शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

अबकी दफा गलके ही रहेगी खिचड़ी

तब उस जमाने में बीरबल की खिचड़ी कब और कितनी गली मुझे नहीं मालूम! अकबर के राज में खिचड़ी के कितने अच्छे दिन रहे, इसका भी कोई खास प्रमाण नहीं मिलता। या फिर तब के राजा-महाराजाओं ने खिचड़ी को 'राष्ट्रीय फूड' बनाने के लिए कितने और कहां तक प्रयास किए, ये भी पता नहीं चलता।

पर इतना तो पक्का मालूम है कि खिचड़ी का दबदबा नीचे से लेकर ऊपरी तबके तक टनाटन है। बोले तो सबकी फेवरेट।

मगर हां वर्तमान सरकार जरूर खिचड़ी के 'अच्छे दिन' लाने के प्रति 'कृत-संकल्प' है। सुनाई में आ रहा है कि खिचड़ी को 'राष्ट्रीय फूड' घोषित कराने के प्रयास जोर-शोर से चल रहे हैं। और लग रहा है, इस दफा खिचड़ी गलके ही रहेगी। बीरबल की खिचड़ी की तरह अध-गली नहीं रहने दी जाएगी। आखिर खिचड़ी के सम्मान का सवाल है।

यह खासा दुखद रहा है कि पिछली सरकारों ने खिचड़ी की तरफ जरा भी ध्यान नहीं दिया। उसे लगभग 'उपेक्षित' ही रख छोड़ा। जबकि खिचड़ी की जनमानस के बीच मजबूत पैठ को देखते हुए उसे राष्ट्रीय फूड का खिताब बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। न भूलिए, रसगुल्ला और समोसे के साथ-साथ खिचड़ी भी हमारी 'संस्कृतिक प्रतिष्ठा' का प्रतीक है। खिचड़ी अगर गरीब के पेट का सहारा है तो होटलों-रेस्तरां-ढाबों की खास डिमांड भी है।

जिस प्रकार हर खुशी के लिए मिठाई जरूरी है उसी प्रकार हर टाइप की भूख के लिए खिचड़ी जरूरी है। चाहे हम कितना ही महंगा खाना क्यों न खा लें पर पेट के चूहे तो देसी खिचड़ी खाकर ही शांत होते हैं।

अजी औरों की जाने दीजिए, मैं खुद खिचड़ी का बहुत बड़ा वाला फैन हूं। बड़े-बूढ़े बताते हैं कि मैंने पैदा होते ही पहला शब्द 'खिचड़ी' ही बोला था। खुशनसीब हूं मैं कि मेरा बचपन खिचड़ी के साये में बीता। तब चॉकलेट या चिप्स की जगह खिचड़ी खाकर ही हम अपनी छोटी-छोटी भूखों को भगा दिया करते थे।

न केवल खाने बल्कि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में भी खिचड़ी ऐसे रची-बसी हुई है जैसे- आजकल मोबाइल और इंटरनेट। शायद ही कोई बात या उदहारण खिचड़ी का नाम लिए बिना पूरी होता हो!

हम सब हर रोज अपने-अपने तरीके से किस्म-किस्म की खिचड़ियां पका-गला रहे हैं। कोई सिर्फ बातों की खिचड़ी पका रहा है तो कोई राजनीति में अपनी खिचड़ी गला रहा है। कुछ तो ऐसे भी हैं जो स्त्रियों के इन-बॉक्स में अपनी खिचड़ी गलाने की प्रतीक्षा में रत रहते हैं।

सोशल मीडिया में तो 24x7 खिचड़ी पकती-गलती ही रहती है।

खिचड़ी को राष्ट्रीय फूड बनाने के वास्ते जोर लगाने के लिए सोशल मीडिया का भी खास रोल रहा है। आलम यह है कि ट्विटर, फेसबुक पर आने वाली हर दूसरी पोस्ट खिचड़ी के प्रमोशन पर ही केंद्रित रहती है। रहेगी भी क्यों नहीं आखिर खिचड़ी हमारी आन-बान-शान जो है।

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