सोमवार, 10 जुलाई 2017

खामोश! तोता आजाद हो चुका है

तोता अब आजाद है। पूरी आजादी से अपने काम को अंजाम दे रहा है। तोते की आजादी बहुत लोगों को बेइंतहा खल रही है। रह-रहकर तमाम सवाल और आरोप तोते की आजादी पर वे लगा रहे हैं। अपने वक्त का हवाला दे रहे हैं। अपनी ईमानदारी पर सवाल खड़े करने वालों को आड़े हाथों ले रहे हैं। बयान दिए जा रहे हैं कि वर्तमान सरकार विकट द्वेष की भावना से काम कर रही है। चैन से जीने नहीं दे रही।

मगर तोता राजनीतिक बयानों और नेताओं की भपकियों से बेअसर अपने काम में व्यस्त है। दुम पर जब पैर रखा जाएगा तो अगला चीखेगा ही। सो, नेता लोग भी चीख-चाख मचाए हुए हैं।

कहिए कुछ भी, रस्सी के इतना जल जाने के बाद भी बलों का पड़ना कम नहीं हुआ है। बल्कि बल और भी ऐंठ गए हैं। अब ऐंठे या रूठें पर मजा निश्चित ही बहुत आ रहा होगा जनता को।

देखा है, पिछले कई सालों से घोटाले राजनीति और नेताओं के पूरक बन चुके थे। नेताओं के जहन में एक बेफिक्री-सी थी कि चाहे कितने ही घपले-घोटाले करते रहो न तोता कभी कुछ बोलेगा न सरकार के मालिकान सवाल पूछेंगे। जितना और जिस हद तक जनता को लूट सकते हो, लूट लो। न दूर न पास कहने-सुनने वाला कोई नहीं है। ज्यादा कुछ दवाब पड़ा तो चार-छह दिन हवालात की हवा खा थोड़ा और तंदुरुस्त हो लेंगे।

यह विडंबना क्या कम बड़ी है कि वे खुद को गरीब-गुरबों का मसीहा घोषित कर रहे हैं। मोह-माया से खुद को दूर बता रहे हैं। रेड को विरोधियों की साजिश करार दे रहे हैं। तिस पर भी प्रतिष्ठनों से इतना धन, इतनी बेनामी संपत्ति निकल कर बाहर आ रही है। क्या खालिस जन-नेताओं के ठाठ ऐसे ही होते हैं? कल तलक मामूली-सा दिखने वाला नेता कुछ ही सालों में लाखों-करोड़ों का मालिक बन बैठता है। किसी सरकारी या प्राइवेट नौकरी या व्यापार से कहीं ज्यादा पैसा और रूतबा तो नेता बनने में है। हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा।

जब ऊपर के भ्रष्टाचार और घोटालों के हाल ये हैं फिर नीचे वालों का क्या कहिए। वहां तो सरल लेन-देन के लिए टेबल है ही।

वैसे, दो का चार बनाने में जितनी तिकड़में चोर न भिड़ता होगा, उससे कहीं ज्यादा तो नेता लोग भिड़ा लेते होंगे। हालांकि चोर दोनों ही हैं किंतु स्टैंडर्ड अलग-अलग हैं। हां, पकड़े जाने या रेड पड़ने पर शर्म दोनों को ही नहीं आती। बल्कि तब तो और भी ‘शेर’ से हुए जान पड़ते हैं। तुरंत ‘प्रताड़ित’ बन जाती हैं। मानो- दुनिया की तमाम तरह की प्रताड़नाएं अकेले वे ही सहन कर रहे हैं।

खैर...।

तोते की आजादी एक हल्का-सा ‘शुभ संकेत’ तो लेके आई है। मगर ये आजादी कितनी और कहां तक ‘तटस्थ’ रह पाती है, अहम बात तो देखना ये है।

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

अ-संस्कारी व्यंग्यकार

मेरे व्यंग्य में ‘संस्कार’ नाम की चीज ‘न’ के बराबर है। ऐसा नहीं है कि मैंने कभी कोशिश नहीं की अपने लेखन में संस्कारों को डालने की। किंतु क्या करूं, हर बार मात खा जाता हूं। जब भी संस्कार का ताबिज पहनकर व्यंग्य लिखा, व्यंग्य न बनकर ‘सुभाषित’ टाइप बन गया। तमाम संस्कारशील व्यंग्यकारों को भी पढ़कर देख लिया लेकिन अपने व्यंग्य में संस्कार मैं फिर भी पैदा नहीं कर सका।

इस बाबत पत्नी जाने कितनी ही दफा मुझे वॉर्न चुकी है कि तुम्हारे व्यंग्य में संस्कार न होने के कारण न खुद पढ़ती हूं न अपने मायके वालों से पढ़ने को कहती हूं। अपने लेखन को सुधारो। इसमें संस्कार डालो- संस्कार। तुम्हारे अ-संस्कारी व्यंग्य बड़े ही भद्दे और उज्जड़ किस्म के होते हैं।

पत्नी की आपत्ति पर बायकॉट भला कैसे कर सकता हूं? अतः सुनकर चुप रह जाता हूं। ज्यादा साफ-सफाई इसलिए नहीं देता कहीं दोनों वक्त का खाना-पीना ही बंद न हो जाए। यों भी, पत्नियों के मूड का कोई भरोसा नहीं होता। आज मेरे व्यंग्य उसे ‘अ-संस्कारी’ लग रहे हैं, हो सकता है, कल को ‘तुलसीदास की चौपाईयां’ लगने लगें!

वैसे, कहिए कुछ भी ये संस्कार बड़ी ही ‘कुत्सित’ चीज होती है। इन्हीं संस्कारों का खामियाजा मंटो को किस-किस रूप में अपने जीवन और लेखन में झेलना पड़ा। पूरी दुनिया ने उसे 'बदनाम लेखक' घोषित कर दिया। खुशवंत सिंह के साथ भी तो यही हुआ। लोग जाने क्या-क्या गलत-सलत खुशवंत सिंह के लेखन के बारे में कहते रहे। उन्हें घोषित तौर पर अ-संस्कारी लेखक तक बता दिया। हद है। लेखन में औरत, सेक्स, ग्लैमर या पीने-पिलाने का जिक्र करना क्या अ-संस्कारी परंपरा है? बताएं। बताएं।

कहने को रह हम 21वीं सदी में रहे हैं मगर बातें आज भी वही 16वीं-17वीं सदी की करते हैं।

क्या करूं, जो अपने व्यंग्य में मैं संस्कार की चाश्नी नहीं घोल पाता। संस्कार के अतिरिक्त बाकी सब तो है न मेरे व्यंग्य में। वैसे भी, व्यंग्य संस्कार की कसौटी पर नहीं, मार्केट और करेंट मुद्दों की डिमांड पर लिखा जाता है। यह नए दौर का व्यंग्य लेखन है। इसमें ग्लैमर भी है। मार्केट भी है। मस्ती और पंच भी।

पर यह हकीकत न पत्नी को समझ आती है न किसी और को। संस्कार के चक्कर में अगर पड़ा रहूंगा तो अभी जो लिख रहा हूं उससे भी हाथ धो बैठूंगा। फिलहाल, मैं ‘अ-संस्कारी व्यंग्यकार’ बने रहकर ही खुश हूं।

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

साहित्य के तईं नया राज्य

मुझे भी एक अलग राज्य चाहिए। राजनीति करने के लिए नहीं, साहित्य के लिए। हां, मुझे साहित्य के लिए नए राज्य की दरकार है। साहित्य के नए राज्य में मैं आपने हिसाब से चीजें बनाना व करना चाहता हूं। इस राज्य में सिर्फ और सिर्फ मेरी ही चलेगी। राज्य का ‘राजा’ मैं ही बनूंगा। अपनी पसंद के किस साहित्यकार को मैं साहित्यिक पुरस्कार देना-दिलवाना चाहता हूं किसे नहीं; इस पर मेरा निर्णय ही मान्य होगा।

नए साहित्यिक राज्य में मैं साहित्य की नहीं बल्कि पुरस्कारों की सेवा करने वालों पर अधिक बल दूंगा। मेरा मानना है- साहित्य की सेवा तब तक नहीं हो सकती, जब तक पुरस्कार की अशर्फियां लेखक-साहित्यकार की झोली में न आन गिरें। साहित्य व लेखन को अगर अच्छे से चलाना या संवारना है तो पुरस्कार की राजनीति पर ध्यान ज्यादा लगाना होगा।

मेरा दावा है कि नया साहित्यिक राज्य सम्मानों व पुरस्कारों के लिए तमाम नए अवसर लेकर आएगा। जो वरिष्ठ साहित्यकार ‘लिखने’ से ज्यादा ‘बोलने’ में ‘विश्वास’ करते हैं उन्हें पुरस्कृत करने पर खास ध्यान दिया जाएगा। आखिर वे हमारे साहित्य की जीवित मगर बोलती हुई धरोहरें हैं। धरोहरों की चिंता करना हर साहित्य-प्रेमी का पहला फर्ज होना चाहिए। क्या नहीं...?

मैं अपने नए साहित्यिक राज्य में किसी लेखक-साहित्यकार को यह अधिकार नहीं दूंगा कि वो ‘सृजन’ करे। लेखन के प्रति ‘गंभीर’ बना रहे। प्रगतिशील आलोचकों को मेरे राज्य में कहीं कोई जगह नहीं मिलेगी। हां, वहां ‘समीक्षकों’ का हर दम स्वागत होगा। समीक्षा लेखन सबसे खूबसूरत विधा है। बिना किसी दिमागी ताम-झाम के एक बने बनाए खांचे के तहत आप मनचाही समीक्षा लिख व लिखवा सकते हैं। मेरी निगाह में समीक्षा लेखन सबसे सरल और वक्त बचाऊ पेशा है।

नए साहित्यिक राज्य में इस बात पर तव्वजो ज्यादा देने का प्रयास किया जाएगा कि शाब्दिक क्रांतियों को जितना हो सके चारदीवारी के भीतर ही निपटा लिया जाए। क्रांतियां जब सड़कों-चौराहों का रूख कर लेती हैं तब यथास्थितिवादी व्यवस्था में खदबदाहटें पैदा होने लगती हैं। मैं नहीं चहूंगा कि मेरे नए साहित्यिक राज्य में कोई भगत सिंह की तर्ज पर क्रांति-फ्रांति करे। मुझे क्रांतियों से सख्त नफरत है। इसीलिए तो नए साहित्यिक राज्य को बनाने का संकल्प मैंने बिना किसी सामाजिक क्रांति के लिया है।

बेशक, मैं साहित्य की सेवा करना चाहता हूं मगर अपने तरीके से। मेरा प्रयास रहेगा कि अपने राज्य में बात प्रेमचंद या मुक्तिबोध पर नहीं मेरे ऊपर ज्यादा हो। मेरे साहित्यिक कर्म व वैचारिक धर्म का गहनता से विवेचन किया जाए। मुझे मिले प्रत्येक छोटे-बड़े साहित्यिक सम्मान-पुरस्कार पर अधिक से अधिक लिखा जाए।

मेरी सरकार से गुजारिश है कि वो मुझे नए साहित्यिक राज्य को बनाने का समूचित अधिकार दे ताकि मैं साहित्य को यशोगान और पुरस्कार का अखाड़ा बनाकर कुछ अजूबा और अनूठा कर सकूं।

बुधवार, 5 जुलाई 2017

जीएसटी पर कविता

कवि परेशान है। कुछ समझ नहीं पा रहा कि जीएसटी पर कविता कैसे लिखे? न उसे शब्द मिल पा रहे हैं। न कोई सीन क्रिएट हो पा रहा। कवि बार-बार जीएसटी के रहस्य को समझने की कोशिश कर रहा है मगर हर बार गच्चा खा जाता है। 5, 12, 18, 28 का फेर उसे समझ नहीं आ पा रहा। झुंझलाहट में कभी वो खुद को गरियाता है तो कभी सरकार को।
    
मैं कवि की परेशानी को समझ सकता हूं। अर्थशास्त्र को समझ पाने में हमारे देश के कवि अभी कच्चे हैं। वे ज्यादातर साम्यवाद, पूंजीवाद, अमीरी-गरीबी, कत्ल-आत्महत्या, फूल-पत्ती, नदी-नाले, आकाश-तारे, सूरज-चंद्रमा टाइप कवितओं में ही उलझ रहते हैं। अर्थशास्त्र और बाजार की तरफ न उनका ध्यान जाता है न इसे वे कविता लायक ही पाते हैं। इसीलिए आजकल जीएसटी पर कविता लिख पाने में खुद को ‘बौना’ महसूस कर रहे हैं।

कवियों को भी समझना चाहिए कि अब वो पहले वाला वक्त नहीं रहा। सीन चेंज, बहुत चेंज हो चुका है। चारों तरफ ‘डिजिटल इंडिया’ का ‘कोलाहल’ है। दुनिया और समाज सरपट-सरपट भागे जा रहे हैं। किसी के पास अब इतनी फुर्सत भी नहीं कि ठहर कर शर्ट का कॉलर भी ठीक कर सके। ऐसे में, भीषण संवेदनात्मक कविताएं लिखना तो दूर इस दौर के कवि के लिए सोचना भी जरा मुश्किल है।

पन्नों से कहीं ज्यादा कविताएं अब सोशल मीडिया पर आ रही हैं। लुत्फ यह है कि सोशल मीडिया पर मौजूद अस्सी परसेंट लोग कवि ही हैं। जो जरा-बहुत लिख पाता है, तुरंत अपने फेसबुक पेज पर कविता टांग देता है। कविता अब पूर्णता डिजिटल मोड में ढल गई है।

फिर भी, हमारे बीच कुछ ऐसे कवि हैं, जो खुद की खुशफहमियों से बाहर निकल ही नहीं पा रहे। सत्तर के दशक में जी रहे हैं और सोशल मीडिया के नए कवियों को कोस रहे हैं। उन्हें जीएसटी पर कविता न लिख पाने का मलाल तो हैं पर अपना दर्द साझा करें किससे? नया कुछ सीखना नहीं चाहते, पुराना अब चलन से बाहर हो चुका है। दिक्कत विकट है फिर भी ऐंठ में कोई कमी नहीं।

जीएसटी पर कविता लिखना इतना कठिन नहीं। कुछ शब्दों का हेर-फेर कर मस्त कविता तानी जा सकती है। मगर पुराना कवि शब्दों के हेर-फेर को न सिर्फ कविता बल्कि साहित्य की भी तौहीन समझता है। ऐसे में भला कैसे लिख पाएगा जीएसटी पर कविता?

मगर मैं जीएसटी पर कविता पढ़ने का शौक रखता हूं। बेहद बेसब्री से इस इंतजार में हूं कि कोई वरिष्ठ या आधुनिक टाइप का कवि जीएसटी पर कविता लिखे। देश में इतने सारे कवियों के होते जीएसटी पर एक भी कविता का न आ पाना- किसी और के लिए हो न हो- मगर मेरे तईं बड़ा ही ‘क्षोभ का विषय’ है!