मंगलवार, 29 अगस्त 2017

मेरी-तेरी, इसकी-उसकी निजताएं

बहरहाल, निजताओं पर चाहे कितने कानून बना लिए लीजिए। कितनी ही बहस कर लीजिए। एक-दूसरे की निजताओं की कितनी ही दुहाईयां दे लीजिए। मगर फिर भी कुछ सवाल न खत्म हुए हैं। न कभी खत्म हो पाएंगे। ये ऐसे गैर-वाजिब सवाल हैं, जिन्हें हम चाहकर भी 'निजी' नहीं बना सकते। समाज एवं घर-परिवार के बीच गाहे-बगाहे इन सवालों को उछाला जाता ही रहता है। रोक-टोके के बाद भी

समस्या यह है अगर इन सवालों पर आप अगर ‘मौन’ रहते हैं। या हंसकर टाल देते हैं। या अनसुना कर देते हैं। या वक्त की भारी कमी का हवाला देते हैं। तो अगला बिना ज्यादा कुछ समझे-बुझे तुरंत आप पर ‘अंदरूनी शक’ करना प्रारंभ कर देता है। यों भी, किसी पर कैसा भी शक करना समाज का हर शख्स अपना ‘मौलिक अधिकार’ समझता है। शक की एक चिंगारी न केवल नाते-रिश्तेदारों के बीच अपितु गली-मोहल्ले में भी ऐसी फैलती है फिर आपके पास मुंह छिपाने के अतिरिक्त और कोई चारा रह नहीं पाता।

इंसान की निजता को ‘भंग’ करने के लिए दो सवाल सबसे अधिक पूछे जाते हैं। पहला- “और सुनाओ...?” दूसरा- “खुशखबरी कब दे रहे हो...?” इन दो सवालों से हम आदिकाल से जूझ रहे हैं। देश, समाज, दुनिया, मनुष्य कितने ही ‘आधुनिक’ या ‘डिजिटल’ क्यों न हो जाएं किंतु ये दो सवाल गांठ की भांति हमारे पल्लू से बंधे ही रहते हैं। इन सवालों पर न आप मुंह चुरा सकते हैं न किसी पर चौड़े हो सकते। अगला आमने-सामने नहीं पूछेगा तो व्हाट्सएप करके पूछ लेगा। पर पूछेगा जरूर। क्योंकि बिना पूछे हमारे यहां लोगों की दाल-रोटी हजम नहीं होती।

“और सुनाओ...।“ बंदा क्या सुनाए। दस-बारहा घंटे की नौकरी। दो घंटे जाम में फंसने के बाद। अगला जब थका-मंदा घर लौटकर आता है तब तक उसकी हिम्मत की बैंड कर कदर बज चुकी होती है फिर वो न कुछ सुनाने न कुछ सुनने के काबिल रह ही नहीं पाता। रात का खाना खाकर अगले दिन की जद्दोजहद के लिए उसे तैयार होना होता है। मगर लोग हैं कि फोन कर-करके, व्हाट्सएप कर-करके एक ही सवाल “और सुनाओ...” “क्या हाल हैं...” “क्या चल रहा है...” “मैसेज का जवाब क्यों नहीं देते…” बंदे की रगों में ‘भस्स’ भरते रहते हैं।

सुनाना न सुनाना बंदे का ‘निजी मसला’ है। कम से कम इतनी निजता तो उसकी झोली में पड़ी रहने दो यारों।

ठीक ऐसा ही मसला ‘खुशखबरी सुनाने’ का है। लुत्फ देखिए, खुशखबरी जानने की इच्छा जितनी परिवार वालों को नहीं, उससे कहीं ज्यादा रिश्तेदारों को रहती है। कुछ तो इतने ‘गजब’ होते हैं कि बहू के घर में पहला कदम रखते ही खुशखबरी जानने को बेताब हो उठते हैं। मानो- जच्चा-बच्चा का सारा खर्च अकेले वे ही उठाएंगे।

इस सवाल पर जब कभी लड़के या बहू की तरफ से ‘आड़ा-तिरछा’ जवाब मिल जाता है तो ऐसे मुंह बिचका लेते हैं जैसे वे उनके खूंठे पर बंधी बकरी खोल लाए हों। अमां, शादी का पहला और अंतिम उद्देश्य सिर्फ खुशखबरी पर ही नहीं टिका होता। आजकल के जमाने में तो बिल्कुल भी नहीं। इतनी विकट महंगाई में दो बंदों का खर्च पूरा पड़ नहीं पाता और लोगों हैं कि तुरंत खुशखबरी की मिठाई चखने को बेकरार हुए बैठे रहते हैं।

हालांकि ये सब इंसान की ‘व्यक्तिगत निजाताओं’ में आता है। पर सामने वाला इसे ‘निजी’ बना रहने दे तब न। मेरी-तेरी, इसकी-उसकी निजताओं को तो कुछ लोग अपनी ‘बपौती’ समझते हैं। जब जहां चाहा कुछ भी पूछ बैठे। बिना सोचे-समझे।

निजता जरूरी है। निकट भविष्य में अगर इन ‘बेढंगें सवालों’ से भी ‘मुक्ति’ मिल जाए फिर ‘निजताएं’ और भी ‘खूबसूरत’ लगने लगेंगी हमें।

1 टिप्पणी:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’रसीदी टिकट सी ज़िन्दगी और ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...