सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

न मिला साहित्य का नोबेल

साहित्य का नोबेल एक दफा फिर से मेरे देश के साहित्यकारों के हाथों से फिसल गया। एक विदेशी साहित्यकार उस पर कब्जा जमा बैठा। यह जितना क्षोभप्रद हमारे साहित्यकारों के लिए है, उससे कहीं ज्यादा बेचैनी का विषय मेरे लिए है। अपनी बेचैनी का आलम मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता। जबकि इस बार मुझे पक्का विश्वास था कि साहित्य का नोबेल मेरे देश के ही किसी साहित्यकार के झोले में गिरेगा। मगर होनी को टालने की हिम्मत भला कौन कर सके है।

देश के साहित्यकार को साहित्य का नोबेल मिलने की दावेदारी मैं यों ही हवा में नहीं छोड़ रहा हूं। इसके पुख्ता कारण हैं मेरे कने। साहित्य का नोबेल बांटने का निर्णय लेने वाली समीति को क्या मालूम नहीं था कि पिछले साल मेरे देश के कितने ही साहित्यकारों-लेखकों ने मात्र ‘असहिष्णुता’ के मुद्दे पर अपने-अपने पुरस्कार एक झटके में लौटा दिए थे? देश-समाज में असहिष्णुता को न पनपने देने की खातिर साहित्यकारों ने अपनी ऐड़ी-चोटी का बल तक लगा दिया था। लोकतंत्र की रक्षा की खातिर कितने ही साहित्यकारों ने सरकार के विरूद्ध सभाएं-गोष्ठियां कर डालीं।

ये सब करते वक्त साहित्यकारों ने जरा भी यह न सोचा कि ऐसा करने से वे या उनका लेखन खतरे में पड़ सकता है। जेल आदि की हवा भी खानी पड़ सकती है। तरह-तरह की धमकियां मिल सकती हैं।

फिर भी हमारे वीर साहित्यकार एक के बाद एक कर-करके पुरस्कार लौटाते रहे। घोर-संघर्ष के उन दिनों में बहुत से साहित्यकारों ने तो अपना नियमित लेखन भी मुलत्वी कर दिया होगा। ऐसे में भला कहां दिलो-दिमाग लगता है लिखने लिखाने में।

तिस पर भी साहित्य का नोबेल देने वाली ज्यूरी ने मेरे देश के साहित्यकारों के पुरस्कार वापसी के संघर्ष को यों इग्नोर किया जैसे ये सब ‘ठलुआगीरी’ का काम हो। उन्हें पता ही नहीं कि कितना ‘पीड़ादायक’ होता है मिले हुए पुरस्कार को यों मुफ्त में लौटाना। साहित्यकार को कितने-कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं एक-एक पुरस्कार की खातिर। पीठ खुजियाने से लेकर चरण तक छूने तक क्या-क्या नहीं करना पड़ता। तब कहीं जाकर पुरस्कार उनकी झोली में गिरता है।

पुरस्कार वापस करना कोई बच्चों का खेल नहीं महाराज। फिर भी मेरे देश के साहित्यकारों ने यह महान काम किया। मुझे उन पर हर तरह से गर्व है।

नोबेल देने वालों का यह ‘पक्षपाती रवैया’ मुझे वाकई बहुत खरा है। जी तो चाह रहा है, उन्हें मैं एक तगड़ा ‘खुला खत’ लिखूं। किंतु मुझे कुछ सोचकर ही चुप रह जाना पड़ रहा है।

मैं मेरे देश के साहित्यकारों का ‘भला’ चाहता हूं। हर वक्त दिल से यही दुआ करता हूं कि एक रोज उन्हें भी साहित्य का नोबेल मिलते हुए देखूं। इससे नोबेल का कद ही ‘ऊंचा’ होगा।

2 टिप्‍पणियां:

Pushpendra Dwivedi ने कहा…

बेहतरीन रचनात्मक अभिव्यक्ति

Ravishankar Shrivastava ने कहा…

मेरा पक्ष रखने, सार्वजनिक रूप से मेरा समर्थन करने के लिए आपका आभार. मैंने आशा नहीं छोड़ी है. इस बार नहीं तो अगली बार ही सही .. ही ही ही :)