सोमवार, 6 नवंबर 2017

मंदड़ियों से भी सहानुभूति रखिए

मंदड़ियों से 'सहानुभूति' रखने का कोई भी मौका मैं हाथ से नहीं जाने देता। मंदड़ियों से सहानुभूति रख मुझे ऐसी ही 'शांति' मिलती है जैसे भक्त को अपने ईश्वर की उपासना कर। मैं उन 'मतलबी' लोगों में से नहीं हूं जो टेढ़े वक़्त में 'मजबूर आदमी' का साथ छोड़ दे। आजकल मंदड़ियों की स्थिति लगभग मजबूर आदमी जैसी ही हो रखी है।

इधर, सेंसेक्स ने 33 हजार के पार जब से 'जम्प' लगाई है बेचारे मंदड़ियों के 'खराब दिन' आ लिए हैं। सेंसेक्स के गिरने की उम्मीद में बनाया गया उनका हर 'नक्का' लगभग 'फेल' साबित हो रहा है। कल तक वे दलाल पथ पर 'सीना चौड़ा' कर घूमते पाए जाते थे, इन दिनों आलम यह है कि वे अपने घरों से नहीं निकल रहे हैं। ऐसी विकट मार मारी है सेंसेक्स ने न सहलाते बन रहा है न मरहम लगाते।

सेंसेक्स की महिमा भी अपरंपार है। कब किस करवट, ऊंट की मानिंद, पलट या बैठ जाए कोई नहीं जानता। 2014 के बाद से इसने जो तेजी पकड़ी है अब तक हाथ न आ पाया है मंदड़ियों के। अपवादस्वरूप छोटी-मोटी गिरावटों को अगर परे रखें तो भी सेंसेक्स अपनी रौ में मस्तराम ही बना हुआ है। मार्केट के जानकार लोग बता रहे हैं कि सेंसेक्स में बनी तेजी को अभी कुछ साल और प्रभावी रहना है!

हालांकि स्टॉक मार्केट में कुछ भी 'निश्चित' नहीं है, जैसे कभी क्रिकेट में अंतिम गेंद तक नहीं होता, फिर भी अगर ऐसा हुआ तो मंदड़ियों की तो विकट वाली वाट लग ही जानी है। जाने कितने मंदड़ियों को सदमे में आ जाना है। जाने कितने मंदड़ियों के चूल्हे बंद हो जाने हैं।

मैं तो कभी-कभी मंदड़ियों के खराब दिनों की स्थिति को सोचकर लगभग अवसाद टाइप माहौल में चला जाता हूं। वे मंदड़िये हुए तो क्या हुआ; हैं तो अपने ही भाई लोग न।

देखो जी, क्षेत्र चाहे स्टॉक मार्केट का हो चाहे लेखन या राजनीति का- अपना तो बचपन से यही मनाना रहा है- कि दुकान सबकी चलती रहनी चाहिए। ऐसा कभी न होना चाहिए कि फलां की दुकान में तला पड़ जाए। आज के जमाने में किसी भी टाइप की दुकान को चलाए रखना 'वैवाहिक जीवन' को चलाए रखने से कहीं ज्यादा कठिन काम है! क्या समझे पियारे...।

एक तरफा तेजी या एक तरफा मंदी दोनों की स्टॉक मार्केट की सेहत और देश की इकोनॉमी के लिए 'घातक' हैं। दोनों के बीच बैलेंस बराबर का बना रहना चाहिए। अच्छा, थोड़ा मंदड़ियों को भी यह समझना चाहिए कि 'सब दिन होत न एक समान'। उनके दिमाग में जब 24x7 मंदी-मंदी ही घूमेगी, तो ऐसे कैसे चलेगा। एक न एक दिन ऊंट को पहाड़ के नीचे आना ही होगा। जैसाकि इन दिनों आया हुआ है। सेंसेक्स का घोड़ा राणा प्रताप का 'चेतक' बना हुआ है। न किसी के रोके रुक रहा है न किसी के ठहरे ठहर।

बेचारे मंदड़िये इस 'खुशफहमी' में फंसे हुए हैं कि बुल नीचे का रूख करे तो बेयर उस पर हावी होए। मगर बुल को तो ऊंचाई का ऐसा चस्का लगा हुआ है कि 33 हजार के पहाड़ पर चढ़ मंदड़ियों के साथ-साथ बेयर को भी चिढ़ा रहा है। सच पूछिए तो अच्छे दिन बुलिश सेंसेक्स के ही आए हैं।

शेयर मार्केट में गुजारे अपने लंबे कॅरियर में मैंने ऐसे तमाम तीसमारखां मंदड़िये भी बहुत नजदीक से देखे हैं जो बार-बार चोट खाकर भी अपनी मंदी की प्रवृत्ति को छोड़ते नहीं। बाजार चाहे कितना ही क्यों न बढ़ जाए उनका नक्का तो सेंसेक्स को गिराने पर ही केंद्रित रहता है। हर आती और जाती सांस के साथ वे यही दुआ करते हैं कि कब बुल घड़ाम हो और वे उस पर चढ़ाई करें। गिरने वाले पर हंसना या ताली बजाना हमारी सदियों पुरानी आदत रही है।

फिर भी, सेंसेक्स में बनी तेजी की इस बेला में हमें मंदड़ियों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। उनसे पूरी नहीं तो 'आंशिक सहानुभूति' तो रखनी ही चाहिए। आखिर वे भी स्टॉक मार्केट की व्यवस्था का एक अहम हिस्सा हैं। उनका 'मंदी-प्रूफ नजरिया' यह बताने के लिए काफी है कि आप शेयर मार्केट से गिरावट के समय में भी अच्छा कमा सकते हैं। बस मंदी को सहन करने का जज्बा होना चाहिए भीतर।

वैसे, मंदड़िये (मजबूरी के बाद भी) मजबूत दिल के मालिक होते हैं। इसलिए तो मैं उनके प्रति सहानुभूति रखने का कोई मौका छोड़ता नहीं।

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