शुक्रवार, 17 मार्च 2017

वामपंथी मित्र से एक मुलाकात

मेरे एक वामपंथी मित्र हैं। पेशे और स्वभाव दोनों में केवल वामपंथ को ही जीते हैं। वामपंथ के अतिरिक्त पूरी दुनिया उन्हें नश्वर और पूंजीवादी टाइप नजर आती है। भीतर से लेकर बाहर तक लाल वस्त्र पहनते हैं। पैरों में लाल चप्पल और सिर में लाल तेल लगाते हैं। खाने में या तो लाल टमाटर खाते हैं या फिर लाल मिर्च। लाल रंग के अलावा न तो वे किसी रंग को पहचानते हैं न महत्त्व देते।

निरंतर डिजिटल होते समय में आज भी हाथ से ही लेख लिखते हैं। हालांकि छपते-छपाते कहीं नहीं हैं लेकिन मन में जिद है कि एक दिन पूरी दुनिया को वामपंथ के रंग में रंगकर रहेंगे। हां, बताता चलूं, वामपंथी मित्र के बच्चे अमेरिका में सैटिलिड हैं। जब-तब अपने बच्चों से एप्पल के आइ-फोन पर बातें करते रहते हैं। मित्र के फेसबुक और टि्वटर एकाउंट भी हैं। लेकिन वहां भी उन्होंने अपनी दीवारें लाल रंग से पोत रखी हैं।

अभी चुनाव परिणाम आने के बाद वामपंथ मित्र सब्जी मंडी में लाल टमाटर खरीदते हुए मिल गए। दुआ-सलाम हुई। एक-दूसरे के हाल-चाल जानें। मित्र थोड़ा ‘परेशान मूड’ में दिखे। मैंने पूछा- ‘क्या हुआ? परेशान से नजर आ रहे हैं? घर-परिवार में सब खैरियत तो है न?’ मुझे रोड से थोड़ा साइड में ले जाकर कहने लगे- ‘यार, बहुत बुरा। बहुत ही बुरा हुआ।‘ मैंने पुनः पूछा- ‘बुरा? क्या बुरा हुआ?’ बोले- ‘हम (वामपंथी पार्टी) उत्तर प्रदेश में फिर ‘जीरो’ साबित हुए। भाजपा-सपा-कांग्रेस की जाने दीजिए हम तो बसपा के करीब तक भी न पहुंच पाए। सारी उम्मीदें पानी में मिल गईं। कॉरपोरेट पूंजीवाद फिर जीत गया।‘

मैंने बेहद कूलता के साथ उनसे कहा- ‘तो क्या हुआ? ये तो होना ही था। राजनीति की जाने दीजिए वामपंथ तो समाज और लोगों के बीच से भी ‘खारिज’ हो चुका है। नई पीढ़ी तो वामपंथ की ए बी सी डी तक नहीं जानती। वामपंथियों की हार पर भला कैसा प्रलाप?’

मेरी बात सुनकर मित्र थोड़ा भुनभुनाए- ‘बहुत ही गलत धारणा है आपके मन में वामपंथ को लेकर। आपको पता होना चाहिए, वामपंथी विचारधारा दुनिया की समस्त धाराओं में सबसे श्रेष्ठ और प्रोग्रेसिव है। आप जैसे जड़-बुद्धि लोगों ने ही हमारे वामपंथ को हर जगह ‘बदनाम’ किया हुआ है। आप खोखले पूंजीवादी हैं।‘

मित्र की ‘पीड़ा’ को मैं समझ सकता था। हारा हुआ वामपंथी अक्सर ऐसा ही बर्ताव करता है। दिमाग पर ज्यादा लोड लेने का नहीं। फिर भी मैंने अपने वामपंथी मित्र को समझाते हुए कहा- ‘देखिए जनाब, आप मुझे कह कुछ भी लीजिए लेकिन हकीकत यही है कि पूरी दुनिया में वामपंथ को ‘कोने में सरका’ दिया गया है। वाम विचारधारा पूरी तरह से ‘इरेलीवेंट’ पड़ चुकी है। और, ये सब आप लोगों की ‘यथास्थितिवादी सोच’ के कारण ही है। जब तलक आप मार्केट, अमेरिका, तकनीक को गरियाते रहेंगे, आप यों ही हाशिए पर धकेले जाते रहेंगे। स्वीकार कर लीजिए, वामपंथियों की नाक टूट चुकी है।‘

लेकिन मित्र मेरा एक भी तथ्य स्वीकार करने की स्थिति में नहीं थे। अब उनका मुझे गरियाना और अधिक बढ़ गया था। आखिर, खीझकर उन्होंने मुझे ‘राष्ट्रवादी’ घोषित कर ही दिया।

यों भी, मित्रों की बातों का ‘बुरा’ मानने का शौक मुझे नहीं है। सो, अपने वाम-मित्र के कहे का बुरा भी मैंने नहीं माना। कौन-सा बुरा मान लेने से वो या मैं अपने विचारों में बदल जाते।

फिर भी, जाते-जाते मित्र यह सलाह देना नहीं भूले कि मुझे वामपंथी विचारधारा को अभी और पढ़ने-जानने की जरूरत है। अपने दिमाग को खोलने की जरूरत है। कॉरपोरेट राजनीतिक पूंजीवाद को समझने की जरूरत है।

फिलहाल, मित्र की सलाहें सर-आंखों पर।

1 टिप्पणी:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "यूपी का माफ़िया राज और नए मुख्यमंत्री “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !