बुधवार, 29 नवंबर 2017

पत्नी को चाहिए रोशोगुल्ला

पत्नी को रसगुल्ला बेहद पसंद है। इतना पसंद कि एक दफा बहसबाजी के दौरान उसने रसगुल्ले को मुझसे बेहतर करार दिया था। उसकी मिठास को मेरी मिठास से दस गुना उम्दा बताया था। पसंद चूंकि पत्नी की है, इस नाते मैं उससे अधिक बहस बही नहीं कर सकता। यों भी, पत्नियों से बहस के दौरान बहुत-सी बातों का खास ख्याल रखना पड़ता है।

खैर...!

पत्नी के संज्ञान में जब से रसगुल्ले के बंगाल की झोली में चले जाने की बात आई है उसने लगभग जिद-सी पकड़ ली है कि उसे दास बाबू के यहां का ही रोशोगुल्ला खाना है। अब कहां कलकत्ता और कहां बरेली! सिर्फ रोशोगुल्ला लेने कलकत्ता जाना इतना आसान है क्या! आए दिन ट्रेनों की लेट-लतीफी उसको मालूम नहीं? तब भी एक ही जिद।

हालांकि कई दफा समझा चुका हूं उसको यों बच्चों वाली जिद न करे। रसगुल्ला खाना ही है तो बरेली में रसगुल्ले की दुकानों की भला क्या कमी। हां, ये बात सही है कि यहां के रसगुल्लों में बंगाल के रोशोगुल्लों जैसा स्वाद तो नहीं आ सकता फिर भी जीभ को तो तृप्त कर ही सकता है।

रसगुल्ले के चाहने वालो की उसके प्रति दीवानगी को समझ सकता हूं। यह दीवानगी और प्यार का ही तो असर रहा जो बंगाल वालो ने ओडिशा वालो से रसगुल्ले पर मालिकाना अधिकार को जीत लिया। अच्छा ही हुआ, नहीं तो बेचारा दो राज्यों के आपसी विवाद के बीच पिसता रहता।

मगर मेरे और पत्नी के बीच रसगुल्ले को लेकर विवाद अभी तलक कायम है। इसका फैसला न कोई अदालत कर सकती है न घर-परिवार वाले। मैं भी अच्छी तरह से जानता हूं कि अन्ततः झुकना मुझे ही पड़ेगा। फिर भी मामला जितना और जहां तक लंबा खींच जाए क्या हर्ज है।

पत्नी का कहना है कि वो बंगाल के रसगुल्ले को खाकर उसके स्वाद को 'फील' करना चाहती है। उसकी आत्मा तक घुस जाना चाहती है। मानो, रसगुल्ला कोई आलू हो जिसे मशीन में डालते ही वो सोना उगलने लगे। रसगुल्ले रसगुल्ले सब एक से चाहे बंगाल का हो या बरेली का।

कहीं पढ़ा था कि बनारस में रहने वाले कुछ बंगाली यह तक कहते हैं कि रसगुल्ला उन्होंने बनाया है। और एक दफा जिसने उनका बनाया रसगुल्ला खा लिया तो बंगाल, ओडिशा के रसगुल्ले को भूल जाएगा। अजी, दावा पेश करने में क्या जाता है। कल को अगर मैं यह कहने लग जाऊं कि मैं परसाई जी से बेहतर व्यंग्य लिख सकता हूं। तो क्या मेरे खुशफहमीनुमा दावे पर यकीन कर लिया जाएगा। कभी नहीं...।

फिलहाल तो कोशिश जारी है पत्नी को रसगुल्ले पर मनाने की। कभी मौका पड़ा तो बंगाल का रोशोगुल्ला उसको खिला दिया जाएगा। तब तक वो बरेली के रसगुल्ले का ही स्वाद ले। तिस पर भी नहीं मानती है तो फिर एक ही चारा होगा मेरे कने बंगाल की यात्रा का। वो भी रसगुल्ले की खातिर। 

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