शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

अ-संस्कारी व्यंग्यकार

मेरे व्यंग्य में ‘संस्कार’ नाम की चीज ‘न’ के बराबर है। ऐसा नहीं है कि मैंने कभी कोशिश नहीं की अपने लेखन में संस्कारों को डालने की। किंतु क्या करूं, हर बार मात खा जाता हूं। जब भी संस्कार का ताबिज पहनकर व्यंग्य लिखा, व्यंग्य न बनकर ‘सुभाषित’ टाइप बन गया। तमाम संस्कारशील व्यंग्यकारों को भी पढ़कर देख लिया लेकिन अपने व्यंग्य में संस्कार मैं फिर भी पैदा नहीं कर सका।

इस बाबत पत्नी जाने कितनी ही दफा मुझे वॉर्न चुकी है कि तुम्हारे व्यंग्य में संस्कार न होने के कारण न खुद पढ़ती हूं न अपने मायके वालों से पढ़ने को कहती हूं। अपने लेखन को सुधारो। इसमें संस्कार डालो- संस्कार। तुम्हारे अ-संस्कारी व्यंग्य बड़े ही भद्दे और उज्जड़ किस्म के होते हैं।

पत्नी की आपत्ति पर बायकॉट भला कैसे कर सकता हूं? अतः सुनकर चुप रह जाता हूं। ज्यादा साफ-सफाई इसलिए नहीं देता कहीं दोनों वक्त का खाना-पीना ही बंद न हो जाए। यों भी, पत्नियों के मूड का कोई भरोसा नहीं होता। आज मेरे व्यंग्य उसे ‘अ-संस्कारी’ लग रहे हैं, हो सकता है, कल को ‘तुलसीदास की चौपाईयां’ लगने लगें!

वैसे, कहिए कुछ भी ये संस्कार बड़ी ही ‘कुत्सित’ चीज होती है। इन्हीं संस्कारों का खामियाजा मंटो को किस-किस रूप में अपने जीवन और लेखन में झेलना पड़ा। पूरी दुनिया ने उसे 'बदनाम लेखक' घोषित कर दिया। खुशवंत सिंह के साथ भी तो यही हुआ। लोग जाने क्या-क्या गलत-सलत खुशवंत सिंह के लेखन के बारे में कहते रहे। उन्हें घोषित तौर पर अ-संस्कारी लेखक तक बता दिया। हद है। लेखन में औरत, सेक्स, ग्लैमर या पीने-पिलाने का जिक्र करना क्या अ-संस्कारी परंपरा है? बताएं। बताएं।

कहने को रह हम 21वीं सदी में रहे हैं मगर बातें आज भी वही 16वीं-17वीं सदी की करते हैं।

क्या करूं, जो अपने व्यंग्य में मैं संस्कार की चाश्नी नहीं घोल पाता। संस्कार के अतिरिक्त बाकी सब तो है न मेरे व्यंग्य में। वैसे भी, व्यंग्य संस्कार की कसौटी पर नहीं, मार्केट और करेंट मुद्दों की डिमांड पर लिखा जाता है। यह नए दौर का व्यंग्य लेखन है। इसमें ग्लैमर भी है। मार्केट भी है। मस्ती और पंच भी।

पर यह हकीकत न पत्नी को समझ आती है न किसी और को। संस्कार के चक्कर में अगर पड़ा रहूंगा तो अभी जो लिख रहा हूं उससे भी हाथ धो बैठूंगा। फिलहाल, मैं ‘अ-संस्कारी व्यंग्यकार’ बने रहकर ही खुश हूं।

1 टिप्पणी:

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

आप और अ संस्कारी हर्गिज नहीं। ये आपके खिलाफ गृह मंत्रालय की साजिश लगती है।