बुधवार, 28 जून 2017

राजनीति के बीच फंसा राष्ट्रपति चुनाव

राजनीति अपना रंग गिरगिट से भी तेज बदलती है। गिरगिट कहीं राजनीति को रंग बदलते देख ले- तो कसम से- ‘आत्महत्या’ ही कर ले। राजनीति में रहकर इसका रंग बदलने वाले नेता अपने करियर में हमेशा कामयाब होते हैं। न वे कभी हारते हैं, न किसी को जीतने देते। सीधा-साधारण आदमी अगर राजनीति में जीत भी जाए तो उसके चरित्र की दुर्गति होते देर नहीं लगती। इसीलिए अति-महत्तवाकांक्षी लोग ही राजनीति के मैदान में अपना सिक्का चला व जमा पाते हैं।

अपने इसी रंग और स्वभाव के कारण ही राजनीति हमेशा चर्चा और बहस में बनी रहती है। ठलुओं का जी बहलाए और विरोधियों का पारा चढ़ाए रहती है। आजकल राजनीति का सारा ‘फोकस’ राष्ट्रपति चुनाव पर आकर टिक लिया है। जहां जिसे देखो राष्ट्रपति चुनाव से नीचे या ऊपर बात करना ही नहीं चाहता। हर कोई पार्टनर की पॉलिटिक्स तो जानना चाहता है किंतु अपनी खोटियां खोलने से डरता है। हालांकि काफी हद तक दलों की खोटियां खुल चुकी हैं मगर फिर भी बहुत कुछ बाकी है अभी खुलना। यों, खोलकर खुलेआम ‘रिस्क’ भला कौन ले? हाइकमान को जवाब भी तो देना पड़ सकता है न।

राष्ट्रपति चुनाव में पार्टियों ने ‘दलित दांव’ क्या चला मुकाबला और भी ‘दिलचस्प’ हो लिया। अब बहस इस पर तनी हुई है कि कौन दल या नेता कितना दलित-प्रेमी और कितना दलित-विरोधी है। हालांकि- ऐसे समय में- दलित-विरोधी कोई दल नहीं होना चाहेगा फिर भी बात होठों के बीच कहां दबी रह पाती है। जुबान पर कुछ, मन की बात में कुछ न कुछ हलचल तो बनी रहती है।

दलों का अलग-अलग तरीकों से दलित-दलित खेलना बेशक दलितों को पसंद न आ रहा हो लेकिन क्या कीजिए- यह राजनीति है राजनीति। यहां दांव दूसरे को पस्त करने के लिए ही खेले-खिलवाए जाते हैं।

मंचों पर खड़े होकर जाति और धर्म पर चाहे कितनी ही ऊंची-ऊंची बातें क्यों न खींच लें पर शाश्वत सत्य तो यही है कि राजनीति में इनकी ‘हेल्प’ लिए बिना न कोई चुनाव लड़ा जा सकता है न जीता जा सकता। जाति राजनीति और नेताओं का वो ‘पिलर’ है जिस पर सत्ताओं की इमारतें बड़ी शान से खड़ी की-करवाई जाती हैं। हमाम में दूध का धुला कोई नहीं। कम या ज्यादा नंगे तो सभी हैं। क्यों हैं न पियारे?

हालांकि जनता को इससे कोई सरोकार नहीं कि उनका नेता या राष्ट्रपति दलित है या सवर्ण लेकिन राजनीति में ये बहुत मायने रखता है। नेताओं की पहली पसंद ‘जातिवाद’ है बाद में ‘जन-हित’। राष्ट्रपति चुनाव कहने को बड़ा ‘प्रतिष्ठित चुनाव’ है लेकिन दलगत और जातिवाद की जुगलबंदी इसे ‘नौटंकी’ बनाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रख छोड़ रही। इसी में उन्हें मजा आ रहा है। तब ही तो मैं चुनाव और राजनीति को कभी ‘गंभीरता’ से नहीं हमेशा ‘मनोरंजन’ की तरह लेता हूं। दिल और मन ‘लगा’ रहना चाहिए बस।

दो महान हस्तियों में से राष्ट्रपति कौन बनेगा देश के नेता लोग जानें पर कथित दलित-प्रेम का खेल राजनीति में हमेशा यों ही चलता रहेगा। समझ गए न पियारे।

2 टिप्‍पणियां:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’सांख्यिकी दिवस और पीसी महालनोबिस - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

दिगंबर नासवा ने कहा…

अपने देश में जो न हो वो कम है ... फिर ये तो बस राजनीति है ...