शुक्रवार, 31 मार्च 2017

सोशल मीडिया के मूर्ख

यों, दुनिया में मूर्खों की कमी नहीं। सबसे अधिक मूर्ख अब सोशल मीडिया पर ही पाए जाने लगे हैं। सोशल मीडिया पर पाए जाने वाले मूर्खों की अजब ही कहानियां है। ये मूर्ख यहां या तो एक-दूसरे से लड़ते-भिड़ते रहते हैं या फिर लाइक-कमेंट की आस में ‘दुबले’ होते रहते हैं। किसी का खुद पर न किसी और पर कोई जोर नहीं रहता। हर मूर्ख अपनी मूर्खता के साथ स्वतंत्र है।

चूंकि मैं स्वयं सोशल मीडिया का एक ‘मूर्ख’ हूं इस नाते मेरी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि मैं अपनी मूर्खता में कहीं कोई कमी नहीं आने दूं। अपनी मूर्खता को ‘रेलिवेंट’ बनाए रखने की खातिर मैं यहां हर वो हरकत करना पसंद करता हूं जो ‘वायरल’ बने। किसी भी बात या मुद्दे का वायरल होना सोशल मीडिया में सेलिब्रिटी टाइप होने की फीलिंग देता है। मूर्खताएं यहां बहुत तेजी से वायरल होती हैं। सीधा-साधा या बौद्धिक किस्म का ज्ञान अगर यहां दे रहे हैं तो आप नितांत फालतू हैं। आप पर कोई ध्यान नहीं देगा। हां, आप में अगर अपनी मूर्खताओं के दम पर दूसरे को अटरेक्ट करने का माआदा है तो आप हिट हैं। ऊल-जलूल मूर्खताओं की वजह से ही यहां फॉलोइंग बढ़ने में जरा देर नहीं लगती।

यहां किसी से कैसे भी भिड़ने के लिए आप स्वतंत्र हैं। भिड़ने के लिए इज्जत कोई मसला नहीं। अगर इज्जत की ही फिकर करनी है तो घर की चारदीवारी से बेहतर दूसरी कोई जगह नहीं। मैं तो जब से सोशल मीडिया पर आया हूं अपनी इज्जत को घर के एक कोने की खूंटी पर टांग दिया है। केवल मूर्खता को ही अपना हथियार बनाया हुआ है। आदत ऐसी पड़ चुकी है कि मूर्खता अब अपनी-सी लगती है। जिस दिन कोई मूर्खतापूर्ण स्टेटस न अपडेट कर लूं बात बनती ही नहीं।

कहने में शर्म कैसी कि सोशल मीडिया हम मूर्खों का ‘डिजिटल गहना’ है।

फिर भी, यहां कुछ ऐसे लोग हैं जो खुद को मूर्ख कहने से कतराते हैं। आग-बबूला हो उठते हैं। तमाम प्रकार की नैतिकताओं की दुहाईयां देने लग जाते हैं। लेकिन इससे होगा क्या? न लोग आपको मूर्ख कहना बंद करेंगे न मानना। एडजस्ट करके चलने में ही भलाई है। वरना खुदा मालिक।

न सिर्फ सोशल मीडिया बल्कि आम जिंदगी में भी मूर्खता का अपना एक चार्म है। मूर्खता बेफिकरी टाइप होती है। मूर्ख अपनी मूर्खताओं को ज्यादा से ज्यादा एंन्जॉय किया करते हैं। दुनिया भर की तमाम समस्याओं के बीच अगर कुछ पल के लिए हम मूर्ख हो भी लें तो क्या हर्ज है? मूर्खताओं के साथ जिंदगी ज्यादा हसीन लगती है। वरना, यों रोते रहने का क्या है, रोते रहिए। किसे फिकर?

सोशल मीडिया का प्लेटफॉर्म खुद को दिमागी तौर पर हल्का रखने के लिए है नाकि बौद्धिकता झाड़ने के लिए। बौद्धिकता के लिए यहां तमाम जगहें हैं। जरूरत से अधिक बौद्धिकता दिलो-दिमाग के लिए हानिकारक है। हां, मूर्खताओं में आनंद ही आनंद है।


इसीलिए मुझे सोशल मीडिया के मूर्ख पसंद हैं। मूर्खता का अपना मजा है। जरा एक दफा आप भी मूर्ख बनकर तो देखिए हुजूर।

3 टिप्‍पणियां:

विकास नैनवाल ने कहा…

बहुत खूब अंशु जी।

Venkatesh Yemlawar ने कहा…

शानदार।

Kavita Rawat ने कहा…

जहाँ आसानी से मूर्खता से काम बन जाय वहां बुद्धिमानी का कोई काम नहीं
बहुत खूब
आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं