सोमवार, 6 मार्च 2017

मरने पर लाइक!

फेसबुक पर लाइक के मसले तगड़े हैं। आए-दिन अखबारों में छपने वाली रपटें बताती रही हैं कि लाइक की चाह में लोग ‘डिप्रेशन’ तक का शिकार होने लगे हैं। लोगों में अपने काम एवं नींद के प्रति इत्ता उत्साह देखने में न आता, जित्ता एक लाइक को लेकर रहता है। लाइक पाना मानो उनकी जिंदगी का अहम मकसद बन गया हो! यों भी, सोशल मीडिया में सबसे ज्यादा लाइक पाने वाले को ‘सम्मान’ और कम लाइक पाने वाले को ‘हिकारत’ भरी निगाहों से देखा जाता है। पार्टियों में भी लोग एक-दूसरे का हालचाल बाद में पहलेफेसबुक की फलां- फलां पोस्ट या फोटू पर मिले लाइक का हिसाब पूछते हैं।

लाइक की दीवानगी के बीच एक बात मैंने अनेकों बार नोट की है कि लोग किसी के मरने की खबर को भी लाइक करे बिना नहीं रह पाते। ऊपर से कमाल ये, फलां व्यक्ति के मरने की खबर देने वाला बंदा अगर अपने स्टेटस में यह भी लिख दे- कृपया, इस स्टेटस को लाइक न करें- तब भी लोग लाइक करे बिना नहीं मानते। बल्कि मैंने तो मरने की खबर पर ही 500-700 लाइक आते देखे हैं। वाह! क्या बात है- सोशल मीडिया में लोग मरने को खबर को भी उत्ता ही ‘पसंद’ करते हैं जित्ता किसी के ‘पैदा’ होने को!

अक्सर मुझे लगता है कि लाइक की चाह हमारे दिलो-दिमाग के सभी दरवाजे एकदम बंद करके रखती है। लाइक करने वाले को केवल लाइक पर चटका लगाने से मतलब होता है- फिर खबर चाहे कैसी भी क्यों न हो। बाकी चोट-फेंट, बुखार-दस्त आदि के स्टेटसों पर लाइक ठोकना आम बात है। शायद तब तलक रोटी हलक से नीचे न उतरती होगी, जब तलक बंदा या बंदी अपने बीमार होने की खबर फेसबुक पर पोस्ट न कर दे।

मरना धरती पर भले ही शोक-संवदेना की खबर माना जाता हो किंतु फेसबुक पर यह ‘लाइक का औजार’ है। अगला किसी के मरने की खबर यह समझकर पोस्ट करता होगा कि इस बहाने दस-पचास लोगों को पता चल जाएगा पर मरने की खबर को ही फेसबुकिए लाइक कर बैठेंगे, सोचिए क्या गुजरती होगी उसके दिल पर। यानी, सोशल मीडिया के लोग किसी के जाने पर प्रसन्न होते हैं, शायद इसीलिए लाइक पे लाइक ठोके जाते हैं।

मरने वाला चाहे स्वर्ग में जाए या नरक में यमराज की निगाह में ‘सम्मानित’ व्यक्ति ही होता होगा! भई, सम्मानित क्यों न होगा; आखिर इत्ते सारे लाइक पाने के बाद स्वर्ग या नरक में आया है। समस्त देवतागण उसका सम्मान फूल-मालाओं के साथ किया करते होंगे। मन ही मन खुद को ‘कोसते’ जरूर होंगे कि हाय! हमारे जमाने में फेसबुक क्यों न हुआ। मरने पर कुछ लाइक हमें भी मिल जाते।

सोशल मीडिया में संवदेनशीलता अब दूर की कौड़ी है। यहां समस्त हाव-भाव या तो लाइक से जुड़े होते हैं या कमेंट से। खुश हैं तो लाइक कीजिए। गम है तो लाइक कीजिए। बीमार हैं तो लाइक कीजिए। घूम-घाम रहे हैं तो लाइक कीजिए। मानो- पूरी दुनिया एक लाइक पर आनकर टिक गई है।

फेसबुक पर अगर हम ‘छींक’ या ‘खंखार’ भी दे तो भी मन में तमन्ना कुछ लाइकस पाने की ही रहती है। मैंने तो मात्र ‘हाय’ पर ही ढेरों लाइकस यहां पड़े देखे हैं।

तो प्यारे किसी के मरने की खबर पर यों संजीदा होनी की आवश्यकता नहीं बस ‘लाइक’ कीजिए और काम पर चलिए। फेसबुक की आवाम का यही दस्तुर है।

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