रविवार, 6 अगस्त 2017

यारी-दोस्ती की टशनबाजियां

दोस्तों की किल्लत मुझे बचपन से कभी नहीं रही। लाइफ में एक से बढ़कर एक दोस्त बनाए। जमकर दोस्तबाजियां कीं। स्कूल-कॉलेज के दिनों की दोस्तियों ने नए मुकाम हासिल किए। मोहल्ले में मैं पतंगबाजी के लिए तो खासा बदनाम था ही, नुक्कड़ पर दोस्तों के साथ मजमा लगाने के चर्चे भी कम न थे। इस बाबत जाने कितनी दफा मुझे मोहल्ले से बरखास्त किए जाने की चालें चली गईं। मगर मैं न माना। यारबाशियों का दौर यों ही चलता रहा।

मगर हां यारी-दोस्त में इस बात का मैंने खास ख्याल रखा कि कोई भी पढ़ा-लिखा या बुद्धिजीवि टाइप का दोस्त न बने। हालांकि काबिल लौंडों की तरफ से कोशिशें तो बहुत हुईं मुझसे दोस्ती गांठने की किंतु मैंने ही कभी भाव न दिया। वो क्या है, पढ़े-लिखे या काबिल लौंडों से दोस्ती करने के अपने लफड़े हैं। वो या तो हमेशा पढ़ाई-लिखाई की बातें करेंगे या फिर दुनिया-जहान का ज्ञान बांटेंगे। फिल्म, रोमांस, पतंगबाजी, गुल्ली-डंडा, आवारागिर्दी का चेप्टर न उनकी लाइफ में होते हैं न किताबों में। ऐसी महान आत्माओं से मैं दोस्ती के पेच लड़ाना नहीं चाहता, जहां दोस्तीबाजी में मस्तियां- बदमाशियां न हों।

दोस्त ऐसे हों जिनके साथ आप जिंदगी का हर आनंद उठा सकें। जिंदगी के वो पाठ जो आप किताबें पढ़कर न जान पाए, दोस्त लोग हंसते-खेलते सीखा दें। किस्म-किस्म की बदमाशियां दोस्ती की पहली निशानी होती हैं। ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि जरूरत के वक्त पढ़े-लिखे दोस्तों से कहीं ज्यादा काम बदमाश (बिंदास) टाइप दोस्त आते हैं। पढ़ा-लिखा दोस्त हर मसले में दिमाग पर लोड लेने लगता है। मगर बिंदास दोस्त ‘भाई तू चिंता न कर। जो होगा देखा जाएगा’ कहकर दिली-हौसला बढ़ा देता है।

खूब ध्यान है, स्कूल-कॉलेज में ऐसे कितने ही विकट वाले सीन बने पर बचाया हमेशा बिंदास दोस्तों ने ही। इंटीलेक्चूअल किस्म के दोस्त तो दूर बैठे तमाशा देखते रहे। बाद में जब मिले तो ऊंची-ऊंची नसीहतें और दे गए। नसीहतों से जिंदगी कभी चली है भला। वो तो खुदा का शुक्र रहा कि मैंने कभी पढ़े-लिखे लौंडों की नसीहतों को दिलो-दिमाग पर नहीं लिया। नहीं तो किसी भी सूरत में मैं आज लेखक नहीं बन पाता। मेरे लेखक बनने में मेरे बिगड़ैल टाइप दोस्तों का बहुत बड़ा हाथ है।

न न चौंकिए नहीं। यह हकीकत है। बचपन में- जितना भी बिगड़ैल किस्म का साहित्य मिला उन्हीं दोस्तों की मदद से सब पढ़ डाला। जब ढंग से अक्ल आई भी न थी, तब ही खुशवंत सिंह की चार-पांच किताबें पढ़कर चट्ट कर चुका था। कहने को वो सड़क किनारे बिकने वाला अश्लील या लुगदी किस्म का (काबिल लोगों की नजर में) साहित्य था पर आज भी उन लेखकों की तूती प्रगतिशील या जनवादी लेखकों-साहित्यकारों से कहीं ज्यादा बोलती है। उनसे कहीं अधिक रॉयल्टी पाते हैं। बेस्ट-सेलर हैं। आज भी जमकर पढ़े जाते हैं।

अपना तो शुरू से मानना रहा है कि लेखक बनने के लिए बदमाश और बिंदास टाइप दोस्तों का साथ बेहद जरूरी है। लाइफ का लेसन तो वे ही लोग ढंग से बता पाते हैं। डर को भीतर से बाहर निकाल फेंकने का माआदा रखते हैं।

मगर आजकल की दोस्तियां और दोस्त हमारे बचपन से काफी अलग हैं। अब दोस्तियां ‘जमीनी’ कम ‘डिजिटल’ ज्यादा हैं। दोस्तियां फेसबुक पर गढ़ी जाती हैं। उस बंदे को सम्मान की निगाह से देखा जाता है, जिसकी फ्रेंड-लिस्ट की संख्या चार-पांच हजार के पार निकल चुकी हो। अगला यह कहते फुला नहीं समाता कि आज उसने फेसबुक पर दस-पचास दोस्त बनाए या बीस-पच्चीस को फ्रेंड रिक्यूस्ट भेजी।

डिजिटल दोस्ती का सबसे बड़ा लुत्फ यह है कि आड़े वक्त में ये दोस्तियां पता नहीं किस कुंए में मुंह छिपाए आराम फरमाती रहती हैं। यहां इन-बॉक्स में आकर लंबी-चौड़ी बातें हांकने वाले तो खूब टकराते हैं किंतु साथ में मोहल्ले के नुक्कड़ पर चाय पिलाने या गली में गुल्ली-डंडा खेलने वाला कोई नहीं मिलता। आमने-सामने दोस्तों की शक्लें देखे या आवाज सुने ही महीनों-सालों बीत जाते हैं। डिजिटल समय में दोस्त-दोस्तियां औपचारिक-सी होती जा रही हैं।

फिर भी, मुझे इस बात का संतोष है कि मेरे कने अब भी वही दोस्त हैं, जिनके साथ बचपन और जवानी किस्म-किस्म की शरारतों और बदमाशियों के साथ गुजरी। मौका मिलता है तो हम आज भी अपने उसी पुराने दौर में लौट जाते हैं। जरा-बहुत सही मन तो ‘बहल’ ही जाता है।

4 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " 'बंगाल का निर्माता' की ९२ वीं पुण्यतिथि “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Udan Tashtari ने कहा…

डिजिटल दोस्ती का सबसे बड़ा लुत्फ यह है कि आड़े वक्त में ये दोस्तियां पता नहीं किस कुंए में मुंह छिपाए आराम फरमाती रहती हैं।....बहुत सही कहा!! अच्छा लगा पढ़कर!!

Preeti 'Agyaat' ने कहा…

यहां इन-बॉक्स में आकर लंबी-चौड़ी बातें हांकने वाले तो खूब टकराते हैं किंतु साथ में मोहल्ले के नुक्कड़ पर चाय पिलाने या गली में गुल्ली-डंडा खेलने वाला कोई नहीं मिलता। आमने-सामने दोस्तों की शक्लें देखे या आवाज सुने ही महीनों-सालों बीत जाते हैं। डिजिटल समय में दोस्त-दोस्तियां औपचारिक-सी होती जा रही हैं।...सहमत

Anusha Mishra ने कहा…

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