बुधवार, 3 मई 2017

अब दिमाग से सोचना बंद

जब से अखबार में खबर पढ़ी है कि फेसबुक ‘ब्रेन सेंसिंग तकनीक’ पर काम कर रहा है। मतलब, हमारा दिमाग जो सोचेगा, वही हमारी फेसबुक वॉल पर उतरता चला जाएगा। तब से मैंने दिमाग से सोचना ही बंद कर दिया है! दिमाग को खोपड़ी से अलग कर एक कोठरी में ताला-बंद कर दिया है। न सांप होगा, न लाठी टूटेगी।

दिमाग है कुछ भी सोच सकता है। किसी का कोई जोर थोड़े न रहता है उस पर। पता चला फेसबुक खोले बैठा हूं, आ गई दिमाग में कोई ऐसी-वैसी बात, तुरंत उतर गई मेरी फेसबुक वॉल पर। तब सोच सकते हैं क्या होगा मेरा? ऐसी-वैसी बात पर कब तक किस-किस को यह सफाई देता फिरूंगा कि इस सोच के लिए मैं नहीं दिमाग दोषी है। कौन मानेगा भला?

यों, फेसबुक पर बवाल पहले ही क्या कम हैं, जो अब यह ब्रेन सेंसिंग तकनीक गजब ढहाएगी। न जाने जुकरबर्ग के भेजे में कैसी-कैसी वाहियात तकनीकें घर करती रहती हैं। पहले ‘डिस्लाइक’ के बटन को लेकर अच्छा-खासा रायता फैला था। यहां तो ‘लाइक’ न देने पर लोग राशन-पानी लेकर सिर पर सवार हो लेते हैं। कहीं अगर डिस्लाइक का बटन आ जाता तो खुद जाने क्या-क्या, कैसे-कैसे हंगामें कट रहे होते फेसबुक के प्लेटफॉर्म पर।

चलो बोलकर लिखने वाला स्टेटस तो समझ आता है, जिसे बाद में हम अपने अनुसार एडिट भी कर सकते हैं। किंतु ब्रेन सेंसिंग तकनीक तो पूरी बावल-ए-जान है। क्या जुकरबर्ग को मालूम नहीं कि मनुष्य दिल से कहीं ज्यादा अपने दिमाग का गुलाम है। दिमाग अच्छा भी सोच सकता है। बुरा भी। यों भी, हर किसी का दिमाग न ओशो की तरह गहराई लिए होता है, न कबीर की तरह सच्चाई लिए। कुछ के दिमाग तो शक्ति कपूर से भी कहीं अधिक अश्लीलताएं लिए होते हैं। उनका क्या होगा?

दिमाग कोई बच्चा थोड़े है कि आंखें दिखाईं और मान गया। दिमाग प्रत्येक सोच के बंधन से मुक्त होता है। चाहे तो शोध करवा के देख लीजिए, मनुष्य के दिमाग में कायदे की बातें कम, बे-कायदे की ही अधिक आती हैं। ये सब फेसबुक पर सीधा जब आने लग जाएगा फिर तो जाने कितनों को लेने के देने पड़ जाएंगे।

जुकरबर्ग तुम स्वयं एक पति हो। जरा उन लाखों पतियों पर तो रहम फरमाओ जो दिन में कितनी ही दफा अपनी पत्नी के अतिरिक्त अपनी पड़ोसन, अपने ऑफिस की कॉलिग, अपनी पक्की दोस्ती आदि-इत्यादि के बार में दिमाग में जाने क्या-क्या सोच लेते हैं। उनके दिमाग की वो सोच कहीं उनके फेसबुक स्टेटस पर जाहिर होने लग गई और उनकी पत्नियों ने पढ़ ली फिर खुद ही अनुमान लगा सकते हो, उन बेचारे पतियों का क्या हश्र होगा। कहीं के नहीं रहेंगे वे। अपने दिमाग का पाप भुगतेंगे वे बेचारे। यह ब्रेन सेंसिंग तकनीक तो उन पतियों के लिए किसी ‘अभिशाप’ से कम नहीं प्यारे जुकरबर्ग। क्यों हम पतियों की बसी-बसाई दुनिया को अपनी बेतुकी तकनीक के बल पर ऊजाड़ देना चाहते हो।


मेरे विचार में न केवल जुकरबर्ग बल्कि फेसबुक को भी अपनी ब्रेन सेंसिंग तकनीक पर पुर्नविचार जरूर करना चाहिए। या फिर पतियों को ही फेसबुक से अपना नाता तोड़ लेना चाहिए। अपने दिमाग पर भला किसका जोर चला है आज तक।

1 टिप्पणी:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’देश के दुश्मन - बाहर भी, भीतर भी : ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...