रविवार, 31 दिसंबर 2017

ढोल-नगाड़े की सार्थकता

ढोल-नगाड़ों से मुझे बहशत-सी होती है। आस-पास बज रहे ढोल-नगाड़े की आवाज भी अगर कानों में पड़ जाए तो मैं घंटों घर से बाहर नहीं निकलता। ऐसा लगता है कि कोई बहुत दूर खड़ा होके मेरी बर्बादी का जश्न टाइप मना रहा है। आप यकीन नहीं करेंगे, इसी डर से मैंने अपनी शादी में ढोल-डीजे का झंझट ही नहीं रखा था। हालांकि काफी लोग मुझसे नाराज भी हुए लेकिन मैंने किसी की न सुनी।

अरे, शादी ही तो करने जा रहा था कोई माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने नहीं। कि, अपनी कथित विजय का जुलूस ढोल-नगाड़े बजाकर निकालूं। लोग ऐसा स्वीकार नहीं करते किंतु मेरी निगाह में शादी-बियाह एक ऐसा जुआ है कि दांव लग गया तो जीवन भर आनंद ही आनंद नहीं तो उम्रभर का कर्ज। तो फिर क्यों ढोल-नगाड़े बजवाकर अपनी जग-हंसाई करवाना!

कल को लोगों को कहने का मौका ही क्यों दो कि जनाब ने शादी तो बड़े ढोल-नगाड़े बजाकर की थी, पर चार दिन में ही चांद-तारे नजर आ गए। लोगों को कहने से आप रोक थोड़े न लोगे।

कई शादियों में तो मैंने यह तक देखा है कि घोड़ी पर बैठते ही घोड़ी बिदक ली। एकाध दफा तो घोड़ी ने दूल्हे को ही अपनी पीठ पर से नीचे धकेल दिया है। मतलब अपशकुन...! फिर भी लोग केस को नहीं समझते और बैंड-बाजा-बारात करवा ही देते हैं।

मुझे तो ढोल-नगाड़ों का बजना नेताओं की जीत पर समझ आता है। सही भी लगता है। धरती पर असली मेहनत तो नेता लोग ही करते हैं। बेचारे चुनावों में दिन-रात एक कर देते हैं। साम-दाम-दंड-भेद सब आजमा लेते हैं। तब कहीं जाकर उन्हें कुर्सी का सुख प्राप्त होता है।

हम समझते नहीं किंतु ये सब इतना सरल नहीं होता। चुनाव लड़ना और जीतना एक प्रकार से अपने जीवन को ही दांव पर लगाना होता है। ऐसे चुने हुए नेताओं की जीत पर ढोल-नगाड़े बजें तो उसकी बात ही कुछ और है। इससे ढोल-नगाड़े की सार्थकता का पता चलता है!

शादी की कथित खुशी और नेता की जीत में यही फर्क है कि शादी में बाजी बमुश्किल पलटती है जबकि राजनीति में बाजी को कभी भी कितनी बार पलटा जा सकता है।

खैर, मुझे क्या? मुझे तो ढोल-नगाड़े वैसे भी आतंकित करते हैं।

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