गुरुवार, 4 मई 2017

बाहुबली सेंसेक्स

आज जिधर भी निगाह उठाकर देख लीजिए, सबसे अधिक चर्चे कटप्पा के बाहुबली को मारने के ही मिलेंगे। हालांकि बाहुबली-2 सिनेमा घरों तक पहुंच चुकी है। लोगों ने देख भी ली है। लोग देख भी रहे हैं। किंतु यह सवाल अब भी वहीं का वहीं है कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? लुत्फ देखिए, बाहुबली मरा फिल्म में है, ‘चिंतित’ पूरा समाज है।

लेकिन कटप्पा-बाहुबली के इस रहस्यमयी द्वंद्व बीच एक बेमिसाल खबर ऐसी भी रही जिस पर किसी का ध्यान ‘न’ के बराबर ही गया। अभी चंद रोज पहले ही हमारा सेंसेक्स तीस हजारी हुआ। दलाल पथ ‘झूम’ उठा। अर्थव्यवस्था को ‘बूस्ट-अप’ मिला। व्यापार चैनलों पर ‘उत्सव’ टाइप माहौल रहा। निवेशकों के दिल अपार खुशियों से गद-गद हो गए। किंतु समाज और सोशल मीडिया सेंसेक्स की इस ‘आला उपलब्धि’ को यों ‘इग्नोर’ किए रहा जैसे- वाम सोच वाले राष्ट्रवादियों को किए रहते हैं। जिस लोकतांत्रिक और समावेशी व्यवस्था पर अक्सर हम लंबे-चौड़े लेक्चर देते हैं, सेंसेक्स के संदर्भ में बहुत ही ‘उदासीनता’ का माहौल रहा।

सेंसेक्स का तीस हजारी होना कोई छोटी-मोटी खबर या उपलब्धि नहीं। यहां तक पहुंचने में सेंसेक्स ने न जाने कितने आड़े-तिरछे पड़ावों को पार किया। कितने ही लोगों की जली-कटी सुनी। मंदड़ियों के घातक नक्कों को सीधे जिगर पर झेला। कितने ही भीषण करेक्शनों की मार झेली, फिर-फिर साहस के साथ उठ खड़ा हुआ। किंतु हमारे समाज ने उसकी तीस हजारी कामयाबी पर ‘लड्डू’ खिलाना तो छोड़िए उसे ‘बधाईयां’ तक न दीं।

समाज की सेंसेक्स के प्रति इस ‘एग्नोरेंस’ से मैं बेहद ‘आहत’ हूं। हर उस व्यक्ति की ‘कड़ी निंदा’ करता हूं जिसने सेंसेक्स को यों ‘उपेक्षित’ रख छोड़ा।

प्रायः मैंने देखा-सुना है कि लोग सेंसेक्स को ‘गुलाबी अर्थव्यवस्था’ का प्रतीक मानते हैं। कहते हैं, सेंसेक्स एलिट वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है वनिस्पत निम्न या मध्य वर्ग के। लोगों की सेंसेक्स के प्रति ये धारणा बहुत गलत है। सेंसेक्स हमारी अर्थव्यवस्था का ‘टर्निंग प्वाइंट’ है। सेंसेक्स बढ़ता है तो देश की इकॉनोमी में सुधार होता है। जीडीपी में निखार आता है। दूसरे मुल्कों के बीच देश की आन-वान-शान बढ़ती है। भारत कृषि-प्रधान मुल्क होने के साथ सेंसेक्स-प्रधान भी है, न भूलें। तीस हजारी होने के बाद से तो उसकी जिम्मेदारियां और भी बढ़ जाती हैं।

सबसे खास बात। सेंसेक्स ने कभी किसी का ‘अहित’ नहीं चाहा। हां, ज्यादा मुनाफा कमाने के लालच में लोग खुद ही अपना अहित कर बैठे तो उसे लिए भला सेंसेक्स क्यों दोषी हो? सेंसेक्स ने कभी किसी निवेशक से सट्टा करने को नहीं कहा। निवेशक अगर खुद ही सट्टा करने लग जाए तो भला सेंसेक्स क्या करे? देखो जी, सेंसेक्स तो समंदर है, यहां जितना डालेंगे उतना उसमें समाता चला जाएगा। अपनी चादर के अनुसार पैर तो आपको फैलाने हैं।

मतलबपरस्ती हम पर इतना हावी रहती है कि हम अपनों को तो जीत या कामयाबी की बधाईयां दिन-रात देते रहते हैं किंतु सेंसेक्स के एचीवमेंट पर मौन साधे हुए हैं। कटप्पा-बहुबली-आइपीएल की खुमारी जरा बाहर निकलिए हुजूर और सेंसेक्स को उसके तीस हजारी होने की शुभकामनाएं दीजिए ताकि उसे भी लगे कि लोग उसे भी ‘प्यार’ करते हैं।

1 टिप्पणी:

अरविन्दनाभ शुक्ल ने कहा…

बढ़िया है| इसे भी देखें -
http://arvindanabha.blogspot.in/2015/10/blog-post_8.html