए रखते हैं। और एक हम लेखक हैं, जो इस-उस पर टिका-टिप्पणी कर अपना दिल जलाते रहते हैं।

कितना खुशनसीब है वो परिवार जिसमें ऐसे मस्त डांसर फूफा जी हैं। फूफा शादियों में सिर्फ मुंह ही नहीं बिगाड़ते, डांस भी बिंदास करते हैं। जियो फूफा जी।

बुधवार, 6 जून 2018

फ्लिपकार्ट का बिकना

जब भी किसी को बिकते देखता हूं तो खास आश्चर्य नहीं होता। सोचता हूं, अगले में बिकने का गुण रहा होगा, इसीलिए तो बिका। वरना, इस घोर प्रतिस्पर्धा के समय में बिकना-बिकाना इतना आसान कहां।
मैं तो जब आईपीएल के खिलाड़ियों को बिकते देखता हूं तो यह हौसला मन में जगा रहता है कि बिकना इतना बुरा भी नहीं अगर ठीक-ठाक पैसे मिल रहे हों।

इसीलिए फ्लिपकार्ट ने ठीक किया वालमार्ट के हाथों बिक कर। खुद की मेहनत पर खड़ी की दुकान बंद करने से तो बेहतर था कि उसे बेच दिया जाए। जब बिजनेस की झोंक खुद से न संभल पा रही हो तो उसका तियां-पांचा कर ही देना चाहिए।

मगर फ्लिपकार्ट के बिकने पर देश का बुद्धिजीवि वर्ग बड़ा परेशान है। उनकी परेशानी को सुनकर लग तो ऐसा रहा है मानो- उनके बेटे की दुकान बिक गई हो! जबकि खुद बड़े आराम की जिंदगी बसर कर रहा है देश का बुद्धिजीवि वर्ग। सिवाय हर मुद्दे पर गाल बजाने और जुबान चटखाने के कोई खास काम उनके कने नहीं होता।

कह रहे हैं, फ्लिपकार्ट का बिकना देश को विदेशी पूंजीवाद के हाथों गिरवीं रख देने जैसा है। सरकार धीरे-धीरे कर देश के उद्योग-धंधों को विदेशी कंपनियों को सौंप रही है। पहली बात तो यह है कि फ्लिपकार्ट ने बिकने का फैसला खुद से किया है, सरकार का इस डील में कोई रोल ही नहीं बनता। और फिर ऐसा कौन-सा धंधा है, जहां विदेशी हस्तक्षेप नहीं है। खाने से लेकर जीने तक हर कहीं विदेशी आइटम्स का दबदबा है। पूंजीवाद का विरोध तो महज दिखावा है। बुद्धिजीवि खुद अंदर से कितना पूंजी में डूबे हुए हैं, सब जानते हैं।

वैसे, जब भी देशी कंपनियों को विदेशियों के हाथों बिकते देखता हूं तो यही सवाल मन में आता है कि हम भारतीयों को बाजार की मांग के मुताबिक चलना नहीं आता। कस्टमर्स का टेस्ट कंपनियां जान नहीं पातीं। जबकि अपना माल बेचने में विदेशी हमसे कहीं अधिक चालक और तेज होते हैं। अगर यह सच न होता तो मोबाइल मार्केट में चाइनीज फोनों की धूम न होती।

खैर, फिर भी दो बंदों ने फ्लिपकार्ट को इतने लंबे समय तक अपने दम पर टिकाए रखा बड़ी बात है। बाद में जब कंपनी हाथ से फिसलने लगी तो बेच दी। बिल्कुल ठीक किया। फिसलने से पहले संभल जाने में ही तो समझदारी है।

बिकना-बिकाना खुद को मार्केट में बनाए रखने के फंडे हैं। आज के दौर में कामयाब भी वही है जो खुद को ऊंचा बेच सके। चाहे खिलाड़ी हो या कलाकार या फिर लेखक ही क्यों न हो। अंटी में आता पैसा किसे बुरा लगता है जनाब।

मुझसे तो कोई आकर कहे कि मैं आपके लेखन को खरीदना चाहता हूं, मैं तो हंसी-हंसी स्वीकृति दे दूंगा। खरीद ले। पर पैसा मस्त दियो। पैसा ही जीवन का अंतिम सत्य है। बाकी सब हवाबाजी है महाराज।

खैर, जिसे बिकना था वो बिक गई। जिन्हें पूंजीवाद को गरियाना है, गरियाते रहें। मुनाफा पहले है। जज्बातों का कोई अचार थोड़े न डालना है उम्रभर। क्या समझे।

मंगलवार, 5 जून 2018

खटमलों से प्रेम

पिछले दिनों एक सज्जन के घर ठहरने का मौका मिला। सज्जन की सज्जनता तब बहुत भा गई, जब रात को सोने से पहले ही उन्होंने मुझे बता दिया कि उनकी खटिया और बिस्तर में खटमल हैं! खटमल का नाम सुनते ही मेरा मन प्रसन्न हो उठा। मैंने उन्हें खटमल वाली खटिया और बिस्तर पर मुझे सुलाने के लिए तहे-दिल से धन्यवाद दिया। एक बार को वे भी थोड़ा सकपका-सा गए कि कैसा बंदा है, जो खटमल की खटिया और बिस्तर पर सोने के लिए बाबला हुआ जा रहा है।

उन्होंने मुझसे पूछा भी कि मुझे खटमलों के साथ सोने में कोई एतराज तो नहीं। मैंने उन्हें साफ कह दिया एतराज का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। बल्कि खटमलों के प्रति तो मेरे दिल में बचपन से ही प्यार और आदर हैं। खटमल द्वारा इंसानों का खून पीने को मैं कतई बुरा नहीं मानता। इंसान का खून उनका भोजन है। यों, किसी के भोजन पर लात मारना उचित नहीं।

वक्त ने इंसान को बड़ा निर्दयी और मतलबपरस्त बना दिया है। हमेशा वो अपना ही भला सोचता है। कभी नहीं चाहता कि उसके दम पर किसी दूसरे के साथ भी अच्छा हो। अपवादों को छोड़ दें तो 'अच्छाई' करना इंसानों की कुंडली में लिखा ही नहीं।

किंतु मैं ऐसा रत्तीभर नहीं सोचता। चाहे खटमल हो या छिपकली, इंसान हो या शैतान कोशिश मेरी यही रहती है, उनके साथ अच्छा ही करूं। बताते है, अच्छा करने से स्वर्ग मिलता है। हालांकि मुझे स्वर्ग की कभी तमन्ना नहीं रही, फिर भी, अगर मिल जाए तो क्या हर्ज?

कोई ऐसा मानेगा तो नहीं पर हम इंसानों ने खटमलों के साथ ज्यादती बहुत की है। उन्हें यों उपेक्षित रख छोड़ा है मानो वे हमें भारी नुकसान पहुंचाते हों! जबकि हकीकत यह है कि खटमल सिवाय इंसान का खून चूसने के और कोई हानि उसे नहीं पहुंचाता। एक नन्हा-सा जीव इतने बड़े इंसान का कितना खून चट कर जाएगा भला! उससे कहीं अधिक मात्रा में इंसान जानवरों का खून कर रहा है। खुद ही एक-दूसरे के खून का प्यासा है।

लेकिन खटमल जरा-सा क्या पी ले, हमें तरह-तरह की मुसीबतें होने लगती हैं। तुरंत ही उसे मारने के इंतजाम किए जाते हैं। जबकि खटमल से कहीं खतरनाक मच्छर है पर उस पर इंसान का जोर चल ही नहीं पा रहा। देश में मच्छर सुकून भरी जिंदगी जी रहे हैं। और बेचारे खटमल विलुप्ति की कगार पर हैं।

खटमलों के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए किया मैंने यह है कि मैं उन सज्जन के यहां से दस-बीस खटमल मांग लाया हूं। ताकि उन्हें अपनी खटिया और बिस्तर पर संरक्षण दे सकूं। रात को जब सोऊं तो वे मेरे खून से अपनी भूख मिटा सकें। भूखे को भोजन खिलाना शास्त्रों में भी पुण्य का काम बताया गया है।

शेर, चीता, गाय आदि तो हम बचाते ही रहते हैं अब थोड़ा हमें खटमलों को बचाने के बारे में भी सोचना चाहिए। खटमलों को भी हमारे प्यार की दरकार है।

गुरुवार, 31 मई 2018

आत्मचिंतन ही तो कर रहा हूं

मेरे शुभचिंतक अक्सर मुझे यह सलाह देते हैं कि मैं अपने लेखन पर आत्मचिंतन करूं! उनका मानना है कि निरंतर आत्मचिंतन से मैं अपने लेखन को और भी निखार सकता हूं।

उनकी सलाह सिर-आंखों पर। ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि मेरे शुभचिंतक मुझे सलाह दें और मैं न मानूं। मैंने धरती पर जन्म ही अपने शुभचिंतकों की सलाहें मानने के लिए लिया है! जिस दिन मैं उनकी सलाह मानने में अपनी दिलचस्पी रखना छोड़ दूंगा, समझिए मेरी रचनात्मकता कूड़ा हो जाएगी!

ऐसा नहीं कि मैं आत्मचिंतन नहीं करता। खूब करता हूं। कभी-कभी तो एक साथ इतना आत्मचिंतन कर लेता हूं कि मेरी आत्मा और मेरा चिंतन दोनों मिलकर मुझे गरियाने लग जाते हैं। एक दफा की बात है, मेरी आत्मा ने मेरे भीतर रहने से ही इनकार कर दिया था। आरोप लगा रही थी कि मैं चिंतन के बहाने उसका (आत्मा) का मानसिक शोषण कर रहा हूं! वो तो भला हो मेरे शुभचिंतकों का कि उनकी रिक्वेस्ट पर वो वापस लौट आई।

वैसे, लगता नहीं कि मुझे मेरे लेखन पर आत्मचिंतन की आवश्यकता है। क्योंकि चिंतन-परक ऐसा कुछ मैं लिखता ही नहीं। लेखन में मैंने हमेशा ऐसे विषयों से जी चुराने की कोशिश की है, जिसमें बहुत अधिक चिंतन की जरूरत पड़े। चिंतन और चिंता दोनों को मैं चिता समान मानता हूं। (ये मेरा निजी मत है। मेरे शुभचिंतक कृपया दिल पर न लें।)

फिर भी, हल्का-फुल्का आत्मचिंतन मैं इसलिए कर लेता हो ताकि मेरे दिमाग का विकास ठीक-ठाक होता रहे। 'सबका साथ, सबका विकास' में मेरी घोर आस्था है!

जिस प्रकार का आत्मचिंतन बुद्धिजीवि लोग कर लेते हैं, उतना तो मैं दस जन्म लेकर भी नहीं कर सकता। पता नहीं उनकी आत्मा उनसे नाराज होती भी है या नहीं? कहीं यह सोचकर तो चुप्पी नहीं मार जाती कि बुद्धिजीवियों से क्या पंगा लेना। ये तो इनका 24x7 का काम है। सही भी है न, बुद्धिजीवि आत्मचिंतन नहीं करेगा तो क्या मुझ जैसे ठलुए करेंगे?

आत्मचिंतन बहुत उम्दा चीज है अगर देख-भाल कर किया जाये। शायद इसीलिए मेरे शुभचिंतक मुझे आत्मचिंतन करने की सलाह देते रहते हैं।
जी, आत्मचिंतन में ही लगा हूं।

शहरों को बदनाम करने की साजिश

एक सर्वे में एंवाई 14 शहरों को बदनाम कर डाला कि वो 'गंदे' हैं। शहर भला गंदे क्यों होने लगे! शहरों ने खुद को थोड़े न गंदा किया है। शहर तो गंदे इंसानों ने मिलकर किए हैं। सड़क से लेकर हवा-पानी तक को इतना दूषित कर दिया कि रहना तो छोड़िए, सांस लेना तक मुश्किल। शहरों की गंदगी जब खुद से संभल नहीं पाई तो कह दिया कि अमुख-अमुख शहर गंदे हैं।

जबकि हकीकत तो यह है कि शहर नहीं इंसान की मानसिकता ही गंदी है। इतने बरसों में इंसान न खुद को साफ-सुथरा रख सका न अपने शहरों को। जहां भी गया गंदगी लेकर गया। वो तो गनीमत बस इतनी रही है कि अभी चांद और सूरज रहने लायक ठिकाने नहीं बन पाए हैं इंसानों के इसलिए गंदगी से बचे हुए हैं। वरना उन्हें भी इंसानों ने कब का प्रदूषित कर डाला होता। फिर भी, कवायदें जारी हैं मंगल ग्रह पर आशियाना बसाने की।

गंदगी से हमारा प्रेम अब का नहीं बल्कि आदमजात के जन्म से है। तब हम अपनी अनिभिज्ञता के चलते गंदे रहते थे, अब अभिज्ञता के चलते रहते हैं। प्राथमिकता में हमारी अपने घर का चबूतरा साफ-सफाई संपन्न रहे, यही रहता है। पड़ोसी का चबूतरा या गली की नालियां कितनी ही गंदी रहें, हमसे नहीं मतलब। अपना चकचक रखने के चक्कर में हम प्रायः दूसरे का घर गंदा करने से कभी गुरेज नहीं करते।

शहरों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। शहर खुद से गंदे कभी नहीं रहे। गंदा तो हमने उन्हें किया है। अपने दिमागों में पसरा कचरा हम शहरों की सड़कों-नालियों में डालते रहते हैं। धीरे-धीरे कर कचरे ने इतना विकराल रूप ले लिया कि खुली हवा में सांस लेना तक दुभर हो गया। हम कपड़ों से लेकर रहन-सहन तक में आधुनिक होते चले गए मगर अपनी सोच को गंदगी से पाट दिया। नतीजा सामने है।

देख रहा हूं आजकल शहरों को स्मार्ट बनाने का खूब हल्ला मचा पड़ा है। जिसे देखो वही जुटा है अपने शहर को स्मार्ट घोषित करवाने में। कभी शौचालय बनाकर तो कभी सफाई अभियान चला कर शहरों को स्मार्ट सिटी की घोड़ा-दौड़ में लाया जा रहा है। यहां भी नंबर गेम की जुगाड़ जोरों पर है।

तिस पर भी पान की थूक और राह चलते कुछ भी फेंक देने की आदत में सुधार नहीं आ पाया है। बरसों पुरानी आदत है इतनी जल्दी कैसी छूट जाएगी भला। अपनी आदतों पर पर्दा डालने का सबसे उत्तम समाधान है शहरों को गंदा दिखाकर उन्हें बदनाम कर दो। हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा।

सुना है, 14 शहरों की बदनामी होते ही सरकारी अमला नींद से जाग गया है। पूरी जी-जान से जुट पड़ा है, शहरों की गंदगी के प्रदूषित दागों को धोने के लिए।

फिलहाल, यह अभी रहस्यमय ही है कि प्रदूषित दाग कब तलक धुल पाएंगे। जो हो पर शहर तो खामख्वाह बदनाम हो ही गए न।

बुधवार, 30 मई 2018

विरोध और तेल के दाम

कुछ लोग धरती पर जन्म सिर्फ विरोध करने के लिए लेते हैं। विरोध क्यों कर रहे हैं? किसलिए कर रहे हैं? इससे उन्हें खास कोई मतलब नहीं रहता। उन्हें विरोध करना है तो करना है।

आप यह न समझिएगा कि वे विरोधी स्वभाव के होते हैं। न न ऐसा उनके साथ कुछ नहीं होता। विरोध तो वे इसलिए जताते रहते हैं ताकि अपने 'मन की भड़ास' निकाल सकें। दरअसल, मन की भड़ास ही उनका विरोध होती है।

इन दिनों उनका विरोध तेल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ भड़का हुआ है। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब वे तेल की आड़ में सरकार को न कोसें। कोसने वालों में विपक्ष के लोगों की भूमिका बड़ी है। वे बतलाना चाहते हैं कि सरकार की बेरुखी और तेल की ऊंची कीमतों से एक अकेली जनता ही नहीं बल्कि वे भी उतना ही त्रस्त हैं। वे कितना त्रस्त हैं ये, उनके कड़ी धूप से लस्त-पस्त चेहरे, बहुत अच्छे से बता देते हैं। 47 डिग्री टेम्परेचर में सड़क पर सरकार के विरोध में उतरना कोई हंसी खेल नहीं है जनाब।

ज्यादातर विरोध करने वालों में वो क्लास ही आगे रहती है, जिसके घर में हर किसी की अपनी अलग गाड़ी होती है। तेल के दाम चाहे 80 रुपए हों या 100 उनकी सेहत पर खास असर नहीं डालते। लेकिन विरोध तो उन्हें करना है न। पब्लिक को भी यह बताना है कि भाई, एक अकेले तुम ही नहीं, तेल की आग में हम भी बराबर झुलस रहे हैं।

कुछ विरोध अक्सर इसलिए भी जताए जाते हैं ताकि समाज के बीच विरोध की प्रासंगिकता कायम रह सके। बाकी विरोध में कितने प्रतिशत 'विरोध' होता है और कितने प्रतिशत 'विट'; यह हम बहुत अच्छे से जानते-समझते हैं।

गजब तो ये है कि तेल इतना महंगा होने के बाद भी न सड़कों पर न घरों में गाड़ियां कम नहीं हो रहीं। जबकि अब गाड़ियों को चलाने के लिए सड़कें कम पड़ने लगी हैं। फ्लाई-ओवर बनाए जा रहे हैं। मगर हमारे गाड़ियों के प्रति मोह में कहीं कोई कमी नहीं आई है। फिर भी रोना जारी है कि सरकार तेल की कीमतों पर लगाम क्यों नहीं लगाती।

सब कुछ सरकार ही देखे। हमारा कोई फर्ज नहीं। हमारा काम तो केवल विरोध करने का है। और, वो हम कर ही रहे हैं। यों भी, सरकार के खिलाफ विरोध करना सबसे आसान संघर्ष है। जब किसी पर बस न चले तो सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ जाओ। चाहे तेल के दाम को लेके या बढ़ती महंगाई को लेके। खुद से कुछ नहीं करना। बस विरोध, विरोध और विरोध करना है।

या तो हम बहुत नादान हैं या फिर निरे मूर्ख। तेल में आई महंगाई को हम पॉजिटिव रूप में क्यों नहीं लेते। तेल के दाम बढ़ाए ही इसलिए गए हैं ताकि हम फिर से साइकिल पर लौट सकें। पैदल चलने को आदत में ला सकें। अपने ऊपर से तेल के खर्च का अतिरिक्त बोझ कम कर सकें। मोटर-स्कूटर न चलाकर वातावरण में प्रदूषण न फैला सकें। पर लोग हैं कि समझने को तैयार नहीं। विरोध करने पर उतारू हैं। जबकि यह बात वे भी अच्छे से जानते हैं कि विरोध करने से होना-हवाना कुछ नहीं है। खामख्वाह एक्स्ट्रा एनर्जी ही खर्च होगी।

जो लोग हर समय विरोध करने पर उतारू रहते हैं उन्हें मेरी- अगर मानें तो- सलाह है कि तेल के बढ़ते दामों का विरोध न करें। कोई फायदा नहीं। अगर करना ही है तो अपने घर में गाड़ियां कम कर लें। साइकल खरीद लें। फिर न तेल की फिक्र रहेगी न सरकार को कोसने में ऊर्जा ही नष्ट होगी।

एक दफा करके तो देखें।

मंगलवार, 15 मई 2018

मंटो पागल नहीं था

जब भी फुर्सत पाती है, मंटो की 'आत्मा' मेरे पास चली आती है। हालांकि मंटो को गुजरे पचास साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है मगर उसकी आत्मा में खास बदलाव नहीं आया है। वो दुनिया-समाज से तब भी नाराज थी, आज भी उतनी ही नाराज है। नाराज हो भी क्यों न! जिस समाज ने हमेशा उसे 'पागल' और उसके लिखे को 'अश्लील' समझा उससे 'नाराजगी' तो बनती है।

मंटो की आत्मा सवाल बहुत करती है। ऐसे-ऐसे सवाल अगर आज की हुकूमत सुन ले तो फिर से उसे 'पागलखाने' में डलवा दे। मगर उसके सवाल होते बहुत वाजिब हैं। वो समाज के- दिमागी स्तर पर- न बदलने पर बहुत खफा है।

मुझसे पूछती है- कितनी हैरानी की बात है, मेरे गुजरने और देश में लोकतंत्र के पैर जमाने के बाद भी लोग जिस्म में तो बदल गए लेकिन दिमागी तौर पर बीमार ही हैं, क्यों? क्या कहूं मंटो की आत्मा से कि उसके इस सवाल का जबाव मेरे पास तो क्या इस्मत आपा के पास भी न होगा।

दरअसल, ये बड़ा ही डरपोक और दब्बू किस्म का समाज है। यहां बखत उसी की है, जो जितना दिमागी से पैदल है। फिर चाहे वो लेखक हो या नेता।

मंटो की आत्मा को यह भी खबर है कि उस पर एक फिल्म तैयार है यहां। इस बात की खुशी उसे भी बहुत है कि लोग उसे पचास साल बीतने के बाद भी शिद्दत से याद करते हैं। उसको खूब पढ़ा और उस पर लिखा भी जा रहा है। लेकिन फिर भी यह दुनिया और समाज बदल क्यों नहीं रहा? कतई कुत्ते की पूंछ जैसा है, टेढ़ा का टेढ़ा।

'यह नहीं बदलने का मंटो साब'। मैं मंटो की आत्मा से कहता हूं। वो खामोश रहती है। थोड़ी हंसी के साथ कहती है कि न बदले मेरा क्या उखाड़ लेगा। मुझे तो जो लिखना था लिख दिया। कह दिया। 'खोल दो' के बाद भी लोग अगर अपनी सोच को नहीं खोलना चाहते तो उनकी मर्जी। पड़े रहें बंद कुएं में। बंद दिमाग और खब्ती विचारों के साथ।

मैं मंटो की आत्मा का दुख समझ सकता हूं। मन में सोतचा हूं- पागल मंटो नहीं, यह समाज ही था।

बुधवार, 9 मई 2018

गर्मी का डर

मनुष्य बड़ा ही डरपोक किस्म का प्राणी है। किसी न किसी बात पर हर वक्त डरा-सहमा सा रहता है। लेकिन 'डर के आगे जीत' होने का दावा भी करता है। हालांकि इस तरह के दावे विज्ञापनों में ही किए जाते, वास्तव में जब डर सामने होता है, तब सारी जीत दस्त बनकर निकल जाती है।

फिलहाल, इन दिनों मनुष्य गर्मी से डरा हुआ है। अभी चार-पांच महीने पहले तक सर्दी से डर हुआ था। थोड़े दिनों बाद जब मानसून शुरू होगा तब बरसात से डरा-डरा घूमेगा। डर को मनुष्य ने अपने व्यवहार में ऐसे शामिल कर लिया है कि नन्हे से कॉकरोच को देखकर भी विकट डर जाता है।

जब से मनुष्य ने यह सुना है कि इस बार गर्मी पेलके पड़ेगी, बस डर गया है। खुद को गर्मी से बचाए रखने के उपाय यूट्यूब पर देख-खोज रहा है। एक-दूसरे को गर्मी से बचाव के नुस्खे भी सुझा रहा है। फिर भी, गर्मी को गरियाने में लगा पड़ा है।

इस भले मनुष्य से यह पूछा जाए कि गर्मी को गरिया कर क्या हासिल हो जाएगा? गर्मी का स्वभाव ही तपाना है, वो तपाएगी ही। किसी के गरियाने या बौखलाने का असर गर्मी पर तो होने से रहा।

यों भी, गर्मी इस दफा कोई पहली बार तो पड़ नहीं रही। हर बार की यही कहानी है। गर्मियों के दिनों में ही पेड़ लगाने, पानी बचाने, प्रकृति से छेड़छाड़ न करने जैसी क्रांतिकारी बातें याद आती हैं। गर्मी के विदा लेते ही सारी बातें हवा में धूल उड़ाती जान पड़ती हैं।

बात-बात पर गाल बजाना मनुष्य का जन्म से ही स्वभाव रहा है। प्रकृति की रक्षा के वास्ते जाने कितनी ही कसमें हम हर रोज खाते हैं। पर नतीजा किसी का कुछ नहीं निकलता। जैसे- नेता जनता के समक्ष कसमें खाकर भूल जाते हैं, वैसे ही हम प्रकृति के समक्ष। हिसाब बराबर।
हर साल गर्मियों में पारा 50 पार निकल जाता है। टीवी हल्ला मचाता है। मनुष्य हाय गर्मी, हाय गर्मी चिल्लता है। मगर गर्मी है कि अपनी मर्जी से बाज नहीं आती। सोचने वाली बात है, गर्मी गर्मियों में नहीं पड़ेगी तो कब पड़ेगी?

मुझ जैसों को तो बेसब्री से इंतजार रहता है गर्मी का। हालांकि गर्मियां अब मेरे बचपन जैसी नहीं रहीं तो क्या आनंद तो अब भी उतना ही देती ही है। गर्मी के होने का अहसास ही बचपन की यादों में ले जाता है। बचपन की गर्मियां कितनी बे-फिक्र थीं। नानी का घर था। पास में घना पेड़ था। दोपहरें यों ही आपस में खेलते बीत जाती थीं। आंगन में पसरी धूप और उसी में खेलने की जिद का भी अपना ही मजा था।

मगर वो समय अब गुजर चुका है पर गर्मियां अपने स्वभाव में अब भी नहीं बदली हैं। हां, लोग जरूर बदल गए हैं। अब लोग गर्मी से घबराते हैं। ज्यादा गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पाते। पेड़ की नहीं एसी की ठंडक ढूंढ़ते हैं।

कितना डरपोक हो गया है मनुष्य न। गर्मी से डरता है।

मंगलवार, 1 मई 2018

लाल किला बिक थोड़े न रहा है

बात बहुत बड़ी नहीं, बस इतनी-सी है। कि, सरकार लाल किले की देख-भाल का जिम्मा एक निजी ग्रुप को सौंप रही है। तो क्या...! सौंपने दीजिए न। जब खुद से नहीं संभल-संवर पा रहा तो निजी ग्रुप ही देखे। इस बहाने लाल किला लाल किला तो नजर आएगा। निजी ग्रुप उसकी साफ-सफाई तो करता रहेगा। रंगाई-पुताई, धुलाई भी साथ-साथ हो जाया करेगी।

अब सरकार के पास इतना वक्त कहां धरा है कि वो देश की धरोहरों की देख-भाल करती फिरे। सरकार खुद की ही देख-भाल कर ले, ये ही बहुत है। आए दिन तो उसे कभी इस तो कभी उस राज्य के चुनावों में बिजी रहना पड़ता है। सरकार या मंत्री लोग चुनाव देखें या धरोहरों को। उनके लिए तो उनकी कुर्सी ही धरोहर है। वे तो उसे ही बचाए रखने में दिन-रात संघर्षरत रहते हैं।

अच्छा ही किया जो सरकार ने लाल किले की साफ-सफाई का अधिकार एक निजी ग्रुप को दे दिया। कम से कम अब वे लाल किले को अपना समझकर तो उसकी देख-रेख करेंगे। अब सब कुछ समय-प्रबंधन के साथ होगा। उम्मीद है, लाल किला का लाल रंग और भी निखर कर आएगा।

मगर उड़ाने वाले तो यह अफवाह उड़ा रहे हैं कि सरकार ने लाल किले को निजी हाथों बेच दिया। उसका सौदा कर दिया। धरोहर की इज्जत को नुकसान पहुंचाया। विश्व में देश का सिर शर्म से झुका दिया। आदि-आदि।

हद है। सरकार भला ऐसा क्यों करेगी। जितना प्यार विपक्ष लाल किला से करता है, उससे कहीं ज्यादा सरकार करती है। धरोहर को कैसे सहेजा जाए, यह सरकार से ज्यादा अच्छा कौन जानता है भला। सरकार के भीतर क्या कम धरोहरें हैं। जिन्हें वो आज भी करीने से सहेजे हुए है।
लाल किला जैसी धरोहर अगर सरकार की प्राथमिकता में नहीं होती तो उसके बारे में वो सोचती ही क्यों। यह बात सरकार भी अच्छे से जानती है कि धरोहर की हिफाजत जितना बेहतरीन तरीके से निजी ग्रुप कर लेगा शायद सरकार न कर पाए। कभी सरकारी दफ्तर और निजी ऑफिस के भीतर जाकर देखिए, फर्क स्वयं पता चल जाएगा।

कल तक लाल किले की चिंता किसी को नहीं थी। आज एक निजी ग्रुप को क्या कह दिया देख-भाल करने के लिए विपक्ष से लेकर बुद्धिजीवि तक यों चीख-चिल्ला रहे हैं मानो हिमालय पर्वत खिसक कर बरेली में शिफ्ट हो गया हो!

लाल किला को बेचने-फेचने की बातें सिर्फ अफवाहें हैं। अफवाहों के न सिर होते हैं न पैर। वे बे-पर ही यहां-वहां उड़ती रहती हैं। अतः अफवाहों पर ध्यान न दें। सरकार की मंशा को गलत न समझें। लाल किला कल भी अपना था। आज भी अपना है। हमेशा अपना ही रहेगा।

बुधवार, 25 अप्रैल 2018

उपवास से उपहास तक

उनके उपवास को उपहास का केंद्र खामखां बनाया गया। जबकि ऐसा किसी इतिहास या कानून की किताब में नहीं लिखा है कि उपवास मतलब नितांत 'भूखा' रहना। पहले या बीच-बीच में थोड़ी-बहुत टूंगा-टांगी चलती है। बंदा उपवास कर रहा है, कोई अपनी जान देने थोड़े न बैठा है। जीवन अनमोल है।

सोशल मीडिया तो झूठ और फोटोशॉप का पुलंदा है। जो धत्तकर्म कहीं नहीं हो सकते वो यहां होते रहते हैं। और, बेहद खुलकर होते हैं। सीन को थोड़ा समझने का प्रयास करें। पहली बात, सोशल मीडिया पर खाने की जो तस्वीर वायरल हो रही है, उसमें छोले-भटूरे नहीं पूरियां-छोले नजर आ रहे हैं। दूसरी बात, उस तस्वीर में अध्य्क्ष महोदय कहीं नहीं हैं। अब पार्टी के कुछ सदस्य बाहर जाकर कुछ खा-पी लेते हैं तो इसमें इतना हंगामा खड़ा करने का क्या मतलब! पेटपूजा से बड़ा कोई कर्म नहीं।

यों भी, यह कुछ घंटे का सांकेतिक उपवास था। सरकार को बस बताना भर था कि 'देखो, दलित हित के नाम पर उपवास हम भी कर सकते हैं।' जरा-सी देर के उपवास के लिए तमाम तरह की फॉर्मिल्टज निभाई जातीं, यह तो कोई अक्लमंदी नहीं होती! आगे जब कभी उन्हें लंबी भूख हड़ताल करनी होगी, तब देखा जाएगा।

हर किसी ने सोशल मीडिया और अखबारों में कथित छोले-भटूरे तो खूब देख लिए किंतु उपवास के पीछे का उद्देश्य समझने की कोशिश ही नहीं की। अमां, इतना आसान नहीं होता जन-हित के लिए सरकार से लड़ना-भिड़ना। धरने पर बैठना। आंदोलन करना। उपवास रखना। हरदम जनता को यह विश्वास दिलाते रहना कि तुम चिंता मत करो। हम मरते दम तक तुम्हारे साथ हैं। ऐसा कहने और करने का साहस केवल जन-नेता के पास ही होता है। और, उन्होंने यह करके भी दिखा दिया। यह क्या कम बड़ी बात रही?

पता नहीं कुछ लोग उनके हर प्रयास को मजाक में क्यों लेते हैं। वे कोई पहले जन-नेता तो हैं नहीं जो उपवास पर बैठे हों। अतीत में ऐसे नेताओं की फौज है जिन्होंने अपना राजनीतिक करियर ही उपवास के सहारे चमकाया है। उनमें से कोई सीएम बना बैठा है तो कोई मंत्री।

सामाजिक जीवन में भले ही न हों पर राजनीतिक जीवन में उपवास के अनेक लाभ हैं। सीधे शब्दों में कहूं तो बड़ा और मशहूर नेता बनने का रास्ता उपवास की गली में से होकर ही निकलता है। वो नेता ही किया जो अपनी जनता के हितों की खातिर कुछ देर भूखा न रह पाए। या दलित के घर खाना खाने न जाए!

अंदर ही अंदर मैं भी उनकी सांकेतिक भूख हड़ताल से प्रभावित हुआ हूं। मेरा भी दिल करने लगा है कि किसी दिन किसी सोशल मुद्दे पर मैं भी उपवास पर बैठूं। गोटी अगर फिट बैठ गई तो लेखक से नेता बनने की संभावनाएं किसी भी पॉलिटिकल पार्टी में तलाश लूंगा। जन-हित के वास्ते जितने काम मैं नेता बनकर कर सकता हूं, लेखक बने रहकर नहीं कर पाऊंगा। लेखक की इस दुनिया में सुनता ही कौन है! खुद की बीवी तक न सुनती।

भले ही उनके उपवास का सोशल मीडिया पर उपहास उड़ा पर कदम उन्होंने पीछे नहीं हटाए हैं। सरकार से 2019 में दो-दो हाथ करने की तैयारी में दिख रहे हैं। अच्छा है। बहुत अच्छा है। करें। मेरी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।

तंज कसने वालो से मैं कहना चाहता हूं, छोले-भटूरे इतना बुरा आइटम नहीं कि आप उपहास उड़ाएं। बड़ा ही मस्त धंधा है। सही बताऊं, अगर मैं ज्यादा न पढ़ा होता तो आज निश्चित ही अपने शहर में मेरा भी छोले-भटूरे का ठेला होता। जितना मैं नौकरी कर कमा पा रहा हूं, इससे दोगुना छोले-भटूरे का ठेला लगा कर कमा लिया होता अब तक। जिंदगी चैन से गुजर रही होती।

अपने देश में हर टाइप का धंधा मंद हो सकता है पर खाने-पीने का कभी नहीं। बड़े-बड़े भूखड़ पड़े हैं यहां। खाने-पीने का फ्यूचर हमेशा ही ब्राइट है अपने देश में।

लोगों का क्या है वो तो कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं। अभी उन्होंने उनके उपवास को टारगेट किया कल को पीएम के किसी भाषण पर जोक बनाने लग जाएंगे। सोशल मीडिया के अपने चोचले हैं। अच्छा खासा उनका उपवास चल रहा था अगर सोशल मीडिया पर इसका उपहास न उड़ाया गया होता।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह उनका पहला उपवास था। पहले कदम में थोड़ी-बहुत गलतियां तो हो ही जाती हैं। परफेक्ट तो यहां कंप्यूटर भी न होता शिरिमानजी।

उपहास उड़ाने वाले खुद जरा आधा घंटा भूखा रहकर तो देख लें। कसम से भीतर तक के टांके ढीले न हो जाएं तो जो कहें वो हारने को तैयार हूं।
पॉपुलर नेता बनने के लिए ये सब तो करना पड़ेगा। अभी उन्होंने उपवास किया है, हो सकता है, कल को जन-हित की खातिर वनवास पर भी निकल जाएं। इरादे मजबूत होने चाहिए बाकी समय इतिहास लिखता रहता है। उनके उपवास ने भी कम बड़ा इतिहास नहीं रचा है! मानिए तो सही।

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

कैशलैस होइए, क्या समस्या है

जब 'पैसा हाथ का मैल है' तो 'एटीएम में कैश नहीं है' को लेकर इतना फिक्रमंद क्यों होना महाराज? नहीं है तो नहीं है। समझदारी तो इसमें है कि जो चीज नहीं है, काम उसके वगैर चलाया जाए। लेकिन नहीं...।
लगा पड़ा है हर कोई सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक कभी सरकार तो कभी बैंक को गरियाने में। गरियाते रहिए। गरियाने से न तो कैश एटीएम में भर जाएगा। न सरकार नतमस्तक होकर अपनी जेब से पैसा निकालकर आपके हाथ में धर देगी।

जबकि प्रधानमंत्री जी कितनी ही दफा हमसे कैशलैस होने का आह्वान कर चुके हैं। कितनी ही तरह की एप्स मौजूद हैं पैसे के लेन-देन के लिए। एक प्रकार से बैंक ही मोबाइल पर आ गया है। अब ज्यादा जरूरत न बैंकों के चक्कर काटने की रही, न कैश को जेबों में रखने की। लेकिन फिर भी लोग एटीएम और कैश के प्रति अपना मोह त्यागना नहीं चाहते।
कैशलैस होने के अपने फायदे हैं। सबसे बड़ा फायदा तो यही है कि जेब भारी-भरकम पर्स के बोझ से मुक्त रहती है। जेब कटने का खतरा भी न के बराबर रहता है। प्लास्टिक मनी से पैसा चुकाते वक्त चार लोगों की निगाह आप पर रहती है। सोसाइटी में आपका मान-सम्मान बढ़ता है।
अब तो कुछ एप्स से पेमेंट करने पर अच्छा-खासा 'कैश-बैक' भी मिलने लगा है। जेब में क्रेडिट कार्ड का होना खुद में कितना आत्मविश्वास भर देता है। इसे दिल से महसूस कीजिए।

न्यू इंडिया में रहना है तो कैश और एटीएम का मोह तो छोड़ना होगा। आदत तो डालने से डलती है जनाब। मुझे ही देखिए न। जेब में कैश होने के बावजूद पत्नी से साफ कह देता हूं पैसे नहीं हैं। जब भी कोई रिश्तेदार घर आने का मन बनाता है तो उनसे कह देता हूं कार्ड साथ में लेते आइएगा। बाहर नकदी की समस्या विकट है।

चाहे दूध वाला हो या सब्जी वाला सबको पेटीएम ही करता हूं। कैश का अपने साथ कोई रगड़ा नहीं। सिर्फ कहने या विज्ञापन के दिखाए जाने से ही थोड़े न बन जाएंगे हम न्यू या डिजिटल इंडिया। उस रूप में खुद को ढालना तो पड़ेगा ही न।

यकीन मानिए, इस कैश-वैश, एटीएम-फेटीएम में कुछ नहीं रखा। जितना जल्दी हो खुद को कैशलैस कर लीजिए। कैश के झंझट से मुक्ति पाइए। समय से दो कदम आगे चलने में ही भलाई है। कब तक यथास्थितिवाद में जीते रहेंगे महाराज।

मैं तो उस कल्पना भर से ही प्रफुल्लित हो जाता जब मुझे पूरा इंडिया कैशलैस नजर आता है। यों लगता है मानो किसी दूसरे ही संसार में आ गया हूं। कितना दिलचस्प होगा न कि एक भिखारी मुझसे कैशलैस भीख मांगे। या एक जूस वाला मुझे कैशलैस जूस पिलाए। इंडिया ऐसे ही तो बदलेगा। सरकार या बैंक को गरिया लेने से मन की भड़ास जरूर निकल जाएगी मगर कैश फिर भी हाथ-पल्ले न पड़ेगा।

तो क्यों न कैशलैस ही हुआ जाए। क्या समस्या है।

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

आतंकवादी नहीं हैं मच्छर

आजकल मुझे मच्छरों से पीड़ित लोग बहुत मिल रहे हैं। हर किसी की जुबान पर बस यही शिकायत है- 'मच्छरों ने आतंक मचा रखा है।' तो क्या मच्छर आतंकवादी हो गए हैं? नहीं। मैं मच्छरों की तुलना आतंक या आतंकवादी से करने के सख्त खिलाफ हूं। यह एक निरही जीव को बदनाम करने की कुत्सित साजिश है।

मैं इस बात की पूर्ण जिम्मेदारी लेने को तैयार हूं कि मच्छर कभी आतंक मचा ही नहीं सकते। आतंक न तो मच्छरों के स्वभाव में है न ही उनका शौक। यह मैं इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि मेरा उनका साथ 24x7 का है। न वे मुझसे एक पल को दूर रह सकते हैं न मैं उनसे।

सिर्फ हल्का-सा काट भर लेने के अतिरिक्त मच्छर कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। ईश्वर ने डंक उन्हें दिए ही इस बात के लिए हैं ताकि वे उनके माध्यम से खुद का दाना-पानी ले सकें। क्या हम मच्छरों के पेट की खातिर अपना थोड़ा-सा खून भी नहीं दे सकते? हे! मनुष्य, इतना भी स्वार्थी न बन कि एक नन्हे से जीव को जीवन भी न दे सके। यों भी बेचारे मच्छर की जिंदगी होती ही कितनी-सी है। बामुश्किल दस-पन्द्रह दिन।

मेरा ही खून दिन भर में जाने कितनी बार मच्छर पी लेते हैं किंतु मैंने न तो कभी बुरा माना न कभी शहर के डीएम साहब से शिकायत की। पी लेते हैं तो पी लें। इतने बड़े शरीर से चींटी बराबर खून अगर निकल भी जाएगा तो मेरा क्या चला जाएगा। जरूरतमंद को खून देना शास्त्रों में पुण्य का काम बताया गया है।

न जाने क्यों हम इंसान पुण्य कमाने से घबराते हैं। जबकि सबको पता है खाली हाथ आए थे, खाली हाथ ही जाना है। फिर भी...!

मच्छरों का वर्चस्व सर चढ़कर बोल रहा है। जमीन से लेकर जहाज तक में उनका रुतबा कायम है। अभी खबर पढ़ी कि एक विमान में मच्छर के काट लेने से अंदर विकट अप्रिय स्थिति बन गई। एयर-होस्टेस ने तो यात्री से यह तक कह डाला- 'हर कहीं हैं मच्छर। तुम देश बदल लो।'

मच्छरों से पार पाना फिलहाल असंभव-सा जान पड़ता है। लेकिन मच्छर आतंकवादी नहीं हैं।

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

नाम में कुछ न रखा

तय किया है कि मैं अपना नाम बदलूंगा! यह नाम अब मुझे जमता नहीं। न तो मेरे नाम में फिल्मी फील है न साहित्यिक प्रभाव। जब भी कोई मेरा नाम पुकारता है, लगता है, शुष्क नदी में पत्थर फेंक रहा हो! पता नहीं, क्या और क्यों सोचकर मेरे घर वालों ने मेरा यह नाम रख दिया।

बहुत अच्छे से याद है, जब क्लास में टीचर मुझे मेरे नाम से बुलाया करते तो सारे दोस्त मुझ पर हंसा करते थे। मजाक उड़ाते हुए कहते- कभी टाइम निकालकर दो-चार फूल हमारी बगिया में भी लगा जाना यार। कसम से उस वक़्त इतनी आक्रमक टाइप फील आती थी कि बस कुछ पूछिए मत। मन मसोस और मुट्ठी भिंच कर रह जाता था। लड़-भिड़ इसलिए नहीं सकता था क्योंकि मेरी गिनती क्लास के चरित्रवान स्टूडेंट्स में हुआ करती थी।

वैसे, मेरा चरित्रवान होना उनका कोरा भ्रम ही था। जबकि चरित्र से मेरा नाता दूर-दूर तक न तब था न अब है।

मैं अपने नाम के साथ कुछ ऐसा जोड़ना चाहता हूं ताकि भीड़ से अलग दिखूं। नाम से कुछ फेम तो कुछ बदनामी भी मिले। बदनामी से मैं डरता नहीं। क्योंकि लेखक आधा बदनाम ही होता है।

सोच रहा हूं, मैं भी अपने नाम के बीच में 'राम जी', 'शिव जी', 'गणेश जी', 'टकला', 'लंगड़ा', 'कबाड़ी', 'भूरा' आदि उपनाम लगा लूं। ये सभी नाम हिट हैं। और, आसानी से किसी की भी जुबान पर चढ़ जाने के लिए पर्याप्त हैं।

कोशिश मेरी यही रहेगी कि मेरे नाम पर थोड़ा सियासी बवाल भी हो। मेरे 'उपनाम' की प्रासंगिकता या अप्रासंगिकता पर नेता और बुद्धजीवि लोग आपस में बहस करें। मेरे उपनाम से जुड़ा इतिहास खंगाला जाए। सोशल मीडिया पर मेरे 'उपनाम' के स्क्रीन या फोटो-शॉप्ड लगे जाएं।
इससे मुझे और मेरे नाम दोनों को समान फायदा मिलेगा। साथ ही, इस अवधारणा पर लोगों का विश्वास मजूबत होगा कि नाम में कुछ न रखा। कभी भी कैसे भी इस्तेमाल कर लो।

मैं तो कहता हूं, एक मुझे ही नहीं हर किसी को अपने नाम के साथ कुछ-न-कुछ खिलवाड़ करते रहना चाहिए। इससे खुद के साथ-साथ कई लोगों का मन लगा रहता है।

बदनाम होकर नाम कमाने का चार्म ही कुछ अलग है बॉस।

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

लोटावाद की जय

सिवाय 'लोटावाद' को छोड़कर दुनिया के किसी भी वाद में मेरा रत्तीभर विश्वास नहीं। बाकी वादों के साथ अपनी-अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताएं हैं लेकिन लोटावाद के साथ ऐसा कुछ भी नहीं। यह वाद एकदम स्वतंत्र है।

हालांकि लोग ऐसा मानेंगे नहीं लेकिन अपनी-अपनी लाइफ में थोड़े-बहुत लोटे तो हम सभी हैं। जहां सुविधा या निजी हित देखें हैं, वहां लुढ़के भी हैं। सफलता का पूरा स्वाद केवल वही लोग चख पाते हैं, जिन्होंने लुढ़कने को अपने जीवन का मंत्र बनाया हुआ है।

खामखां के आदर्शों से दिल को सुकून तो अवश्य मिल सकता है किंतु पेट नहीं भरा जा सकता। पेट भरने के लिए लोटा तो बनना ही पड़ेगा।
लुढ़काऊपन लोटे में स्वभाविक है, बनावटी नहीं। जिस भी दिशा में चाहता है वो लुढ़क सकता है। लोटे के लुढ़कने पर किसी का जोर नहीं। यही वजह है कि लोटावादी अपने लोटावाद के साथ ज्यादा सहज रह पाते हैं। जैसे मैं।

दुनिया में जितने भी किस्म के वाद हैं, हर वाद अपने साथ किसी न किसी वैचारिक मजबूरी को ढोह रहा है। वैचारिक मजबूरियां तब अधिक बोझप्रद जान पड़ती हैं जब उन्हें जबरन थोपने की कोशिश की जाती है। आजकल यही हो रहा है। अपने-अपने वाद में यकीन रखने वाले वादी पूरी मुस्तैदी से लगे हैं दूसरे के वाद को खारिज करने में। उनके वाद ने उन्हें लोटा बना रखा है लेकिन वे यह मानेंगे थोड़े ही।

मगर लोटा-प्रेमी मस्त हैं अपने लोटावाद के साथ। उन्हें किसी के वाद से कोई मतलब नहीं। न उनकी किसी के प्रति वैचारिक प्रतिबद्धता है न वाद की मजबूरी। उनका पूरा ध्यान लुढ़कने में केंद्रित रहता है। जिसे वे अच्छे से निभा रहे हैं।

मुझे भी लोटावाद एक आदर्श वाद लगता है। इसीलिए हर किस्म के वाद से मैं खुद को दूर रखता हूं। चूंकि मुझे- अपनी सुविधानुसार- लुढ़कना पसंद है इसलिए लोटों में मेरा विश्वास गहन है।

समाज और दुनिया को समझने के लिए आपको लोटा बनना ही पड़ेगा। जब तक आप लुढ़केंगे नहीं, जान ही नहीं पाएंगे कि सयाने किस एंगल की ओर झुके हुए हैं।

ये वाद-फाद सब ऊपरी दिखवे हैं, असली मकसद है अपने काम का निकलना। काम निकालने के लिए इंसान किसी भी हद तक जा सकता है। वादवादी तो अपने-अपने वादों को खुद पर इसलिए ढो रहे हैं ताकि समाज की सहानुभूति जुटा सकें। नादान हैं।

अगर खुद की प्रासंगिकता को बचाए रखना है तो वैचारिक वादों से ध्यान हटाकर लोटावादी बनिए। जहां मतलब निकलता हुआ दिखे बस वहीं लोट जाइए। दुनिया क्या कहेगी, इसकी फिक्र दुनिया वालों पर छोड़िए।

लुढ़कते लोटावाद को अपने जीवन का अंतिम सत्य मानकर चलिए। दुनिया आपके कदमों में न हो तो मेरा नाम बदल देना।

आइए, खुद पर हंसा जाए

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हम खुद पर हंसने से कतराते हैं। हां, दूसरों पर हंसने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते। दूसरों पर हंसना हमें अपनी 'उपलब्धि' नजर आता है। कुछ चेहरे ऐसे भी होते हैं जिन्हें देखकर यह सोचना पड़ता है कि आखिर बार वे कब और कितना हंसे होंगे? एक अजीब टाइप की गंभीरता वे अपने चेहरे पर धरे रहते हैं। मानो, अपनी गंभीरता के दम पर शांति का नोबेल जीत लेने की तमन्ना रखते हों!

लेकिन वो लोग सबसे खतरनाक होते हैं जो अपनी हंसी हंसते और दूसरे की हंसी रोते हैं। इन पर हंसने का आप दुःसाहस भी नहीं कर सकते।
इतिहास गवाह है, दुर्योधन अपनी हंसी हंसता और दूसरे की हंसी रोता था। हिटलर कब हंसता था यह खुद उसको भी मालूम न रहता होगा!
इनसे इतर, चार्ली चैपलिन ने तो खैर हंसते-हंसाते ही अपनी जिंदगी गुजार दी। जॉनी वॉकर कभी उधार की हंसी नहीं हंसे। केश्टो मुखर्जी तो अपने चेहरे के चाप से ही हमें उन पर हंसने को मजबूर कर देते थे। लगभग ऐसा ही हाल मिस्टर बीन का है। उनकी शक्ल देखते ही हंसी आ जाए।

हंसी एक नायाब अस्त्र है खुद और दूसरों को मानसिक रूप से जवान रखने का। यों, हंसते तो हम सभी हैं पर अपने पर हंसी गई हंसी का कोई मुकाबला नहीं।

इसीलिए तो मेरी हरदम कोशिश यही रहती है कि मैं ज्यादा से ज्यादा खुद पर ही हंसूं। खुद पर कटाक्ष करूं। खुद की खिंचाई करूं। खुद की बेवकूफियों को केंद्र में रख खुद पर तंज कसूं। आखिर पता तो चले कि मुझमें खुद पर हंसने की कितनी कुव्वत है।

असली सुख तो मुझे तब हासिल होता है, जब लोग मुझ पर हंसकर खुश होते हैं। उनकी खुशी मेरे लिए मायने रखती है। वरना, भाग-दौड़ भरी जिंदगी में किसके पास इतना समय है कि वो किसी पर हंसकर खुश होए। खुशी और हंसी से तो लोग ऐसे दूर भागने लगे हैं जैसे बिल्ली को देखकर चूहा।

दिल से निकली हंसी की बात ही कुछ और है। पर कुछ लोग दिल से न हंस हंसने के लिए लॉफ्टर क्लब का सहारा लेते हैं। लॉफ्टर क्लबों की हंसी वास्तविक नहीं कृत्रिम होती हैं। वहां खुद से हंसा नहीं जाता, जबरन हंसाया जाता है।

न न मुझे उधार की ऐसी हंसी कतई स्वीकार नहीं। हंसने के लिए किसी का मुंह ताकने से बेहतर है कि खुद ही खुद पर हंस लें। किसी से शिकायत भी नहीं रहेगी।

बे-अक्ल हैं वे लोग जो मूर्खों पर गुसाते हैं। जबकि मूर्ख तो हंसी का सबसे उत्तम वाहक हैं। वे न हों तो लोग शायद हंस ही न पाएं! इसीलिए तो मुझे अपनी बेवकूफी पर गुस्सा नहीं, हंसी आती है। मैं चाहता भी यही हूं कि लोग मुझे पर हंसें ताकि हमारे दरमियान हंसी का कारोबार चलता रहे।