गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

समस्याएं ही समस्याएं

समस्या देश में नहीं होती। लोगों के 'दिमाग' में होती है। दिमाग से होते-होते समस्या जब ज़बान पर आती है तब वह 'देश की समस्या' बन जाती है। देश की समस्याओं को हल करने के लिए बड़े-बड़े 'दिमागदार' लोगों की सहायता ली जाती है। दिमागदार लोग समस्या को हल करने में अपना अगला-पिछला सारा जोर लगा देते हैं। समस्या का हल खोजते-खोजते कुछ तो खुद अपने लिए ही समस्या बन जाते हैं।

धीरे-धीरे धरती पर समस्याओं का बोझ इस कदर बढ़ता चला जाता है कि हर समस्या एक-दूसरे से पूछती है- 'पार्टनर! तेरी समस्या क्या है? एक समस्या हो तो बताई-समझाई भी जाए। यहां इंसानों से ज्यादा तो समस्याएं हैं। कुछ समस्याएं तो ऐसी भी हैं कि इंसान के मरने के बाद भी उसका पिंड न छोड़तीं। उम्मीद करता हूं, यमराज इंसान को ले जाने से पहले उससे उसकी या दुनिया की समस्या अवश्य ही पूछ लेता होगा!

आजादी से पहले और आजादी के बाद की समस्याएं हमेशा एक-दूसरे के 'काउंटर' में लगी रही हैं। न पहले वाली समस्याएं हल हो पाती हैं न बाद वाली। ऊपर से 'लुत्फ' यह, जब से सोशल मीडिया अस्तित्व में आया तब से समस्याओं का मानो 'अंबार' ही खड़ा हो गया है। मैं गारंटी के साथ कह सकता हूं, धरती से कहीं ज्यादा समस्याएं सोशल मीडिया पर हैं।

जिसे देखो वो अपने फेसबुक, टि्वटर, व्हाट्सएप के स्टेटसों पर किसी न किसी समस्या का राग छेड़े बैठा है। हालांकि गाना किसी को नहीं आता। गा मगर सब रहे हैं।

देश की समस्याएं कूड़े का ढेर बनती जा रही हैं। हर कोई अपने घर के एंटरेंस को साफ-सुथरा रखने के लिए दूसरे के घर के आगे कूड़ा डालने में लगा पड़ा है। कूड़े पर झगड़े बढ़ते जा रहे हैं। झगड़ों के समाधान के वास्ते यूएन तक गुहारें लगाई जा रही हैं। बेचारा यूएन परेशान है कि किस कूड़े (समस्या) से निपटे किसे न्यूट्रल छोड़ दे।

इसीलिए तो मैंने समस्याओं पर सोचना ही बंद कर दिया है। एंवई टेंशन लेने से कोई फायदा नहीं। अपने दिमाग को मैं किस्म-किस्म के 'फितूरों का घर' ही बनाए रहने देना चाहता हूं। मैं उन पुराने लोगों में से नहीं, जो देसी घी खाके अपने शरीर एवं दिमाग को 'मजबूत' रखा करते थे। मैं तो 'रिफाइंड युग' की पैदाइश हूं। जरा-सी समस्या से मेरा कॉलिस्ट्रोल बढ़ जाता है। दिल की धड़कनें मुंह को आ जाती हैं। शुगर का लेबल रॉकेट-लांचर बन जाता है।

समस्या के एग्नोरेंस में ही भलाई है। बाकी जो लोड ले रहे हैं, उन्हें दूर से प्रणाम।

1 टिप्पणी:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन गणेश शंकर विद्यार्थी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।