बुधवार, 17 मई 2017

चिप-कांडः इंसानी खोपड़ी का जवाब नहीं

पिछले कई दिनों से अखबार और खबरिया चैनल ‘चिप-मय’ दिख रहे हैं। तेल के खेल में प्रयोग की जानी वाली ‘चिप’ की खबरें खोद-खोद कर छापी-दिखाई जा रही हैं। लोग कभी चिप को तो कभी तेल मालिकों को ‘कोस’ रहे हैं। चिप-कांड ने न केवल सरकार बल्कि चिप-धारकों की नींद भी हराम कर रखी है। क्या तो तेल वाले, क्या तो मोबाइल वाले हर कोई चिपों के लेकर ऐसे ‘डरे-सहमे’ हुए हैं मानो यह कोई ‘चरस-गांजा’ टाइप हो।

कुछ भी कहिए पर ‘दाद’ देनी पड़ेगी इंसानी खोपड़ी की। जाने कहां-कहां से कैसे-कैसे धांसू आइडिया दिमाग में ले आते हैं। पर्दे के पीछे सारा खेल खुल्लम-खुल्ला चलता रहता है। भनक कहीं जाके तब लग पाती है, जब अच्छा-खासा माल पिट लिया जाता है। इंसानी (करतबी) खोपड़ी के आगे कंप्यूटर तो क्या कैलक्युलेटर तक फेल है।

कस्टमर की जेब का गेम चिप के सहारे बजाने का आइडिया जिस भी बंदे का रहा हो मगर था ‘नायाब’। अभी तलक तो हमने चिप का ज्यादा से ज्यादा यूज मोबाइल में या किसी डिजिटल मशीन के भीतर ही देखा-सुना था। लेकिन चिप के सहारे तेल का खेल भी खेला जा सकता है, यह वाक्या पहली दफा ही सामने आया।

कुछ गलत नहीं कहते अगर यह कहते हैं कि कुछ भी हो सकता है। ऐसे तिकड़मी और घोर-जुगाड़ू मसलों को देख-सुनकर तो यह बात और भी ‘बलबती’ हो जाती है। पूरी दुनिया में इंसानी दिमाग से तेज और बेहतर कोई चीज दौड़ ही नहीं सकती। घपलों-घोटालों के मामलों में तो खासकर। देखिए न, पेट्रोल पंप मालिक बड़ी तत्परता के साथ चिप-कांड करते रहे। न इसकी भनक ग्राहक को कभी लगने दी, न सरकार को। और जब चिप का राज खुला तो ऐसे-ऐसे किस्से सामने आए कि दांतों तले उंगुली भी दबा लो तो भी उंगुली को कोई फरक न पड़े।

चिप बनाने वालों ने कभी सपने में भी न सोचा होगा कि एक नन्हा-सा आइटम इतना बड़ा कांड कर सकता है। डाइरेक्ट दिल पर न लीजिएगा लेकिन प्रधानमंत्रीजी के ‘डिजिटल’ और ‘न्यू इंडिया’ के सपने को ढंग से ऊंचाईयों पर ये लोग ही ले जा रहे हैं। इंसानी दिमाग इतने फितुरों से भरा पड़ा है कि कब कहां क्या खेल खेल जाए कुछ नहीं पाता। कोड पूछकर बैंक खाते से रुपये साफ करने के किस्से तो अब चोरी-चकारियों की तरह आम हो चले हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो जब फ्रॉड द्वारा किसी बंदे के लुटने की खबर अखबार में न छपती हो। ठग-विद्या में इंसानी खोपड़ी महारत हासिल कर चुकी है। महारत।

आलम यह है कि यहां जिसे ‘ठलुआ’ समझो वो एक दिन बड़ा कांड करने वाला निकलता है। उसके कांड के किस्से जब अखबारों में छपते हैं, तब कहीं जाकर यह एहसास होता है कि दिमाग का असल इस्तेमाल तो ठलुए ही कर रहे हैं। चिप कांड भी कुछ-कुछ ऐसा ही है। सारा खेल खेल लिए जाने के बाद सरकार और अधिकारी नींद से जाग रहे हैं। वाह!

आगे चिप कांड वालों का तेल पुलिस या प्रशासन कैसे निकालेंगे यह बाद की बात रही फिलहाल तो उनकी खोपड़ी की चपलता पर रश्क कीजिए और अपनी कटी जेबों पर आंसू बहाइए।

1 टिप्पणी:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’अफवाहों के मकड़जाल में न फँसें, ब्लॉग बुलेटिन पढ़ें’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...