सोमवार, 28 अगस्त 2017

उनकी खामोशी का इमोशनल अत्याचार

वो खामोश हैं। इतने खामोश कि उनकी आवाज न जमीन न टि्वटर कहीं पर भी सुनाई नहीं दे रही। देश-दुनिया में इतना कुछ घटते रहने के बाद भी उनका खामोश रहना न केवल मुझे बल्कि उनके चहाने वालों को भी अब खलने-सा लगा है।

पहले जब वे लगभग हर मुद्दे पर बोलते या ट्वीट करते रहते थे तब हमारे दिलों में यह आस जगी रहती थी कि हमारे बीच कोई तो है जो मुस्तैदी के साथ विरोध कर रहा है। उनकी ट्वीटिया विरोधी भाषा अच्छों-अच्छों के पसीने छुड़ा दिया करती थी। सोशल मीडिया से लेकर गली-मोहल्लों के नुक्कड़ों पर जमने वाले जमघट तक में उनके नाम एवं विरोध के चर्चे छाए रहते थे। मजाल है, जो उनके विरोधी तेवरों से किसी ऊंचे या बड़े नेता की पगड़ी न उछली हो। सड़क से लेकर टि्वटर तक पर सबकी बखिया उधेड़ी है उन्होंने।

लेकिन यकायका उनका लंबी खामोशी में चले जाना किसी को रास नहीं आ रहा। लोग परेशान है कि वे कुछ बोल क्यों नहीं रहे? मुद्दों पर अपना ‘तगड़ा विरोध’ दर्ज क्यों नहीं करवा रहे? वे बोलते थे तो सबका मन लगा रहता था। लेखकों को लिखने व ठलुओं को मौज लेने के अवसर मिलते रहते थे।

सच कहूं तो उनके यों खामोश बने रहने से मेरा भी मन टि्वटर पर नहीं रमता। उनके टि्वटर पेज पर इस उम्मीद में टहलने चला जाता हूं कि शायद उनका कुछ धांसू-सा लिखा हुआ ट्वीट मिल जाए। कभी-कभार एकाध फॉर्मल ट्वीट को छोड़के ज्यादातर उनके टि्वटर एकांउट पर खामोशी ही पसरी रहती है।

उनकी खामोशी के रहस्य को जनाने का प्रयास मैं उनको ट्वीट करके भी कर चुका हूं। किंतु आज तलक वहां से कोई उत्तर नहीं आया। ऐसे थोड़े न होता है कि आप अपनी जनता को अपनी खामोश का सबब न बतलाएं। जबकि आपके बारे में यह मशहूर है कि आप हर काम जनता से बिना पूछे करते ही नहीं। फिर यह खामोशी क्यों?

उनकी खामोशी धीरे-धीरे कर ‘इमोशनल अत्याचार’ टाइप बनती जा रही है। मुझे डर है, उनकी खामोशी अगर थोड़ी और लंबी खींच ली तो यह देश-दुनिया-समाज कहीं उन्हें ‘विस्मृत’ न कर दे!

2 टिप्‍पणियां:

Nirmal Gupta ने कहा…

बेहतरीन व्यंग्य.कम शब्द मारक असर जैसे सतसई के दोहे.घाव करे गम्भीर.

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’खेल दिवस पर हॉकी के जादूगर की ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...