गुरुवार, 21 सितंबर 2017

वंशवाद की जय

पहले मैं वंशवाद और वंशवादियों को ‘हेय दृष्टि’ से देखा करता था। जाने कितने ही लेख मैंने ‘वंशवाद के विरोध’ में यहां-वहां लिख डाले। कितने ही दोस्तों से अपनी दोस्ती सिर्फ इस बात पर एक झटके में ‘खत्म’ कर दी कि वे बहुत बड़े वाले वंशवादी थे। हमेशा वंशवाद के समर्थन में खड़े रहते थे। मेरे वंशवादी न होने पर अक्सर मुझ पर ‘कटाक्ष’ करते थे।

लेकिन वंशवाद पर जब से मैंने ‘उन्हें’ सुना है तब से मेरा नजरिया वंशवाद पर पूरी तरह से बदल गया है! जैसाकि ‘उन्होंने’ कहा था कि मेरे वंशवाद पर सवाल न उठाइए। वंशवाद की परंपरा हमारे यहां सदियों से रही है। इस बहाने कुछ ऊंचे वशवादियों के नाम भी उन्होंने गिनवा दिए।

मैंने काफी गहराई में जाकर सोचा और महसूस किया कि उन्होंने कुछ ‘गलत’ नहीं कहा। हम ‘वंशवाद-प्रधान’ मुल्क ही हैं। राजनीति से लेकर साहित्य, फिल्मों से लेकर बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों तक में वंशवाद गहरी जड़ें जमाए है। वंशवाद को दो-चार तगड़े लेखों या तीखे भाषणों के सहारे कतई नहीं ‘उखाड़ा’ जा सकता।

कहना न होगा, बहुत से सामाजिक एवं राजनीति मसले वंशवाद के जोर से ही ‘स्लॉव’ हो जाते हैं हमारे यहां।

हालांकि कहने वाले वंशवाद को समाज पर ‘काला धब्बा’ बताते हैं। किस्म-किस्म की ‘बुराईयां’ गिनाते हैं। अच्छाईयां न के बराबर बताते हैं। किंतु ‘सूक्ष्म दृष्टि’ से अगर देखा जाए तो वंशवाद से उत्तम कोई विकल्प है ही नहीं। वंशवाद के तमाम फायदे हैं। खासकर, राजनीति तो ‘वंशवादिये लाभों’ से भरी पड़ी है।

अपवाद को किनारे रख दें तो सौ परसेंट देखा यही गया है कि नेता का बेटा आगे चलकर बनता नेता ही है। राजनीति के जिस बीज को कभी उसके परिवार में बोया गया था आगे आने वाली पीढ़ियां अपने-अपने तरीके से उसे पल्लवित करती रहती हैं। वंश एक ही ढाल पर तना बरसों बरस टिका रहता है। लगभग यही हाल सिनेमाई संसार का भी है। कंगना ने इसी वंश-परंपरा पर ही तो तीखे प्रहार किए हैं। पर कंगना क्या जाने ‘वंशवाद की मलाई’ का स्वाद!

जब से वंशवाद पर हंगामा छिड़ा है, देख रहा हूं, अब वो बड़े नेता और बुद्धिजीवि भी लगभग ‘खामोश’ हैं जो गाहे-बगाहे वंशवाद को गलिया दिया करते थे। चूंकि वंशवाद पर बयान एक ‘ऊंचे कद’ के नेता की तरफ से आया है तो लाजिमी है अन्य लोगों का चुप रह जाना। वंशवाद में सबके अपने-अपने (कम या ज्यादा) फायदे निहित हैं तो भला कोई क्यों बोले?

यह देश, समाज और खुद मैं ‘एहसानमंद’ हूं उन वंशवादी नेताओं-फिल्मवालों का जिन्होंने लाख हाय-तौबा के बाद भी अपने-अपने वंशवाद को ‘जिंदा’ रखा हुआ है। वंशवाद को अस्तित्व में रख वे पूरी दुनिया में एक मिसाल कायम कर रहे हैं। मैं तो चाहता हूं पूरी दुनिया हमारे देश के वंशवादियों से वंशवाद को चलाए-बनाए रखने की ‘प्रेरणा’ ले।

वंशवाद की सदा जय हो।

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