बुधवार, 8 मार्च 2017

छिपकली को बदनाम करने की साजिश

एंवई सब मिलकर बिचारी छिपकली को ‘बदनाम’ करे पड़े हैं। इसमें छिपकली का क्या ‘दोष’? छिपकली को क्या मालूम कि वो एक ऊंची कंपनी के फ्रेंच फ्राइज में ‘शहादत’ देने जा रही है। छिपकली अपने नेचर में कतई ‘स्वतंत्र’ होती है। बेरोक-टोक कहीं भी आ-जा सकती है। कहीं भी गिर या निकल सकती है। वो भला इंसान को क्या डराएगी, इंसान खुद उसका नाम सुनते ही पसीने-पसीने हो जाता है।

सोशल मीडिया पर तो छिपकली को ‘वायरल’ कर दिया गया है। बतौर ‘खलनायक’ छिपकली को प्रस्तुत किया जा रहा है। कहीं यह भी लिखा देखा था कि फ्रेंच फ्राइज में छिपकली मिलने से पूरा परिवार ‘दहशत’ में हैं! लो कल्लो बात। दहशत में आने का क्या मतलब? मरी छिपकली ने परिवार वालों को कोई ‘धमकी’ थोड़े न दी थी, जो परिवार दहशत में आ गया। एक तो बिचारी को जान से हाथ धोना पड़ा, ऊपर से बदनामी मिली सो अलग।

सारी लगती तो उस कंपनी के शेफ की है, जिसने बिना देखे-जाने फ्रेंच फ्राइज के साथ छिपकली को भी तल दिया। शेफ मासूम छिपकली की हत्या का दोष है। मेरे विचार में तो इस मामले की सीबीआइ जांच बनती है। कित्ती तकलीफ हुई होगी बिचारी छिपकली को तले जाते वक्त। लेकिन हम इंसानों को छिपकली के दर्द-ओ-गम से क्या वास्ता, हम तो उसे सोशल मीडिया पर वायरल करने में व्यस्त हैं।

दरअसल, छिपकली के प्रति हमारी धारणाएं काफी गलत हैं। नब्बे परसेंट लोग उसे ‘घृणा’ की नजर से ही देखते हैं। बाथरुम से लेकर बैडरुम तक में उसकी आवाजाही पर गाहे-बगाहे रोक-टोक लगाते रहते हैं। छिपकली को देख यों चिल्लाते हैं मानो घर के भीतर कोई शेर-चीता घुस आया हो। जबकि छिपकली मूलतः बेहद शांत जीव है। न कभी किसी से कुछ कहती है, न किसी को डराती-धमकाती। शांत-सी दीवार पर चिपकी रहती है। पूर्णता धर्मनिरपेक्ष होती है। जातिवाद में रत्तीभर यकीन नहीं रखती।

मैंने छिपकली को कभी किसी से खाना मांगते नहीं देखा। अपना खाना वो स्वयं अपनी मेहनत के बल पर जुटाती है। फिर भी बदनाम है। घर-परिवारों के बीच छिपकली की हैसियत कॉकरोज टाइप ही है। न जाने हम लोग छिपकली और कॉकरोज से इत्ता भय क्यों खाते हैं? जबकि सच तो यह है कि इंसान से डरवाना और खतरनाक इस धरती पर कोई नहीं।

कुर्बान हुई छिपकली के प्रति मेरे मन में बेहद इज्जत है। बिना किसी कारण उसे काल के गाल में समा जाना पड़ा। कसूरवार था कोई, जिम्मेदार बिचारी छिपकली को ठहराया जा रहा है। मेरा सख्त मानना है कि छिपकली समुदाय को इस मौत (अन्याय) के खिलाफ जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन करना चाहिए। सरकार को नींद से जगाना चाहिए। आखिर ऐसे कब तलक छिपकलियां इंसानों के खाने में अपनी शहादत देती फिरेंगी? इत्ती बदनामियां भी ठीक नहीं छिपकली समुदाय के लिए।

साथ-साथ छिपकली समुदाय की तरफ से मेरी भी अपील है कि दोषी को सख्त से सख्त सजा मिले।

3 टिप्‍पणियां:

Yatin Pandit ने कहा…

छी
पक
ली ?

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बढ़िया।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’आओगे तो मारे जाओगे - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...