गुरुवार, 18 मई 2017

अपने ही फैलाए वायरस से डरता इंसान

सच पूछो तो मुझे वायरस का डर नहीं। हंसी तो मुझे इस बात पर आ रही है कि इंसान अपने ही फैलाए वायरस से खुद डर रहा है। जगह-जगह चेतावनियां देता फिर रहा है कि रेन्समवेयर वायरस से बच कर रहें। ऐसी-वैसी कोई फाइल या इ-मेल न खोलें। जरा-कुछ खतरा दिखे तो तुरंत अपना कंप्यूटर बंद कर दें। हां, फिरौती के लिए मांगी गई रकम तो बिल्कुल भी न दें।

अचानक से इतना डर, इतना भय क्यों और किसलिए? रेन्समवेयर वायरस भगवान का नहीं इंसानों का बनाया एवं फैलाया हुआ है। इसका उद्देश्य भगवान को नहीं केवल इंसानों को नुकसान पहुंचाना है। उंगुली को टेढ़ा कर पैसा वसूलना है। यह सब तिकड़मबाजियां तो इंसान ने ही इंसान को सिखाई-पढ़ाई-बताई हैं। फिर इनसे क्या घबराना?

इंसान खुद को चाहे कितना ही ‘बलशाली’ प्राणी क्यों न कह ले लेकिन होता वो बहुत ‘डरपोक’ टाइप है। खुल्ला कहूं तो जानवरों से भी ज्यादा डरपोक। गीदड़-भभकी का जानवर फिर भी मुकाबला कर लेते हैं किंतु इंसान तो तुरंत इतना दूर भाग जाता है लंगूर को देखकर बंदर।

बताइए, एक वायरस से पूरी दुनिया डरी पड़ी है। कमाल देखिए, इतना आधुनिक और टेक्नो-फ्रैंडली होने के बावजूद वायरस का कोई तोड़ उसके पास नहीं। बैंक, एटीएम, मेल आदि-इत्यादि बंद करवा रखे हैं, कहीं रेन्समवेयर सबकी लंका न लगा दे। हालांकि कई जगह लगा भी चुका है। तो भी क्या...?

अमां, यह कोई पहला या अनोखा वायरस नहीं जो इतना विकट होकर फैला है। इससे पहले भी कई तरह के वायरस हमारे सिस्टम को तबाह कर चुके हैं। वे सब भी इंसानों के ही फैलाए हुए थे। ब्राह्मांड से नहीं उतरे थे। किन्हीं देवताओं या राक्षसों ने उन्हें नहीं बनाया था। तिस पर भी हम हार गए। अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार कर पड़ोसी से कह रहे हैं- भाई, जरा दवा लगा दे। दवा लगते ही थोड़ी-बहुत राहत जैसे ही मिलती है इंसान अपने दर्द को भूलाकर दूसरे किसी बड़े हमले का इंतजार करता हुआ मिलता है। दोबारा हमला होते ही फिर वही रटी-रटाई चिंताएं-सावधानियां हवाओं में दौड़ने लगती हैं।

इन किस्म-किस्म के वायरसों पर अधिक चिंता करने की जरूरत नहीं। ये होते रहे हैं। होते रहेंगे। जिम्मेवार ठहरा कर दोष चाहे किसी भी देश को दे लीजिए मगर इंसान अपनी ‘काली फितरत’ को कभी नहीं छोड़ने वाला। निरंतर आधुनिक या डिजिटल होकर वो किसी न किसी तरीके से खुद को ही नुकान पहुंचा रहा है। कभी वायरस फैला कर। कभी वेबसाइट हैक कर। कभी एटीएम से बेलेंस उड़ा कर। कभी डाटा करप्ट कर।

लुत्फ तो यह है कि इंसान ही इंसान के इजाद किए गए तोड़ को नहीं भेद पा रहा। तमाम सवाधानियों-चिंताओं के बीच खुद भी उलझा रहता है। दूसरों को भी उलझाए रखता है।

आज नहीं तो कल रेन्समवेयर का खतरा टल ही जाएगा। लेकिन इस बात का क्या भरोसा कि अगला फैलने वाला वायरस इससे भी ज्यादा स्ट्रौंग न होगा?

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