गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

ताजमहल के बहाने

आजकल ताजमहल पर खूब जिक्र छिड़ा हुआ है तो यह किस्सा याद आ गया।

कुछ साल पहले पत्नी ने भी ऐसी ही एक तमन्ना मुझ पर जाहिर की थी कि मैं उसके खर्च होने के बाद उसकी याद में 'ताजमहल' जैसा कुछ बनवाऊं! तब इस मसले पर हमारे बीच तगड़ी बहस हुई थी। बात तलाक के रास्ते होती हुई थाना-कोतवाली तक पहुंच गई थी। न केवल मोहल्ले के पड़ोसियों बल्कि रिश्तेदारों ने भी खूब तमाशा देख फुल-टू मजे लिए थे।

पता नहीं पत्नी के दिमाग में यह बात कहां से बैठ गई थी कि मैं उसके वास्ते ताजमहल टाइप (प्रेम की धरोहर) बनवाने की हैसियत रखता हूं। जबकि मेरी आर्थिक वस्तुस्थिति से वो काफी अच्छी तरह वाकिफ थी। ताजमहल बनवाने को वो बच्चों से भी आसान खेल समझती थी। उसे लगता था मरे कने धन-दौलत का एक ऐसा 'गुप्त पेड़' है, जहां 24x7 पैसे लटके ही रहते हैं। जब जरूरत हो। जाओ और तोड़ लाओ।

वो तो शाहजहां साहब का ही बूता था जो उन्होंने अपनी बेगम मुमताज की याद में ताजमहल बनवा डाला। वरना, आजकल तो आशिक लोग अपनी महबूबा के लिए मोबाइल रिचार्ज से आगे कहां बढ़ पाते हैं! प्रेशर जब ज्यादा पड़ता है तो अपनी ईएमई पर एक फोन खरीदकर दे देते हैं।
मगर कभी-कभी मुझे लगता है, शाहजहां साहब ने ताजमहल बनाकर देश के आशिकों और मुझ जैसे पतियों को विकट मुसीबत में डाल दिया। अपवादों पर खाक डाल भी दें तो कुछ महबूबाओं और पत्नियों की ख्वाहिश यह तो रहती ही है कि उनका आशिक या पति उनके लिए एक ताजमहल टाइप बनाकर तो दे ही। पर ये सोचने की जहमत नहीं फरमातीं की तब के समय और अब के समय में जमीन-आसमान से भी अधिक अंतर आ चुका है। अगर ईएमई का सहारा न होता तो अब तक तलाक के केसोंं की बाढ़-सी आ गई होती।

चौदवीं का चांद दूर से देखने में ही खूबसूरत लगता है। करीब आने पर तो हजार तरह की मुसीबतें दर-पेश आती हैं।

इधर ताजमहल पर जब से विवाद छिड़ा है पत्नी को याद दिला रहा हूं उसकी वो जिद। बुझे मन से पत्नी भी यह स्वीकार करने लगी है कि अच्छा ही हुआ जो मैंने तब उसकी बात न मानी। वरना, आज मुझे भी कोई उस 'दूसरे ताजमहल' के लिए कोस रहा होता!

वर्तमान में बने रहने में ही हजार सुख हैं। इतिहास के पीछे भागना खुद को दिगभ्रमित करने जैसा ही है। क्या नहीं...!

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