सोमवार, 1 मई 2017

हवाई चप्पल के प्रति मेरा प्रेम

मुझे चप्पलों- विशेषकर ‘हवाई चप्पल’- से बेहद लगाव है। हवाई चप्पल न केवल मेरी जिंदगी बल्कि मेरे लेखन का भी ‘आईना’ है। एक ऐसा आईना जिसमें बैठे-ठाले मैं अपनी सूरत निहारता रहता हूं। जितना ‘सुकून’ मुझे हवाई चप्पल पहनकर मिलता है, उतना ब्रांडेड जूते पहनकर भी नहीं।

हवाई चप्पल में गजब की आत्मीयता होती है। न इसमें वर्ग भेद है, न वर्ण भेद। धर्मनिरपेक्षता की सबसे मजबूत निशानी हवाई चप्पल ही है। हवाई चप्पल के पैरों में आते ही सिर के ऊपर से ‘एलिटता का भाव’ तुरंत ‘उड़नछू’ हो लेता है। इसका जमीनी एहसास अमीर को भी उतना ही मुतमइंन किए रहता है जितना गरीब को। मैं तो अक्सर ही हवाई चप्पल पहनकर बड़ी-बड़ी पार्टियों में यों ही चला जाता हूं। मजाल है, वहां मौजूद किसी भी शख्स ने मेरी चप्पलों के स्टेटस पर सवाल उठाया हो। बल्कि कई दफा तो लोगों ने मुझसे डिमांड की है कि मैं उन्हें भी हवाई चप्पल लाकर दूं। क्या है की वे अब भीषण एलिटता की निशानी जूतों को पहन-पहनकर उकता चुके हैं।

दूसरों की जाने दीजिए, पिछले दिनों स्वयं प्रधानमंत्रीजी ने हवाई चप्पल की वकालत यह कहकर की थी कि मैं चाहता हूं, हवाई चप्पल पहनने वाला भी हवाई जहाज में सफर करे। बिल्कुल करे। क्या हर्ज है। बल्कि मैं तो कहता हूं, हवाई जहाज की ‘शान’ सिर्फ और सिर्फ हवाई चप्पल पहनने वाले की बढ़ा सकते हैं। क्योंकि जितना ‘सादगी’ का भाव उनके भीतर रहता है, उतना ब्रांडेड जूते पहनने वाले के पास भी नहीं।

ब्रांडेड जूते के मुकाबले हवाई चप्पल खासा हल्की होती है। इससे हवाई जहाज पर पड़ने वाला ‘अतिरिक्त जूतों का भार’ कम होगा। हवाई जहाज का तल खुलकर सांस ले सकेगा। पैर बार-बार जूते पहनने-उतारने की कवायद से मुक्ति पा सकेंगे। मोजों के बंधन से मुक्ति मिलेगी। पैरों को खुलापन महसूस होने के साथ-साथ खुली हवा में रहने का भी आनंद मिलेगा। कितना हसीन नजारा होगा कि एक ही हवाई जहाज में सभी यात्रियों के पैरों में देसी हवाई चप्पल इठला रही होगी।

चूंकि मैं रैगूलर हवाई चप्पल पहनने का आदि हूं। इस बाबत यह बात गारंटी के साथ कह सकता हूं कि जितना ‘कंफर्ट’ हवाई चप्पल में है उतना किसी में नहीं। हवाई चप्पल अपने स्वभाव में जितनी चंचल होती है उतनी ही चपल भी। स्लिम इतनी की जीरो फिगर वाले भी देखकर जल उठें। बताने वाले बताते हैं कि हवाई चप्पल की मार का तोड़ बड़े-बड़े पहलवानों के पास भी नहीं।
हवाई चप्पल का अटूट प्रेमी होने के नाते मुझे अफसोस है कि पिछले दिनों बेचारी चप्पल को काफी ‘बेइज्जती’ का सामना करना पड़ा। वो भी एक बदमिजाज मंत्रीजी के रूखे व्यवहार के कारण। मंत्रीजी ने तो चप्पल को ‘खलनायक’ बना ही डाला था, वो तो प्रधानमंत्रीजी ने हवाई चप्पल की अहमियत समझाकर इसकी ‘इज्जत’ को बचा लिया।

चाहे आप कितनी ही ऊंची से ऊंची कंपनी के ब्रांडेड जूते-सैंडल पहन लें लेकिन जो बात हवाई चप्पल में है वो किसी में नहीं। हवाई चप्पल हमारे पैरों की शान है। इसका स्थान तो कोई ले ही नहीं सकता।


अभी तो मैं पार्टियों या दफ्तर में ही हवाई चप्पल पहनकर जाया करता हूं। अब से मैं न केवल हवाई सफर बल्कि साहित्यिक गोष्ठियों-आयोजनों में भी हवाई चप्पल ही पहनकर जाया करूंगा। वचन देता हूं, हवाई चप्पल की ‘रेलिवेंसी’ को कभी मरने नहीं दूंगा। प्योर देसीपन का सुख हवाई चप्पल में ही है।

1 टिप्पणी:

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

हाँ,हवाई चप्पल समाज में समरसता भी तो स्थापित करेती है.