बुधवार, 5 जुलाई 2017

जीएसटी पर कविता

कवि परेशान है। कुछ समझ नहीं पा रहा कि जीएसटी पर कविता कैसे लिखे? न उसे शब्द मिल पा रहे हैं। न कोई सीन क्रिएट हो पा रहा। कवि बार-बार जीएसटी के रहस्य को समझने की कोशिश कर रहा है मगर हर बार गच्चा खा जाता है। 5, 12, 18, 28 का फेर उसे समझ नहीं आ पा रहा। झुंझलाहट में कभी वो खुद को गरियाता है तो कभी सरकार को।
    
मैं कवि की परेशानी को समझ सकता हूं। अर्थशास्त्र को समझ पाने में हमारे देश के कवि अभी कच्चे हैं। वे ज्यादातर साम्यवाद, पूंजीवाद, अमीरी-गरीबी, कत्ल-आत्महत्या, फूल-पत्ती, नदी-नाले, आकाश-तारे, सूरज-चंद्रमा टाइप कवितओं में ही उलझ रहते हैं। अर्थशास्त्र और बाजार की तरफ न उनका ध्यान जाता है न इसे वे कविता लायक ही पाते हैं। इसीलिए आजकल जीएसटी पर कविता लिख पाने में खुद को ‘बौना’ महसूस कर रहे हैं।

कवियों को भी समझना चाहिए कि अब वो पहले वाला वक्त नहीं रहा। सीन चेंज, बहुत चेंज हो चुका है। चारों तरफ ‘डिजिटल इंडिया’ का ‘कोलाहल’ है। दुनिया और समाज सरपट-सरपट भागे जा रहे हैं। किसी के पास अब इतनी फुर्सत भी नहीं कि ठहर कर शर्ट का कॉलर भी ठीक कर सके। ऐसे में, भीषण संवेदनात्मक कविताएं लिखना तो दूर इस दौर के कवि के लिए सोचना भी जरा मुश्किल है।

पन्नों से कहीं ज्यादा कविताएं अब सोशल मीडिया पर आ रही हैं। लुत्फ यह है कि सोशल मीडिया पर मौजूद अस्सी परसेंट लोग कवि ही हैं। जो जरा-बहुत लिख पाता है, तुरंत अपने फेसबुक पेज पर कविता टांग देता है। कविता अब पूर्णता डिजिटल मोड में ढल गई है।

फिर भी, हमारे बीच कुछ ऐसे कवि हैं, जो खुद की खुशफहमियों से बाहर निकल ही नहीं पा रहे। सत्तर के दशक में जी रहे हैं और सोशल मीडिया के नए कवियों को कोस रहे हैं। उन्हें जीएसटी पर कविता न लिख पाने का मलाल तो हैं पर अपना दर्द साझा करें किससे? नया कुछ सीखना नहीं चाहते, पुराना अब चलन से बाहर हो चुका है। दिक्कत विकट है फिर भी ऐंठ में कोई कमी नहीं।

जीएसटी पर कविता लिखना इतना कठिन नहीं। कुछ शब्दों का हेर-फेर कर मस्त कविता तानी जा सकती है। मगर पुराना कवि शब्दों के हेर-फेर को न सिर्फ कविता बल्कि साहित्य की भी तौहीन समझता है। ऐसे में भला कैसे लिख पाएगा जीएसटी पर कविता?

मगर मैं जीएसटी पर कविता पढ़ने का शौक रखता हूं। बेहद बेसब्री से इस इंतजार में हूं कि कोई वरिष्ठ या आधुनिक टाइप का कवि जीएसटी पर कविता लिखे। देश में इतने सारे कवियों के होते जीएसटी पर एक भी कविता का न आ पाना- किसी और के लिए हो न हो- मगर मेरे तईं बड़ा ही ‘क्षोभ का विषय’ है!

3 टिप्‍पणियां:

Shah Nawaz ने कहा…

:) बहुत बढ़िया

Rishabh Shukla ने कहा…

​सुंदर रचना......बधाई|​​

आप सभी का स्वागत है मेरे ब्लॉग "हिंदी कविता मंच" की नई रचना #वक्त पर, आपकी प्रतिक्रिया जरुर दे|

http://hindikavitamanch.blogspot.in/2017/07/time.html




राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’राष्ट्रीय एकात्मता एवं अखण्डता के प्रतीक डॉ० मुखर्जी - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...