मंगलवार, 29 अगस्त 2017

मेरी-तेरी, इसकी-उसकी निजताएं

बहरहाल, निजताओं पर चाहे कितने कानून बना लिए लीजिए। कितनी ही बहस कर लीजिए। एक-दूसरे की निजताओं की कितनी ही दुहाईयां दे लीजिए। मगर फिर भी कुछ सवाल न खत्म हुए हैं। न कभी खत्म हो पाएंगे। ये ऐसे गैर-वाजिब सवाल हैं, जिन्हें हम चाहकर भी 'निजी' नहीं बना सकते। समाज एवं घर-परिवार के बीच गाहे-बगाहे इन सवालों को उछाला जाता ही रहता है। रोक-टोके के बाद भी

समस्या यह है अगर इन सवालों पर आप अगर ‘मौन’ रहते हैं। या हंसकर टाल देते हैं। या अनसुना कर देते हैं। या वक्त की भारी कमी का हवाला देते हैं। तो अगला बिना ज्यादा कुछ समझे-बुझे तुरंत आप पर ‘अंदरूनी शक’ करना प्रारंभ कर देता है। यों भी, किसी पर कैसा भी शक करना समाज का हर शख्स अपना ‘मौलिक अधिकार’ समझता है। शक की एक चिंगारी न केवल नाते-रिश्तेदारों के बीच अपितु गली-मोहल्ले में भी ऐसी फैलती है फिर आपके पास मुंह छिपाने के अतिरिक्त और कोई चारा रह नहीं पाता।

इंसान की निजता को ‘भंग’ करने के लिए दो सवाल सबसे अधिक पूछे जाते हैं। पहला- “और सुनाओ...?” दूसरा- “खुशखबरी कब दे रहे हो...?” इन दो सवालों से हम आदिकाल से जूझ रहे हैं। देश, समाज, दुनिया, मनुष्य कितने ही ‘आधुनिक’ या ‘डिजिटल’ क्यों न हो जाएं किंतु ये दो सवाल गांठ की भांति हमारे पल्लू से बंधे ही रहते हैं। इन सवालों पर न आप मुंह चुरा सकते हैं न किसी पर चौड़े हो सकते। अगला आमने-सामने नहीं पूछेगा तो व्हाट्सएप करके पूछ लेगा। पर पूछेगा जरूर। क्योंकि बिना पूछे हमारे यहां लोगों की दाल-रोटी हजम नहीं होती।

“और सुनाओ...।“ बंदा क्या सुनाए। दस-बारहा घंटे की नौकरी। दो घंटे जाम में फंसने के बाद। अगला जब थका-मंदा घर लौटकर आता है तब तक उसकी हिम्मत की बैंड कर कदर बज चुकी होती है फिर वो न कुछ सुनाने न कुछ सुनने के काबिल रह ही नहीं पाता। रात का खाना खाकर अगले दिन की जद्दोजहद के लिए उसे तैयार होना होता है। मगर लोग हैं कि फोन कर-करके, व्हाट्सएप कर-करके एक ही सवाल “और सुनाओ...” “क्या हाल हैं...” “क्या चल रहा है...” “मैसेज का जवाब क्यों नहीं देते…” बंदे की रगों में ‘भस्स’ भरते रहते हैं।

सुनाना न सुनाना बंदे का ‘निजी मसला’ है। कम से कम इतनी निजता तो उसकी झोली में पड़ी रहने दो यारों।

ठीक ऐसा ही मसला ‘खुशखबरी सुनाने’ का है। लुत्फ देखिए, खुशखबरी जानने की इच्छा जितनी परिवार वालों को नहीं, उससे कहीं ज्यादा रिश्तेदारों को रहती है। कुछ तो इतने ‘गजब’ होते हैं कि बहू के घर में पहला कदम रखते ही खुशखबरी जानने को बेताब हो उठते हैं। मानो- जच्चा-बच्चा का सारा खर्च अकेले वे ही उठाएंगे।

इस सवाल पर जब कभी लड़के या बहू की तरफ से ‘आड़ा-तिरछा’ जवाब मिल जाता है तो ऐसे मुंह बिचका लेते हैं जैसे वे उनके खूंठे पर बंधी बकरी खोल लाए हों। अमां, शादी का पहला और अंतिम उद्देश्य सिर्फ खुशखबरी पर ही नहीं टिका होता। आजकल के जमाने में तो बिल्कुल भी नहीं। इतनी विकट महंगाई में दो बंदों का खर्च पूरा पड़ नहीं पाता और लोगों हैं कि तुरंत खुशखबरी की मिठाई चखने को बेकरार हुए बैठे रहते हैं।

हालांकि ये सब इंसान की ‘व्यक्तिगत निजाताओं’ में आता है। पर सामने वाला इसे ‘निजी’ बना रहने दे तब न। मेरी-तेरी, इसकी-उसकी निजताओं को तो कुछ लोग अपनी ‘बपौती’ समझते हैं। जब जहां चाहा कुछ भी पूछ बैठे। बिना सोचे-समझे।

निजता जरूरी है। निकट भविष्य में अगर इन ‘बेढंगें सवालों’ से भी ‘मुक्ति’ मिल जाए फिर ‘निजताएं’ और भी ‘खूबसूरत’ लगने लगेंगी हमें।

सोमवार, 28 अगस्त 2017

उनकी खामोशी का इमोशनल अत्याचार

वो खामोश हैं। इतने खामोश कि उनकी आवाज न जमीन न टि्वटर कहीं पर भी सुनाई नहीं दे रही। देश-दुनिया में इतना कुछ घटते रहने के बाद भी उनका खामोश रहना न केवल मुझे बल्कि उनके चहाने वालों को भी अब खलने-सा लगा है।

पहले जब वे लगभग हर मुद्दे पर बोलते या ट्वीट करते रहते थे तब हमारे दिलों में यह आस जगी रहती थी कि हमारे बीच कोई तो है जो मुस्तैदी के साथ विरोध कर रहा है। उनकी ट्वीटिया विरोधी भाषा अच्छों-अच्छों के पसीने छुड़ा दिया करती थी। सोशल मीडिया से लेकर गली-मोहल्लों के नुक्कड़ों पर जमने वाले जमघट तक में उनके नाम एवं विरोध के चर्चे छाए रहते थे। मजाल है, जो उनके विरोधी तेवरों से किसी ऊंचे या बड़े नेता की पगड़ी न उछली हो। सड़क से लेकर टि्वटर तक पर सबकी बखिया उधेड़ी है उन्होंने।

लेकिन यकायका उनका लंबी खामोशी में चले जाना किसी को रास नहीं आ रहा। लोग परेशान है कि वे कुछ बोल क्यों नहीं रहे? मुद्दों पर अपना ‘तगड़ा विरोध’ दर्ज क्यों नहीं करवा रहे? वे बोलते थे तो सबका मन लगा रहता था। लेखकों को लिखने व ठलुओं को मौज लेने के अवसर मिलते रहते थे।

सच कहूं तो उनके यों खामोश बने रहने से मेरा भी मन टि्वटर पर नहीं रमता। उनके टि्वटर पेज पर इस उम्मीद में टहलने चला जाता हूं कि शायद उनका कुछ धांसू-सा लिखा हुआ ट्वीट मिल जाए। कभी-कभार एकाध फॉर्मल ट्वीट को छोड़के ज्यादातर उनके टि्वटर एकांउट पर खामोशी ही पसरी रहती है।

उनकी खामोशी के रहस्य को जनाने का प्रयास मैं उनको ट्वीट करके भी कर चुका हूं। किंतु आज तलक वहां से कोई उत्तर नहीं आया। ऐसे थोड़े न होता है कि आप अपनी जनता को अपनी खामोश का सबब न बतलाएं। जबकि आपके बारे में यह मशहूर है कि आप हर काम जनता से बिना पूछे करते ही नहीं। फिर यह खामोशी क्यों?

उनकी खामोशी धीरे-धीरे कर ‘इमोशनल अत्याचार’ टाइप बनती जा रही है। मुझे डर है, उनकी खामोशी अगर थोड़ी और लंबी खींच ली तो यह देश-दुनिया-समाज कहीं उन्हें ‘विस्मृत’ न कर दे!

सोमवार, 21 अगस्त 2017

जो हो, रात में नहीं निकलूंगा

आदेश लड़कियों के लिए आया था कि वे रात में घर से बाहर न निकलें। किंतु लागू इसे मैं खुद पर कर रहा हूं। आज से या कहूं अभी से मैंने रात में घर से निकलना एवं घर की खिड़की से मुंह निकालकर बाहर देखना तक बंद कर दिया है। सुन रहा हूं कि बाहर का माहौल खराब है। छेड़छाड़ की वारदातें बढ़ती जा रही हैं। हालिया, चोटी काटने की खबर ने तो मुझे इतना डरा-सा दिया है कि घर में भी ‘हैलमेट’ पहनकर ही रहता हूं। तथा, पत्नी को भी सख्त हिदायत दे रखी है कि वो भी घर-बाहर हैलमेट का ही सदपयोग करे।

हालांकि पत्नी ने इसे कतई गंभीरता से नहीं लिया है। उलटा मेरे डरपोक व अंधविश्वासी स्वभाव पर ही तमाम सवाल खड़े कर दिए हैं। चूंकि वो पत्नी है। घर की प्रथम मालकिन है। इस नाते उससे ज्यादा सवाल-जवाब करना मुनासिब इसलिए भी नहीं समझता कहीं खामखा रोटी-पानी के बंद होने की नौबत न आ जाए।

फिर भी, हिदायत बरतना एवं आगाह करना मेरा फर्ज था सो हर एक को कर रहा हूं। मैंने तो अपनी फेसबुक पोस्ट में भी पुरुषों से अपील कर डाली है कि वे रात को घर से बाहर निकलने की गलती न करें।

देखो जी, बुरे वक्त और विपरित चलती हवा का कोई ठौर-ठिकाना न होता कि कहां से, किधर से, किस पर हावी हो जाए। आजकल तो अपनी हिफाजत अपने हाथ होनी चाहिए। सरकार-प्रशासन भला कहां तक एक-एक व्यक्ति के आगे-पीछे साथ-साथ टहलेगा। इसीलिए तो मैंने रात को बाहर न निकलने का डिसिजन लिया।

लेखकों (इसमें मैं खुद को भी शामिल कर रहा हूं) को तो खासतौर पर रात में कहीं नहीं आना-जाना चाहिए। आखिर लेखक साहित्य एवं राष्ट्र की अमूल्य धरोहर टाइप होते हैं। उन पर कलम और शब्दों को सजाने-संवारने का खास जिम्मा होता है। दुश्मन एक बार को चोर-डकैत को छोड़ सकता है। लेकिन लेखक अगर उसके हत्थे चढ़ गया फिर उसकी खैर नहीं।

इस बेढंगे समय में मैं खुद को खोना नहीं चाहता। मुझे अपनी इज्जत बेहद प्यारी है। कोई आवारा मुझे ताड़े, छेड़े या मेरी चोटी तक आए ऐसे में मैं खुद को घर के भीतर सुरक्षित रखना ज्यादा बेहतर मानूंगा। यहां-वहां की खबर बनने से तो अच्छा है अपने कदम वापस खींच लूं। यों भी, बात-बात पर क्रांति या क्रांतिकारी बातें करना मुझे आता नहीं। नितांत ‘सेफ लाइफ’ जीने का मैं बचपन से आदी रहा हूं।

जानता हूं, मेरी बातें सुनकर बहुत लोग मुझसे खफा होंगे। मुझे कायर एवं बुजदिल होने की संज्ञाएं दे रहे होंगे। एकाध ने तो मेरे ऊपर ‘पुरुष बिरादरी के लिए कलंक’ टाइप उदघोष भी जारी कर डाले होंगे। किंतु मैं किसी की ‘परवाह’ नहीं करता।

मुझे रात में घर से बाहर नहीं निकलना तो नहीं ही निकलना है। मैं मेरे फैसले पर अटल हूं।

शनिवार, 19 अगस्त 2017

भीड़ का सनी लियोनी हो जाना

सड़क कोच्चि की थी। भीड़ भी कोच्चि की थी। मगर सनी लियोनी कोच्चि की नहीं थी। वो तो वहां किसी शोरूम के उद्घाटन के लिए थी। फिर भी उसकी एक झलक भर पाने भर को कोच्चि की सड़क भीड़ से पट गई थी।

सड़क पर इतनी भीड़। कि, लोगों के बस सर ही सर दिखलाई पड़ रहे थे। लोग एक के ऊपर एक कूदे जा रहे थे। हुजूम किसी के रोके नहीं रुक रहा था। सनी लियोनी की कार उस भीड़ में एक ‘सफेद बिंदु’ टाइप नजर आ रही थी। सनी भी अपने लिए इतनी भीड़ को देखकर ‘अभिभूत’ थी। भीड़ की कुछ तस्वीरें उन्होंने अपने टि्वटर हैंडल पर पोस्ट भी कीं। एक फोटू तो ऐसी भी थी, जिसमें कुछ बंदे स्टेज के पर्दे में से झांक-ताक पर उतारू थे। तमन्ना इतनी भर थी कि किसी तरह सनी के नजदीक आकर एक सेल्फी लेने का मौका हाथ आ जाए।

विकट भीड़ को देख बहुत देर तक तो मैं यही सोचता रहा कि सनी लियोनी वहां क्या थी? क्या कोई बहुत बड़ी सेलिब्रिटी? क्या कोई बहुत बड़ी पॉलिटिशियन? क्या किसी देश की राजकुमारी? क्या किसी ऊंचे ब्रांड की ब्रांडअमबेस्डर? न न इनमें से वो कुछ भी नहीं थी। महज कुछ फिल्मों में ज्यादा खास किरदार न निभाने वाली एक अदाकारा ही तो थी। फिर भी कोच्चि के लोग-भीड़ पागल थी, सनी लियोनी को देखने के लिए।

भीड़ सेलिब्रिटी या (पूर्व) पोर्न स्टार में से किसे देखने को उत्तेजित थी? ऐसा भी नहीं हो सकता कि कोच्चि कभी कोई फिल्मी स्टार या सेलिब्रिटी जाता ही न हो। फिर सनी लियोनी के लिए ही भीड़ का इतना पागलपन क्यों? यह सवाल केवल मेरे जहन में ही नहीं बल्कि बहुतेरों के दिलो-दिमाग में अभी तलक छाया होगा। पर सच तो यह है कि भीड़ या लोगों की चाहत का कोई पैमाना नहीं होता। वो किसी को कैसे भी अपने हिसाब से पसंद या नापसंद कर सकती है। उसकी मर्जी।

निश्चित ही भीड़ का क्रेज सनी लियोनी की पोर्न स्टार छवि और उसकी सेक्सुअल्टी पर बेबाक राय से जुड़ा होगा। यों भी, बीच-बीच में यह खबरें भी आती रही थीं कि सनी लियोनी गूगल पर सबसे अधिक सर्च की जाने वाली सेलिब्रिटियों में से एक है। खैर, यह बताने की जरूरत नहीं कि सनी को गूगल या अन्य किसी पोर्न साइट पर क्यों और किसलिए सर्च किया जाता है।

कोच्चि की भीड़ के लॉचिक को समझे बिना ही केवल इतना समझें कि लोगों के बीच पोर्न या पोर्न स्टार का क्रेज जबरदस्त रहता है। पोर्न अब दबी-ढकी चीज नहीं रही। ऐसा तो शायद ही कोई होगा जिसके मोबाइल की गैलरी में एकाध रंगीन टाइप फिल्म या क्लिप न हो। या ऑन-लाइन देखता न हो। यदा-कदा आने वाले ऑन-लाइन सर्वे हमारी ‘अंतर-वासना’ की सारी पोलें खोलकर रख दे रहे हैं।

भीड़ के सनी लियोनी हो जाने पर न आंखें फाड़िए न मुंह को अचंभित मोड में खुला रखिए। इस बात को स्वीकार कीजिए कि सनी लियोनी का सिक्का फिल्म इंडस्ट्री में भले ज्यादा न जमा हो मगर लोगों के दिलो-दिमाग में बेहद मजबूती के साथ जमा हुआ है।


सनी लियोनी की मार्केट में डिमांड है। मार्केट में डिमांड उसी की होती है, जिसे हाथों-हाथ लिया जाता है। भीड़ के सनी लियोनी होने पर दुखी मत होईए बल्कि खुशी जताई कि समाज दकियानुसी प्रतिमानों को ध्वस्त कर आगे निकलने को बेताब है।

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

फिक्रमंद होने का बीमारी

लोग भी न फिक्रमंद होने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते। अब देखिए, लोग इस बात पर फिक्रमंद हैं कि सिक्का ने इंफोसिस को क्यों छोड़ा? किसलिए छोड़ा? काहे इतनी बड़ी नौकरी को दो सेकंड में लात मार दी? आदि-आदि।

सिक्का ने अगर इंफोसिस को त्यागा तो उसके पीछे कुछ तो ठोस कारण रहे ही होंगे न। वरना इतनी धांसू नौकरी भला कौन छोड़ना चाहेगा। हालांकि नौकरी छोड़ने के कारण उन्होंने स्पष्ट कर दिए हैं। लेकिन लोगों की जुबान पर विराजमान ‘चुल्ल’ का क्या कीजिएगा। उन्हें तो ‘खुजली’ रहती है न एंवई किस न किसी बात या मुद्दे पर ‘लोड’ लेने की। लोड जब ज्यादा बढ़ जाता है फिर डॉक्टरों के चक्कर लगाते फिरते हैं कि हमें नींद नहीं आती। खोपड़ी भारी रहती है। अवसाद घेरे रहता है। आदि-आदि।

सिंपल-सी बात है। मसला इंफोसिस और सिक्का के बीच का है। लड़ाई-टंटें उनके हैं। गुस्सा-नाराजगी उनकी है। फिर, पता नहीं लोग क्यों सिक्का के लिए ‘दुबले’ हुए जा रहे हैं। जबकि वे मस्त हैं। अपनी कंपनी को छोड़ने की रत्तीभर शिकन उनके माथे या चेहरे पर देखने को नहीं मिली। खुलकर अपनी असहमतियों को मीडिया से साझा कर रहे हैं। लेकिन नहीं, लोग भला किसी दूसरे के मामले में अपनी फिक्र की अपनी टांग घुसेड़े बिना कैसे चैन से बैठ सकते हैं। कुछ तो इतने ज्यादा फिक्रमंद होते हैं कि फिक्र करते-करते यमराज के दरवाजे तक पहुंच जाते हैं।

वाकई, लोग अपनी फिक्र से इतना कमजोर नहीं हुआ करते, जितना कि दूसरे की फिक्र में डूबकर।

हां, दलाल स्ट्रीट का सिक्का की विदाई पर ‘फिसल’ पड़ना समझ आता है। उस पर इंफोसिस के शेयर को ठीक-ठाक बनाए-चलाए रखने की जिम्मेदारी जो है। अपनी जिम्मेदारियों के प्रति अगर वो ही ‘संजीदा’ नहीं होगा तो भला उसके रास्ते से गुजरेगा कौन। हालांकि दलाल पथ से गुजरने वालों को कभी सही मंजिल की तरफ सुरक्षित जाते कम ही देखा है। फिर भी जब रास्ता है तो लोग गुजरेंगे ही। यों भी लोगों का रूझान अपने शेयर इंफोसिस की तरफ तो हो सकता किंतु सिक्का की तरफ न के बराबर ही होगा। मगर सच यह भी है कि कंपनी के बाहर सिक्का के चाहने वाले भी कम नहीं।

मुझसे भी कई लोगों ने पूछा कि आपको सिक्का का इस तरह कंपनी छोड़ना कैसा लगा? मैंने साफ कह दिया कि भइए, न मेरा सिक्का से दूर-पास का कोई रिश्ता है न इंफोसिस का मेरे कने कोई शेयर। तो भला मैं क्यों और किसलिए सिक्का की विदाई पर ‘मातम’ मनाऊं? मैंने तो पिछले दिनों अपनी जेब कट जाने तक पर मातम नहीं मनाया था।

देखो जी, इतना ‘कॉपलेक्स’ होकर जीना अपने बस की बात नहीं। जिंदगी में अपनी मुसीबतें क्या कम हैं, जो इक्का-सिक्का की मुसीबतों को मोल ले खुद को मुसीबतों का गुलाम बना लूं।


इंसान को इतना फिक्रमंद भी नहीं होना चाहिए कि फिक्रमंदी खुद उसके तईं ‘लाइलाज बीमारी’ बन जाए। बाकी सिक्का की सिक्का जानें और इंफोसिस की इंफोसिस।

रविवार, 13 अगस्त 2017

दुनिया मुठ्ठी में

कई साल पहले की बात है। देश की एक आला कंपनी ने देशवासियों को कर लो दुनिया मुठ्ठी में का मंत्र दिया था। मंत्र को हमने न केवल स-हृदय स्वीकारा बल्कि स्वागत भी किया। फिर तो देश के प्रत्येक आमो-खास की मुठ्ठी में एक बे-तार का यंत्र नजर आने लगा। आलम यह था- जिस ओर निगाह दौड़ा दो, उस ओर कर लो दुनिया मुठ्ठी में के इश्तिहारों से दीवारें पटी पड़ी रहती थीं। बे-तार के उस यंत्र पर हम इस कदर ‘मोहित’ थे कि मोहल्ले के नुक्कड़ और गांव-देहात की चौपाल पर उसी की धुनें और चर्चाएं छाई रहती थीं।

सही मायनों में मोबाइल फोन के प्रति हमारे भीषण आकर्षण या कहें दीवानगी की शुरुआत यहीं से हुई थी।

करो लो दुनिया मुठ्ठी में से शुरू हुआ सफर फिलहाल फ्री-हैंडसेट पर आकर टिका है। लेकिन यह अंत नहीं है। अंत हो भी नहीं सकता क्योंकि इंसान की खोपड़ी हर पल कुछ न कुछ नया और अद्भूत इस दिशा में ला रही है। देश में बाकी क्रांतियां का तो नहीं मालूम हां मगर ‘डिजिल-क्रांति’ बहुत तेजी चल रही है। हर घर का तो छोड़िए हर व्यक्ति के हाथ में एक-दो मोबाइल फोन मिल जाना अब सामान्य-सी बात है।

अपने काम-धंधों के बाद लोग कहीं और अगर व्यस्त रहते हैं तो अपने-अपने मोबाइल फोनों में ही। टच-स्क्रीन पर ऊंगलियां हर वक्त कुछ न कुछ या तो खोजती रहती हैं या फिर मैसेजिस लिखती रहती हैं। दीवानगी का आलम यह है कि राह चलते हुए भी लोगों ने अब निगाहें ऊपर कर चलना छोड़ दिया है। फेसबुक, टि्वटर, व्हाट्सएप हमारी जिंदगी के वो जरूरी हिस्से बन चुके हैं कि अब अपनों को इग्नोर करते जाना हमारी आदत में शामिल हो गया है। हममें से बहुत लोगों को शायद इसका गम न हो। रिश्ते ही तो हैं।

हाल में, नहले पे दहला जियो ने अपने हैंडसैट को आंशिक फ्री कर दीवानगी का एक औ झुनझुना हमें थमा दिया है। मुफ्त डाटा बांटने की होड़ तो चल ही रही थी कंपनियों के बीच अब शायद मुफ्त के हैंडसेट बांटने का अभियान भी चल निकले।

जो हो पर ग्राहक सर से लेकर पैर तक फायदे ही फायदे में है। कभी ऐसा समय भी था जब मात्र ‘हैलो’ कहने के ही दस रुपए झट्ट से कट जाया करते थे। अब वो समय है कि लोग एक-दूसरे से घंटों वीडियो चैट कर लेते हैं वो भी बहुत ही मामूली खर्चे में।

दुनिया जितनी तेजी के साथ डिजिटल हो रही है, उतनी ही तेजी से इंसानों के बीच नजदीकियां बिखर रही हैं। महीनों गुजर जाते हैं हमें एक-दूसरे से मिले या शक्लें देखे हुए। तो क्या...। मुफ्त का हैंडसेट और पर-डे वन जीबी डेटा है न दूरियों को नजदीकियों में बदलने के लिए!

मंगलवार, 8 अगस्त 2017

निफ्टी, तुम्हें अभी बहुत ऊपर जाना है

मैं सेंसेक्स और निफ्टी दोनों का समान प्रसंशक हूं। यह बात सही है कि मैंने जिस प्रखरता के साथ सेंसेक्स पर लिखा, उतना निफ्टी पर नहीं लिख पाया। निफ्टी पर न लिखने के पीछे किसी प्रकार का किंतु-परंतु नहीं है। पर इससे मेरा निफ्टी के प्रति स्नेह कम नहीं हो जाता। मेरा बचपन से मानना रहा है कि स्टॉक मार्केट में जितना ‘पोटेंशल’ सेंसेक्स का है, निफ्टी का भी कम नहीं।

तमाम बाधाओं को दुलत्ती मार निफ्टी ने जिस वीरता के साथ दस हजार के पहाड़ को पार किया है, वाकई, काबिले-तारीफ है। निफ्टी ने न केवल स्टॉक मार्केट, दलाल स्ट्रीट का मान बढ़ाया है अपितु अपने निवेशकों के दिलों में भी महत्तवपूर्ण जगह बनाई है। वरना, तो अब तलक हर जीत पर सेंसेक्स के ही ‘जयकारे’ लगा करते थे। उसे ही ‘बधाईयां’ दी जाती थीं।

देखा जाए तो स्टॉक मार्केट में सेंसेक्स के मुकाबले निफ्टी का सफर भी इतना आसान नहीं रहा। न जाने कितनी दफा वो सेंसेक्स की भारी-भरकम गिरावटों के बीच दबी-कुचली गई। खूब ध्यान है, आज से कोई 18-19 साल पहले निफ्टी 800-900 के बीच झूलती रहा करती थी। जहां कोई निगेटिव खबर आई नहीं कि निफ्टी सिकुड़कर और छोटी हो जाती थी। हालांकि ऐसी ही चोटें सेंसेक्स ने भी खूब खाईं हैं। पर वजन में वजनदार होने के नाते सेंसेक्स फिर भी झेल जाता था।

बावजूद तमाम दबावों के संघर्ष दोनों करते रहे। संघर्ष का सुफल आज हमारे सामने है।

मेरे लिए निफ्टी और सेंसेक्स दोनों ही न केवल ‘वंदनीय’ बल्कि ‘प्रेरणास्पद’ भी हैं। जीवन में मुझे जब भी प्रेरणा लेने की आवश्यकता महसूस होती है, मैं किसी महा या सिद्धपुरुष से नहीं बल्कि निफ्टी से लेता हूं। निफ्टी ने मुझे एक बहुत ही छोटे लेबल से ठीक-ठाक ऊंचाई पर जाने का मार्ग बताया-दिखाया है।

ध्यान रहे, दस हजार का आंकड़ा निफ्टी के लिए आदि-अंत नहीं है। हालांकि मार्केट में तो चर्चे पंद्रहा से बीस हजार तक जाने के भी हैं। ये तो खैर जितने मुंह उतनी बातें वाला हिसाब-किताब है। मगर सच यही है कि अभी निफ्टी को बहुत ऊपर बहुत ही ऊपर जाना है। देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ निवेशकों के पोर्ट-फोलियों में भी चांद-सितारें लगाने हैं। दुनिया को यह बता देना है कि मुकाबले में निफ्टी भी किसी से कम नहीं।

बहरहाल, उस लेबल तक पहुंचने के लिए निफ्टी को मेरी अग्रिम शुभकामनाएं रहेंगी।

रविवार, 6 अगस्त 2017

यारी-दोस्ती की टशनबाजियां

दोस्तों की किल्लत मुझे बचपन से कभी नहीं रही। लाइफ में एक से बढ़कर एक दोस्त बनाए। जमकर दोस्तबाजियां कीं। स्कूल-कॉलेज के दिनों की दोस्तियों ने नए मुकाम हासिल किए। मोहल्ले में मैं पतंगबाजी के लिए तो खासा बदनाम था ही, नुक्कड़ पर दोस्तों के साथ मजमा लगाने के चर्चे भी कम न थे। इस बाबत जाने कितनी दफा मुझे मोहल्ले से बरखास्त किए जाने की चालें चली गईं। मगर मैं न माना। यारबाशियों का दौर यों ही चलता रहा।

मगर हां यारी-दोस्त में इस बात का मैंने खास ख्याल रखा कि कोई भी पढ़ा-लिखा या बुद्धिजीवि टाइप का दोस्त न बने। हालांकि काबिल लौंडों की तरफ से कोशिशें तो बहुत हुईं मुझसे दोस्ती गांठने की किंतु मैंने ही कभी भाव न दिया। वो क्या है, पढ़े-लिखे या काबिल लौंडों से दोस्ती करने के अपने लफड़े हैं। वो या तो हमेशा पढ़ाई-लिखाई की बातें करेंगे या फिर दुनिया-जहान का ज्ञान बांटेंगे। फिल्म, रोमांस, पतंगबाजी, गुल्ली-डंडा, आवारागिर्दी का चेप्टर न उनकी लाइफ में होते हैं न किताबों में। ऐसी महान आत्माओं से मैं दोस्ती के पेच लड़ाना नहीं चाहता, जहां दोस्तीबाजी में मस्तियां- बदमाशियां न हों।

दोस्त ऐसे हों जिनके साथ आप जिंदगी का हर आनंद उठा सकें। जिंदगी के वो पाठ जो आप किताबें पढ़कर न जान पाए, दोस्त लोग हंसते-खेलते सीखा दें। किस्म-किस्म की बदमाशियां दोस्ती की पहली निशानी होती हैं। ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि जरूरत के वक्त पढ़े-लिखे दोस्तों से कहीं ज्यादा काम बदमाश (बिंदास) टाइप दोस्त आते हैं। पढ़ा-लिखा दोस्त हर मसले में दिमाग पर लोड लेने लगता है। मगर बिंदास दोस्त ‘भाई तू चिंता न कर। जो होगा देखा जाएगा’ कहकर दिली-हौसला बढ़ा देता है।

खूब ध्यान है, स्कूल-कॉलेज में ऐसे कितने ही विकट वाले सीन बने पर बचाया हमेशा बिंदास दोस्तों ने ही। इंटीलेक्चूअल किस्म के दोस्त तो दूर बैठे तमाशा देखते रहे। बाद में जब मिले तो ऊंची-ऊंची नसीहतें और दे गए। नसीहतों से जिंदगी कभी चली है भला। वो तो खुदा का शुक्र रहा कि मैंने कभी पढ़े-लिखे लौंडों की नसीहतों को दिलो-दिमाग पर नहीं लिया। नहीं तो किसी भी सूरत में मैं आज लेखक नहीं बन पाता। मेरे लेखक बनने में मेरे बिगड़ैल टाइप दोस्तों का बहुत बड़ा हाथ है।

न न चौंकिए नहीं। यह हकीकत है। बचपन में- जितना भी बिगड़ैल किस्म का साहित्य मिला उन्हीं दोस्तों की मदद से सब पढ़ डाला। जब ढंग से अक्ल आई भी न थी, तब ही खुशवंत सिंह की चार-पांच किताबें पढ़कर चट्ट कर चुका था। कहने को वो सड़क किनारे बिकने वाला अश्लील या लुगदी किस्म का (काबिल लोगों की नजर में) साहित्य था पर आज भी उन लेखकों की तूती प्रगतिशील या जनवादी लेखकों-साहित्यकारों से कहीं ज्यादा बोलती है। उनसे कहीं अधिक रॉयल्टी पाते हैं। बेस्ट-सेलर हैं। आज भी जमकर पढ़े जाते हैं।

अपना तो शुरू से मानना रहा है कि लेखक बनने के लिए बदमाश और बिंदास टाइप दोस्तों का साथ बेहद जरूरी है। लाइफ का लेसन तो वे ही लोग ढंग से बता पाते हैं। डर को भीतर से बाहर निकाल फेंकने का माआदा रखते हैं।

मगर आजकल की दोस्तियां और दोस्त हमारे बचपन से काफी अलग हैं। अब दोस्तियां ‘जमीनी’ कम ‘डिजिटल’ ज्यादा हैं। दोस्तियां फेसबुक पर गढ़ी जाती हैं। उस बंदे को सम्मान की निगाह से देखा जाता है, जिसकी फ्रेंड-लिस्ट की संख्या चार-पांच हजार के पार निकल चुकी हो। अगला यह कहते फुला नहीं समाता कि आज उसने फेसबुक पर दस-पचास दोस्त बनाए या बीस-पच्चीस को फ्रेंड रिक्यूस्ट भेजी।

डिजिटल दोस्ती का सबसे बड़ा लुत्फ यह है कि आड़े वक्त में ये दोस्तियां पता नहीं किस कुंए में मुंह छिपाए आराम फरमाती रहती हैं। यहां इन-बॉक्स में आकर लंबी-चौड़ी बातें हांकने वाले तो खूब टकराते हैं किंतु साथ में मोहल्ले के नुक्कड़ पर चाय पिलाने या गली में गुल्ली-डंडा खेलने वाला कोई नहीं मिलता। आमने-सामने दोस्तों की शक्लें देखे या आवाज सुने ही महीनों-सालों बीत जाते हैं। डिजिटल समय में दोस्त-दोस्तियां औपचारिक-सी होती जा रही हैं।

फिर भी, मुझे इस बात का संतोष है कि मेरे कने अब भी वही दोस्त हैं, जिनके साथ बचपन और जवानी किस्म-किस्म की शरारतों और बदमाशियों के साथ गुजरी। मौका मिलता है तो हम आज भी अपने उसी पुराने दौर में लौट जाते हैं। जरा-बहुत सही मन तो ‘बहल’ ही जाता है।

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

माफ कीजिएगा, मेरे घर में टमाटर नहीं है

क्या आपके घर में टमाटर है?

यह प्रश्न आजकल मुझे इतना ‘असहज’ किए हुए है कि मैं रातों को सो नहीं पा रहा। निगाहें हर वक्त दरवाजे की देहरे पर टिकी रहती हैं कि कहीं कोई पड़ोसी या रिश्तेदार टमाटर मांगने न आ धमके। आलम यह है कि दफ्तर भी न के बराबर ही जा पा रहा हूं। वहां भी यही डर सताता रहता है कि कोई कुलीग टमाटर की डिमांड न कर दे।

पत्नी को सख्त हिदायत दे रखी है कि मेरी सब्जी में टमाटर का एक छिलका भी नहीं दिखना चाहिए। इस मुद्दे पर कई दफा पत्नी से ‘मुंहजोरी’ हो चुकी है। जो न कहना चाहिए वो सबकुछ वो मेरे बारे में कह चुकी है। इक टमाटर की खातिर वो मुझे दुनिया का सबसे ‘कंजूस पति’ तक मोहल्ले में ‘घोषित’ कर चुकी है। मगर कोई नहीं...। सब मंजूर है। टमाटर की खातिर मैं अपना ‘अपमान’ सहने को ‘स-हर्ष’ तैयार हूं। लेकिन मैंने भी ‘प्रण’ कर रखा है कि चाहे जो हो जाए घर में टमाटर खरीदकर नहीं लाऊंगा तो नहीं ही लाऊंगा।

मानता हूं, टमाटर खाने के तमाम लाभ हैं। टमाटर सलाद की शान है। टमाटर गोरे लाल गालों की खूबसूरत पहचान है। किंतु सिर्फ सेहत की शान की खातिर इतने महंगे टमाटर को खरीदना- मेरी निगाह में- फिजूलखर्ची ही नहीं बल्कि अव्वल दर्जे की मूर्खता है। माफ कीजिएगा, मैं ऐसी मूर्खता करने के पक्ष में कतई नहीं हूं।

यह तो टमाटर की बात रही। ऐसा मैंने तब भी किया था, जब पिछले दिनों दाल और प्याज की बढ़ी कीमतों ने आंखों में पानी ला दिया था। तब भी पत्नी मेरे सिर को आ गई थी। न केवल मोहल्ले बल्कि नाते-रिश्तेदारों के बीच कंजूस कहकर मेरी ‘खिल्ली’ उड़ाई गई थी फिर भी मैंने न दाल खरीदी न ही प्याज। हां, काफी दिनों तलक खाना बे-स्वाद टाइप ही रहा। पत्नी ने घर में खाना बनाना न के बराबर कर दिया। मगर मैं न हारा। दाल और प्याज से समानांतर लड़कर मैंने दिखा दिया- महंगाई के आगे समझौता न करने में ही जीत है।

बात बहुत सिंपल-सी है। किंतु हम समझना नहीं चाहते। थोड़े दिनों के लिए अगर हम टमाटर नहीं खाएंगे तो कौन-सा चीन बुरा मान जाएगा? या सब्जीवाला हमें लौकी देने से मना कर देगा? या बॉस दफ्तर से बाहर कर देगा? न जी न। ऐसा कुछ नहीं होगा। दुनिया अपने ठिए पर यों ही चलती रहेगी। चाहे आप टमाटर खाओ या न खाओ। डिसाइड तो हमें करना है कि हमारी जेब टमाटर खाना अलाऊ करती है या लौकी-तुरर्ई।

वैसे, पूरी कोशिश में हूं कि टमाटर की दहशत से खुद को बचाकर रख सकूं। लेकिन फिर भी मुंह के आगे कोई अगर पड़कर मुझसे टमाटर मांग भी लेता है तो मैं दोनों हाथ जोड़कर उससे इतना भर कह देता हूं- माफ कीजिएगा शिरिमानजी, मेरे घर में टमाटर नहीं है।

बुधवार, 2 अगस्त 2017

बुद्धिजीवि होने के खतरे

मैं बुद्धिजीवियों के मोहल्ले में रहता जरूर हूं मगर खुद बुद्धिजीवि नहीं हूं। उनसे हमेशा दस-बीस कदम की दूरी रखता हूं। उन्होंने कई दफा कोशिश की कि मैं उनकी बुद्धिजीवि मंडली में शामिल होकर उन जैसा बन जाऊं लेकिन हर दफा मैंने खुद को उनसे बचाया ही लिया। साफ शब्दों में उनसे कह दिया- मुझे बुद्धिजीवि बनने का तो शौक है कोई हसरत। बुद्धिजीवियों जैसी ऐलीट टाइप जिंदगी मैं नहीं जीना चाहता।

हालांकि बुद्धिजीवि होना बड़ा 'साहस' का काम है। मगर साथ ही उसके 'खतरे' भी हैं। साहस और खतरों से मैंने हमेशा बचने की कोशिश की है। बुद्धिजीवि 'शाब्दिक लफ्फबाज़ी' में बेहद सहासी होता है। अपने नेताओं को ही देख लो। मैं देश के प्रत्येक नेता को बुद्धिजीवि मानता हूं! नेताओं की कथनी-करनी में अंतर होने के बावजूद उनमें इतना साहस होता है, जिसके बल पर वो सत्ता में पांच साल तक आराम से टिके रहते हैं। लोगों का ऐसा मानना है कि नेता नोट और वोट से चुनाव जीतते हैं, मगर मेरा इसपिछड़ी मान्यता’ में कतई विश्वास नहीं। नेता केवलबुद्धि’ के बल पर ही चुनाव जीतते हैं। जनता को रिझाने के लिए किसी नोट या वोट की नहीं सिर्फ बुद्धि की आवश्यकता होती है। किस जरूरी मुद्दे पर जनता को अपनी ओर खींचना है। कैसे उनमें अपने प्रति विश्वास को जीवित रखना है। कैसे उनकी रोटी खाकर उनके झोपड़े में सोना है। इस सब 'त्याग' के लिए बुद्धि की ही जरूरत पड़ती है, नोट की नहीं।

अगर आप बुद्धिजीवि हैं तो वैचारिक और शाब्दिक लफ्फबाजी बड़ी आसानी से कर सकते हैं। आतंकवाद, भूख, गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ, खेती-किसानी जैसे मुद्दों पर सेमिनारों में जाकर खुलकर वैचारिक और शाब्दिक लफ्फबाजियां करें, कोई आपको रोकेगा-टोकेगा नहीं, क्योंकि आप बुद्धिजीवि हैं। बुद्धिजीवि बनकर आप कैसे भी वैचारिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक आदि खतरों पर 'सिर्फ चिंता' व्यक्त कर सकते हैं। ध्यान रखें, बुद्धिजीवि कभी सड़कों पर नहीं निकलते। वे ठंडे कमरों में बैठकर ही गर्म योजनाएं बनाते-बिगाड़ते रहते हैं। 

दूसरी तरफ, हमारे साहित्यकार राजनीतिक बुद्धिजीवियों से दो-चार कदम हमेशा आगे रहते हैं। नेता चाहे जितना बड़ा या छोटा हो पांच साल में एक बार जनता के बीच उसे जाना ही होता है, वोट मांगने। लेकिन साहित्यकार पांच साल तो क्या पचास साल में एक बार भी जनता के बीच जाना पसंद नहीं करता। बात भी सही है, साहित्यकार जनता के बीच क्यों जाए! जनता शायद जानती नहीं कि साहित्यकारों को सामाजिक जनहितैषी मुद्दों को उठाने के लिए किस कदर 'वैचारिक जमा-खर्च' करना पड़ता है। इस काम में बुद्धि तो खर्च होती ही है ! आखिर वे वैचारिक बुद्धिजीवि जो ठहरे। जनता अपनी फिक्र खुद करे। उनकी समस्यों से किसी साहित्यिक बुद्धिजीवि का भला क्या लेना-देना?

इसीलिए मैं हर दम यही गुज़ारिश अपने तमाम पाठकों-मित्रों से करता रहता हूं कि मुझे न 'बुद्धिजीवि' समझें, मानें।


मैं 'साधारण व्यक्ति' के तौर पर ही रहना और मरना चाहता हूं। बुद्धिजीवि बनकर कैसा भी 'पाप' मैं अपने सिर नहीं लेना चाहता। बुद्धिजीवि होना कितना ख़तरनाक है, इसे नेताओं-साहित्यकारों से बेहतर भला कौन जान-समझ सकता है!