गुरुवार, 3 अगस्त 2017

माफ कीजिएगा, मेरे घर में टमाटर नहीं है

क्या आपके घर में टमाटर है?

यह प्रश्न आजकल मुझे इतना ‘असहज’ किए हुए है कि मैं रातों को सो नहीं पा रहा। निगाहें हर वक्त दरवाजे की देहरे पर टिकी रहती हैं कि कहीं कोई पड़ोसी या रिश्तेदार टमाटर मांगने न आ धमके। आलम यह है कि दफ्तर भी न के बराबर ही जा पा रहा हूं। वहां भी यही डर सताता रहता है कि कोई कुलीग टमाटर की डिमांड न कर दे।

पत्नी को सख्त हिदायत दे रखी है कि मेरी सब्जी में टमाटर का एक छिलका भी नहीं दिखना चाहिए। इस मुद्दे पर कई दफा पत्नी से ‘मुंहजोरी’ हो चुकी है। जो न कहना चाहिए वो सबकुछ वो मेरे बारे में कह चुकी है। इक टमाटर की खातिर वो मुझे दुनिया का सबसे ‘कंजूस पति’ तक मोहल्ले में ‘घोषित’ कर चुकी है। मगर कोई नहीं...। सब मंजूर है। टमाटर की खातिर मैं अपना ‘अपमान’ सहने को ‘स-हर्ष’ तैयार हूं। लेकिन मैंने भी ‘प्रण’ कर रखा है कि चाहे जो हो जाए घर में टमाटर खरीदकर नहीं लाऊंगा तो नहीं ही लाऊंगा।

मानता हूं, टमाटर खाने के तमाम लाभ हैं। टमाटर सलाद की शान है। टमाटर गोरे लाल गालों की खूबसूरत पहचान है। किंतु सिर्फ सेहत की शान की खातिर इतने महंगे टमाटर को खरीदना- मेरी निगाह में- फिजूलखर्ची ही नहीं बल्कि अव्वल दर्जे की मूर्खता है। माफ कीजिएगा, मैं ऐसी मूर्खता करने के पक्ष में कतई नहीं हूं।

यह तो टमाटर की बात रही। ऐसा मैंने तब भी किया था, जब पिछले दिनों दाल और प्याज की बढ़ी कीमतों ने आंखों में पानी ला दिया था। तब भी पत्नी मेरे सिर को आ गई थी। न केवल मोहल्ले बल्कि नाते-रिश्तेदारों के बीच कंजूस कहकर मेरी ‘खिल्ली’ उड़ाई गई थी फिर भी मैंने न दाल खरीदी न ही प्याज। हां, काफी दिनों तलक खाना बे-स्वाद टाइप ही रहा। पत्नी ने घर में खाना बनाना न के बराबर कर दिया। मगर मैं न हारा। दाल और प्याज से समानांतर लड़कर मैंने दिखा दिया- महंगाई के आगे समझौता न करने में ही जीत है।

बात बहुत सिंपल-सी है। किंतु हम समझना नहीं चाहते। थोड़े दिनों के लिए अगर हम टमाटर नहीं खाएंगे तो कौन-सा चीन बुरा मान जाएगा? या सब्जीवाला हमें लौकी देने से मना कर देगा? या बॉस दफ्तर से बाहर कर देगा? न जी न। ऐसा कुछ नहीं होगा। दुनिया अपने ठिए पर यों ही चलती रहेगी। चाहे आप टमाटर खाओ या न खाओ। डिसाइड तो हमें करना है कि हमारी जेब टमाटर खाना अलाऊ करती है या लौकी-तुरर्ई।

वैसे, पूरी कोशिश में हूं कि टमाटर की दहशत से खुद को बचाकर रख सकूं। लेकिन फिर भी मुंह के आगे कोई अगर पड़कर मुझसे टमाटर मांग भी लेता है तो मैं दोनों हाथ जोड़कर उससे इतना भर कह देता हूं- माफ कीजिएगा शिरिमानजी, मेरे घर में टमाटर नहीं है।

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