गुरुवार, 6 जुलाई 2017

साहित्य के तईं नया राज्य

मुझे भी एक अलग राज्य चाहिए। राजनीति करने के लिए नहीं, साहित्य के लिए। हां, मुझे साहित्य के लिए नए राज्य की दरकार है। साहित्य के नए राज्य में मैं आपने हिसाब से चीजें बनाना व करना चाहता हूं। इस राज्य में सिर्फ और सिर्फ मेरी ही चलेगी। राज्य का ‘राजा’ मैं ही बनूंगा। अपनी पसंद के किस साहित्यकार को मैं साहित्यिक पुरस्कार देना-दिलवाना चाहता हूं किसे नहीं; इस पर मेरा निर्णय ही मान्य होगा।

नए साहित्यिक राज्य में मैं साहित्य की नहीं बल्कि पुरस्कारों की सेवा करने वालों पर अधिक बल दूंगा। मेरा मानना है- साहित्य की सेवा तब तक नहीं हो सकती, जब तक पुरस्कार की अशर्फियां लेखक-साहित्यकार की झोली में न आन गिरें। साहित्य व लेखन को अगर अच्छे से चलाना या संवारना है तो पुरस्कार की राजनीति पर ध्यान ज्यादा लगाना होगा।

मेरा दावा है कि नया साहित्यिक राज्य सम्मानों व पुरस्कारों के लिए तमाम नए अवसर लेकर आएगा। जो वरिष्ठ साहित्यकार ‘लिखने’ से ज्यादा ‘बोलने’ में ‘विश्वास’ करते हैं उन्हें पुरस्कृत करने पर खास ध्यान दिया जाएगा। आखिर वे हमारे साहित्य की जीवित मगर बोलती हुई धरोहरें हैं। धरोहरों की चिंता करना हर साहित्य-प्रेमी का पहला फर्ज होना चाहिए। क्या नहीं...?

मैं अपने नए साहित्यिक राज्य में किसी लेखक-साहित्यकार को यह अधिकार नहीं दूंगा कि वो ‘सृजन’ करे। लेखन के प्रति ‘गंभीर’ बना रहे। प्रगतिशील आलोचकों को मेरे राज्य में कहीं कोई जगह नहीं मिलेगी। हां, वहां ‘समीक्षकों’ का हर दम स्वागत होगा। समीक्षा लेखन सबसे खूबसूरत विधा है। बिना किसी दिमागी ताम-झाम के एक बने बनाए खांचे के तहत आप मनचाही समीक्षा लिख व लिखवा सकते हैं। मेरी निगाह में समीक्षा लेखन सबसे सरल और वक्त बचाऊ पेशा है।

नए साहित्यिक राज्य में इस बात पर तव्वजो ज्यादा देने का प्रयास किया जाएगा कि शाब्दिक क्रांतियों को जितना हो सके चारदीवारी के भीतर ही निपटा लिया जाए। क्रांतियां जब सड़कों-चौराहों का रूख कर लेती हैं तब यथास्थितिवादी व्यवस्था में खदबदाहटें पैदा होने लगती हैं। मैं नहीं चहूंगा कि मेरे नए साहित्यिक राज्य में कोई भगत सिंह की तर्ज पर क्रांति-फ्रांति करे। मुझे क्रांतियों से सख्त नफरत है। इसीलिए तो नए साहित्यिक राज्य को बनाने का संकल्प मैंने बिना किसी सामाजिक क्रांति के लिया है।

बेशक, मैं साहित्य की सेवा करना चाहता हूं मगर अपने तरीके से। मेरा प्रयास रहेगा कि अपने राज्य में बात प्रेमचंद या मुक्तिबोध पर नहीं मेरे ऊपर ज्यादा हो। मेरे साहित्यिक कर्म व वैचारिक धर्म का गहनता से विवेचन किया जाए। मुझे मिले प्रत्येक छोटे-बड़े साहित्यिक सम्मान-पुरस्कार पर अधिक से अधिक लिखा जाए।

मेरी सरकार से गुजारिश है कि वो मुझे नए साहित्यिक राज्य को बनाने का समूचित अधिकार दे ताकि मैं साहित्य को यशोगान और पुरस्कार का अखाड़ा बनाकर कुछ अजूबा और अनूठा कर सकूं।

2 टिप्‍पणियां:

Ravishankar Shrivastava ने कहा…

मुझे भी चाहिए अपने लिए एक अलग राज्य और मैं तो इसके लिए हथियार भी उठा सकता हूं 😆

anshumala ने कहा…

ओह साहित्यकार बनना तो बड़ा मुश्किल काम है | हम तो कभी न बन पायेंगे |