सोमवार, 13 नवंबर 2017

खुशनसीबी: जिनके नाम 'पैराडाइज पेपर्स' में आए!

कहते हैं, मोक्ष स्वर्ग जाकर ही मिलता है! धरती पर रहकर इंसान कर्म चाहे कैसे भी करे पर अंतिम इच्छा उसकी स्वर्ग जाने की ही रहती है। स्वर्ग से मनुष्य का मोह अब का नहीं आदि काल से है। नरक में जाने की तमन्ना तो चोर-अपराधी भी नहीं रखना चाहते। जो भी हो पर स्वर्ग का हमारे जीवन में अच्छा-खासा क्रेज है। यकीन मानिए, कभी-कभी तो बैठे-ठाले मैं भी स्वर्ग जाने की इच्छा अपने मन में गढ़ लिया करता हूं।
धरती पर रहकर कलयुग का आनंद बहुत ले लिया। एक दफा स्वर्ग का लुत्फ भी तो लेकर देखना चाहिए कि नहीं...! इस बहाने बड़े-बड़े देवी-देवताओं से ही मुलाकात हो जाएगी।

सच पूछिए तो मैं उन महान हस्तियों को 'खुशनसीब' मानता हूं जिनका नाम 'पैराडाइज पेपर्स' में आया! जिस कांड के साथ ही पैराडाइज (स्वर्ग) जुड़ा हो वो भला 'गलत' कैसे हो सकता है? इसे तो साक्षत देवताओं का वरदान माना जाना चाहिए! मानो- ये पैराडाइज पेपर्स उन्हीं सेलेब्रिटीज़ के लिएही  रचा गया हो!

इस 'नश्वर संसार' में भांति-भांति के लोग हैं। यहां कभी भी कुछ भी हो सकता है। 'कुछ भी हो सकता है' के लिए खाली-पीली में टेंशन लेने को मैं उचित नहीं मानता। इससे पहले पनामा पेपर्स में जिन ऊंची हस्तियों के नाम आए थे, सिवाय मियां नवाज शरीफ को छोड़के, बाकी किसी के साथ कुछ भी 'बुरा' नहीं हुआ। वो तो मियां शरीफ राजनीतिक उठा-पटक के लपेटे में आ गए। वरना तो गाड़ी चल ही रही थी।

सिंपल-सा फंडा है, बड़े आदमी की चोरी चोरी नहीं 'वरदान' समझी जाती है जबकि छोटा आदमी अगर चोरी से सांस भी ले ले तो तरह-तरह की धराएं लगाकर उसे निपटा दिया जाता है। इस फर्क को समझें और चिल करते रहें।

दरअसल, घपलों-घोटालों के मामले में हम एक बेहद बेफिक्रे मुल्क हैं। विडंबना देखिए, घपले करने वाले ही अक्सर आदर्शवाद और ईमानदारी पर लंबा-चौड़ा भाषण देते पाए जाते हैं। विज्ञापनों में साफ-सफाई व स्वच्छता के उपदेश देने वाले अपना टैक्स दूसरे देश में जाकर बचाते मिलते हैं। जब नाम अख़बारों की सुर्खियों में आ जाता है तो बड़े ही फ़ॉलोसिफिकल अंदाज में 'शांति' का पाठ पढ़ाने लगते हैं। साथ-साथ अपनी बढ़ती उम्र का वास्ता भी दे देते हैं।

वो मशहूर कहावत है न- 'हाथी के दांत दिखाने के कुछ और खाने के कुछ और होते हैं'। तो यही कहावत यहां भी अक्षरशः फिट बैठती है।
फिल्मी या पॉलिटिकल सेलिब्रिटियों का नाम चाहे पनामा पेपर्स में सामने आया हो या पैराडाइज पेपर्स में सेहत और चेहरे पर पीलापन अभी तलक किसी के भी देखने को नहीं मिला है। न ही मिलेगा। बड़े-बड़े लोगों की बड़ी-बड़ी बातें!

वे तो मन ही मन प्रसन्न हो रहे होंगे चाहे कैसे भी आया चलो नाम तो आया। आजकल हर कहीं नाम का ही बोल-बाला है। नाम चाहे बदनामी से मिले या नेक-कर्म से। बस, नाम होना चाहिए। सेलिब्रिटियों को तो वैसे भी थोड़ा बदनाम होकर मिले नाम को एन्जॉय करने में ज्यादा आनंद आता है। अक्सर बदनामियां ही उनकी फिल्में चला ले जाती हैं। समाज भी ऐसे सेलिब्रिटी को ही महत्त्व देने लगा है जो किसी न किसी स्तर पर कुछ न कुछ बदनाम तो हो ही!

सोशल मीडिया अपनी बदनामियों को वायरल करने का सबसे सशक्त माध्यम है आजकल।

पैराडाइज पेपर्स के जरिए मिले नाम को तो सीधा स्वर्ग से मिला वरदान ही माना जाएगा न!

हालांकि विकास-प्रधान सरकार कह जरूर रही है कि पैराडाइज पेपर्स में आए नामों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाएगी मगर फिर आंखों के सामने 2जी और कोयला घोटाला आ जाता है और खुशफहमी दइमाः पर धीरे-धीरे कर असर जमाने लगती है। कुर्सी पर बैठकर कोई भी राजनीतिक जुमला छेड़ने में कुछ नहीं जाता। बस ज़बान ही तो हिलानी होती है। यों भी, राजनीति ज़बान हिलाने का ही तो खेल है। जिसकी जितनी लंबी ज़बान उसका उतना ही ऊंचा जुमला। क्या समझे...!

कृपया ध्यान में रखें जहां स्वर्ग, धर्म, आस्था आदि का मसला बीच में आ जाता हैं वहां सारी की सारी ऊंची बातें धरी की धरी रह जाती हैं। चूंकि पैराडाइज पेपर्स में ऑलरेडी स्वर्ग घुसा हुआ है, तो इसमें कुछ 'कठोर' होता हुआ दिखाई पड़ेगा, उम्मीद कम ही है पियारे! स्वर्ग-सम्मत किसी मसले में अपने नाम का शामिल होना 'गर्व' की बात मानी जाए! है कि नहीं...!

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

कूड़े पर बहस के बहाने

उस दिन मोहल्ले में दो पड़ोसी आपस में सिर्फ इस मुद्दे पर भिड़ लिए कि तूने मेरे घर के आगे कूड़ा क्यों डाला! दोनों के मध्य बहुत देर तक इस मुद्दे पर हल्की-फुल्की गालियों के साथ विचार-विमर्श चलता रहा। बात कूड़े के रास्ते होती-होती कभी एक दूसरे के खानदान तक पहुंच जाती तो कभी एक-दूसरे के अत्यंत निजी प्रसंगों तक। कुछ देर के लिए यह समझना दुर्लभ जान पड़ता कि दोनों के बीच विमर्श या बहस का विषय है क्या?

अक्सर जब आप किसी 'राष्ट्रीय समस्या' पर आपस में बहस को जुटते हैं तो विषय से इतर दो-चार बातें हो ही जाती हैं। बहस को प्रासंगिक बनाए रखना बहुत जरूरी है ताकि आस-पास के लोग भी इंटरेस्ट के साथ उसमें शरीक हो सकें।

यों भी, कूड़े पर लड़ाई या बहस हमारे देश की अनादि काल से राष्ट्रीय समस्या रही है। शायद ही ऐसा कोई शहर, घर, मोहल्ला, कॉलोनी, सोसाइटी हो जहां इस मुद्दे पर लोग आपस में लड़े-भिड़े न हों। बहुत से मामलों में तो बात थाना-कोतवाली, कोर्ट-कचहरी तक भी पहुंच चुकी है। तिस पर भी लोग अपने व्यवहार में अंतर न ला पाए हैं।

बात जहां तक आपस में भिड़ने की है तो हम कूड़े तो क्या भूलवश एक-दूसरे से टच हो जाने तक पर भिड़ लेते हैं। भिड़ना हमारी 'लड़ताऊ संस्कृति' का अहम हिस्सा-सा है। इसे हम कदापि नहीं त्याग सकते।

दूसरी तरफ सरकार के तमाम छोटे-बड़े मंत्री जी-जान से जुटे हैं कूड़े की समस्या के निस्तारण के लिए। आए दिन किसी न किसी अखबार में कोई न कोई मंत्री साफ-सुथरी झाड़ू पकड़े नजर आ ही जाता है, कूड़ा (गंदगी) साफ करते हुए। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि मंत्रीजी के जाने से पहले ही कथित जगह पर कूड़े को पहुंचा दिया जाता है। ताकि मंत्रीजी की कूड़े को झाड़ू मारते हुए फोटू टनाटन आ सके।

विपक्षी लोग इसे बेशक पब्लिसिटी का फण्डा मान सकते हैं किंतु है ये खालिस नेक काम है। नेक कामों के लिए पब्लिसिटी का दरवाजा हमेशा खुला रखना चाहिए।

देखिए, सुधरते-सुधरते ही हममें सुधार आ पाएगा। सुधार कोई जादुई छड़ी न होता कि घुमाई और असर चालू।

कूड़े पर झगड़े-टनटें शाश्वत हैं। ये कभी न कम होने। फिर भी, यह उम्मीद तो कायम है ही कि एक दिन कूड़े पर बाजी हम जीत ही लेंगे।

सोमवार, 6 नवंबर 2017

मंदड़ियों से भी सहानुभूति रखिए

मंदड़ियों से 'सहानुभूति' रखने का कोई भी मौका मैं हाथ से नहीं जाने देता। मंदड़ियों से सहानुभूति रख मुझे ऐसी ही 'शांति' मिलती है जैसे भक्त को अपने ईश्वर की उपासना कर। मैं उन 'मतलबी' लोगों में से नहीं हूं जो टेढ़े वक़्त में 'मजबूर आदमी' का साथ छोड़ दे। आजकल मंदड़ियों की स्थिति लगभग मजबूर आदमी जैसी ही हो रखी है।

इधर, सेंसेक्स ने 33 हजार के पार जब से 'जम्प' लगाई है बेचारे मंदड़ियों के 'खराब दिन' आ लिए हैं। सेंसेक्स के गिरने की उम्मीद में बनाया गया उनका हर 'नक्का' लगभग 'फेल' साबित हो रहा है। कल तक वे दलाल पथ पर 'सीना चौड़ा' कर घूमते पाए जाते थे, इन दिनों आलम यह है कि वे अपने घरों से नहीं निकल रहे हैं। ऐसी विकट मार मारी है सेंसेक्स ने न सहलाते बन रहा है न मरहम लगाते।

सेंसेक्स की महिमा भी अपरंपार है। कब किस करवट, ऊंट की मानिंद, पलट या बैठ जाए कोई नहीं जानता। 2014 के बाद से इसने जो तेजी पकड़ी है अब तक हाथ न आ पाया है मंदड़ियों के। अपवादस्वरूप छोटी-मोटी गिरावटों को अगर परे रखें तो भी सेंसेक्स अपनी रौ में मस्तराम ही बना हुआ है। मार्केट के जानकार लोग बता रहे हैं कि सेंसेक्स में बनी तेजी को अभी कुछ साल और प्रभावी रहना है!

हालांकि स्टॉक मार्केट में कुछ भी 'निश्चित' नहीं है, जैसे कभी क्रिकेट में अंतिम गेंद तक नहीं होता, फिर भी अगर ऐसा हुआ तो मंदड़ियों की तो विकट वाली वाट लग ही जानी है। जाने कितने मंदड़ियों को सदमे में आ जाना है। जाने कितने मंदड़ियों के चूल्हे बंद हो जाने हैं।

मैं तो कभी-कभी मंदड़ियों के खराब दिनों की स्थिति को सोचकर लगभग अवसाद टाइप माहौल में चला जाता हूं। वे मंदड़िये हुए तो क्या हुआ; हैं तो अपने ही भाई लोग न।

देखो जी, क्षेत्र चाहे स्टॉक मार्केट का हो चाहे लेखन या राजनीति का- अपना तो बचपन से यही मनाना रहा है- कि दुकान सबकी चलती रहनी चाहिए। ऐसा कभी न होना चाहिए कि फलां की दुकान में तला पड़ जाए। आज के जमाने में किसी भी टाइप की दुकान को चलाए रखना 'वैवाहिक जीवन' को चलाए रखने से कहीं ज्यादा कठिन काम है! क्या समझे पियारे...।

एक तरफा तेजी या एक तरफा मंदी दोनों की स्टॉक मार्केट की सेहत और देश की इकोनॉमी के लिए 'घातक' हैं। दोनों के बीच बैलेंस बराबर का बना रहना चाहिए। अच्छा, थोड़ा मंदड़ियों को भी यह समझना चाहिए कि 'सब दिन होत न एक समान'। उनके दिमाग में जब 24x7 मंदी-मंदी ही घूमेगी, तो ऐसे कैसे चलेगा। एक न एक दिन ऊंट को पहाड़ के नीचे आना ही होगा। जैसाकि इन दिनों आया हुआ है। सेंसेक्स का घोड़ा राणा प्रताप का 'चेतक' बना हुआ है। न किसी के रोके रुक रहा है न किसी के ठहरे ठहर।

बेचारे मंदड़िये इस 'खुशफहमी' में फंसे हुए हैं कि बुल नीचे का रूख करे तो बेयर उस पर हावी होए। मगर बुल को तो ऊंचाई का ऐसा चस्का लगा हुआ है कि 33 हजार के पहाड़ पर चढ़ मंदड़ियों के साथ-साथ बेयर को भी चिढ़ा रहा है। सच पूछिए तो अच्छे दिन बुलिश सेंसेक्स के ही आए हैं।

शेयर मार्केट में गुजारे अपने लंबे कॅरियर में मैंने ऐसे तमाम तीसमारखां मंदड़िये भी बहुत नजदीक से देखे हैं जो बार-बार चोट खाकर भी अपनी मंदी की प्रवृत्ति को छोड़ते नहीं। बाजार चाहे कितना ही क्यों न बढ़ जाए उनका नक्का तो सेंसेक्स को गिराने पर ही केंद्रित रहता है। हर आती और जाती सांस के साथ वे यही दुआ करते हैं कि कब बुल घड़ाम हो और वे उस पर चढ़ाई करें। गिरने वाले पर हंसना या ताली बजाना हमारी सदियों पुरानी आदत रही है।

फिर भी, सेंसेक्स में बनी तेजी की इस बेला में हमें मंदड़ियों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। उनसे पूरी नहीं तो 'आंशिक सहानुभूति' तो रखनी ही चाहिए। आखिर वे भी स्टॉक मार्केट की व्यवस्था का एक अहम हिस्सा हैं। उनका 'मंदी-प्रूफ नजरिया' यह बताने के लिए काफी है कि आप शेयर मार्केट से गिरावट के समय में भी अच्छा कमा सकते हैं। बस मंदी को सहन करने का जज्बा होना चाहिए भीतर।

वैसे, मंदड़िये (मजबूरी के बाद भी) मजबूत दिल के मालिक होते हैं। इसलिए तो मैं उनके प्रति सहानुभूति रखने का कोई मौका छोड़ता नहीं।

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

अबकी दफा गलके ही रहेगी खिचड़ी

तब उस जमाने में बीरबल की खिचड़ी कब और कितनी गली मुझे नहीं मालूम! अकबर के राज में खिचड़ी के कितने अच्छे दिन रहे, इसका भी कोई खास प्रमाण नहीं मिलता। या फिर तब के राजा-महाराजाओं ने खिचड़ी को 'राष्ट्रीय फूड' बनाने के लिए कितने और कहां तक प्रयास किए, ये भी पता नहीं चलता।

पर इतना तो पक्का मालूम है कि खिचड़ी का दबदबा नीचे से लेकर ऊपरी तबके तक टनाटन है। बोले तो सबकी फेवरेट।

मगर हां वर्तमान सरकार जरूर खिचड़ी के 'अच्छे दिन' लाने के प्रति 'कृत-संकल्प' है। सुनाई में आ रहा है कि खिचड़ी को 'राष्ट्रीय फूड' घोषित कराने के प्रयास जोर-शोर से चल रहे हैं। और लग रहा है, इस दफा खिचड़ी गलके ही रहेगी। बीरबल की खिचड़ी की तरह अध-गली नहीं रहने दी जाएगी। आखिर खिचड़ी के सम्मान का सवाल है।

यह खासा दुखद रहा है कि पिछली सरकारों ने खिचड़ी की तरफ जरा भी ध्यान नहीं दिया। उसे लगभग 'उपेक्षित' ही रख छोड़ा। जबकि खिचड़ी की जनमानस के बीच मजबूत पैठ को देखते हुए उसे राष्ट्रीय फूड का खिताब बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। न भूलिए, रसगुल्ला और समोसे के साथ-साथ खिचड़ी भी हमारी 'संस्कृतिक प्रतिष्ठा' का प्रतीक है। खिचड़ी अगर गरीब के पेट का सहारा है तो होटलों-रेस्तरां-ढाबों की खास डिमांड भी है।

जिस प्रकार हर खुशी के लिए मिठाई जरूरी है उसी प्रकार हर टाइप की भूख के लिए खिचड़ी जरूरी है। चाहे हम कितना ही महंगा खाना क्यों न खा लें पर पेट के चूहे तो देसी खिचड़ी खाकर ही शांत होते हैं।

अजी औरों की जाने दीजिए, मैं खुद खिचड़ी का बहुत बड़ा वाला फैन हूं। बड़े-बूढ़े बताते हैं कि मैंने पैदा होते ही पहला शब्द 'खिचड़ी' ही बोला था। खुशनसीब हूं मैं कि मेरा बचपन खिचड़ी के साये में बीता। तब चॉकलेट या चिप्स की जगह खिचड़ी खाकर ही हम अपनी छोटी-छोटी भूखों को भगा दिया करते थे।

न केवल खाने बल्कि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में भी खिचड़ी ऐसे रची-बसी हुई है जैसे- आजकल मोबाइल और इंटरनेट। शायद ही कोई बात या उदहारण खिचड़ी का नाम लिए बिना पूरी होता हो!

हम सब हर रोज अपने-अपने तरीके से किस्म-किस्म की खिचड़ियां पका-गला रहे हैं। कोई सिर्फ बातों की खिचड़ी पका रहा है तो कोई राजनीति में अपनी खिचड़ी गला रहा है। कुछ तो ऐसे भी हैं जो स्त्रियों के इन-बॉक्स में अपनी खिचड़ी गलाने की प्रतीक्षा में रत रहते हैं।

सोशल मीडिया में तो 24x7 खिचड़ी पकती-गलती ही रहती है।

खिचड़ी को राष्ट्रीय फूड बनाने के वास्ते जोर लगाने के लिए सोशल मीडिया का भी खास रोल रहा है। आलम यह है कि ट्विटर, फेसबुक पर आने वाली हर दूसरी पोस्ट खिचड़ी के प्रमोशन पर ही केंद्रित रहती है। रहेगी भी क्यों नहीं आखिर खिचड़ी हमारी आन-बान-शान जो है।

बुधवार, 1 नवंबर 2017

नेताओं के बिकने पर इतना हंगामा क्यों!

जब दूल्हा बिक सकता है, खिलाड़ी बिक सकते हैं तो नेता क्यों नहीं बिक सकते? समझ नहीं आता- नेताओं के बिकने पर ही इतना हंगामा क्यों खड़ा किया जाता? मीडिया से लेकर समाज-सुधारक तक बिके नेता के पीछे यों पड़ जाते हैं मानो उसने बिककर बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो!

जरा-सी बात लोग नहीं समझते, नेता कोई अपने लिए थोड़े ही न बिकता है! वो बिकता है देश, लोकतंत्र और अपनी पार्टी की खातिर! वो बिकता है ताकि चुनावों के दौरान- बरसों से चली आ रही खरीद-फरोख्त की परंपरा को जिंदा रख सके! परंपराओं के साथ जुड़ाव जितना नेता लोग रख लेते हैं उतना कोई न रख पाता!

चुनावी माहौल में तो नेताओं की खरीद-बेच कोई नई बात नहीं होती। तकरीबन हर पार्टी में ये चलता है। नेताओं की खरीद-फरोख्त एक तरह से 'चुनावी शगुन' टाइप होती है। बिना इसको निभाए न चुनावों में मजा आता है न हार-जीत को देखने में।

राजनीति में विचारधाराएं अब बीते जमाने की बातें हुईं। विचारधारा के हिसाब से नेता या पार्टी अगर चलने लगे न तो चार दिन में ही भट्टा बैठ जाएगा। हां, देश, समाज और जनता को दिखाने को हर नेता और पार्टी अपनी-अपनी विचारधारा का गुणगान अवश्य करते हैं किंतु वास्तविकता में यह सब होता नहीं। सिंपल-सी बात है, आज की तारीख में न तो कोई दल दूध का धुला है न ही कोई नेता हमाम में नंगा। हर कोई अपने तरीके से अपनी दुकान चलाने में मशगूल है।

फिर भी हैं बुद्धिजीवि किस्म के कुछ लोग समाज में जिन्हें नेताओं के बिकने-बिकाने पर सख्त एतराज रहता है। पर उनके कहे की चिंता ही कौन करता है यहां? जाहिर करते रहें वे अपना एतराज, खरीद-फरोख्त तो फिर भी चलनी ही है।

राजनीति में कुछ बातें अब इतनी सामान्य हो ली हैं कि जिनके घटने पर- थोड़ा-बहुत समय तो हो-हल्ला होता है- फिर सब अपने-अपने कानों में तेल डालकर ऐसे बैठ जाते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो। बदलते वक्त ने क्या नेता, क्या पार्टी, क्या जनता सबको बदल डाला है।

मेरा तो स्पष्ट मानना यही है कि जो हो रहा है होता रहने दें। समय सबका इतिहास खुद लिख देगा। नेताओं में मची ख़रीद-फरोख्त की भेड़-चाल आंशिक ही सही पर राजनीति का आगे आने वाला समय इससे भी विकट होगा।

सब पर खाक डाल आप तो सिर्फ मौज लीजिए। बाकी वक़्त की चाल पर छोड़ दीजिए।