सोमवार, 21 अगस्त 2017

जो हो, रात में नहीं निकलूंगा

आदेश लड़कियों के लिए आया था कि वे रात में घर से बाहर न निकलें। किंतु लागू इसे मैं खुद पर कर रहा हूं। आज से या कहूं अभी से मैंने रात में घर से निकलना एवं घर की खिड़की से मुंह निकालकर बाहर देखना तक बंद कर दिया है। सुन रहा हूं कि बाहर का माहौल खराब है। छेड़छाड़ की वारदातें बढ़ती जा रही हैं। हालिया, चोटी काटने की खबर ने तो मुझे इतना डरा-सा दिया है कि घर में भी ‘हैलमेट’ पहनकर ही रहता हूं। तथा, पत्नी को भी सख्त हिदायत दे रखी है कि वो भी घर-बाहर हैलमेट का ही सदपयोग करे।

हालांकि पत्नी ने इसे कतई गंभीरता से नहीं लिया है। उलटा मेरे डरपोक व अंधविश्वासी स्वभाव पर ही तमाम सवाल खड़े कर दिए हैं। चूंकि वो पत्नी है। घर की प्रथम मालकिन है। इस नाते उससे ज्यादा सवाल-जवाब करना मुनासिब इसलिए भी नहीं समझता कहीं खामखा रोटी-पानी के बंद होने की नौबत न आ जाए।

फिर भी, हिदायत बरतना एवं आगाह करना मेरा फर्ज था सो हर एक को कर रहा हूं। मैंने तो अपनी फेसबुक पोस्ट में भी पुरुषों से अपील कर डाली है कि वे रात को घर से बाहर निकलने की गलती न करें।

देखो जी, बुरे वक्त और विपरित चलती हवा का कोई ठौर-ठिकाना न होता कि कहां से, किधर से, किस पर हावी हो जाए। आजकल तो अपनी हिफाजत अपने हाथ होनी चाहिए। सरकार-प्रशासन भला कहां तक एक-एक व्यक्ति के आगे-पीछे साथ-साथ टहलेगा। इसीलिए तो मैंने रात को बाहर न निकलने का डिसिजन लिया।

लेखकों (इसमें मैं खुद को भी शामिल कर रहा हूं) को तो खासतौर पर रात में कहीं नहीं आना-जाना चाहिए। आखिर लेखक साहित्य एवं राष्ट्र की अमूल्य धरोहर टाइप होते हैं। उन पर कलम और शब्दों को सजाने-संवारने का खास जिम्मा होता है। दुश्मन एक बार को चोर-डकैत को छोड़ सकता है। लेकिन लेखक अगर उसके हत्थे चढ़ गया फिर उसकी खैर नहीं।

इस बेढंगे समय में मैं खुद को खोना नहीं चाहता। मुझे अपनी इज्जत बेहद प्यारी है। कोई आवारा मुझे ताड़े, छेड़े या मेरी चोटी तक आए ऐसे में मैं खुद को घर के भीतर सुरक्षित रखना ज्यादा बेहतर मानूंगा। यहां-वहां की खबर बनने से तो अच्छा है अपने कदम वापस खींच लूं। यों भी, बात-बात पर क्रांति या क्रांतिकारी बातें करना मुझे आता नहीं। नितांत ‘सेफ लाइफ’ जीने का मैं बचपन से आदी रहा हूं।

जानता हूं, मेरी बातें सुनकर बहुत लोग मुझसे खफा होंगे। मुझे कायर एवं बुजदिल होने की संज्ञाएं दे रहे होंगे। एकाध ने तो मेरे ऊपर ‘पुरुष बिरादरी के लिए कलंक’ टाइप उदघोष भी जारी कर डाले होंगे। किंतु मैं किसी की ‘परवाह’ नहीं करता।

मुझे रात में घर से बाहर नहीं निकलना तो नहीं ही निकलना है। मैं मेरे फैसले पर अटल हूं।

2 टिप्‍पणियां:

Nirmal Gupta ने कहा…

जबरदस्त व्यंग्य्।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’गणेश चतुर्थी और ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...