शनिवार, 20 मई 2017

व्यंग्य और क्लीवेज

जितना पसंद मुझे व्यंग्य लिखना है, उतना ही क्लीवेज देखना भी। कभी-कभी तो मुझे व्यंग्य और क्लीवेज एक-दूसरे के पूरक नजर आते हैं। उत्मुक्तता और उत्तेजना दोनों में एक समान होती है। जैसे- व्यंग्यकार को व्यंग्य लिखे बिना चैन नहीं पड़ता, वैसे ही हीरोईनों को क्लीवेज दिखाए (अपवादों को जाने दें) ‘संतुष्टि’ नहीं मिलती। फिल्मों में क्लीवेज दिखाना कितना कहानी की डिमांड होती है और कितना फसाना यह तो मैं नहीं जानता मगर हां ‘शो-ऑफ’ के लायक अगर कुछ है तो देखने-दिखाने में क्या हर्ज? यह तो निर्भर सामने वाले की ‘मानसिकता’ पर करता है कि वो क्लीवेज को ‘जस्ट एंटरटेनमेंट’ एन्जवॉय करता है या फिर सभ्यता-संस्कृति के मूल्यों पर खतरा।

अक्सर हैरानी होती है मुझे कि इतना आधुनिक और डिजिटल होते जाने के बाद भी हमें क्लीवेज पर बात या चर्चा करना बड़ा भद्दा टाइप लगता है। मानो कोई पाप-शाप कर रहे हों। किसी देसी-विदेशी हीरोईन की क्लीवेज को देखते ही जबान से ‘वाह! क्या कमाल क्लीवेज है’ अगर निकल जाए तो अगला इतनी ‘असभ्य नजरों’ से हमें देखता है मानो हम उसकी शर्ट के बटन खोलने की हिमाकत कर रहे हों। अरे भाई अगर कोई सुंदर क्लीवेज नजर आई और तारीफ कर दी तो इसमें इतना बिफर पड़ने की क्या जरूरत है? अमां, जब खूबसूरत चेहरे की तारीफ की जा सकती है तो मदमस्त क्लीवेज की क्यों नहीं? क्या क्लीवेज इंसान के शरीर से बाहर का पार्ट होती है?

ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब हीरोईन दीपिका पादुकोण ने लोगों की यह कहकर कि ‘मेरी क्लीवेज, मेरी मर्जी’ कैसे बोलती बंद कर दी थी। दीपिका को अपनी क्लीवेज पर गर्व है तो उस गर्व की तारीफ करने में क्या जाता है? तारीफें इंसान को हरदम कुछ नया करने के लिए प्रेरित करती हैं।

क्लीवेज की एक झलक ही इंसान को इतना ‘तृप्ति’ कर सकती है, जितना कि संपूर्ण देह-दर्शन नहीं। उसी प्रकार, व्यंग्य के भीतर छिपे छोटे-गहरे पंच भी एक प्रकार से व्यंग्य की क्लीवेज ही होते हैं। जो काम पूरा व्यंग्य नहीं कर सकता वो पंच कर जाते हैं। वनलाइनर इन्हीं पंच को और ग्लैमरस बनाने के काम आते हैं। व्यंग्य का बाहरी और भीतरी ग्लैमर पंच और वनलाइनर से ही तो निखरता-संवरता है। व्यंग्यकार के पास अगर अपने व्यंग्य के ग्लैमर को साधने का हुनर है फिर तो बल्ले-बल्ले...।

व्यंग्य में क्लीवेज का जिक्र हालांकि शुचितावादियों को अटपटा टाइप जरूर लगेगा, लगने दो। जब तक लगेगा नहीं तब तक वे अपने परंपरावादी दायरों से बाहर निकलेंगे नहीं। सच तो यही है कि बिना पंच (क्लीवेज) का इस्तेमाल किए व्यंग्य रचा ही नहीं सकता। पंच और वनलाइनर का मिक्सचर ही व्यंग्य को ‘हॉट’ बनाता है। एंवई, ‘ठंडे व्यंग्य’ लिखने का अब कोई मतलब न रहा प्यारे। व्यंग्य का जमाना बहुत बदल गया है। ‘माइक्रो-व्यंग्य’ ही आजकल चलन में है। कम शब्द, ज्यादा आनंद।


मेरी तो कोशिश यही रहती है कि मैं अपने हर व्यंग्य में क्लीवेज (पंच) की खूबसूरती बनाए रखूं। ताकि पढ़ने वाले को ‘रस’ मिले। जरूरी है, पढ़ने और लिखने वाले के दिल का जवान रहना, तभी तो व्यंग्य और क्लीवेज की मस्तियां तन में आनंद बरकरार रखेंगी।

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