गुरुवार, 15 जून 2017

अगले जन्म मुझे भूत ही कीजियो

भूत मुझे बेहद पसंद हैं। बचपन से आकर्षित करते रहे हैं। भूतिया फिल्में देखना। भूतों पर आधारित किस्से-कहानियां सुनना। भूतिया जगहों पर जाना। बड़ा आनंद आता है इन सब में मुझे।

अक्सर खुद को मैं इसलिए भी गरियाता हूं कि मैंने मनुष्य-रूप में जन्म क्यों लिया? भूत क्यों नहीं बना? भूत के रूप में जन्म लिया होता तो इंसानी-दुनिया के दंद-फंद से दूर कितना खुशहाल होता। इंसानों के बीच रहने का दिल नहीं करता अब। बड़े लफड़े हैं इंसानी लाइफ में। हर वक्त जाति-धर्म-राजनीति की चीख-पुकार। आपस में मन-मुटाव। पैसे की अंधी दौड़। नौकरी-चाकरी के बेइंतहा झंझट।

मगर भूतिया दुनिया इससे एकदम अलग है। वहां सब एक समान हैं। न उनकी अधिक तमन्नाएं हैं, न आपस में अधिकारों की जंग।

सबसे दिलचस्प यह है कि भूतों के बीच न कोई बुद्धिजीवि है, न नेता, न समाजसुधारक। सब अपने मन के राजा हैं। मैंने कभी उन्हें विचारों या धर्मनिरपेक्षता के मसलों पर लड़ते-झगड़ते नहीं देखा। खुद इतना ताकतवर होते हुए भी, उनके मध्य कभी जुबानी या हाथ-पैरों का दंगल नहीं छिड़ता। जबकि इंसान अपनी ही बिरादरी वालों से इतना खार खाया रहता है कि कुछ पूछिए मत।

हम इंसानों को ऐसा लगता है कि भूत हमें डराते हैं। हमें मारते या हमारा शोषण करते हैं। जबकि ऐसा कुछ नहीं है। भूत अपने स्वभाव में बेहद ‘शांतिप्रिय’ होते हैं। उनका उद्देश्य हमेशा- न कहूं से दोस्ती न कहू से बैर वाला होता है। चूंकि हम इंसान हर वक्त एक तरह के ‘भय’ में जीते रहते हैं इसीलिए हम भूतों से डरते हैं। कुछ की तो भूत का नाम सुनते ही पैंट गीली हो लेती है।
इंसान बहुत ही डरा हुआ प्राणी है इसीलिए भूतों के नाम से घबराता है।

लेकिन मैं अगले जन्म में भूत बनने की ही तमन्ना रखता हूं। भूतों जैसा जीवन जीना चाहता हूं। खुद भूत बनके इंसान के भय को अपनी अपनी ‘अदृश्य आंखों’ से देखना चाहता हूं। और यह साबित करना चाहता हूं कि भूत भी उम्दा व्यंग्यकार होता है। मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं कि व्यंग्य का जितना मसाला भूतों के पास रहता है, उतना इंसानों के पास भी नहीं।

तो हे! ईश्वर, ऐ! खुद अगले जन्म मुझे भूत ही कीजियो।