बुधवार, 17 मई 2017

काहे के गरीब मुल्क

वो तो एंवई लोग छोड़ते रहते हैं कि इंडिया गरीब मुल्क है। जबकि ऐसा कतई नहीं है। इंडिया राजा-महाराजाओं के जमाने में भी ‘सोने की चिड़िया’ था, अब भी है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि अभी सोने की चिड़िया को चंद बड़े लोगों ने हैक कर रखा है। पर कोई नहीं…। कभी-कभी छोटे लोग भी सोने की चिड़िया का लुत्फ अपनी सुविधानुसार ले लेते हैं। किंतु गरीब वे भी नहीं है।

आम लाइफ में किसी आम आदमी को गरीब कह दो तो अगला यों ‘भड़क’ उठता है मानो कोई ‘अश्लील’ टाइप गाली दे डाली हो। गरीब शब्द और गरीबी की परिभाषाएं किताबों या फिर वाम विचारकों के मुंह से सुनने में ही अच्छी लगती हैं। जबकि असल जिंदगी में गरीब तो वे भी नहीं होते।

मैं तो यह कहता हूं कि हम अपने को गरीब माने ही क्यों? जिस देश में बाहुबली-2 एक हजार करोड़ कमा और जस्टिन बीबर का शो सौ करोड़ कूट ले जाए भला वहां की जनता गरीब कैसे हो सकती है? वे तो गरीब शब्द के आस-पास भी कहीं नहीं ठहरते।

सुना कि तीन से लेकर पचहत्तर हजार रुपये तक का टिकट बिका था बीबर के लाइव शो का। क्या सेलिब्रिटी, क्या नॉन-सेलिब्रिटी हर वर्ग का बंदा-बंदी बीबर को देखने-सुनने को बेताब था। विदेशियों के प्रति हमारी बेताबी का आलम तो पूछिए ही मत। किसी ट्यूरिस्ट प्लेस या फिर जहां विदेशी लोग इकठ्ठा हों आम भारतीय जब तलक उनके साथ एकाध फोटू या सेल्फी नहीं ले लेता, उसके हलक से रोटी का गस्सा ही नहीं उतरता। तो बीबर के शो में अगर भारतीयों में पचहत्तर हजार का टिकट खरीद भी लिया तो कौन-सा गुनाह कर दिया?

हां, यह बात अलग है कि बीबर केवल ‘लिप सिंग’ कर हमें ‘मूर्ख’ बनाकर चला गया पर विदेशियों से मूर्ख बनने में हमें ज्यादा आनंद आता है न। अच्छा, कुछ होड़ भी होती है हममें कि अगर सामने वाला बाहुबली या बीबर देखने जा रहा है तो अगला घर पर कैसे रह सकता है। नोट को जेब में पड़े-पड़े सड़ना नहीं चाहिए। बाहुबली या बीबर के बहाने बढ़ने वाली आय से ही तो पता चलता है कि हम अब गरीब टाइप मुल्क नहीं रहे।

सरकार की कोशिश भी यही है कि न्यू इंडिया का हर बाशिंदा टेक्निकली-इकॉनोमिकली संपन्न हो। डिजिटल और कैशलेस होते इंडिया की तरफ बढ़ते हमारे कदम गरीबी से मुक्ति की ही तो पहल है। देश तो नोटबंदी के वक्त भी गरीब नहीं हुआ था। कहीं न कहीं से किसी न किसी के पास से लाखों-करोड़ों रुपये मिलने की खबरें आ ही जाती थीं। जिन्हें नोटबंदी के दिनों में लाइनों में खड़े होने से दिक्कत थी वे बाहुबली और बीबर के लिए बिना किसी तकलीफ खड़े रहे। ये है न्यू इंडिया।

वाम विचारकों को अब अपना पुराना राग छोड़ देना चाहिए। उनका रात-दिन गरीबी-गरीबी चिल्लाना अब काम नहीं आना। मुल्क को गरीब कहने से पहले एक दफा उन्हें बाहुबली-2 और बीबर के आंकड़ों को भी देख ले ना चाहिए।

बाहुबली-2 की अपार कामयाबी के बाद से मैंने तो खुद को गरीब कहना-मानना ही बंद कर दिया है। मैं तो फख्र के साथ कहता हूं कि मैं उस मुल्क का बाशिंदा हूं जहां की जनता ने बाहुबली-2 को एक हजार करोड़ की कमाई करवाई है। फिर काहे के गरीब मुल्क?

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