मंगलवार, 2 मई 2017

ऐसा हारे कि चारों खाने चित्त

वे हार गए। बहुत ही बुरी तरह से हारे। ऐसा हारे की चारों खाने चित्त हुए पड़े हैं। ईमानदारी धरा पर धरी की धरी रह गई। न केवल टोपियां उछलीं बल्कि झाड़ू तक जब्त हो गई। ये सब उनकी आंखों के सामने होता रहा। अफसोस, न वे ईंट से ईंट ही बजा पाए न ईवीएम के कथित झूठ को जनता के सामने ला पाए। अति-अहंकार के मद में डूबा उनका सत्ता का गुरूर जनता ने क्षण भर में मिट्टी में मिला दिया।

इसीलिए तो कहा गया है कि राजनीति या सत्ता के प्लेटफॉर्म पर सबसे जीता जा सकता है किंतु जनता से नहीं। जनता हमेशा ही माई-बाप होती है। कब किसको किस तरह से धूल चटवा दे कुछ नहीं पता।

ईमानदारी को संभाल पना हर किसी के बूते का नहीं होता। मैंने बड़े अच्छों-अच्छों को अपनी कथित ईमानदारियों से डोलते हुए देखा है। उनकी ईमानदारियां हाथी के दांत सरीखी होती हैं- बाहर से दिखाने की कुछ, अंदर से खाने की कुछ। ईमानदार की जीभ पर एक दफा जब सत्ता का स्वाद चढ़ जाता है न तब वो खुद के प्रति भी निष्पक्ष नहीं रह पाता। ऐंठ और अहंकार की खुमारी उसे दीवाना बनाए रखती है। यों, दीवानगी बुरी बात नहीं लेकिन जब आपे से बाहर हो जाए तो खतरा-ए-जान है।

कमाल देखिए, इतना हारने के बाद उनकी ऐंठ अभी भी गई नहीं। ईवीएम की खलनायकी अब भी उनके दिमाग में चलहकदमी कर रही है। हारने वाला अपनी हार को कहीं न कहीं तो डिफेंड करेगा ही न। सो, वे भी कर रहे हैं। मगर इससे अब हासिल कुछ नहीं होना। हां, पछतावा होता तो बात समझ में भी आती। लेकिन, यहां तो पछतावे का कोई सीन ही दूर-दूर तक नजर नहीं आता।

उन्हें आड़े-तिरछे बयान देते वक्त इतिहास के पन्ने अवश्य ही पलट लेने चाहिए थे। ऐसे तमाम राजा-महाराजा, तोपची-धुरंधर आए और चले गए। जिन्होंने कभी दूसरों की ईंट से ईंट बजाने की कोशिशें की अंततः वहीं ईंटें खुद उन्हीं के जा लगीं। ईंटों में कोई समझ-बूझ तो होती नहीं। जहां जिस दिशा में फेंक दी जाती हैं, वहीं जा लगती हैं। राजनीति हो या समान्य जीवन जैसे को तैसा होते देर ही कितनी लगती है।

राजनीति एक ऐसी शै है, जहां ईमानदारी से कहीं ज्यादा जरूरी धैर्य और जबान होती है। जिसके पास न धैर्य है न जबान, उसकी गाड़ी राजनीति में ज्यादा लंबी चल नहीं पाती। जनता एक दिन उसे खारिज कर ही देती है। जैसे- उन्हें कर दिया गया। अब न वे घर के रहे, न घाट के। मगर उन्हें ये समझ में आए तब न।

लुत्फ देखिए, ईंटें भी वहीं हैं। ईवीएम भी वहीं हैं। अगर कुछ नहीं है तो वे। क्योंकि उनका अहंकार उनकी लुटिया डुबो चुका है।

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