शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

फिक्रमंद होने का बीमारी

लोग भी न फिक्रमंद होने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते। अब देखिए, लोग इस बात पर फिक्रमंद हैं कि सिक्का ने इंफोसिस को क्यों छोड़ा? किसलिए छोड़ा? काहे इतनी बड़ी नौकरी को दो सेकंड में लात मार दी? आदि-आदि।

सिक्का ने अगर इंफोसिस को त्यागा तो उसके पीछे कुछ तो ठोस कारण रहे ही होंगे न। वरना इतनी धांसू नौकरी भला कौन छोड़ना चाहेगा। हालांकि नौकरी छोड़ने के कारण उन्होंने स्पष्ट कर दिए हैं। लेकिन लोगों की जुबान पर विराजमान ‘चुल्ल’ का क्या कीजिएगा। उन्हें तो ‘खुजली’ रहती है न एंवई किस न किसी बात या मुद्दे पर ‘लोड’ लेने की। लोड जब ज्यादा बढ़ जाता है फिर डॉक्टरों के चक्कर लगाते फिरते हैं कि हमें नींद नहीं आती। खोपड़ी भारी रहती है। अवसाद घेरे रहता है। आदि-आदि।

सिंपल-सी बात है। मसला इंफोसिस और सिक्का के बीच का है। लड़ाई-टंटें उनके हैं। गुस्सा-नाराजगी उनकी है। फिर, पता नहीं लोग क्यों सिक्का के लिए ‘दुबले’ हुए जा रहे हैं। जबकि वे मस्त हैं। अपनी कंपनी को छोड़ने की रत्तीभर शिकन उनके माथे या चेहरे पर देखने को नहीं मिली। खुलकर अपनी असहमतियों को मीडिया से साझा कर रहे हैं। लेकिन नहीं, लोग भला किसी दूसरे के मामले में अपनी फिक्र की अपनी टांग घुसेड़े बिना कैसे चैन से बैठ सकते हैं। कुछ तो इतने ज्यादा फिक्रमंद होते हैं कि फिक्र करते-करते यमराज के दरवाजे तक पहुंच जाते हैं।

वाकई, लोग अपनी फिक्र से इतना कमजोर नहीं हुआ करते, जितना कि दूसरे की फिक्र में डूबकर।

हां, दलाल स्ट्रीट का सिक्का की विदाई पर ‘फिसल’ पड़ना समझ आता है। उस पर इंफोसिस के शेयर को ठीक-ठाक बनाए-चलाए रखने की जिम्मेदारी जो है। अपनी जिम्मेदारियों के प्रति अगर वो ही ‘संजीदा’ नहीं होगा तो भला उसके रास्ते से गुजरेगा कौन। हालांकि दलाल पथ से गुजरने वालों को कभी सही मंजिल की तरफ सुरक्षित जाते कम ही देखा है। फिर भी जब रास्ता है तो लोग गुजरेंगे ही। यों भी लोगों का रूझान अपने शेयर इंफोसिस की तरफ तो हो सकता किंतु सिक्का की तरफ न के बराबर ही होगा। मगर सच यह भी है कि कंपनी के बाहर सिक्का के चाहने वाले भी कम नहीं।

मुझसे भी कई लोगों ने पूछा कि आपको सिक्का का इस तरह कंपनी छोड़ना कैसा लगा? मैंने साफ कह दिया कि भइए, न मेरा सिक्का से दूर-पास का कोई रिश्ता है न इंफोसिस का मेरे कने कोई शेयर। तो भला मैं क्यों और किसलिए सिक्का की विदाई पर ‘मातम’ मनाऊं? मैंने तो पिछले दिनों अपनी जेब कट जाने तक पर मातम नहीं मनाया था।

देखो जी, इतना ‘कॉपलेक्स’ होकर जीना अपने बस की बात नहीं। जिंदगी में अपनी मुसीबतें क्या कम हैं, जो इक्का-सिक्का की मुसीबतों को मोल ले खुद को मुसीबतों का गुलाम बना लूं।


इंसान को इतना फिक्रमंद भी नहीं होना चाहिए कि फिक्रमंदी खुद उसके तईं ‘लाइलाज बीमारी’ बन जाए। बाकी सिक्का की सिक्का जानें और इंफोसिस की इंफोसिस।

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