गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

शादी, खाना और लिफाफा

शादी चाहे अपने कितने भी करीबी या दूर वाले की हो लिफाफा मैं खाने के स्वादनुसार ही देता हूं। यानी, जैसा खाना वैसा लिफाफा! अमां, पैसे कोई पेड़ पर तो उगते नहीं कि किसी को भी यों ही थमा आओ। शादियों में खाना ही तय करता है कि अगले की हैसियत क्या है!

आप यकीन नहीं करेंगे, मैंने अपनी शादी में भी रिश्तेदारों-दोस्तों से लिफाफे उनसे खाने का स्वाद जानकर ही स्वीकार किए थे। इस चक्करबाजी एकाध जगह से मेरे लिफाफे मारे भी गए। उसका गम नहीं। पर ज्यादातर लोगों ने खाने की तारीफ ही की।

शादी में सारा खेल ही खाने का होता है। मैंने तो कई शादियों में खाना खा लेने के बाद ही लोगों को दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद देते देखा है। सही भी है न। एक तो बंदा इतनी दूर से किराया-भाड़ा खर्च करके आए और खाना भी ढंग का न मिले तो बेकार है।

मुझे तो वो लोग अति-प्रिय हैं जो भूख न लगने के बावजूद भी थाली में खाने का पहाड़ खड़ा कर देते हैं। वहां मौजूद ऐसा कोई भी आइटम छोड़ते नहीं जो न लेते हों। कई तो ऐसे भी होते हैं जो थाली को गले तक भर लेने के पश्चात भी यह तय नहीं कर पाते कि खाने को वहीं खाना है या घर ले जाना है! वैसे, शादी-व्याह में बचे खाने को बांध कर घर ले जाने की प्रवृति अब भी कई जगह कायम है।

छुपाना कैसा। कई बार तो ऐसा मैंने भी किया है अगर खाना उम्दा है तो बांध कर घर ले आया हूं। वहां मौजूद किसी ने कुछ भी समझा हो। इसमें शर्म कैसी। मैंने तो खाने को फेंकने से बचाया ही न।

यह तो हमारी आदत शुरू से रही है कि हम मुफ्त में मिली चीज- चाहे कोई भी, कैसी भी हो- को जाया नहीं जाने देते। जब मुफ्त में इतना सारा खाना परोसा पड़ा हो तो भला उसे बिन चखे कैसे छोड़ सकते हैं? शादियों में जाने वाले आधे से ज्यादा लोग तो संभवता खाने के लालच में ही जाते होंगे! उनमें से एक मैं भी हूं। बताने में शर्म कैसी।

वैसे, ये कोई जरूरी नहीं होता कि शादी में खाना खा लेने के बाद आप लिफाफा दे हीं। आपकी नियत पर डिपेंड करता है। न भी दें तो कोई आपसे पूछने नहीं आ रहा कि आप फलां शादी में गए तो लिफाफा देके आये थे या नहीं? अगर खाना पसंद नहीं तो बिना नाम वाला लिफाफा भी चल सकता है। ऐसा न जाने मैंने ही कितनी दफा किया है। बताने में कैसी शर्म।

यही वजह है लोग अब शादियों में खाने पर दिल खोलकर खर्च करते हैं। फिर भी, नुक्स निकालने वाले किसी न किसी आइटम में नुक्स निकाल ही लेते हैं। क्या कीजिएगा। बरसों से पड़ी आदत इतनी जल्दी कहां छुटती है! बिना कोई नुक्स निकाले कभी कोई शादी हमारे यहां संपन्न हुई है भला?

फिलहाल, शादियों का सीजन है, देखभाल के ही लिफाफा दीजिएगा। फिर न कहना बताया नहीं।

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