शुक्रवार, 30 जून 2017

जीएसटी और लेखक

कई दिनों से जीएसटी पर अखबारों, न्यूज चैनलों पर कुछ न कुछ आ ही रहा है। कोई जीएसटी के पक्ष में दिख रहा है तो कोई विरोध में। मतलब, जितने मुंह उतनी बातें। बहती गंगा में वे लोग भी हाथ धोने में लगे हैं, जिन्हें जीएसटी का ‘जी’ भी नहीं मालूम! फिर भी, कहने या बोलने में क्या जाता है? ये तो ‘हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा’ वाला हिसाब है।

किंतु, जीएसटी पर मेरी चिंताएं जरा दूजी हैं। जीएसटी के मद्देनजर मैं लेखक के बारे में सोच रहा हूं। रात-दिन मेरे दिमाग में यही कीड़ा उथल-पुथल मचाए रहता है कि जीएसटी से (हम) लेखकों को क्या मिलेगा? या हमारा कितना और कहां तक भला होगा? जीएसटी के आला जानकारों से पूछा एवं दाएं-बाएं से जितना भी मुझे पढ़ने को मिल सका, पढ़ा- इस मसले पर सभी का डिब्बा गोल था। कोई भी यह नहीं बता-समझा पाया कि जीएसटी कैसे लेखक वर्ग के लिए मुफीद टाइप साबित होगा।

तो क्या मैं मान लूं, लेखक वर्ग सरकार की किसी भी आर्थिक श्रेणी में नहीं आता? लेखक को अपने लिखे पर कितना और क्या पारिश्रमिक मिलना चाहिए, ऐसा कोई नियमशुदा कानून नहीं है। लेखक के पारिश्रमिक को जीएसटी की किस दर में शामिल किया गया है? निरंतर बढ़ती महंगाई के साथ क्या लेखक का मेहनताना नहीं बढ़ना चाहिए आदि पर सरकार का रूख क्या है? चंद व्यापारियों या विपक्षियों ने ही जीएसटी पर हल्ला मचाया हुआ है। कोई बंद करने की धमकी दे रहा तो कोई वॉक-आउट करने की।

बेचारा लेखक मौन है। क्या कहे? किससे कहे? न वो अपने लेखन को बंद करने की धमकी दे सकता है, न यहां-वहां लिखने की। अपना-सा मुंह लेके बैठा हुआ है। भीषण गर्मी में बस कलम चलाए जा रहा है।

अच्छा, कमाल की बात यह है कि लेखकों की तरफ से भी किसी ने सरकार को आड़े हाथों नहीं लिया है। इसीलिए सरकारें भी लेखकों के हितों एवं सुविधाओं की तरफ से अपने कानों में तेल डाले रहती हैं। न बजट में लेखकों को कुछ मिलता है, न सरकारी योजनाओं में। न जीएसटी में ही कुछ नजर आ रहा है। लेखक कल भी कलम घिस रहा था, आज भी घिस रहा है, हमेशा ही घिसता रहेगा।

वैसे, मैं इस मसले पर सरकार के खिलाफ जंतर-मंतर पर ‘भूख हड़ताल’ पर बैठने तक को तैयार हूं। बस यही सोचकर कदम वापस खींच लेता हूं कि मैं चौबीस घंटे से ज्यादा भूखा नहीं रह पाता। क्या करूं, मेरे पापी पेट को बहुत जल्द भूख लग आती है। किंतु सरकार की ईंट से ईंट बजाने में मैं कतई पीछे नहीं हूं। अगर मेरी जगह कोई और लेखक भूख हड़ताल पर बैठे तो।

लेखकों के हितों के बारे में अगर मैं नहीं सोचूंगा तो भला कौन सोचेगा? सरकार से मेरी गुजारिश है कि वो जीएसटी में हम लेखकों को क्या मिल रहा है, इस पर अपना नजरिया स्पष्ट करे। वरना आंदोलन के लिए मैं रेडी हूं।

4 टिप्‍पणियां:

प्रियंका गुप्ता ने कहा…

मज़ेदार पोस्ट है !

Shah Nawaz ने कहा…

:) हम सब भूख हड़ताल पर आपके साथ हैं...

anshumala ने कहा…

हम तो २८ % का विलासिता वाला टैक्स भी देने को तैयार है बस कोई हमारी फेसबुकगिरि और ब्लॉगिंग करने का मेहनताना दे दे | अब सोच रहे है कि किसके दरवाजे धरना दे जुगरबर्ग के या सरकार के |

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

रोचक और सामयिक :)