मंगलवार, 21 मार्च 2017

शरारतें जरूरी हैं

मुझमें और शरारत में छत्तीस का आंकड़ा बचपन से रहा है। बताते हैं- जब मैं पैदा हुआ था तब गोदी में आने के बहाने मैंने नर्स को डाइरेक्ट तमाचा जड़ दिया था। बस तभी से मुझे शरारती टाइप बच्चा माना जाने लगा। बचपना गुजर जाने के बाद जवानी आ जाने पर भी मैंने अपनी शरारतों को नहीं छोड़ा। जैसे- चोली दामन के साथ रहा करती है, वैसे ही मेरी शरारतें भी मेरे साथ रहीं। बल्कि शादी हो जाने के बाद तो और ज्यादा बढ़ गईं।

किंतु पत्नी को मेरी शरारतों पर कतई गुस्सा नहीं आता। बल्कि वो तो खुश होती है कि उसे मुझ जैसा प्योर शरारती पति मिला।

मेरा निजी तौर पर मानना रहा है कि व्यक्ति को जीवन में थोड़ा-बहुत शरारती अवश्य होना ही चाहिए। बिना शरारतों के जीवन बड़ा बोरिंग और बोगस टाइप जान पड़ता है। ऐसी लाइफ के भी भला क्या मायने जहां शरारतें न हों। दिल को ताउम्र बच्चा ही बनाए रखना चाहिए ताकि वैचारिक या धार्मिक बड़प्पन हम पर हावी ही न हो। जरा-बहुत सीरियसनेस चलती है लेकिन ज्यादा लोड लेने का नहीं।

शरारतों का आलम यह है कि मौका मिलने पर अब भी मोहल्ले के बच्चों के साथ सड़क पर सौ का नोट डाल डोरी बांधकर खींचना या सड़क पर चलते-फिरते बंदे के पीछे भौपूं बजाना या गिल्ली-डंडा खेलते वक्त गिल्ली से पड़ोसियों की खिड़कियों के कांच तोड़ना या कत्ते की दुम में लड़ी बांधकर छोड़ना या भीषण गर्मी में बच्चों के साथ रामगंगा में डूबकी लगाकर उनके साथ खेलना नहीं भूलता। अमां, यही तो असली जिंदगी है। हम तो अपने बड़प्पन में अपना बचपना और शरारतें लगभग बिसरा ही चुके हैं। मगर मेरी हरदम कोशिश यही रहती है कि अपनी ऊल-जलूल शरारतें कभी न छोड़ू। चाहे कोई कुछ भी कहता रहे।

मिस्टर बीन से अक्सर मैं शरारतें करने की प्रेरणा लेता रहता हूं। उन्हें देखकर लगता है कि बंदा ऐसा ही होना चाहिए फुल-टू मस्ती और शरारतखोर। हर बात, हर एक्ट में शरारत। चाहे मिस्टर बीन हों या चार्ली चैप्लिन इनकी शरारतें हमें हर पल गुदगुदाती हैं। जिंदगी के औने-पौने गम या बोझ को कम कर जाती हैं। अगर शरारतें न हों तो बचपन से जवान तक का रास्ता बड़ी ही मुश्किल से कटे।

व्यक्ति अगर इतना ही शरारत-पसंद हो जाए तो फिर जात-बिरादरी, धर्म-संप्रदाय, ऊंच-नीच, काले-गोरे आदि के मसले चुटकियों में न निपट जाएं। नहीं क्या...?

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